Wednesday, November 4, 2026
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Same Sex: अदालत के संज्ञान में आने से पहले केंद्र सरकार का हलफनामा मीडिया तक कैसे पहुंचा? मुझे बहुत आश्चर्य है; जवाब लीक पर जताई नाराजगी

दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई के मुख्य बिंदु

पक्षकोर्ट के समक्ष रखी गई दलीलें
केंद्र सरकार (ASG चेतन शर्मा)सरकार ने हलफनामा मीडिया को नहीं दिया है। दाखिल किया गया हलफनामा फिलहाल आपत्तियों (Objections) के अधीन है। इस मामले में सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता पक्ष रखेंगे।
याचिकाकर्ता (Senior Adv. सौरभ कृपाल)मामले को टालने का विरोध किया। उन्होंने कहा कि यदि केंद्र सरकार मीडिया में आए अपने हलफनामे को बदलने की योजना बना रही है, तो उन्हें स्पष्ट रूप से कहना चाहिए।
दिल्ली हाईकोर्ट (Justice Swarana Kanta Sharma)कोर्ट ने दर्ज किया कि हलफनामा आधिकारिक रिकॉर्ड पर नहीं है। केंद्र को 2 सप्ताह के भीतर आपत्तियां हटाकर हलफनामा ऑन-रिकॉर्ड लाने का निर्देश दिया गया।

नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने समलैंगिक साझेदारों (Same-Sex Partners) को स्वास्थ्य आपात स्थितियों के दौरान एक-दूसरे का ‘चिकित्सा प्रतिनिधि’ (Medical Representative) बनने और सहमति देने के विधिक अधिकारों की मांग वाली याचिका पर केंद्र सरकार के जवाब के मीडिया में समय से पहले लीक होने पर कड़ी आपत्ति जताई है। अदालत ने आश्चर्य व्यक्त किया कि जिस जवाबी हलफनामे (Counter-Affidavit) को आधिकारिक तौर पर अभी तक अदालत के रिकॉर्ड पर रखा ही नहीं गया है, उसकी संवेदनशील सामग्री प्रेस में पहले कैसे प्रकाशित हो गई [समलैंगिक साझेदार चिकित्सा अधिकार याचिका]।

न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान नाराजगी जताते हुए केंद्र सरकार से पूछा कि यह दस्तावेज मीडिया के पास कैसे पहुंचा। वहीं, केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) चेतन शर्मा ने मीडिया को हलफनामा देने से इनकार करते हुए कहा कि हलफनामे में कुछ तकनीकी/विधिक मुद्दे हैं और सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता इस मामले में सरकार का अंतिम रुख स्पष्ट करेंगे।

उच्च न्यायालय की प्रमुख मौखिक टिप्पणियां

1. अदालत से पहले प्रेस के पास हलफनामा पहुंचने पर आश्चर्य न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने खुली अदालत में गंभीर सवाल उठाते हुए कहा: “मेरे संज्ञान में आने से पहले यह जवाबी हलफनामा प्रेस को कैसे पता चला? मुझे इस पर गहरा आश्चर्य है। जब मैंने इसे मीडिया में पढ़ा, तो मैं सोचने लगी कि यह केस तो मेरे पास लंबित है, फिर यह जानकारी सबसे पहले प्रेस के पास कैसे पहुंची? मुझे यह देखकर हैरानी हो रही है कि याचिकाकर्ता को प्रति दी गई और यह सीधे मीडिया तक पहुंच गई। किसी न किसी ने तो इसे प्रेस को उपलब्ध कराया है।”

2. सहमति के बाद भी तारीख मांगने पर अदालत का सवाल

  • जब एएसजी ने सुनवाई स्थगित करने की मांग की, तो पीठ ने मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए पूछा कि यदि 10 सितंबर के कथित हलफनामे में सरकार ने समलैंगिक जोड़ों को आपातकालीन चिकित्सा सहमति देने के अधिकार का समर्थन कर ही दिया है, तो फिर सॉलिसिटर जनरल के आने की क्या आवश्यकता है और मामला क्यों टाला जा रहा है?
  • एएसजी ने स्पष्ट किया कि हलफनामे के संदर्भ में कुछ आंतरिक मुद्दे हैं जिन पर सरकार विचार कर रही है और उस पर अंतिम निर्णय सॉलिसिटर जनरल द्वारा लिया जाएगा।

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मामले का घटनाक्रम (Chronology)

1.1. केंद्र को नोटिस जारी:17 जुलाई 2025.

हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार और राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था।

2.2. हलफनामा मीडिया में लीक:सितंबर 2026.

कोर्ट में आधिकारिक रूप से रिकॉर्ड पर आने से पहले केंद्र का कथित समर्थन वाला जवाब मीडिया में रिपोर्ट हुआ।

3.3. अगली सुनवाई:5 अक्टूबर 2026.

हाईकोर्ट ने केंद्र को 2 सप्ताह में औपचारिक जवाब दाखिल करने का समय दिया है। अगली सुनवाई 5 अक्टूबर को होगी।

अदालत कक्ष में तीखी बहस (ASG बनाम वरिष्ठ अधिवक्ता सौरभ कृपाल)

  • याचिकाकर्ता का स्थगन पर विरोध: याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सौरभ कृपाल ने मामले को आगे टालने का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि यह याचिका एक साल से अधिक समय से लंबित है और देश के नागरिकों के जीवन व स्वास्थ्य से जुड़ा एक बेहद अहम मुद्दा है, इसलिए इस पर तत्काल सुनवाई होनी चाहिए।
  • हलफनामा बदलने की आशंका: * जब यह सामने आया कि हलफनामा रजिस्ट्री की आपत्तियों (Defects/Objections) के कारण रिकॉर्ड पर नहीं आ सका है, तो सौरभ कृपाल ने कहा: “यदि सरकार अपना जवाबी हलफनामा बदलने की योजना बना रही है, तो उन्हें अदालत में साफ तौर पर यह स्वीकार करना चाहिए।”
    • इसके जवाब में एएसजी चेतन शर्मा ने कहा: “मुझे नहीं पता कि आगे क्या होगा, इस पर अंतिम निर्णय सॉलिसिटर जनरल ही लेंगे।”
  • अदालत का अंतरिम निर्देश: अदालत ने आदेश में दर्ज किया कि सरकार का औपचारिक हलफनामा अभी रिकॉर्ड पर नहीं है। पीठ ने केंद्र को आपत्तियां दूर करते हुए दो सप्ताह के भीतर इसे रिकॉर्ड पर दाखिल करने का निर्देश दिया और अगली सुनवाई 5 अक्टूबर तय की।

याचिका की पृष्ठभूमि और मुख्य कानूनी मांगें

  • याचिकाकर्ता: यह याचिका एक भारतीय महिला द्वारा दायर की गई है, जिसने 2023 में न्यूजीलैंड में अपनी समलैंगिक साथी से विवाह किया था।
  • पारिवारिक विवशता और चिकित्सा आपातकाल: * याचिकाकर्ता ने दलील दी है कि उसकी साथी के रक्त-संबंधी या निकटतम पारिवारिक सदस्य अन्य राज्यों या विदेशों में रहते हैं।
    • किसी गंभीर चिकित्सा आपातकाल (Health Emergency) में उनका तुरंत अस्पताल पहुंचना संभव नहीं होता।
  • मौजूदा नियमों की बाधा: वर्तमान चिकित्सा और अस्पताल विनियम केवल “पति या पत्नी, नाबालिगों के मामले में माता-पिता या अभिभावक, अथवा स्वयं मरीज” को ही सर्जरी या जीवन-रक्षक उपचार के लिए सहमति (Consent) देने की अनुमति देते हैं।
  • मांगी गई राहतें: * अस्पतालों और डॉक्टरों को यह निर्देश दिया जाए कि वे गैर-विषमलैंगिक (Non-heterosexual/Queer) साझेदारों को ‘चिकित्सा प्रतिनिधि’ के रूप में मान्यता दें।
    • वैकल्पिक रूप से, मरीज द्वारा अपने साथी को पहले से दी गई अग्रिम मेडिकल पावर ऑफ अटॉर्नी (Medical Power of Attorney) को आपातकालीन चिकित्सा निर्णयों के लिए कानूनी रूप से पर्याप्त और वैध घोषित किया जाए।
  • नोटिस व पूर्व आदेश: हाईकोर्ट ने 17 जुलाई 2025 को केंद्र सरकार और राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (NMC) को नोटिस जारी किया था और 20 अगस्त को जवाब दाखिल करने के लिए एक सप्ताह का अंतिम समय दिया था।

Same Sex: विधिक विवरण

  • प्रासंगिक कानून: भारत का संविधान – अनुच्छेद 21 (जीवन, स्वास्थ्य और गरिमा का अधिकार) एवं अनुच्छेद 14; राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग अधिनियम, 2019 (NMC Act); भारतीय चिकित्सा परिषद (व्यावसायिक आचरण, शिष्टाचार और नैतिकता) विनियम
  • संबद्ध संविधान पीठ नजीर: सुप्रियो चक्रवर्ती बनाम भारत संघ (2023, 5-जजों की संविधान पीठ) — ‘यद्यपि समलैंगिक विवाह को मौलिक अधिकार नहीं माना गया, परंतु केंद्र सरकार द्वारा क्वीर जोड़ों के बुनियादी नागरिक और चिकित्सा अधिकारों की समीक्षा हेतु कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में समिति गठित करने का निर्देश दिया गया था।’
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • याचिकाकर्ता की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता सौरभ कृपाल एवं वरिष्ठ अधिवक्ता श्याल त्रेहान
    • केंद्र सरकार की ओर से: अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) चेतन शर्मा (सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के लिए)
  • पीठ: न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा (दिल्ली उच्च न्यायालय)

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