मुख्य बिंदु (Key Indicators)
- जबरन सहमति असंवैधानिक: राज्य सरकार केवल तब बैनामे (Sale Deed) के जरिए जमीन खरीद सकती है जब जमीन मालिक अपनी स्वेच्छा से बेचने के लिए तैयार हो और दोनों पक्ष परस्पर सहमत मूल्य (Mutually Agreed Price) पर सहमत हों।
- सहमति न होने पर उचित अधिग्रहण कानून लागू होगा: यदि भूमि स्वामी आपसी सहमति से जमीन बेचने से इनकार करता है, तो सरकार को भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन अधिनियम, 2013 (Right to Fair Compensation, LARR Act, 2013) के तहत वैधानिक अधिसूचना जारी कर कानूनी प्रक्रिया का पालन करना होगा।
- किसान/जमीन मालिकों को राहत: हाईकोर्ट ने प्रशासन को सख्त निर्देश दिए हैं कि याचिकाकर्ताओं को परेशान न किया जाए और बैनामा कराने के लिए जबरन उनकी सहमति न ली जाए।
लखनऊ: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में व्यवस्था दी है कि सरकारी प्राधिकरण भूमि अधिग्रहण के लिए निजी भूस्वामियों को बैनामा (Sale Deed) निष्पादित करने के लिए बाध्य या मजबूर नहीं कर सकते।
न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि सहमति से की जाने वाली ‘स्वैच्छिक बिक्री’ (Voluntary Sale) और कानून के तहत होने वाला ‘अनिवार्य भूमि अधिग्रहण’ (Compulsory Acquisition) दो पूरी तरह अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं हैं।
मुख्य कानूनी बिंदु व सिद्धांत
- सहमति अनिवार्य: अदालत ने कहा कि बिक्री विलेख (Sale Deed) के माध्यम से भूमि तभी खरीदी जा सकती है जब भूस्वामी स्वेच्छा से बेचने के लिए सहमत हो और दोनों पक्ष बिक्री मूल्य पर पूरी तरह सहमत हों।
- सहमति न होने पर वैधानिक प्रक्रिया: यदि भूस्वामी सहमति नहीं देता है, तो सरकार को भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकार और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 (LARR Act, 2013) के तहत अनिवार्य वैधानिक प्रक्रिया का पालन करना होगा।
- उत्पीड़न पर रोक: अदालत ने प्रशासनिक अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ताओं को परेशान न करें और न ही बैनामा निष्पादित करने के लिए उनकी सहमति जबरन प्राप्त करने का प्रयास करें।
पीठ की मुख्य टिप्पणी
उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा: “इस मुद्दे पर कानून पूरी तरह स्पष्ट है। यदि भूस्वामी अपनी जमीन बेचने के इच्छुक हैं और राज्य सरकार बातचीत के जरिए बिक्री मूल्य पर समझौते पर पहुंचने में सक्षम है, तो वे राज्य को संपत्ति बेच सकते हैं। हालांकि, ऐसी सहमति के अभाव में राज्य को 2013 के भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत अधिसूचना जारी करनी होगी और कानून के अनुसार भूमि का अधिग्रहण करना होगा। प्राधिकारी याचिकाकर्ताओं को प्रताड़ित न करें और न ही उनसे जबरन सहमति लें।””
मामले की पृष्ठभूमि
- सड़क चौड़ीकरण परियोजना: यह मामला बलरामपुर जिले के देवीपाटन तुलसीपुर गांव में सड़क चौड़ीकरण के लिए भूमि अधिग्रहण से जुड़ा है।
- अखिलेश कुमार पंकज व अन्य की याचिका: याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि वे अपनी जमीन नहीं बेचना चाहते हैं, लेकिन प्रशासन उन्हें उस दर (Rate) पर जमीन बेचने के लिए मजबूर कर रहा है जो उन्हें कतई स्वीकार्य नहीं है।
- राज्य सरकार का पक्ष: सरकार की ओर से दलील दी गई कि सड़क चौड़ीकरण के लिए लगभग 80 प्रतिशत जमीन 104 भूस्वामियों से बैनामे के जरिए पहले ही खरीदी जा चुकी है, लेकिन वर्तमान याचिकाकर्ताओं से संपर्क या सहमति नहीं बन पाई थी।
उच्च न्यायालय का अंतिम निर्देश
- प्रशासन याचिकाकर्ताओं पर बैनामा करने के लिए किसी भी प्रकार का अनुचित दबाव या जबरदस्ती न बनाए।
- यदि कोई याचिकाकर्ता स्वेच्छा से जमीन बेचना चाहे, तभी नियमानुसार बैनामा किया जाए।
- असहमति की स्थिति में सरकार केवल 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून के तहत उचित मुआवजा देकर ही वैधानिक अधिग्रहण की प्रक्रिया आगे बढ़ा सकती है।
मामले के मुख्य तथ्य और कानून की स्थिति
यह याचिका बलरामपुर के देवीपाटन तुलसीपुर गांव में सड़क चौड़ीकरण परियोजना से प्रभावित अखिलेश कुमार पंकज और 7 अन्य ग्रामीणों द्वारा दायर की गई थी।
राज्य सरकार का पक्ष: राज्य सरकार ने तर्क दिया कि सड़क चौड़ीकरण के लिए 80% जमीन आपसी बैनामे के जरिए पहले ही खरीदी जा चुकी है और 104 से अधिक रजिस्ट्रियां हो चुकी हैं। लेकिन याचिकाकर्ता अधिकारियों से सहयोग नहीं कर रहे थे।
याचिकाकर्ताओं का तर्क: याचिकाकर्ताओं का कहना था कि वे दी जा रही कम दरों पर अपनी जमीन बेचने के इच्छुक नहीं हैं, लेकिन प्रशासनिक अधिकारी उन पर बैनामा करने का अनुचित दबाव बना रहे हैं।
हाईकोर्ट का वैधानिक विश्लेषण
न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी की पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा: “कानून इस विषय पर बिल्कुल स्पष्ट है। यदि भूमि स्वामी बेचने का इच्छुक है और राज्य सरकार बातचीत के जरिए मूल्य तय कर लेती है, तो संपत्ति बेची जा सकती है। लेकिन ऐसी सहमति के अभाव में, राज्य सरकार को 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून के तहत अधिसूचना जारी कर कानून के अनुसार ही अधिग्रहण प्रक्रिया पूरी करनी होगी।” कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई याचिकाकर्ता अपनी इच्छा से संपत्ति बेचना चाहता है तो कानूनन बैनामा किया जा सकता है, लेकिन किसी को भी इसके लिए विवश नहीं किया जा सकता।
एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)
| विवरण | विवरण जानकारी |
| केस शीर्षक | अखिलेश कुमार पंकज व अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (Akhilesh Kumar Pankaj & Ors. v. State of U.P.) |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (लखनऊ पीठ) |
| पीठ (Bench) | न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी |
| स्थान / परियोजना | बलरामपुर जिले के देवीपाटन तुलसीपुर गांव में सड़क चौड़ीकरण हेतु भूमि अधिग्रहण |
| मुख्य आदेश | जमीन मालिकों को प्रताड़ित न करें; सहमति न होने पर भूमि अधिग्रहण कानून, 2013 के तहत कार्रवाई करें। |

