किस मामले में आई यह टिप्पणी?
- यह कठोर टिप्पणी जज दिवाकर ने वर्ष 2018 में अपनी पत्नी पर केरोसिन डालकर उसे जिंदा जला देने वाले आरोपी नदीम को फांसी की सजा सुनाते हुए की।
- कोर्ट ने अपराध की विभीषिका पर टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी महिला को जलाकर मारना न केवल उसके जीवन का अंत है, बल्कि उसे असहनीय शारीरिक पीड़ा और भय में धकेलना है। ऐसे जघन्य अपराधों में मृत्युदंड देना ही कानून का डर बनाए रखने के लिए अनिवार्य है।
मुजफ्फरनगर: उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में पिछले 5 महीनों में 11 मामलों में 23 दोषियों को मृत्युदंड (Death Penalty) की सजा सुनाकर चर्चा में आए अपर सत्र न्यायाधीश (ASJ) रवि कुमार दिवाकर ने अपनी अदालत से करीब 100 आपराधिक मामलों के प्रशासनिक स्थानांतरण (Case Transfer) पर बेहद गंभीर और सनसनीखेज टिप्पणियां की हैं।
न्यायाधीश दिवाकर ने हत्या के एक मामले में फैसला सुनाते हुए हिंदी में दर्ज अपने आदेश में कहा कि उनकी अदालत से करीब 97-100 गंभीर मुकदमों को वापस लेने के पीछे का मुख्य उद्देश्य माफिया, दबंगों और अपराधियों को संरक्षण देना था।
फैसले में न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर की प्रमुख टिप्पणियां
1. “कायर न्यायाधीश कहलाने के बजाय मरना पसंद करूंगा”
अपराधियों और माफियाओं के दबाव पर कड़ा प्रहार करते हुए जज ने लिखा: “यदि मैं माफिया/दबंग/अपराधियों जैसी शक्तियों से डरने लगूं, तो मेरे लिए इस पवित्र न्यायिक संस्थान से इस्तीफा देना ही उचित होगा। मैं एक कायर न्यायाधीश कहलाने के बजाय मरना पसंद करूंगा। मैं तब तक सेवा करूंगा जब तक अपने सिद्धांतों पर कायम रह सकता हूं; अन्यथा, मैं इस्तीफा दे दूंगा। जब तक मैं न्यायाधीश की कुर्सी पर बैठा हूं, फैसला/न्याय करने का अधिकार केवल मेरे पास है।”
2. अंतरात्मा और माफिया को संरक्षण देने का आरोप
केस ट्रांसफर की प्रशासनिक कार्रवाई से आहत होकर न्यायाधीश ने दर्ज किया: “मुझे नहीं पता कि मेरे साथ ऐसा व्यवहार करने वाले लोग भगवान में विश्वास रखते हैं या नहीं, लेकिन जब वे मेरे साथ किए गए व्यवहार के बारे में अपनी अंतरात्मा में देखेंगे, तो वे खुद को कभी माफ नहीं कर पाएंगे। एक व्यक्ति दुनिया को धोखा दे सकता है, लेकिन अपनी अंतरात्मा को नहीं। ऐसे व्यवहार का उद्देश्य माफिया/गैंगस्टर/अपराधियों को संरक्षण देना था। मुझे इस बात की पूरी जानकारी है कि ऐसा क्यों हुआ, लेकिन अपने पद की मर्यादा को देखते हुए अभी मेरा बोलना उचित नहीं होगा।”
3. जातिगत व राजनीतिक संरक्षण और ट्रांसफर की धमकियां
जज ने यह भी उजागर किया कि मुकदमों के स्थानांतरण के बाद उन्हें ट्रांसफर की धमकियां दी गईं। उन्होंने लिखा कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कुछ अपराधियों को जातिगत संरक्षण और राजनीतिक समर्थन प्राप्त है, लेकिन वे केवल ईश्वर से डरते हैं, किसी माफिया या दबंग से नहीं।
4.’फॉर्म शॉपिंग’ (Forum Shopping) रोकने के लिए राज्य को सुझाव
जज ने अपने फैसले में सरकार और प्रशासन से आग्रह किया कि यदि गंभीर मामलों के रिकॉर्ड बिना किसी उचित कारण के स्थानांतरित किए जाते हैं, तो जिला शासकीय अधिवक्ता (DGC Criminal) को अपनी बात रखने का अवसर दिया जाना चाहिए ताकि अपराधी अपनी पसंद की अदालत में केस ट्रांसफर (Forum Shopping) न करा सकें।
5. अंतरआत्मा और माफियाओं को संरक्षण
जज ने फैसले में अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए लिखा: “मुझे नहीं पता कि मेरे साथ ऐसा व्यवहार करने वाले लोग भगवान में विश्वास रखते हैं या नहीं, लेकिन जब वे अपने व्यवहार के बारे में अपनी अंतरात्मा में देखेंगे, तो वे खुद को कभी माफ नहीं कर पाएंगे। ऐसे व्यवहार का उद्देश्य माफिया/गैंगस्टर/अपराधियों को संरक्षण देना था। मुझे इसकी पूरी जानकारी है कि ऐसा क्यों हुआ, लेकिन अपने पद की मर्यादा को देखते हुए अभी मेरा बोलना उचित नहीं होगा।”
6. कायरता बनाम न्याय
स्थानांतरण के बाद मिली धमकियों और पश्चिमी यूपी में अपराधियों को मिलने वाले राजनीतिक व जातीय संरक्षण का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा:“यदि मैं माफिया/दबंग/अपराधियों जैसी शक्तियों से डरने लगूं, तो मेरे लिए इस पवित्र न्यायिक संस्थान से इस्तीफा देना ही उचित होगा। मैं एक कायर न्यायाधीश कहलाने की बजाय मरना पसंद करूंगा।”
मुकदमों के स्थानांतरण की पृष्ठभूमि (5 महीने में 23 को फांसी)
- फांसी की सजाओं का रिकॉर्ड: जज रवि कुमार दिवाकर पिछले कुछ महीनों में हत्या के जघन्य मामलों में 23 दोषियों को फांसी की सजा सुनाने के कारण सुर्खियों में रहे हैं।
- मुकदमों की वापसी (Recall): मुजफ्फरनगर के जिला एवं सत्र न्यायाधीश द्वारा एक प्रशासनिक आदेश के जरिए पिछले महीने जज दिवाकर की फास्ट-ट्रैक अदालत से हत्या और जघन्य अपराधों से जुड़े 97 से 100 लंबित मुकदमों को वापस लेकर जिला जज की अदालत में ट्रांसफर कर दिया गया था।
- ‘फोरम शॉपिंग’ पर रोक की मांग: जज दिवाकर ने राज्य सरकार से आग्रह किया कि यदि गंभीर मामलों की पत्रावलियों को अपराधियों को लाभ पहुंचाने के लिए बिना कारण एक अदालत से दूसरी अदालत में भेजा जाता है, तो जिला शासकीय अधिवक्ता (फौजदारी) को अपनी बात रखने का अवसर मिलना चाहिए, ताकि भविष्य में अपराधियों द्वारा ‘फोरम शॉपिंग’ (मनपसंद कोर्ट चुनना) पर रोक लग सके।
ताजा फैसला: पत्नी को मिट्टी का तेल डालकर जिंदा जलाने वाले नदीम को फांसी
यह तल्ख टिप्पणियां न्यायाधीश ने वर्ष 2018 के एक जघन्य हत्याकांड में फैसला सुनाते हुए दर्ज कीं, जिसमें दोषी नदीम ने अपनी 23 वर्षीय पत्नी शहजादी पर मिट्टी का तेल छिड़क कर उसे जिंदा जला दिया था:
- क्रूरता पर कोर्ट का रुख: अदालत ने इसे ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ (Rarest of Rare) मामला मानते हुए कहा कि किसी महिला को जिंदा जलाकर मारना ऐसा अपराध है जिसमें पीड़िता न केवल जीवन से वंचित होती है, बल्कि उसे असहनीय शारीरिक पीड़ा, आतंक और लाचारी झेलनी पड़ती है।
- फांसी की अनिवार्यता: अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में मृत्युदंड देना इसलिए आवश्यक है ताकि कानून का सम्मान न करने वाले अपराधियों के मन में खौफ पैदा हो सके।
मुजफ्फरनगर के अपराध इतिहास और राजनीतिक गठजोड़ पर टिप्पणी
फैसले में न्यायाधीश ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश और मुजफ्फरनगर के आपराधिक इतिहास का भी उल्लेख किया:
- उन्होंने कहा कि मुजफ्फरनगर को कभी ‘क्राइम कैपिटल’ इसलिए कहा जाता था क्योंकि यहां पश्चिमी यूपी के कई सक्रिय गिरोहों का प्रभाव था।
- गन्ना बेल्ट होने के कारण यहां आर्थिक हितों, ठेकों और भूमि विवादों को लेकर अक्सर हिंसक संघर्ष होते रहे हैं और राजनीतिक संरक्षण व अपराध के गठजोड़ की चर्चाएं रही हैं। हालांकि, हाल के वर्षों में संपत्ति कुर्की, एनकाउंटर और सख्त कानूनी कार्रवाइयों से अपराध पर अंकुश लगा है।
Bold Order: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | अतिरिक्त सत्र न्यायालय, मुजफ्फरनगर (उत्तर प्रदेश) |
| पीठासीन अधिकारी | न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर |
| मुख्य मुद्दा | अदालत से 100 गंभीर आपराधिक मामलों का दूसरी जगह स्थानांतरण |
| जज का बयान | “कायर जज कहलाने से बेहतर मरण पसंद करूंगा… यह स्थानांतरण माफियाओं को संरक्षण देने के लिए हुआ।” |
| संबंधित फैसला | पत्नी की जलाकर हत्या करने वाले आरोपी नदीम को मृत्युदंड देते समय की गई टिप्पणियां |

