उपभोक्ता आयोग के मुख्य निष्कर्ष और सख्त टिप्पणियां
- पारदर्शिता का अभाव और सेवा में कमी: आयोग ने कहा कि किसी परिजन द्वारा अपने मरीज के अंतिम क्षणों और दिए गए इलाज की CCTV फुटेज मांगना कोई अनुचित मांग नहीं है। अस्पतालों का ऐसी जानकारी छिपाना परिजनों के मन में संदेह पैदा करता है।“शिकायतकर्ता की मां को जहां चिकित्सा उपचार दिया जा रहा था, उस वार्ड में CCTV का प्रावधान न होने के कारण हुई मानसिक परेशानी और पीड़ा के लिए अस्पताल ₹1 लाख का भुगतान करेगा।” — उपभोक्ता आयोग
- 6 मिनट में 6 पन्नों की डेथ समरी पर सवाल: आयोग ने इस बात पर गहरा अचरज और सवाल उठाया कि मरीज की मौत के महज 6 मिनट के भीतर 6 पन्नों की विस्तृत ‘डेथ समरी’ (Death Summary) कैसे तैयार और हस्ताक्षरित कर ली गई। आयोग ने इसे “असामान्य” और “रेज़र ब्लेड जैसी अत्यधिक तेज़ी” करार दिया।
- डॉक्टर पर लापरवाही का आरोप साबित नहीं: हालांकि, आयोग ने स्पष्ट किया कि शिकायतकर्ता डॉक्टर के खिलाफ विशिष्ट चिकित्सकीय लापरवाही (Medical Negligence) साबित करने के लिए कोई मेडिकल विशेषज्ञ राय (Expert Opinion) या पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सकीं। इसलिए डॉक्टर के खिलाफ मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (MCI) द्वारा कार्रवाई की मांग को खारिज कर दिया गया।
नई दिल्ली: दिल्ली के जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (District Consumer Disputes Redressal Commission) ने अस्पतालों की कार्यप्रणाली, पारदर्शिता और मरीजों के तीमारदारों के प्रति जवाबदेही पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है।
आयोग के अध्यक्ष सुखवीर सिंह मल्होत्रा और सदस्य रवि कुमार की पीठ ने पूर्वी दिल्ली (लक्ष्मी नगर) निवासी महिला की शिकायत पर सुनवाई करते हुए संबंधित निजी अस्पताल को मानसिक प्रताड़ना और कष्ट के लिए शिकायतकर्ता को ₹1 लाख का मुआवजा अदा करने का निर्देश दिया। आयोग ने माना कि जिस वार्ड में मरीज का इलाज चल रहा था, वहां सीसीटीवी कैमरे का प्रावधान न होना और मरीज के अंतिम पलों की फुटेज मांगने पर उपलब्ध न करा पाना अस्पताल की ‘सेवा में कमी’ (Deficiency in Service) है।
उपभोक्ता आयोग की प्रमुख टिप्पणियां और निष्कर्ष
1. वार्ड में सीसीटीवी का अभाव और पारदर्शिता की कमी पीठ ने 20 अगस्त 2026 के अपने आदेश में कहा: “अस्पताल (विपक्षी संख्या 1) उस वार्ड में सीसीटीवी का प्रावधान न होने के कारण—जहां शिकायतकर्ता की मां को चिकित्सा उपचार दिया गया था—शिकायतकर्ता को हुई मानसिक प्रताड़ना और कष्ट के लिए ₹1 लाख का भुगतान करेगा। अपनी मां के जीवन के अंतिम क्षणों और उपचार के तरीके को जानने के लिए सीसीटीवी फुटेज मांगना शिकायतकर्ता का कोई अनुचित अनुरोध नहीं था।”
- आयोग ने सख्त टिप्पणी की कि अस्पताल आमतौर पर ऐसे कारणों से फुटेज देने से कतराते हैं जो वही बेहतर जानते हैं, जिससे तीमारदारों के मन में गंभीर संदेह पैदा होता है।
- आयोग ने पाया कि अस्पताल और डॉक्टर आयोग के समक्ष भी तथ्यों को उजागर करने के बजाय छिपाने का प्रयास कर रहे थे।
2. ‘रेजर ब्लेड स्पीड’: 6 मिनट में 6 पन्नों की डेथ समरी पर सवाल
- आयोग ने इस बात पर गहरा आश्चर्य और संदेह जताया कि मरीज की मौत घोषित होने के मात्र 6 मिनट के भीतर 6 पन्नों की विस्तृत ‘डेथ समरी’ (Death Summary) कैसे तैयार और हस्ताक्षरित कर ली गई।
- पीठ ने इस असाधारण तत्परता को असामान्य (Abnormal) करार दिया।
3. डॉक्टर को मेडिकल लापरवाही से छूट (विशेषज्ञ राय का अभाव)
- यद्यपि आयोग ने अस्पताल प्रबंधन को प्रक्रियात्मक खामी और पारदर्शिता के अभाव का दोषी पाया, लेकिन उसने ड्यूटी पर तैनात डॉक्टर को चिकित्सीय लापरवाही (Medical Negligence) का सीधे तौर पर दोषी नहीं ठहराया।
- आयोग ने स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड पर किसी स्वतंत्र चिकित्सा विशेषज्ञ की राय (Expert Opinion) या ठोस चिकित्सकीय साक्ष्य के अभाव में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (MCI) को डॉक्टर के खिलाफ कार्रवाई का निर्देश नहीं दिया जा सकता।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (मई 2023 की घटना)
- अस्पताल में भर्ती: 74 वर्षीय शांता (केंद्र सरकार स्वास्थ्य योजना – CGHS कार्डधारक) को 26 मई 2023 को रक्तचाप (Blood Pressure) नियंत्रण और उपचार के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया था।
- अंतिम क्षणों का घटनाक्रम:
- 27 मई 2023 की तड़के डॉक्टर ने बीपी बढ़ाने के लिए एक इंजेक्शन दिया, लेकिन मरीज ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
- शिकायतकर्ता (पुत्री) के अनुसार, डॉक्टर ने उनकी चिंताओं को नजरअंदाज करते हुए उन्हें वार्ड से बाहर जाने को कहा।
- लगभग 10-15 मिनट बाद उन्हें सूचित किया गया कि उनकी मां की मृत्यु हो गई है।
- सीसीटीवी फुटेज की मांग: पीड़िता ने अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक से संपर्क कर उस क्षेत्र की सीसीटीवी रिकॉर्डिंग मांगी जहां उनकी मां का इलाज किया गया था। अस्पताल ने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि मरीजों की निजता के कारण कैमरे केवल लॉबी और प्रवेश द्वार पर हैं, वार्ड के भीतर नहीं।
- व्यक्तिगत पैरवी: इसके बाद महिला ने बिना किसी वकील के स्वयं व्यक्तिगत रूप से उपभोक्ता आयोग के समक्ष अपना पक्ष रखा।
अस्पताल का बचाव
- गंभीर स्थिति का दावा: अस्पताल की ओर से अधिवक्ता सुजाता राव ने दलील दी कि मरीज को आपातकालीन कक्ष में भर्ती कराते समय उनके वाइटल साइन्स अत्यधिक खराब थे।
- सीपीआर की प्रक्रिया: अस्पताल ने दावा किया कि 27 मई की सुबह मरीज को कार्डियक अरेस्ट हुआ था। डॉक्टरों की टीम ने तुरंत सीपीआर (CPR) शुरू किया और लगभग 45 मिनट तक पुनर्जीवित करने के प्रयासों के बावजूद सुबह 6:45 बजे मरीज को मृत घोषित किया गया।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: उपभोक्ता परिवाद (चिकित्सा सेवा में कमी एवं मुआवजे की मांग)
- संबंधित फोरम: जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग, दिल्ली
- प्रासंगिक कानून: उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 (Consumer Protection Act, 2019) की धारा 35
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- शिकायतकर्ता: व्यक्तिगत रूप से उपस्थित (In-person)
- अस्पताल (विपक्षी) की ओर से: अधिवक्ता सुजाता राव
- पीठ: अध्यक्ष सुखवीर सिंह मल्होत्रा एवं सदस्य रवि कुमार
Ward Without CCTV:मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित आयोग | दिल्ली राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग |
| पीठ | अध्यक्ष सुखवीर सिंह मल्होत्रा व सदस्य रवि कुमार |
| शिकायतकर्ता | लक्ष्मी नगर, दिल्ली की निवासी (मृतका की बेटी) |
| मुख्य मुद्दा | वार्ड में CCTV न होने से फुटेज न मिलना और 6 मिनट में 6 पन्नों की ‘डेथ समरी’ तैयार होना। |
| आयोग का फैसला | अस्पताल को ₹1 लाख का मुआवजा देने का आदेश; डॉक्टर के खिलाफ मेडिकल लापरवाही के पर्याप्त सबूत नहीं मिले। |

