मुख्य बिंदु (Key Indicators)
- सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों का हवाला: हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक बुद्धदेव कर्माकर मामले का उल्लेख किया, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि वयस्क सहमति से सेक्स वर्क करना अवैध नहीं है, केवल वेश्यागृह (Brothel) चलाना या दूसरों को उसमें धकेलना कानूनन अपराध है।
- पुलिस की छापेमारी पर रोक: सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार जब भी किसी जगह छापेमारी की जाती है, तो वयस्क सहमति से काम करने वाली सेक्स वर्करों को गिरफ्तार, प्रताड़ित या दंडित नहीं किया जाना चाहिए।
- निर्दोष महिला को फंसाने का तर्क: याचिकाकर्ता महिला ने कहा कि छापेमारी के समय वह होटल हयात में मौजूद ही नहीं थी। उसे बाद में थाने बुलाकर झूठा फंसाया गया था।
- कोई विशिष्ट स्वतंत्र अपराध नहीं: रिकॉर्ड पर ऐसी कोई सामग्री या आरोप मौजूद नहीं था जिससे यह साबित हो सके कि याचिकाकर्ता ने सेक्स वर्कर होने की स्थिति के अलावा कोई स्वतंत्र अपराध किया था।
बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सेक्स वर्कर्स के अधिकारों और गरिमा के संरक्षण पर एक अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि कोई सेक्स वर्कर बालिग (Adult) है और आपसी सहमति से इस कार्य में शामिल है, तो पुलिस को किसी भी प्रकार की आपराधिक कार्रवाई या हस्तक्षेप से बचना चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने सीआरपीसी की धारा 482 के तहत दायर याचिका को स्वीकार करते हुए अनैतिक देह व्यापार (रोकथाम) अधिनियम, 1956 (ITP Act) की धारा 3, 4, 5 और 7 के तहत दर्ज प्राथमिकी (FIR) और आरोप-पत्र को पूरी तरह रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में कानूनी कार्यवाही जारी रखना महिला को उसी उत्पीड़न का शिकार बनाना होगा, जिसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने सख्त दिशा-निर्देश जारी किए हैं।
उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष
- आपसी सहमति और वयस्कता का सिद्धांत: न्यायालय ने कहा कि आपराधिक कानून उम्र और सहमति (Age and Consent) के आधार पर समान रूप से लागू होना चाहिए। यदि सेक्स वर्कर वयस्क है और अपनी मर्जी से काम कर रही है, तो वह कानून के समान संरक्षण की हकदार है।
- कोठा (Brothel) चलाना गैरकानूनी, स्वैच्छिक सेक्स वर्क नहीं: अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून के तहत वेश्यालय चलाना या किसी से जबरन देह व्यापार कराना अपराध है, लेकिन वयस्क द्वारा स्वेच्छा से सेक्स वर्क करना अपराध की श्रेणी में नहीं आता।
- छापेमारी के दौरान उत्पीड़न पर रोक: यदि पुलिस किसी होटल या संदिग्ध स्थान पर छापा मारती है, तो वहां मौजूद सेक्स वर्कर को गिरफ्तार, दंडित, प्रताड़ित या पीड़ित नहीं बनाया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के नज़ीर का हवाला
खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले बुद्धदेव करमास्कर बनाम पश्चिम बंगाल राज्य एवं अन्य [Criminal Appeal No. 135/2010] का हवाला देते हुए रेखांकित किया:
“सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि जहां यह स्पष्ट हो कि सेक्स वर्कर वयस्क है और सहमति से भाग ले रही है, पुलिस को हस्तक्षेप करने या कोई आपराधिक कार्रवाई करने से बचना चाहिए। जब भी किसी स्थान पर छापा मारा जाए, तो संबंधित सेक्स वर्कर्स को गिरफ्तार या प्रताड़ित नहीं किया जाना चाहिए।”
मामले की पृष्ठभूमि और आरोप
- रायपुर के होटल में छापा: रायपुर पुलिस ने होटल हयात में छापेमारी के बाद अनैतिक देह व्यापार निवारण अधिनियम (ITP Act) की विभिन्न धाराओं (धारा 3, 4, 5, 7) के तहत मामला दर्ज किया था।
- याचिकाकर्ता की दलील: याचिकाकर्ता महिला ने कहा कि छापेमारी के समय वह होटल में मौजूद ही नहीं थी। उसे बाद में थाने बुलाया गया और सेक्स वर्कर होने के आधार पर झूठा फंसा दिया गया।
- साक्ष्यों का अभाव: अदालत ने रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद पाया कि याचिकाकर्ता पर केवल एक सेक्स वर्कर होने का आरोप लगाने के अलावा ऐसा कोई विशिष्ट साक्ष्य या आरोप नहीं था, जो अधिनियम के तहत किसी स्वतंत्र अपराध के आवश्यक तत्वों को पूरा करता हो।
अंतिम आदेश
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्ता के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखने का कोई औचित्य नहीं है और यह सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के विपरीत एक वयस्क महिला को प्रताड़ित करने जैसा होगा। तदनुसार, पीठ ने याचिका स्वीकार करते हुए याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी, गिरफ्तारी और दायर आरोप-पत्र सहित पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द (Quash) कर दिया।
हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा: जहां यह स्पष्ट है कि सेक्स वर्कर वयस्क है और अपनी सहमति से भाग ले रही है, पुलिस को हस्तक्षेप करने या कोई आपराधिक कार्रवाई करने से बचना चाहिए। इस मामले में आपराधिक कार्यवाही को जारी रखने का कोई उपयोगी उद्देश्य सिद्ध नहीं होगा और यह एक वयस्क महिला को उसी उत्पीड़न का शिकार बनाने के समान होगा जिसके खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय ने विशिष्ट दिशानिर्देश जारी किए हैं।”
एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)
| विवरण | विवरण जानकारी |
| संबंधित अदालत | छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय (Chhattisgarh High Court) |
| पीठ (Bench) | मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल |
| संबंधित कानून | अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम, 1956 (PITA) की धाराएं 3, 4, 5 और 7 |
| मुख्य नजीर | बुद्धदेव कर्माकर बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (सुप्रीम कोर्ट) |
| अदालत का निर्णय | याचिका स्वीकार; महिला के खिलाफ दर्ज एफआईआर और सभी आपराधिक कार्यवाहियां निरस्त। |

