श्रीनगर/जम्मू: जम्मू और कश्मीर एवं लद्दाख उच्च न्यायालय ने भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 69 (धोखे से बनाए गए यौन संबंध/शादी का झूठा वादा) और सहमति से बने शारीरिक संबंधों के विधिक अंतर पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई बालिग महिला यह जानने के बाद भी किसी पुरुष के साथ शारीरिक संबंध बनाए रखती है कि वह पहले से विवाहित है और उसके बच्चे हैं, तो यह नहीं कहा जा सकता कि संबंध ‘तथ्य की गलतफहमी’ या धोखे के आधार पर बने थे। अदालत ने माना कि लंबे समय तक चला शारीरिक रिश्ता प्रथम दृष्टया आपसी सहमति (Consensual) की ओर संकेत करता है [विक्रांत कोतवाल बनाम यूटी ऑफ जेएंडके (Vikrant Kotwal v. UT of J&K)]।
न्यायमूर्ति संजय धर की एकल पीठ ने सत्र न्यायालय द्वारा याचिका खारिज किए जाने के बाद पुलिस सब-इंस्पेक्टर (SI) विक्रांत कोतवाल की अग्रिम जमानत याचिका को 11 सितंबर 2026 के अपने आदेश में स्वीकार करते हुए उन्हें गिरफ्तारी से अंतरिम संरक्षण प्रदान किया।
उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक टिप्पणियां
1. वैवाहिक स्थिति जानने के बाद भी रिश्ता रखना ‘तथ्य की भूल’ नहीं धारा 69 बीएनएस के घटकों और पीड़िता के आचरण का विश्लेषण करते हुए न्यायमूर्ति संजय धर ने कहा: “यद्यपि आरंभ में महिला सिपाही याचिकाकर्ता की वैवाहिक स्थिति से अनभिज्ञ रही हो, लेकिन उसकी वैवाहिक स्थिति की जानकारी होने के बावजूद उसके साथ संबंध जारी रखने का उसका आचरण यह निष्कर्ष निकालता है कि याचिकाकर्ता के साथ उसका संबंध किसी ‘तथ्य की गलतफहमी’ (Misconception of fact) पर आधारित नहीं था। रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री यह दर्शाती है कि पीड़िता और याचिकाकर्ता एक-दूसरे से गहरा प्रेम करते थे, जिसके परिणामस्वरूप दोनों के बीच शारीरिक संबंध बने।”
2. लंबा साहचर्य और शारीरिक संबंध सहमति का सूचक
- अदालत ने लंबे संबंधों के कानूनी प्रभाव को रेखांकित करते हुए कहा:“एक बार जब कोई दीर्घकालिक साहचर्य (Prolonged Association) या शारीरिक संबंध होता है, तो यह अकल्पनीय है कि वह प्रकृति में सहमति से न हो, जब तक कि इसके विपरीत संकेत देने वाली परिस्थितियां न हों।”
- अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह ऐसा मामला नहीं है जहां अभियुक्त ने अपनी पहली शादी छिपाकर पीड़िता को शादी के लिए फुसलाया; बल्कि दोनों को पूरी तरह पता था कि पुरुष पहले से विवाहित है और पहली शादी के रहते दूसरा विवाह कानूनन अमान्य (Invalid) होगा।
3. पुलिसकर्मी होने के कारण फरार होने की न्यूनतम संभावना
- अदालत ने माना कि अभियुक्त पुलिस विभाग का एक कर्मचारी है और वह न केवल जांच बल्कि विभागीय अनुशासनिक नियंत्रण के भी अधीन है। इसलिए उसके जांच से भागने या फरार होने की संभावना न्यूनतम है।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि
- विवाद की उत्पत्ति व एफआईआर: महिला सिपाही की शिकायत पर सब-इंस्पेक्टर विक्रांत कोतवाल के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 69 (धोखे से यौन संबंध), धारा 83 (द्विविवाह/जीवनसाथी के रहते दूसरा विवाह), धारा 88 (गर्भपात कराना) और धारा 115(2) (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना) के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी।
- शिकायतकर्ता का आरोप:
- महिला सिपाही ने आरोप लगाया कि कोतवाल ने शादी का झूठा वादा करके उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए।
- दोनों लगभग एक साल तक पति-पत्नी की तरह साथ रहे, जिस दौरान वह दो बार गर्भवती हुई और दोनों बार कोतवाल के कहने पर गर्भपात कराया।
- बाद में उसे पता चला कि कोतवाल पहले से शादीशुदा है और उसके दो बच्चे हैं। आरोप है कि कोतवाल ने पहली पत्नी को तलाक देकर उससे शादी करने का आश्वासन दिया और मई 2025 में एक पंडित की मौजूदगी में शादी की रस्म भी निभाई।
- तीसरी बार गर्भवती होने पर कोतवाल ने अचानक संबंध तोड़ दिए और बातचीत बंद कर दी।
- निचली अदालत का रुख: सत्र न्यायालय ने मामले की गंभीरता को देखते हुए अग्रिम जमानत खारिज कर दी थी, जिसके बाद अभियुक्त ने हाईकोर्ट का रुख किया।
हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
- अग्रिम जमानत मंजूर: उच्च न्यायालय ने प्रथम दृष्टया संबंधों को सहमति आधारित पाते हुए याचिकाकर्ता सब-इंस्पेक्टर को अग्रिम जमानत प्रदान की।
- जांच में सहयोग की शर्त: आरोपी को निर्देश दिया गया कि वह जांच अधिकारी के समक्ष उपस्थित होकर जांच में पूरा सहयोग करेगा और गवाहों को प्रभावित करने या सबूतों से छेड़छाड़ करने का कोई प्रयास नहीं करेगा।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: विक्रांत कोतवाल बनाम केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर [Vikrant Kotwal v. UT of J&K]
- प्रासंगिक कानून: भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 69, 83, 88 एवं 115(2); भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 482 (अग्रिम जमानत)
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (एसआई) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता के. निर्मल कोतवाल एवं अधिवक्ता आर.एस. ईशर
- राज्य/प्रतिवादी की ओर से: उप महाधिवक्ता (DAG) विशाल भारती एवं अधिवक्ता वसुधा शर्मा
- पीठ: न्यायमूर्ति संजय धर (जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख उच्च न्यायालय)
Women Constable: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति संजय धर (Justice Sanjay Dhar) |
| याचिकाकर्ता | विक्रांत कोतवाल (पुलिस सब-इंस्पेक्टर) |
| संबंधित कानून | BNS, 2023 की धाराएं 69, 83, 88, 115(2) |
| मुख्य कानूनी प्रश्न | क्या पहले से शादीशुदा होने की जानकारी के बावजूद संबंध जारी रखना ‘तथ्य की भूल’ (Misconception of Fact) माना जाएगा? |
| अदालत का फैसला | अग्रिम जमानत मंजूर; प्रथम दृष्टया संबंध आपसी सहमति से बना प्रतीत होता है। |

