Thursday, September 17, 2026
HomeLaw Firms & Assoc.Scandalising the Court: शराब के नशे में अदालती कार्यवाही में बाधा डालने...

Scandalising the Court: शराब के नशे में अदालती कार्यवाही में बाधा डालने पर वकील को एक दिन की कैद; आपराधिक अवमानना का यह केस जानें

हाईकोर्ट की मुख्य टिप्पणियां

  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम अनर्गल आरोप:पीठ ने राजेन्द्र सैल बनाम एमपी हाईकोर्ट बार एसोसिएशन और प्रशांत भूषण से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए दोहराया:“किसी भी पक्षकार को अदालत के फैसलों की निष्पक्ष और उचित आलोचना की सीमा लांघने और जजों की मंशा पर सवाल उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को जजों या अदालतों के खिलाफ गैर-जिम्मेदाराना आरोप लगाने का लाइसेंस नहीं समझा जा सकता।”कर्नाटका हाईकोर्ट
  • पछतावे का अभाव:अदालत ने माना कि अपनी बीमारी (मिर्गी) और बुजुर्ग मां का हवाला देने के बावजूद, वकील ने अपने आचरण के लिए कोई पछतावा नहीं दिखाया, बल्कि अपनी हरकतों को सही ठहराने की कोशिश की।

बेंगलुरु: कर्नाटक हाईकोर्ट की खंडपीठ ने संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे, निर्णयों की निष्पक्ष आलोचना (Fair Criticism) बनाम न्यायाधीशों पर लगाए जाने वाले दुर्भावनापूर्ण व निराधार आक्षेपों (Scandalising the Court) के विधिक अंतर को स्पष्ट करते हुए एक कड़ा संदेश दिया है।

न्यायमूर्ति अनु शिवरामन और न्यायमूर्ति वेंकटेश नाइक टी. की खंडपीठ ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 215 सहपठित न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 15 के तहत दर्ज स्वतः संज्ञान (Suo Motu) आपराधिक अवमानना मामले में दोषी वकील को एक दिन के साधारण कारावास (अदालत उठने तक – Till the rising of the Court) और ₹2,000 के जुर्माने की सजा सुनाई। जुर्माना 15 दिनों के भीतर न भरने की स्थिति में उसे अतिरिक्त एक दिन का साधारण कारावास भुगतना होगा। अदालत ने कारवार स्थित मजिस्ट्रेट कोर्ट में शराब के प्रभाव में उपस्थित होने, न्यायिक कार्यवाही में व्यवधान डालने और न्यायाधीशों पर रिश्वतखोरी के बेबुनियाद आरोप लगाने वाले वकील को ‘आपराधिक अवमानना’ (Criminal Contempt) का दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई है।

उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक टिप्पणियां

1. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम न्यायपालिका पर निराधार आक्षेप राजेंद्र सेल बनाम एमपी हाईकोर्ट बार एसोसिएशन (2005) के ऐतिहासिक फैसले का हवाला देते हुए खंडपीठ ने विधिक सीमाएं तय कीं: “किसी भी वादकारी को किसी फैसले की निष्पक्ष, सद्भावनापूर्ण और उचित आलोचना की सीमाओं को लांघने तथा आम तौर पर अदालतों को बदनाम करने या फैसला सुनाने वाले न्यायाधीशों पर दुर्भावना थोपने की अनुमति नहीं दी जा सकती। न्यायिक व्यवस्था और अदालत की प्रतिष्ठा को कमजोर करने के इरादे से की गई विकृति को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता, अन्यथा न्यायिक प्रणाली की नींव ही कमजोर हो जाएगी, जो न केवल कानून के शासन बल्कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए भी घातक होगी। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को न्यायिक मामलों के संबंध में न्यायाधीशों या अदालतों के खिलाफ निराधार, अनुचित और गैर-जिम्मेदाराना आक्षेप लगाने का लाइसेंस नहीं समझा जा सकता।”

2. आपराधिक अवमानना और सामाजिक-नैतिक आचार संहिता का उल्लंघन

  • अवमाननाकर्ता के आचरण और पश्चाताप के अभाव पर पीठ ने सख्त टिप्पणी की:“शुरुआती आपराधिक अवमानना के लिए कोई पश्चाताप (Remorse) व्यक्त करने के बजाय, उसने अपने कृत्यों को उचित ठहराने का प्रयास किया और समग्र रूप से न्यायिक संस्था के खिलाफ निंदनीय व निराधार बयान देना जारी रखा। उसका आचरण केवल जानबूझकर और हठधर्मी ही कहा जा सकता है, जो सामाजिक, नैतिक और न्यायिक आचार संहिताओं के प्रति उसकी पूर्ण उदासीनता को उजागर करता है। यदि ऐसे आचरण को दंडित न किया जाए, तो कानून का शासन और न्यायिक व्यवस्था खतरे में पड़ जाएगी।”

3. अनुच्छेद 19(1)(a) के संरक्षण की सीमाएं

  • खंडपीठ ने प्रशांत भूषण, इन रे (2021) और विजय कुर्ले, इन रे (2021) के निर्णयों का संदर्भ देते हुए स्पष्ट किया कि न्यायालय अवमानना कानून वास्तविक आलोचना को नहीं रोकता, बल्कि न्यायिक प्रणाली में जनता के विश्वास और सम्मान की रक्षा के लिए एक संवैधानिक ढाल के रूप में कार्य करता है।

Also Read; YouTuber Ajeet Case: दिल्ली हाईकोर्ट के जज और वकील जय देहाद्राई के बीच तीखी बहस; ‘अदालत में आपत्तिजनक शब्दों का ट्रांसक्रिप्ट इस तरह सीधे नहीं सौंपा जा सकता…

मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (कारवार मजिस्ट्रेट कोर्ट की घटनाएं)

  • विवाद की पृष्ठभूमि: वकील कारवार स्थित न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC) की अदालत में अपनी पत्नी द्वारा दायर घरेलू हिंसा (DV Act) के मामले में व्यक्तिगत रूप से (Party-in-person) उपस्थित हो रहा था।
  • पहला व्यवधान: केस के सूचीबद्ध न होने के बावजूद उसने पीठासीन अधिकारी और बेंच क्लर्क पर चिल्लाना शुरू किया तथा न्यायाधीश पर पत्नी से पैसे लेकर पक्षपातपूर्ण आदेश देने का झूठा आरोप लगाया।
  • लिखित माफी और दोबारा वही कृत्य: प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश की रिपोर्ट के बाद उसने माफीनामा प्रस्तुत कर कार्रवाई वापस लेने की प्रार्थना की। लेकिन कुछ ही समय बाद उसने एक अन्य वकील की जिरह के दौरान हस्तक्षेप किया, हंगामा किया और मजिस्ट्रेट के समझाने के बावजूद शांत नहीं हुआ।
  • शराब का सेवन और मेडिकल रिपोर्ट: आरोपी को लड़खड़ाने और सांसों से शराब की गंध आने के कारण मेडिकल जांच के लिए भेजा गया, जहां डॉक्टरों ने उसके शराब के प्रभाव में होने की पुष्टि की।
  • ट्रायल और गवाही: हाईकोर्ट में अवमानना ट्रायल के दौरान डिप्टी रजिस्ट्रार और संबंधित मजिस्ट्रेट का साक्ष्य व जिरह (Cross-examination) दर्ज की गई। मजिस्ट्रेट ने गवाही दी कि वकील ने चेतावनी और पूर्व माफी के बावजूद बार-बार अदालत को बाधित किया।

हाईकोर्ट का अंतिम आदेश और निर्देश

  1. दोषसिद्धि व सजा: न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 12(1) के तहत दोषी करार देते हुए अदालत उठने तक (Till the rising of the Court) की साधारण कैद और ₹2,000 का जुर्माना लगाया गया।
  2. हिरासत में लेने का आदेश: अदालत ने निर्देश दिया कि अवमाननाकर्ता को तत्काल हिरासत (Custody) में लिया जाए।
  3. दोषसिद्धि वारंट जारी: रजिस्ट्रार (न्यायिक) को कर्नाटक उच्च न्यायालय (न्यायालय अवमानना कार्यवाही) नियमावली, 1981 के नियम 16 के तहत विधिवत ‘कनविक्शन वारंट’ (Conviction Warrant) जारी करने का आदेश दिया गया।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: उच्च न्यायालय कर्नाटक बनाम आरोपी अधिवक्ता [आपराधिक अवमानना वाद (स्वतः संज्ञान)]
  • प्रासंगिक कानून: न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(c) (आपराधिक अवमानना की परिभाषा), धारा 12(1) एवं धारा 15; भारत का संविधान – अनुच्छेद 19(1)(a), 19(2) एवं अनुच्छेद 215 (अभिलेख न्यायालय की शक्तियां); कर्नाटक उच्च न्यायालय (न्यायालय अवमानना कार्यवाही) नियमावली, 1981 का नियम 16
  • संबद्ध न्यायिक नजीरें जिनका विश्लेषण हुआ:
    • राजेंद्र सेल बनाम एमपी हाईकोर्ट बार एसोसिएशन एवं अन्य (2005, सुप्रीम कोर्ट) — ‘निर्णयों की निष्पक्ष आलोचना बनाम न्यायाधीशों पर निराधार आक्षेप’
    • प्रशांत भूषण एवं अन्य, इन रे (2021, सुप्रीम कोर्ट) — ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अवमानना कानून की सीमाएं’
    • विजय कुर्ले एवं अन्य, इन रे (2021, सुप्रीम कोर्ट) — ‘न्यायिक संस्था के प्रति जन-विश्वास की रक्षा’
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • उच्च न्यायालय की ओर से: शासकीय अधिवक्ता तेजेश पी.
    • आरोपी अधिवक्ता: व्यक्तिगत रूप से (Party-in-person)
  • पीठ: न्यायमूर्ति अनु शिवरामन और न्यायमूर्ति वेंकटेश नाइक टी. (कर्नाटक उच्च न्यायालय)

Scandalising the Court: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतकर्नाटका उच्च न्यायालय (Karnataka High Court)
पीठ (Bench)न्यायमूर्ति अनु शिवरामन एवं न्यायमूर्ति वेंकटेश नाइक टी.
अवमाननाकर्ता (आरोपी वकील)पंकज कौशिक (Pankaj Kaushik – कारवार के अधिवक्ता)
सजा का प्रावधानअदालत की अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 12(1)
सजा एवं जुर्माना1 दिन की साधारण कैद (Till Rising of the Court) और ₹2,000 जुर्माना
मुख्य कानूनी सिद्धांतनिर्णयों की निष्पक्ष आलोचना की अनुमति है, लेकिन न्यायपालिका पर बेबुनियाद आरोप लगाना अवमानना है।
RELATED ARTICLES

Most Popular

Patna
broken clouds
26 ° C
26 °
26 °
89 %
2.1kmh
84 %
Wed
29 °
Thu
34 °
Fri
35 °
Sat
35 °
Sun
35 °

Recent Comments