दिल्ली हाईकोर्ट की मुख्य तीखी टिप्पणियां
- “PIL में नाम देने का फैशन बन गया है”:मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय ने वकीलों के रवैये पर अफसोस जताते हुए टिप्पणी की:“यह बहुत दुखद है। वकील बिना कोई वास्तविक काम किए PIL दाखिल करने के लिए अपना नाम दे रहे हैं… यह यहां एक चलन बन गया है कि लोग सिर्फ PIL दाखिल करने के लिए नाम देने को तैयार रहते हैं। जब याचिकाकर्ता या उनके सीनियर पहले से किसी पक्षकार से जुड़े थे, तो उन्होंने अपने नाम पर PIL क्यों दाखिल की?” — दिल्ली हाईकोर्ट
- कानूनी अनुचितता (Impropriety):पीठ ने स्पष्ट किया कि भले ही यह कदम कानूनन अपराध न हो, लेकिन यह पेशेवर मर्यादा और औचित्य (Impropriety) के खिलाफ है।
- वरिष्ठ वकीलों का समर्थन:मामले में मध्यस्थ की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राजशेखर राव ने भी पीठ का समर्थन करते हुए कहा कि वकीलों के इस तरह के पैटर्न को रोकना बेहद जरूरी है ताकि लक्ष्मण रेखा न लांघी जाए।
नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट की खंडपीठ ने अदालतों में अधिवक्ताओं द्वारा वास्तविक जमीनी शोध या व्यक्तिगत उत्तरदायित्व के बिना जनहित याचिकाओं (Public Interest Litigation – PIL) में “अपना नाम उधार देने” (Lending their names) और मुवक्किलों के विवादों से उपजी जानकारियों के आधार पर स्वयं याचिकाकर्ता बनने की बढ़ती प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता व असंतोष व्यक्त किया है।
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की खंडपीठ ने गूगल प्ले स्टोर और एप्पल ऐप स्टोर पर उपलब्ध कई मोबाइल ऐप्स में अश्लील सामग्री, अनैतिक तस्करी और अवैध गतिविधियों का आरोप लगाने वाली एक महिला अधिवक्ता द्वारा अपने नाम पर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह तीखी टिप्पणियां कीं। अदालत ने रेखांकित किया कि भले ही किसी वकील का ऐसा कृत्य तकनीकी रूप से गैरकानूनी या विधिक कदाचार (Misconduct) के दायरे में न आता हो, लेकिन न्यायिक और पेशेवर औचित्य (Professional Impropriety) की सीमाएं पार नहीं की जानी चाहिए।
उच्च न्यायालय की प्रमुख मौखिक टिप्पणियां
1. जनहित याचिकाओं में वकीलों द्वारा नाम देने की प्रथा पर अफसोस वकीलों द्वारा बिना शोध के स्वयं के नाम से पीआईएल दायर करने की प्रवृत्ति पर मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय ने कहा: “यह बेहद दुखद है। वकील बिना वास्तविक रूप से काम किए केवल जनहित याचिकाएं दाखिल करने के लिए अपना नाम दे रहे हैं। मुझे खेद है, यदि मैं कुछ गलत कह रहा हूं तो मुझे क्षमा करें… लेकिन यह बहुत, बहुत दुखद है। सवाल यह है कि याचिकाकर्ता ने अपना नाम क्यों दिया? यहां यह एक आम चलन बन चुका है कि लोग सिर्फ जनहित याचिका दायर करने के लिए अपना नाम देने को तैयार हो जाते हैं। उन्हें अपने नाम पर यह पीआईएल क्यों दाखिल करनी चाहिए थी?”
2. मुवक्किल के विवाद बनाम पेशेवर औचित्य (Impropriety)
- अदालत को जब यह जानकारी मिली कि याचिकाकर्ता वकील ने पहले अपने एक मुवक्किल की ओर से कुछ प्रतिवादियों को कानूनी नोटिस भेजा था और उसके सीनियर वकील पूर्व में एक प्रतिवादी का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं, तो मुख्य न्यायाधीश ने पूछा:“जब वह स्वयं या उनके सीनियर किसी एक प्रतिवादी का पहले प्रतिनिधित्व कर चुके थे, तो उन्होंने अपने नाम पर यह जनहित याचिका क्यों दाखिल की? यह कृत्य कानूनन भले ही अवैध न हो या कदाचार की श्रेणी में न आए, लेकिन ‘औचित्य’ (Impropriety) नाम की भी कोई चीज होती है।”
3. हस्तक्षेपकर्ता का समर्थन और याचिकाओं का पैटर्न
- मामले में एक हस्तक्षेपकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राजशेखर राव ने पीठ की चिंता से सहमति जताते हुए कहा:“कुछ ऐसी लक्ष्मण रेखाएं होती हैं जिन्हें कभी पार नहीं किया जाना चाहिए। याचिकाकर्ता से यह पूछा जाना चाहिए कि उन्हें यह पीआईएल दाखिल करने के लिए किसने कहा था। यहां एक निश्चित पैटर्न (Pattern of behavior) है, जहां कुछ वकील हर आदेश में दिखते हैं। इस व्यवहार को उजागर करना और रोकना बेहद जरूरी है।”
- खंडपीठ ने स्थिति की गंभीरता को रेखांकित करते हुए कहा कि “हालात ठीक नहीं हैं और अदालतों को इसके प्रति बहुत सतर्क रहना होगा।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (ऐप स्टोर्स पर अश्लीलता व अपराध का आरोप)
- याचिका में उठाए गए मुद्दे: एक महिला अधिवक्ता ने स्वयं याचिकाकर्ता बनकर दिल्ली हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी। आरोप लगाया गया कि गूगल प्ले स्टोर और एप्पल ऐप स्टोर पर मौजूद विभिन्न मोबाइल एप्लिकेशन पोर्नोग्राफिक सामग्री, देह व्यापार (Immoral Trafficking), वेश्यावृत्ति, नशीले पदार्थों के सेवन, अवैध हथियारों की तस्करी और संगठित अपराधों को बढ़ावा दे रहे हैं।
- हितों का टकराव (Conflict/Impropriety): सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि याचिकाकर्ता अधिवक्ता ने इस मुद्दे पर पहले अपने मुवक्किल की ओर से प्रतिवादियों को लीगल नोटिस जारी किया था और बाद में उसी विषय पर अपने नाम से पीआईएल ठोक दी।
- याचिकाकर्ता की दलील:
- याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता तन्मय मेहता ने तर्क दिया कि यदि किसी मुवक्किल का प्रतिनिधित्व करते समय एक वकील के संज्ञान में कोई सार्वजनिक बुराई या खतरा (Public Menace) आता है, तो क्या वह जनहित याचिका का आधार नहीं बन सकता? उन्होंने कहा कि वकील का मामले में कोई व्यक्तिगत हित नहीं था।
- हालांकि, अदालत की असहमति को देखते हुए उन्होंने याचिका वापस लेने (Withdraw) या केंद्र सरकार के समक्ष अभ्यावेदन (Representation) के रूप में भेजने का प्रस्ताव रखा।
हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
- याचिका वापस लेने की अनुमति: खंडपीठ के कड़े रुख के बाद याचिकाकर्ता के वकील ने याचिका को आगे न बढ़ाने का निर्णय लिया।
- मामला निस्तारित: उच्च न्यायालय ने जनहित याचिका को वापस लिए जाने के आधार पर खारिज/निस्तारित (Dismissed as Withdrawn) कर दिया।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: अधिवक्ता बनाम भारत संघ एवं अन्य [गूगल/एप्पल ऐप स्टोर सामग्री नियमन जनहित याचिका]
- प्रासंगिक कानून: भारत का संविधान – अनुच्छेद 226 (रिट व जनहित याचिका क्षेत्राधिकार); बार काउंसिल ऑफ इंडिया रूल्स (अधिवक्ताओं के पेशेवर आचरण एवं मर्यादा के नियम); सुप्रीम कोर्ट एवं दिल्ली हाईकोर्ट के जनहित याचिका नियम (PIL Rules)
- संबद्ध विधिक सिद्धांत:
- एडवोकेट्स एक्ट एवं बीसीआई नियम (बार काउंसिल ऑफ इंडिया नियमावली) — ‘अधिवक्ता को उन मामलों में स्वयं पक्षकार या याचिकाकर्ता बनने से बचना चाहिए जो उसके मुवक्किलों के विवादों या पेशेवर मुकदमों से जुड़े हों।’
- दत्तात्रेय शंकरराव खर्डे बनाम महाराष्ट्र राज्य (सुप्रीम कोर्ट) — ‘वकीलों को छद्म याचिकाओं (Proxy PILs) का माध्यम बनने के प्रति आगाह करने का सिद्धांत।’
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता की ओर से: अधिवक्ता तन्मय मेहता
- हस्तक्षेपकर्ता की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता राजशेखर राव
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया (दिल्ली उच्च न्यायालय)
Comments Upon PIL: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| पीठ (Bench) | मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय एवं न्यायमूर्ति तेजस कारिया |
| याचिकाकर्ता | एक अभ्यासकर्ता महिला अधिवक्ता (Practicing Advocate) |
| याचिका का विषय | गूगल व एप्पल स्टोर पर अश्लीलता, अवैध हथियारों की खरीद-बिक्री व वेश्यावृत्ति को बढ़ावा देने वाले ऐप रोकने की मांग |
| विवाद का कारण | याचिकाकर्ता ने पहले client की तरफ से नोटिस भेजा, फिर खुद के नाम से PIL दाखिल कर दी; सीनियर वकील भी एक पक्षकार का प्रतिनिधित्व कर चुके थे |
| अदालत का फैसला | याचिका वापस लेने की अनुमति दी गई। |

