Wednesday, November 4, 2026
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Property Attachment: क्या बिना न्यायिक सदस्य के काम कर सकती है PMLA एडजूडिकेटिंग अथॉरिटी?; सुप्रीम बेंच ने फैसला सुरक्षित रखा, पढ़िए

अदालत की टिप्पणियां और ईडी (ED) का रुख

  • शक्तियों के पृथक्करण पर कोर्ट का सवाल: न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने पूछा कि क्या बिना न्यायिक सदस्य के सिविल परिणामों वाले आदेश देना शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) के सिद्धांत का उल्लंघन नहीं है? CJI सूर्यकांत ने टिप्पणी की:“यदि आपके पास 100 या 400 मामले हैं, तब भी सभी का न्यायनिर्णयन केवल एक ही अधिकारी क्यों करे?” — उच्चतम न्यायालय
  • प्रवर्तन निदेशालय (ED) का पक्ष: ईडी की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) अनिल कौशिक और वरिष्ठ अधिवक्ता ज़ोहेब हुसैन ने धारा 6 का हवाला देते हुए तर्क दिया कि कानून खुद 1 या 2 सदस्यीय पीठ के गठन की अनुमति देता है। उन्होंने कहा कि हर एकल-सदस्यीय पीठ में न्यायिक सदस्य का होना अनिवार्य नहीं है और प्रावधानों का सामंजस्यपूर्ण अर्थ निकालना चाहिए।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 (PMLA) की धारा 5, 6 और 8 के तहत प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा की जाने वाली संपत्तियों की अनंतिम कुर्की (Provisional Attachment) और न्यायनिर्णयन प्राधिकरण (Adjudicating Authority) की संरचना व संवैधानिक वैधता पर अपना अंतिम निर्णय सुरक्षित रख लिया है।

मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन-न्यायाधीशों की विशेष पीठ ने मेसर्स कार्वी रियल्टी (इंडिया) लिमिटेड बनाम प्रवर्तन निदेशालय सहित याचिकाओं के समूह पर विस्तृत सुनवाई पूरी करने के बाद फैसला सुरक्षित किया। याचिकाकर्ताओं ने तेलंगाना उच्च न्यायालय के वर्ष 2024 के उस निर्णय को चुनौती दी है, जिसमें गैर-न्यायिक अनुभव वाले एकल सदस्य को कुर्की की पुष्टि करने की अनुमति दी गई थी। शीर्ष अदालत इस केंद्रीय संवैधानिक प्रश्न की समीक्षा कर रही है कि क्या न्यायिक पृष्ठभूमि (Judicial Member) के बिना केवल एक एकल प्रशासनिक सदस्य वाली पीठ ईडी के कुर्की आदेशों की पुष्टि (Confirmation) करने का विधिक अधिकार रखती है या यह व्यवस्था प्राकृतिक न्याय और शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) के सिद्धांत का उल्लंघन करती है।

शीर्ष अदालत के समक्ष उठाए गए प्रमुख विधिक व संवैधानिक मुद्दे

1. ‘विजय मदनलाल चौधरी’ फैसले का सुरक्षा कवच (Safeguard) और संरचना याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने तर्क दिया:

  • सुप्रीम कोर्ट ने विजय मदनलाल चौधरी बनाम भारत संघ (2022) में पीएमएलए की धारा 5 के तहत ईडी की कठोर कुर्की शक्तियों की वैधता को बरकरार रखते हुए यह रेखांकित किया था कि कुर्की की पुष्टि का काम तीन-सदस्यीय बहु-अनुशासनात्मक प्राधिकरण (जिसमें जिला जज स्तर का न्यायिक सदस्य शामिल हो) द्वारा किया जाता है, जो ईडी के मनमानेपन पर एक स्वतंत्र संवैधानिक और न्यायिक नियंत्रण (Independent Safeguard) है।
  • यदि न्यायिक सदस्य को पूरी तरह बाहर कर दिया जाए, तो यह सुरक्षा कवच पूरी तरह ध्वस्त हो जाता है।

2. शक्तियों का पृथक्करण और ‘न्यायिक पहचान’ (Separation of Powers) सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची ने महत्वपूर्ण विधिक बिंदु उठाते हुए टिप्पणी की: “नागरिक परिणामों (Civil Consequences) को प्रभावित करने वाले आदेशों में, किसी अधिकरण (Tribunal) के भीतर भी, न्यायिक पहचान (Judicial Identity) का पहलू निहित होता है। क्या आपका तर्क यह है कि न्यायिक सदस्य की अनुपस्थिति से यह न्यायिक पहचान पूरी तरह निष्प्रभावी हो जाती है, जो अंततः शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के खिलाफ जाती है?”

3. 180 दिनों की समय-सीमा और ‘मस्तिष्क का वास्तविक प्रयोग’

  • अदालत ने इस बात पर गंभीर चिंता व्यक्त की कि क्या 180 दिनों की सांविधिक समय-सीमा समाप्त होने के दबाव में हजारों मामलों का निपटारा केवल एक प्रशासनिक औपचारिकता बनकर रह गया है:पीठ का सवाल: “यदि छह महीने के भीतर हजारों मामलों से निपटना हो, तो क्या वहां वास्तविक न्यायिक मस्तिष्क का प्रयोग (Real application of mind) होगा, या यह केवल ‘डॉटेड लाइन पर हस्ताक्षर’ (Signing on the dotted line) करने जैसा एकतरफा अभ्यास बन जाएगा?” याचिकाकर्ताओं का उत्तर: “यही वास्तविक चिंता है। वरिष्ठ वकील अब वहां उपस्थित होने से बच रहे हैं क्योंकि यह प्रक्रिया पूरी तरह एकतरफा हो चुकी है।”

4. कार्यपालिका द्वारा न्यायिक कार्यों का क्रमिक अधिग्रहण (Executive Overreach)

  • वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व संविधान पीठ के फैसलों के अनुसार, कार्यपालिका नए फोरम बनाकर न्यायिक कार्यों को धीरे-धीरे अपने हाथ में नहीं ले सकती। अधिकरणों के लिए कार्यपालिका के नियंत्रण और प्रभुत्व से स्वतंत्रता एक अनिवार्य पूर्व-शर्त है।

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प्रवर्तन निदेशालय (ED) और केंद्र सरकार का पक्ष

  • धारा 6 का सामंजस्यपूर्ण अर्थान्वयन: अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) अनिल कौशिक ने दलील दी कि PMLA की धारा 6 स्वयं ऐसी परिस्थितियां प्रदान करती है जहां एकल-सदस्यीय या दो-सदस्यीय पीठों का गठन किया जा सकता है।
  • प्रत्येक मामले में न्यायिक सदस्य की अनिवार्यता नहीं: ईडी ने कहा कि हर मामले में जटिल संवैधानिक या सारभूत कानूनी प्रश्न नहीं होते; कई मामले केवल तथ्यात्मक होते हैं, इसलिए हर सिंगल बेंच में न्यायिक सदस्य का होना अनिवार्य नहीं है।
  • कुर्की के आंकड़े: वरिष्ठ अधिवक्ता जोहेब हुसैन ने पीठ को अवगत कराया कि एक वर्ष में लगभग 400 संपत्तियों की कुर्की की जाती है।
  • मुख्य न्यायाधीश की तीखी टिप्पणी: इस पर CJI सूर्य कांत ने सवाल किया—“यदि आपके पास 100 मामले भी हैं, तो न्यायनिर्णयन के लिए केवल एक ही अधिकारी क्यों होना चाहिए?”

सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम निर्देश

  1. आंकड़ों पर हलफनामा: सर्वोच्च न्यायालय ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) को निर्देश दिया कि वह पिछले वर्षों के दौरान की गई संपत्तियों की कुल अनंतिम कुर्कियों और उनके न्यायनिर्णयन की स्थिति पर दो दिनों के भीतर विस्तृत हलफनामा दाखिल करे।
  2. फैसला सुरक्षित: सभी पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद पीठ ने निर्णय सुरक्षित रख लिया।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: मेसर्स कार्वी रियल्टी (इंडिया) लिमिटेड बनाम प्रवर्तन निदेशालय एवं अन्य संबंधित याचिकाएं [PMLA Adjudicating Authority Bench Composition Case]
  • प्रासंगिक कानून: धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 (PMLA) की धारा 5 (अनंतिम कुर्की), धारा 6 (न्यायनिर्णयन प्राधिकरण की संरचना एवं शक्तियां) एवं धारा 8 (कुर्की का न्यायनिर्णयन); भारत का संविधान – अनुच्छेद 14, 21, 50 (कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण) एवं अनुच्छेद 300A
  • संबद्ध पूर्व नजीर: विजय मदनलाल चौधरी बनाम भारत संघ (2022), रोजर मैथ्यूज बनाम साउथ इंडियन बैंक (2020), मद्रास बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ
  • पीठ: भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना (सर्वोच्च न्यायालय)

Property Attachment: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतभारत का उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठासीन न्यायाधीशCJI सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना
संबंधित कानूनPMLA, 2002 (विशेष रूप से धारा 5, 6 और 8)
मूल मामलाकार्वी रियलिटी बनाम ईडी (तेलंगाना हाईकोर्ट के 2024 के फैसले के खिलाफ अपील)
मुख्य कानूनी विवादक्या बिना किसी न्यायिक अनुभव/सदस्य के एकल-सदस्यीय PMLA अथॉरिटी संपत्ति कुर्की पर फैसला दे सकती है?
अदालत का फैसलाविस्तृत सुनवाई पूरी; फैसला सुरक्षित रखा गया; ED से 2 दिनों में डेटा हलफनामा मांगा गया।
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