Wednesday, October 28, 2026
HomeScam NosePlea Of Dead Person: याचिका दायर होने के 33 साल बाद पता...

Plea Of Dead Person: याचिका दायर होने के 33 साल बाद पता चला; 5 साल पहले मर गया था वो…मृत व्यक्ति के नाम पर दायर याचिका पर यह किया

हाईकोर्ट का कड़ा फैसला और निष्कर्ष

  • ‘अस्वच्छ हाथों से कोर्ट का रुख’ (Unclean Hands): अदालत ने पाया कि मरियप्पा के वारिसों ने ट्रिब्यूनल और कोर्ट से मृत्यु की सटीक तारीख छुपाकर रखी। पीठ ने कहा कि जो पक्षकार अदालत के समक्ष सत्य छुपाकर अस्वच्छ हाथों (Unclean Hands) से आते हैं, वे संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत किसी भी न्यायसंगत राहत के हकदार नहीं हैं।
  • 1981 का मूल आदेश हुआ बहाल: हाईकोर्ट ने माना कि 1993 की याचिका कानूनी रूप से अमान्य थी, इसलिए उस पर आधारित 2001 का हाईकोर्ट का रिमांड आदेश भी कानून की नजर में शून्य है। इसके चलते निंगम्मा को अधिभोग अधिकार देने वाला 9 नवंबर 1981 का मूल आदेश फिर से बहाल होकर अंतिम (Final) हो गया।
  • ₹10,000 का जुर्माना: अदालत ने याचिकाकर्ताओं पर ₹10,000 का जुर्माना लगाया, जिसे कर्नाटक राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण (KSLSA) में जमा करने का निर्देश दिया गया है।

बेंगलुरु: कर्नाटक हाईकोर्ट के समक्ष एक बेहद विचित्र और चौंकाने वाला विधिक मामला सामने आया है, जहां भूमि विवाद को लेकर 33 साल पहले (1993 में) दायर की गई एक रिट याचिका वास्तव में ऐसे व्यक्ति के नाम पर दाखिल की गई थी, जिसकी मृत्यु याचिका दायर होने से 5 साल पहले (1988 में) ही हो चुकी थी।

न्यायमूर्ति ई.एस. इंदीरेश की एकल पीठ ने इसे “काफी अजीब” और न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग मानते हुए याचिकाकर्ता के कानूनी वारिसों द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया और उन पर ₹10,000 का जुर्माना (Costs) लगाया, जिसे कर्नाटक राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (KSLSA) में जमा करने का निर्देश दिया गया है [मारियप्पा बनाम लैंड ट्रिब्यूनल एवं अन्य]।

उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक टिप्पणियां

1. मृत व्यक्ति के नाम पर याचिका विधि सम्मत नहीं मृत व्यक्ति के पावर ऑफ अटॉर्नी धारक द्वारा याचिका दायर किए जाने पर अदालत ने कहा:

  • यह अत्यंत विचित्र है कि सी. मारियप्पा की मृत्यु 8 अगस्त 1988 को हो चुकी थी, फिर भी 1993 में उनके जीपीए (GPA) धारक के माध्यम से उनके नाम पर रिट याचिका दायर की गई।
  • किसी मृत व्यक्ति के नाम पर रिट याचिका को वैध रूप से संस्थित (Instituted) नहीं माना जा सकता। इसके संबंध में याचिकाकर्ताओं के वकील की ओर से कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया।

2. तथ्यों को छिपाना और ‘Unclean Hands’ का सिद्धांत अदालत ने रेखांकित किया

  • मारियप्पा के कानूनी वारिसों ने बाद की कार्यवाहियों में भी उनकी मृत्यु की सटीक तारीख का खुलासा नहीं किया। ट्रिब्यूनल के समक्ष दायर हलफनामे में केवल यह अस्पष्ट बात कही गई कि उनकी मृत्यु “बहुत पहले” हो गई थी।
  • अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा: “अदालत के समक्ष अस्वच्छ हाथों (Unclean Hands) से आने के कारण, याचिकाकर्ता भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत किसी भी साम्यिक अनुतोष (Equitable Relief) के हकदार नहीं हैं।”

Also Read this: Public-spirited persons: देश में शक्तिशाली लोगों के खिलाफ भ्रष्टाचार का केस दर्ज कराना लगभग असंभव; IAS अफसरों पर केस मामले को समझें

मामले की पृष्ठभूमि और 45 वर्षों का भूमि विवाद (1981-2026)

  • विवादित भूमि: यह विवाद मांड्या जिले के श्रीरंगपट्टना तालुक स्थित बेलावाड़ी गांव की 4 एकड़ 21 गुंटा भूमि के अधिभोग अधिकारों (Occupancy Rights) से जुड़ा है।
  • 1981 का मूल आदेश: 9 नवंबर 1981 को लैंड ट्रिब्यूनल ने उक्त भूमि के अधिभोग अधिकार सी. निंगम्मा को प्रदान किए थे।
  • 1993 की फर्जी रिट याचिका और 2001 का रिमांड: मारियप्पा के नाम पर 1993 में हाईकोर्ट में इस आदेश को चुनौती दी गई। हाईकोर्ट ने अक्टूबर 2001 में उस याचिका को स्वीकार करते हुए मामले को नए सिरे से विचार के लिए लैंड ट्रिब्यूनल को वापस (Remand) भेज दिया।
  • वारिसों की नई चुनौती (2023-2026): मार्च 2023 में लैंड ट्रिब्यूनल के फैसले के बाद मारियप्पा के वारिसों ने फिर से हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और दावा किया कि ट्रिब्यूनल ने उन्हें सुने बिना उनकी पीठ पीछे आदेश पारित किया।

प्रतिवादी का तर्क और धोखाधड़ी का खुलासा

  • निंगम्मा के कानूनी वारिसों (निजी प्रतिवादियों) की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने अदालत का ध्यान आकर्षित किया कि जिस 1993 की रिट याचिका के आधार पर हाईकोर्ट ने 2001 में रिमांड आदेश दिया था, वह मूल याचिका ही अमान्य (Nullity) थी क्योंकि मारियप्पा की मृत्यु 1988 में ही हो गई थी।
  • हाईकोर्ट ने पाया कि मृत व्यक्ति द्वारा पावर ऑफ अटॉर्नी खत्म हो जाती है और उनके नाम पर कोई मुकदमा दाखिल नहीं हो सकता था।

हाईकोर्ट का अंतिम आदेश

  1. 2001 का रिमांड आदेश शून्य घोषित: अदालत ने फैसला सुनाया कि चूंकि 1993 की मूल रिट याचिका अमान्य थी, इसलिए उस पर पारित हाईकोर्ट का 2001 का रिमांड आदेश भी विधिक रूप से अप्रभावी और शून्य था।
  2. 1981 का मूल आदेश बहाल: लैंड ट्रिब्यूनल द्वारा 9 नवंबर 1981 को निंगम्मा के पक्ष में पारित मूल आदेश स्वतः बहाल हो गया है और उसने अंतिमता (Finality) प्राप्त कर ली है।
  3. ₹10,000 का जुर्माना: गलत तथ्यों और अपारदर्शिता के साथ मुकदमेबाजी जारी रखने के लिए मारियप्पा के वारिसों पर ₹10,000 का हर्जाना लगाया गया।

विधिक प्रतिनिधित्व

  • याचिकाकर्ताओं (मारियप्पा के वारिसों) की ओर से: अधिवक्ता के.एन. नितीश।
  • राज्य सरकार एवं लैंड ट्रिब्यूनल की ओर से: अतिरिक्त शासकीय अधिवक्ता (AGA) शारदा एच.वी.।
  • निजी प्रतिवादियों (निंगम्मा के वारिसों) की ओर से: अधिवक्ता यथिन बी. के निर्देश पर वरिष्ठ अधिवक्ता पी.पी. हेगड़े।

Plea Of Dead Person: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतकर्नाटक उच्च न्यायालय (Karnataka High Court)
पीठासीन न्यायाधीशन्यायमूर्ति ई.एस. इंदिरेश (Justice ES Indiresh)
केस का नामMariappa Vs Land Tribunal
विवादित भूमिश्रीरंगपटन तालुक के बेलवाड़ी गांव की 4 एकड़ 21 गुंटा जमीन
अदालत का निर्णय2001 का हाईकोर्ट आदेश रद्द; 1981 का ट्रिब्यूनल आदेश बहाल और वारिसों पर ₹10,000 जुर्माना।
RELATED ARTICLES

Most Popular

Patna
overcast clouds
27.7 ° C
27.7 °
27.7 °
51 %
0.8kmh
100 %
Wed
29 °
Thu
22 °
Fri
21 °
Sat
28 °
Sun
29 °

Recent Comments