मुख्य बिंदु (Key Indicators)
- जैविक पिता न होना बचाव नहीं: हाईकोर्ट ने कहा कि शादी के समय (2013) पति को पत्नी के पहले बेटे की पूरी जानकारी थी। बच्चे को घर का हिस्सा स्वीकार करने के बाद यह तर्क नहीं दिया जा सकता कि वह उसका जैविक पिता नहीं है।
- भरण-पोषण राशि में भारी वृद्धि:
- पत्नी का भरण-पोषण: ₹8,000 से बढ़ाकर ₹10,000 प्रति माह किया गया।
- नाबालिग बेटी का भरण-पोषण: ₹6,000 से बढ़ाकर ₹30,000 प्रति माह किया गया।
- पहले बेटे का भरण-पोषण: बालिग होने (23 नवंबर 2025 तक/वयस्क होने तक) आवेदन की तिथि से ₹10,000 प्रति माह तय किया गया।
- पति की आय का आकलन: पति की ग्रॉस सैलरी ₹2.01 लाख और नेट इनकम कटौती के बाद ₹1.06 लाख थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल वैध और अनुमति योग्य कटौतियों को छोड़कर पति की प्रभावी मासिक आय ₹1.5 लाख से अधिक मानी जाएगी।
- सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार: सुप्रीम कोर्ट के नज़ीर (Rajnesh v. Neha व Deepa Joshi v. Gaurav Joshi) का हवाला देते हुए कोर्ट ने दोहराया कि पति का यह कर्तव्य है कि वह पत्नी और बच्चों को उसी जीवन स्तर पर रखे जो उन्होंने वैवाहिक जीवन के दौरान अनुभव किया था।
नैनीताल: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने भरण-पोषण (Maintenance) से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में व्यवस्था दी है कि यदि कोई व्यक्ति यह जानते हुए महिला से विवाह करता है कि उसके पिछले विवाह से एक बेटा है, और वह उस बच्चे को अपने वैवाहिक परिवार के हिस्से के रूप में स्वीकार करता है, तो वह बाद में यह कहकर जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकता कि वह बच्चे का जैविक पिता (Biological Father) नहीं है।
न्यायमूर्ति आलोक महरा की एकल पीठ ने हरिद्वार की पारिवारिक अदालत (Family Court) के आदेश को संशोधित करते हुए पत्नी, नाबालिग बेटी और सौतेले बेटे के पक्ष में भरण-पोषण की राशि में वृद्धि की और बेटे को भी भरण-पोषण पाने का हकदार ठहराया।
उच्च न्यायालय की मुख्य टिप्पणियां
पीठ ने पारिवारिक अदालत के फैसले में त्रुटि पाते हुए कहा: “यह दलील कि याचिकाकर्ता संख्या 2 (बेटा) उसका जैविक पुत्र नहीं है, अपने आप में उसके भरण-पोषण की जिम्मेदारी से पूरी तरह मुकरने का आधार नहीं बन सकती। पारिवारिक अदालत के विद्वान न्यायाधीश ने केवल इस आधार पर बेटे के भरण-पोषण के दावे को खारिज करने में भूल की कि प्रतिवादी उसका जैविक पिता नहीं है।”
अदालत ने आगे कहा: “ऐसी परिस्थितियों में, जब प्रतिवादी ने बच्चे के अस्तित्व की पूरी जानकारी होने के बावजूद महिला से विवाह करना चुना और बच्चे को वैवाहिक परिवार के हिस्से के रूप में स्वीकार किया, तो वह उस जिम्मेदारी से बचने की कोशिश नहीं कर सकता जो उसने स्वेच्छा से बच्चे के प्रति उठाई थी।”
पारिवारिक अदालत का आदेश और विवाद
- विवाह (2013): पक्षों का विवाह वर्ष 2013 में हुआ था। पति को पूरी जानकारी थी कि पत्नी का पिछले विवाह से एक बेटा है और यह सहमति थी कि बेटा पत्नी के साथ ही रहेगा। बाद में दोनों की एक बेटी भी हुई।
- सीआरपीसी की धारा 125 के तहत अर्जी: वैवाहिक विवाद के बाद पत्नी ने अपने, अपनी बेटी और अपने बेटे के लिए भरण-पोषण की मांग की थी।
- फैमिली कोर्ट का फैसला: पारिवारिक अदालत ने पत्नी को ₹8,000 प्रति माह और नाबालिग बेटी को ₹6,000 प्रति माह देने का आदेश दिया, लेकिन बेटे का दावा केवल इसलिए खारिज कर दिया क्योंकि पति उसका जैविक पिता नहीं था। इसके खिलाफ हाईकोर्ट में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (Criminal Revision) दायर की गई।
वित्तीय स्थिति और आय का विश्लेषण
- पति की आय: वेतन पर्ची (नवंबर 2025) के अनुसार पति का सकल वेतन (Gross Salary) ₹2,01,843 और कटौतियों के बाद शुद्ध वेतन ₹1,06,654 प्रति माह था। गैर-जरूरी कटौतियों को हटाने के बाद उसकी प्रभावी मासिक आय ₹1.5 लाख से अधिक आंकी गई।
- पत्नी की आय: पति ने दलील दी कि पत्नी भी नौकरी कर रही है और ₹55,000 से ₹58,000 प्रति माह कमा रही है।
- ‘रजनेश बनाम नेहा’ के तहत हलफनामा: सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के तहत दाखिल संपत्ति और देनदारी के हलफनामों की जांच के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि पति पर ऐसी कोई बड़ी देनदारी नहीं है जो उसकी भरण-पोषण देने की क्षमता को प्रभावित करती हो।
भरण-पोषण राशि में संशोधन (संशोधित आदेश)
उच्च न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के दीपा जोशी बनाम गौरव जोशी फैसले का हवाला देते हुए—जिसमें कहा गया है कि पति का कर्तव्य है कि वह पत्नी को वैवाहिक जीवन के समान गरिमापूर्ण जीवन स्तर सुनिश्चित करे—भरण-पोषण की राशि को इस प्रकार संशोधित किया:
- पत्नी के लिए: भरण-पोषण ₹8,000 से बढ़ाकर ₹10,000 प्रति माह किया गया।
- नाबालिग बेटी के लिए: भरण-पोषण ₹6,000 से बढ़ाकर ₹30,000 प्रति माह किया गया।
- बेटे के लिए (जन्म तिथि 23 नवंबर 2007): अर्जी दाखिल करने की तिथि से लेकर उसके वयस्क (Majority) होने की तिथि तक ₹10,000 प्रति माह का भुगतान करने का निर्देश दिया गया।
हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
न्यायमूर्ति आलोक मेहरा ने फैसला सुनाते हुए कहा: “ऐसी परिस्थितियों में, जब पति ने बच्चे की मौजूदगी की पूरी जानकारी रखते हुए शादी की और बच्चे को अपने वैवाहिक घर के हिस्से के रूप में स्वीकार किया, तो वह बाद में अपनी स्वेच्छा से उठाई गई जिम्मेदारी से भाग नहीं सकता। केवल यह तर्क कि वह बच्चे का जैविक पिता नहीं है, भरण-पोषण की जिम्मेदारी से पूरी तरह मुक्त होने का आधार नहीं बन सकता। पारिवारिक अदालत ने केवल इस आधार पर बेटे का दावा खारिज करके गलती की थी।”
एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)
| विवरण | विवरण जानकारी |
| संबंधित अदालत | उत्तराखंड उच्च न्यायालय (High Court of Uttarakhand) |
| पीठ (Bench) | न्यायमूर्ति आलोक मेहरा (Justice Alok Mahra) |
| मूल मामला | दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की मांग |
| अदालत का आदेश | फैमिली कोर्ट का फैसला संशोधित; पति को पत्नी, बेटी और पहले बेटे तीनों को भरण-पोषण देने का आदेश। |

