हाईकोर्ट का निष्कर्ष (High Court Findings)
1.1. खरीदार आवश्यक पक्षकार (Necessary Party) नहीं:Order I Rule 10 CPC.
न्यायमूर्ति के. श्रीनिवास रेड्डी ने कहा कि केवल इसलिए कि कोई खरीदार फैसले से प्रभावित हो सकता है, उसे पक्षकार बनाना अनिवार्य नहीं हो जाता।
2.2. अंतिम फैसला खरीदार पर बाध्यकारी:Final Verdict Binding.
चूंकि खरीदार ‘लिस पेंडेंस’ के सिद्धांत से बंधा हुआ है, इसलिए उसे पक्षकार न बनाए जाने से भाइयों के मूल मुकदमे पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ेगा।
मुख्य निष्कर्ष: यदि कोई व्यक्ति मुकदमे के अधीन चल रही जमीन खरीदता है, तो उसकी रजिस्ट्री की वैधता पूरी तरह से कोर्ट के अंतिम फैसले पर टिकी होती है। यदि विक्रेता हारता है, तो खरीदार का बैनामा निष्प्रभावी हो जाएगा।
अमरावती: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 (Transfer of Property Act, 1882) की धारा 52 के तहत ‘विचाराधीन वाद के सिद्धांत’ (Doctrine of Lis Pendens), सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) के आदेश I नियम 10 (पक्षकारों का संयोजन/Impleadment) और मुकदमे के लंबित रहने के दौरान खरीदी गई संपत्ति के विधिक दर्जे पर स्थिति स्पष्ट की है।
न्यायमूर्ति के. श्रीनिवास रेड्डी की एकल पीठ ने तीन भाइयों द्वारा अपने रिश्तेदारों के खिलाफ लंबित टाइटल सूट में बाहर के खरीदार (रेड्डी) को प्रतिवादी संख्या 7 के रूप में जोड़ने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी और ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराया। अदालत ने फैसला सुनाया है कि यदि किसी संपत्ति के मालिकाना हक (Title Dispute) का मुकदमा अदालत में विचाराधीन है और उस दौरान कोई तीसरा पक्ष वह संपत्ति खरीदता है, तो वह ‘लिस पेंडेंस’ के सिद्धांत के तहत मामले के अंतिम फैसले से स्वतः बाध्य होगा। ऐसे खरीदार को मुकदमे में एक ‘आवश्यक पक्षकार’ (Necessary Party) के रूप में जोड़ना अनिवार्य नहीं है [सिविल रिवीजन याचिका सं. 1593/2025]।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं टिप्पणियां
1. ‘लिस पेंडेंस’ का सिद्धांत (धारा 52, संपत्ति अंतरण अधिनियम) अदालत ने स्पष्ट किया कि लंबित मुकदमे के दौरान किया गया संपत्ति का अंतरण स्वतः अवैध या शून्य नहीं होता, बल्कि वह अदालत के अंतिम निर्णय के पूर्णतः अधीन (Subject to the final decree) होता है:
“मुकदमे की पेंडेंसी के दौरान विवादित संपत्ति की बिक्री ‘लिस पेंडेंस’ के सिद्धांत द्वारा शासित होती है। इसका अर्थ यह है कि बाद का खरीदार (Subsequent Purchaser) अदालत के फैसले से बाध्य होगा, भले ही उसे मुकदमे में औपचारिक रूप से पक्षकार न बनाया गया हो। केवल इसलिए कि कोई व्यक्ति मुकदमे के परिणाम से प्रासंगिक रूप से प्रभावित हो सकता है, उसे प्रतिवादी के रूप में जोड़ना आवश्यक नहीं हो जाता।”
2. आवश्यक पक्षकार (Necessary Party) बनाम उचित पक्षकार (Proper Party) सीपीसी के आदेश I नियम 10 का विश्लेषण करते हुए अदालत ने रेखांकित किया:
- एक बाद का खरीदार ‘उचित पक्षकार’ (Proper Party) हो सकता है ताकि विवाद का पूर्ण निपटारा हो सके, लेकिन वह हर मामले में ‘आवश्यक पक्षकार’ (Necessary Party) नहीं होता जिसके बिना मुकदमा आगे ही न बढ़ सके।
- किसी पक्षकार को जोड़ने का अधिकार अदालत के न्यायिक विवेक (Judicial Discretion) पर निर्भर करता है। चूंकि खरीदार के अधिकार सीधे अंतिम डिक्री से बंधे हैं, इसलिए उसे शामिल न करने से मूल वादी (भाइयों) के विधिक अधिकारों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता।
3. खरीदार द्वारा अंतिम डिक्री को विफल करने पर रोक
- यदि वादी मुकदमा जीत जाते हैं और जमीन के पूर्ण स्वामी घोषित होते हैं, तो खरीदार यह तर्क नहीं दे सकता कि वह मुकदमे का हिस्सा नहीं था।
- खरीदार विक्रेता के विधिक अधिकारों के दायरे में ही खड़ा होता है; यदि विक्रेता का दावा खारिज होता है, तो खरीदार का पंजीकृत बैनामा (Sale Deed) भी डिक्री के सामने अप्रभावी हो जाएगा।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (अन्नामैया/कडपा भूमि विवाद)
- पक्षकार व मूल विवाद: तीन भाइयों ने अपने रिश्तेदारों के खिलाफ अन्नामैया (वाईएसआर जिला) स्थित पैतृक कृषि भूमि पर अपने स्वत्व (Title) की घोषणा और स्थायी निषेधाज्ञा (Permanent Injunction) के लिए मुकदमा (O.S. No. 3/2018) दायर किया था।
- मुकदमे के दौरान जमीन की बिक्री: * वाद लंबित रहने के दौरान, प्रतिवादी संख्या 1 (रिश्तेदार) ने सर्वे नंबर 32 की 3.45 एकड़ भूमि में से अपने कथित 50% हिस्से को 5 नवंबर 2018 को एक पंजीकृत विक्रय विलेख (Registered Sale Deed) के माध्यम से पेराम थनुज यशवंत रेड्डी (तीसरे पक्ष के खरीदार) को बेच दिया।
- राजस्व रिकॉर्ड में भी खरीदार का नाम दर्ज करा दिया गया।
- भाइयों की अर्जी: अतिरिक्त लिखित बयान में जब रिश्तेदार ने जमीन बेचने की बात स्वीकार की, तो तीनों भाइयों ने ट्रायल कोर्ट में सीपीसी के आदेश I नियम 10 के तहत अर्जी (I.A. No. 72/2025) देकर खरीदार को प्रतिवादी संख्या 7 के रूप में जोड़ने की प्रार्थना की।
- ट्रायल कोर्ट का रुख: पंचम अतिरिक्त जिला न्यायाधीश, कडपा (रायाचोटी) ने 6 मार्च 2025 को भाइयों की अर्जी खारिज कर दी। इसके खिलाफ भाइयों ने हाईकोर्ट में सिविल रिवीजन पिटीशन दाखिल की थी।
हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
- रिवीजन याचिका खारिज: उच्च न्यायालय ने माना कि ट्रायल कोर्ट के आदेश में क्षेत्राधिकार या कानून संबंधी कोई त्रुटि नहीं है, अतः रिवीजन याचिका निरस्त की जाती है।
- अंतरिम रोक हटी: हाईकोर्ट ने 7 जुलाई 2025 को ट्रायल कोर्ट की मुख्य कार्यवाही पर लगाई गई अंतरिम रोक (Interim Stay) को तत्काल प्रभाव से हटा दिया और मूल मुकदमे को बिना खरीदार को जोड़े आगे बढ़ाने का आदेश दिया।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: तीन भाई (वादी/पुनरीक्षणकर्ता) बनाम रिश्तेदार एवं अन्य [Civil Revision Petition No. 1593 of 2025]
- प्रासंगिक कानून: संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 की धारा 52 (लिस पेंडेंस का सिद्धांत); सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) का आदेश I नियम 10(2) (पक्षकारों को जोड़ने या हटाने की न्यायालय की शक्ति) एवं धारा 115 (पुनरीक्षण अधिकारिता)
- संबद्ध न्यायिक नजीरें जिनका संदर्भ दिया गया:
- जे.एन. रियल एस्टेट बनाम शैलेंद्र प्रधान एवं अन्य
- एशियन होटल्स (नॉर्थ) लिमिटेड बनाम आलोक कुमार लोढ़ा एवं अन्य
- बनारसी दास बनाम पन्ना लाल (पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट)
- पीठ: न्यायमूर्ति के. श्रीनिवास रेड्डी (आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय)
Transfer of Property Act:क्या है ‘लिस पेंडेंस का सिद्धांत’ (Section 52, Transfer of Property Act)?
‘लिस पेंडेंस’ (Lis Pendens) एक लैटिन शब्द है जिसका अर्थ है “अदालत में लंबित विवाद”।
| मुख्य बिंदु | नियम / प्रभाव |
| मूल सिद्धांत | केस के लंबित रहने के दौरान बिकी संपत्ति का हस्तांतरण अमान्य (Void) नहीं होता, लेकिन यह कोर्ट के अंतिम निर्णय के अधीन रहता है। |
| खरीदार का जोखिम | खरीदार संपत्ति के साथ कानूनी जोखिम भी खरीदता है। यदि विक्रेता केस हार जाता है, तो खरीदार का मालिकाना हक स्वतः समाप्त हो जाएगा। |
| पक्षकार बनाना | खरीदार को मुकदमे में पक्षकार बनाना अनिवार्य नहीं है, क्योंकि कोर्ट का फैसला उस पर सीधे लागू होता है। |
| कानूनी उद्देश्य | केस के दौरान संपत्ति बेचकर मुकदमे को उलझाने या वादी के अधिकारों को विफल करने से रोकना। |

