Thursday, October 8, 2026
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Judicial Officer: डॉक्टर पत्नी ने तलाक के लिए ₹1 करोड़ मांगे; न्यायिक अधिकारी ने पत्नी पर दर्ज करा दी FIR; कोर्ट ने क्यों इसे किया रद्द, पढ़िए

मुख्य बिंदु (Key Indicators)

  • तथ्यों में भारी विरोधाभास: FIR में मुख्य आरोप था कि पत्नी ₹1 करोड़ की मांग पूरी न होने तक तलाक की कार्यवाही में सहयोग करने से मना कर रही थी। हालांकि, रिकॉर्ड से यह बात सामने आई कि फैमिली कोर्ट द्वारा 8 सितंबर 2025 को ही तलाक की डिग्री मंजूर की जा चुकी थी, जबकि FIR इसके कई महीनों बाद 17 जनवरी 2026 को दर्ज कराई गई थी।
  • FIR दर्ज करने में अस्पष्ट देरी: FIR में कथित घटनाएं 26 मई 2021 से 18 नवंबर 2025 के बीच की बताई गई थीं, लेकिन किसी भी विशेष दिन, तारीख या समय का स्पष्ट उल्लेख नहीं था। इस देरी का कोई संतोषजनक कारण नहीं दिया गया।
  • तलाक की डिक्री को छुपाया जाना: न्यायिक अधिकारी पति ने अपनी एफआईआर में इस तथ्य को पूरी तरह से छुपाया कि दोनों के बीच पहले ही तलाक की डिक्री पारित हो चुकी है।
  • विफल मध्यस्थता (Mediation): मामला पहले हाईकोर्ट के मध्यस्थता केंद्र (Mediation and Conciliation Centre) को भेजा गया था, लेकिन जून 2026 की रिपोर्ट के अनुसार पक्षों के बीच कोई समझौता नहीं हो सका, जिसके बाद कोर्ट ने मेरिट के आधार पर सुनवाई की।

प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य के एक न्यायिक अधिकारी (Judicial Officer) द्वारा अपनी डॉक्टर पत्नी और दो अन्य लोगों के खिलाफ दर्ज कराई गई प्राथमिकी (FIR) को रद्द कर दिया है।

न्यायमूर्ति राजीव मिश्रा और न्यायमूर्ति डॉ. अजय कुमार-द्वितीय की खंडपीठ ने पत्नी और अन्य द्वारा दायर रिट याचिका को स्वीकार करते हुए भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज एफआईआर को पूरी तरह खारिज कर दिया। अदालत ने पाया कि यह आपराधिक कार्यवाही “सद्भावनापूर्ण (Bona fide) नहीं, बल्कि दुर्भावनापूर्ण और अदालत की प्रक्रिया का स्पष्ट दुरुपयोग” थी [डॉक्टर पत्नी एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य]।

एफआईआर रद्द करने के दो मुख्य आधार

उच्च न्यायालय ने मामले का विश्लेषण करते हुए पाया कि न्यायिक अधिकारी द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत दो गंभीर खामियों के कारण टिकने योग्य नहीं थी:

  1. एफआईआर दर्ज करने में अकारण देरी: एफआईआर में आरोप लगाया गया था कि घटनाएं 26 मई 2021 से 18 नवंबर 2025 के बीच हुईं, लेकिन किसी भी घटना की विशिष्ट तिथि, दिन या समय का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं था और न ही एफआईआर में इतनी लंबी देरी का कोई उचित कारण बताया गया था।
  2. तलाक की डिक्री और आरोप में भारी विरोधाभास: एफआईआर का मुख्य आरोप यह था कि पत्नी ₹1 करोड़ दिए बिना तलाक की कार्यवाही में सहयोग करने से इनकार कर रही थी। हालांकि, रिकॉर्ड से यह सिद्ध हुआ कि सक्षम पारिवारिक अदालत ने 8 सितंबर 2025 को ही तलाक की डिक्री पारित कर दी थी, जबकि एफआईआर इसके महीनों बाद 17 जनवरी 2026 को दर्ज कराई गई थी।

उच्च न्यायालय की सख्त टिप्पणियां

पीठ ने न्यायिक अधिकारी के आचरण और विरोधाभासों पर टिप्पणी करते हुए कहा: “एफआईआर में दर्ज कथनों में भारी विरोधाभास है। एफआईआर दर्ज होने से पहले ही सक्षम अदालत द्वारा 8 सितंबर 2025 को तलाक की डिक्री पारित की जा चुकी थी, जबकि एफआईआर 17 जनवरी 2026 को दर्ज कराई गई। यह तथ्य एफआईआर में जानबूझकर छिपाया गया।”

अदालत ने आगे कहा: “विवादित आपराधिक कार्यवाही प्रथम सूचनाकर्ता (न्यायिक अधिकारी) द्वारा किसी गुप्त मंशा (Ulterior Motive) और अनुचित लाभ के उद्देश्य से गढ़ी गई है। इस प्रकार, याचिकाकर्ताओं का आपराधिक अभियोजन सद्भावनापूर्ण नहीं, बल्कि दुर्भावनापूर्ण (Malicious) और न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।”

मामले की पृष्ठभूमि और मध्यस्थता की विफलता

  • विवाह और तलाक: पति (न्यायिक अधिकारी) ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत तलाक की अर्जी दाखिल की थी, जिसे फैमिली कोर्ट ने 8 सितंबर 2025 को स्वीकार कर लिया था।
  • एफआईआर की धाराएं: तलाक मंजूर होने के बाद 17 जनवरी 2026 को न्यायिक अधिकारी ने पत्नी व उसके परिजनों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 318(1), 115(2), 352, 308(6), 329(1), 324(4), 351(2) और 221 के तहत मामला दर्ज कराया।
  • मध्यस्थता केंद्र: इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मामले को सुलझाने के लिए ‘मध्यस्थता एवं सुलह केंद्र’ (Mediation Centre) भेजा था, लेकिन 20 जून 2026 की मध्यस्थता रिपोर्ट के अनुसार दोनों पक्षों के बीच कोई समझौता नहीं हो सका था। इसके बाद अदालत ने मामले के गुणावगुण पर सुनवाई की।

अंतिम फैसला

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने माना कि जब तलाक पहले ही दिया जा चुका था, तब तलाक के एवज में ₹1 करोड़ मांगने और सहयोग न करने का आरोप कानून और तथ्यों की दृष्टि से पूरी तरह झूठा और अस्थिर साबित होता है। तदनुसार, खंडपीठ ने रिट याचिका को मंजूर करते हुए डॉक्टर पत्नी और अन्य के खिलाफ दर्ज पूरी एफआईआर और आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।

हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी

न्यायमूर्ति राजीव मिश्रा और न्यायमूर्ति डॉ. अजय कुमार-द्वितीय की पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा: “यह स्पष्ट है कि शिकायतकर्ता (पति) द्वारा अनुचित उद्देश्यों और बाहरी कारणों से आपराधिक कार्यवाहियों को गढ़ा गया था। याचिकाकर्ताओं के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाना bona fide (सद्भावपूर्ण) नहीं है, बल्कि यह दुर्भावनापूर्ण और अदालत की प्रक्रिया का स्पष्ट दुरुपयोग है। तथ्यों और कानून दोनों के आधार पर इस एफआईआर को कायम नहीं रखा जा सकता।”

एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)

विवरणविवरण जानकारी
संबंधित अदालतइलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court)
पीठ (Bench)न्यायमूर्ति राजीव मिश्रा और न्यायमूर्ति डॉ. अजय कुमार-द्वितीय
मुख्य पक्षकारडॉक्टर पत्नी (याचिकाकर्ता) बनाम न्यायिक अधिकारी पति (प्रतिवादी)
संबंधित कानूनभारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराएं 318(1), 115(2), 352, 308(6), 329(1) आदि
अदालत का निर्णयFIR रद्द; आपराधिक कार्यवाही को दुर्भावनापूर्ण और प्रक्रिया का दुरुपयोग माना गया।
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