मुख्य बिंदु (Key Indicators)
- चैट बनी अहम साक्ष्य: अदालत ने अभियुक्त माँ द्वारा पेश की गई चैट (अनुबंधित चैट अनुवाद) का अवलोकन किया और कहा कि यह शिकायतकर्ता के आचरण और व्यवहार को खुद ब खुद स्पष्ट करती है और आरोपों में कोई विश्वसनीयता नहीं छोड़ती।
- शादी का वादा झूठा साबित: चार्जशीट में मौजूद शिकायतकर्ता के पिता के बयान से यह सामने आया कि शिकायतकर्ता पहले से शादीशुदा थी और अपने पति से अलग रह रही थी। चूंकि तलाक का कोई प्रमाण नहीं था, इसलिए किसी अन्य पुरुष द्वारा उससे शादी का वादा करने और उस पर विश्वास करने का दावा कानूनी रूप से मान्य नहीं ठहराया जा सकता।
- आपराधिक संलिप्तता का अभाव: आरोप था कि बेटे ने शादी का झांसा देकर शारीरिक संबंध बनाए और कार बेचकर पैसे हड़पे, जिसमें माँ ने साजिश रची। कोर्ट ने पाया कि दोनों वयस्क थे और उनके बीच सहमति से संबंध थे। इसमें माँ को घसीटना पूरी तरह गलत था।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बेटे द्वारा शादी का झूठा वादा कर शारीरिक संबंध बनाने और धोखाधड़ी करने के मामले में सह-आरोपी बनाई गई मां के खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है।
न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने अपीलकर्ता मां द्वारा सीआरपीसी की धारा 482 के तहत दायर याचिका को स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया। न्यायालय ने पाया कि बेटे और शिकायतकर्ता महिला के बीच हुई वॉट्सऐप/मैसेज चैट की प्रतियां शिकायतकर्ता के आचरण को स्पष्ट रूप से दर्शाती हैं और पूरे आरोप में कोई विश्वसनीयता नजर नहीं आती।
शीर्ष अदालत की मुख्य टिप्पणियां
पीठ ने रिकॉर्ड पर मौजूद चैट और चार्जशीट के साक्ष्यों का विश्लेषण करते हुए कहा: “हमने अनुलग्नक P1 (Annexure P1) का अवलोकन किया है, जो अपीलकर्ता द्वारा प्रस्तुत की गई उसके बेटे और शिकायतकर्ता के बीच की चैट्स की अनुवादित प्रतियां हैं। ये चैट्स शिकायतकर्ता के आचरण के बारे में बहुत कुछ बयां करती हैं। हम इससे अधिक कुछ नहीं कहेंगे, केवल इतना कहना पर्याप्त है कि हमारे अनुसार पूरे आरोप कोई विश्वास पैदा नहीं करते।”
शादी के वादे के झूठे दावे पर अदालत ने कहा: “जहां शादी के वादे का आरोप लगाया गया है, वहीं यह ध्यान देना प्रासंगिक है कि चार्जशीट में मौजूद शिकायतकर्ता के पिता का बयान ही यह दर्शाता है कि शिकायतकर्ता पहले से शादीशुदा थी और अपने पति से अलग रह रही थी। तलाक होने के संबंध में रिकॉर्ड पर कुछ भी नहीं कहा गया है। ऐसी स्थिति में शादी के वादे के झांसे में आने का आरोप कतई स्वीकार करने योग्य नहीं है।”
मामले की पृष्ठभूमि और आरोप
- शिकायतकर्ता का दावा: शिकायतकर्ता महिला ने आरोप लगाया था कि अपीलकर्ता के बेटे ने उससे शादी का वादा किया था और अपीलकर्ता (मां) ने भी शादी के इस वादे में अपने बेटे की सक्रिय रूप से मदद की।
- गंभीर आरोप: महिला का आरोप था कि शादी के इस वादे के आधार पर बेटे ने उससे शारीरिक संबंध बनाए और उसकी कार बेचकर बड़ी रकम हड़प ली।
- निचली अदालतों से सुप्रीम कोर्ट: महिला की शिकायत पर मां को भी साजिश और मिलीभगत के आरोप में सह-आरोपी बनाया गया था, जिसके खिलाफ मां ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी।
False FIR: अदालत के निष्कर्ष व कानूनी तर्क
- सहमति से संबंध (Consensual Relationship): पीठ ने प्रथम सूचना बयान (First Information Statement – FIS) का अवलोकन करते हुए पाया कि दोनों के बीच संबंध पूरी तरह आपसी सहमति से बने थे।
- सख्त शर्तों और मतभेदों का इतिहास: अदालत ने एफआईएस के एक हिस्से का हवाला देते हुए नोट किया कि दोनों साथ यात्रा कर रहे थे और जब बेटा एक अदालती कार्यवाही में शामिल होने के लिए कार से उतरा, तो महिला ने शादी के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था। बाद में उसने बेटे द्वारा सुधरने का वादा करने पर फिर सहमति दी।
- मां को घसीटना अनुचित: पीठ ने माना कि जिस व्यक्ति पर मुख्य आरोप हैं, केवल उसकी मां होने के नाते अपीलकर्ता को आपराधिक कार्यवाही में नहीं लपेटा जा सकता।
अंतिम आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने मां के खिलाफ मामला जारी रखने का कोई ठोस आधार न पाते हुए आदेश दिया:
- अपीलकर्ता (मां) के खिलाफ लंबित सभी आपराधिक कार्यवाहियां पूरी तरह रद्द की जाती हैं।
- यदि अपीलकर्ता जेल में है, तो उसे तत्काल रिहा किया जाए और यदि वह जमानत पर है, तो उसके जमानत बांड निरस्त माने जाएं।
सुप्रीम कोर्ट का वैधानिक दृष्टिकोण
पीठ ने प्रथम सूचना विवरण (First Information Statement) की समीक्षा करते हुए कहा: “शिकायतकर्ता के पिता का बयान खुद यह दर्शाता है कि शिकायतकर्ता पहले से शादीशुदा थी और पति से अलग रह रही थी। कानूनी रूप से तलाक मिलने का कोई जिक्र नहीं है, ऐसे में शादी के वादे के बहकावे में आने का आरोप बिल्कुल भी विश्वसनीय नहीं माना जा सकता। बेटे के खिलाफ लगाए गए इन आरोपों में माँ को घसीटा नहीं जा सकता। पूरी कार्यवाही देखने के बाद यह आरोपों पर जरा भी विश्वास पैदा नहीं करती।” कोर्ट ने आदेश दिया कि याचिकाकर्ता माँ के खिलाफ लंबित सभी आपराधिक कार्यवाहियों को तुरंत निरस्त (Quash) किया जाए और उनके जमानत बांड समाप्त किए जाएं।
False FIR: एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)
| विवरण | विवरण जानकारी |
| संबंधित अदालत | सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ (Bench) | न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन |
| मूल आवेदन | दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482 के तहत कार्यवाही रद्द करने की याचिका |
| मुख्य आदेश | माँ (याचिकाकर्ता) के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही पूरी तरह रद्द; यदि हिरासत में हैं तो तुरंत रिहाई के निर्देश। |

