टेंडर विवाद का मुख्य कानूनी संदर्भ (SecLink vs Adani Properties)
1.1. सेकलिंक (SecLink) की सबसे ऊंची बोली:2018 पहला टेंडर.
2018 के पहले टेंडर में सेशेल्स आधारित कंपनी ‘SecLink Technologies’ ने ₹7,200 करोड़ की उच्चतम बोली लगाई थी, जबकि अदाणी प्रॉपर्टीज (Adani Properties) ने ₹4,529 करोड़ की बोली लगाई थी।
2.2. पहला टेंडर रद्द करने का फैसला:रेलवे भूमि का समावेशन.
27 अगस्त 2020 को महाराष्ट्र सरकार की सचिवों की समिति (CoS) ने पुनर्विकास योजना में 45 एकड़ रेलवे भूमि को शामिल करने और परियोजना को अधिक व्यावहारिक बनाने के लिए पहला टेंडर रद्द कर नया टेंडर जारी करने का निर्णय लिया।
3.3. अदाणी ग्रुप को टेंडर आवंटन:2022-23 नया टेंडर.
शर्तों में संशोधन के बाद जारी नए टेंडर में अदाणी प्रॉपर्टीज ने ₹5,069 करोड़ की बोली लगाकर टेंडर हासिल किया।
4.4. अदालती चुनौती:बॉम्बे HC का रुख व SC में अपील.
SecLink ने आरोप लगाया कि नया टेंडर एक विशेष बोलीदाता (अदाणी) को फायदा पहुंचाने के लिए लाया गया था। बॉम्बे हाईकोर्ट ने सरकार के फैसले को जनहित में सही ठहराया, जिसके खिलाफ SecLink ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एशिया की सबसे बड़ी झुग्गी बस्ती ‘धारावी’ के पुनर्विकास प्रोजेक्ट (Dharavi Slum Redevelopment Project) से जुड़ी निविदा रद्द करने के खिलाफ दायर याचिका की सुनवाई के दौरान धारावी के निवासियों और बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) के अधिकारियों द्वारा कोविड-19 महामारी के चरम दौर में दिखाए गए अदम्य साहस और समझदारी की खुले दिल से प्रशंसा की है।
न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की पीठ सेशल्स स्थित कंपनी ‘सेकलिंक टेक्नोलॉजीज’ (SecLink Technologies) द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में बॉम्बे उच्च न्यायालय के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसमें महाराष्ट्र सरकार द्वारा पूर्व निविदा को रद्द करने और अडानी प्रॉपर्टीज (Adani Properties) को नया टेंडर आवंटित करने के फैसले को वैध ठहराया गया था। अदालत ने टिप्पणी की कि यदि स्थानीय निवासियों का स्व-अनुशासन और निगम कर्मियों का निस्वार्थ समर्पण न होता, तो संकरी गलियों और अत्यधिक जनघनत्व वाले उस क्षेत्र में जान-माल का नुकसान लाखों में पहुंच सकता था।
शीर्ष अदालत की प्रमुख मौखिक टिप्पणियां
1. ‘धारावी ने शेष मुंबई के लिए पेश किया था उदाहरण’: न्यायमूर्ति पी.बी. वराले महाराष्ट्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता द्वारा कोविड महामारी के प्रभाव का उल्लेख किए जाने पर न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले ने कहा: “चूंकि कोविड-19 महामारी का संदर्भ आया है, इसलिए मुझे धारावी के सभी निवासियों की उस असाधारण समझदारी और बुद्धिमत्ता की सराहना करनी चाहिए जो उन्होंने महामारी के उस भीषण दौर में दिखाई। इतने विशाल और घने क्षेत्र में चिकित्सा सहायता पहुंचाना बेहद चुनौतीपूर्ण था। परंतु स्थानीय जनता के संयुक्त प्रयासों, परिपक्व समझ और निगम अधिकारियों के असाधारण परिश्रम के कारण ही कोविड की जंग जीती जा सकी। धारावी ने पूरे मुंबई के लिए एक मिसाल कायम की। उस लड़ाई में कई निगम अधिकारियों ने अपनी जान गंवाई, जिसकी सराहना की जानी चाहिए। यदि ऐसा संयुक्त सहयोग न होता, तो हताहतों का आंकड़ा लाखों में हो सकता था।”
2. ‘संकरी गलियां और 10-15 लोगों का एक घर, फिर भी स्व-अनुशासन’: सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता
- न्यायमूर्ति वराले की टिप्पणी का समर्थन करते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा:“धारावी में एक छोटे से घर में 10 से 15 लोग रहते हैं। लॉकडाउन की स्थिति की कल्पना कीजिए। गलियां इतनी संकरी हैं कि सोशल डिस्टेंसिंग एक दूर का सपना लगती थी। इसके बावजूद यदि महामारी पर नियंत्रण पाया गया, तो वह केवल जनता के स्व-लगाए गए अनुशासन (Self-imposed discipline) और निगम कर्मियों की निस्वार्थ सेवा का परिणाम था।”
3. ‘अभाव और कठिनाइयां इंसान को व्यापक दृष्टिकोण और त्याग सिखाती हैं’: न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश पीठ के दूसरे सदस्य न्यायमूर्ति सुंदरेश ने सहमति जताते हुए कहा: “कभी-कभी गरीबी और सुख-सुविधाओं का अभाव इंसान को अधिक उदार और व्यापक सोच वाला (Broad-minded) बना देता है। ऐसा संयुक्त परिवारों में भी होता है। जब आप कई लोगों के साथ रहते हैं, तो आपको तालमेल बिठाना और समस्याओं से निपटना आ जाता है। ऐसे परिवेश से चरित्र में त्याग की भावना जन्म लेती है, जिससे लोग विपरीत परिस्थितियों और संकटों का सामना कहीं बेहतर तरीके से कर पाते हैं।”
निविदा विवाद की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (SecLink बनाम Adani Properties)
- पहला टेंडर (2018): 28 नवंबर 2018 को धारावी पुनर्विकास परियोजना के लिए पहली बार निविदा जारी की गई थी। इस वित्तीय बोली में याचिकाकर्ता कंपनी ‘सेकलिंक टेक्नोलॉजीज’ (SecLink) ने ₹7,200 करोड़ की उच्चतम बोली लगाई थी, जबकि ‘अडानी प्रॉपर्टीज’ ने ₹4,529 करोड़ की बोली पेश की थी। सेकलिंक सबसे ऊंची बोली लगाने वाली (H-1) कंपनी थी।
- टेंडर का निरसन (2020): 27 अगस्त 2020 को महाराष्ट्र सरकार की सचिवों की समिति (Committee of Secretaries – CoS) ने 2018 की निविदा प्रक्रिया को रद्द करने की सिफारिश की।
- कारण: राज्य सरकार ने केंद्र सरकार से मिली 45 एकड़ रेलवे भूमि को भी इस पुनर्विकास परियोजना में शामिल करने का निर्णय लिया था, जिससे परियोजना का दायरा और व्यवहार्यता (Viability) काफी बढ़ गई थी।
- 5 नवंबर 2020 को नए नियमों और शर्तों के साथ नया टेंडर जारी करने का शासनादेश (GR) निकला।
- दूसरा टेंडर (2022) और अडानी को आवंटन: नए टेंडर में अडानी प्रॉपर्टीज ने ₹5,069 करोड़ की बोली लगाकर ठेका हासिल कर लिया।
- सेकलिंक की याचिका: सेकलिंक ने बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए आरोप लगाया कि रेलवे की जमीन को शामिल करना केवल एक बहाना था और नया टेंडर केवल उनके अधिकारों को छीनने तथा एक विशेष बोलीदाता (अडानी) को लाभ पहुंचाने के लिए तैयार (Tailor-made) किया गया था।
- बॉम्बे हाईकोर्ट का निर्णय: हाईकोर्ट ने सेकलिंक की याचिका खारिज करते हुए माना था कि रेलवे भूमि को शामिल करने से प्रोजेक्ट अधिक व्यावहारिक बना है और सार्वजनिक हित (Public Interest) में लिया गया सचिवों की समिति का फैसला पूरी तरह तर्कसंगत और विधि-सम्मत था। इसी आदेश के खिलाफ मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: सेकलिंक टेक्नोलॉजीज कॉर्पोरेशन बनाम महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य [विशेष अनुमति याचिका (सिविल) – सुप्रीम कोर्ट]
- प्रासंगिक कानून: प्रशासनिक विधि (Administrative Law) के तहत सरकारी अनुबंधों व निविदाओं की न्यायिक समीक्षा; सार्वजनिक हित बनाम बोलीदाता के अधिकार; भारत का संविधान – अनुच्छेद 14 (मनमानेपन के विरुद्ध संरक्षण), अनुच्छेद 19(1)(g) एवं अनुच्छेद 226/136
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत: * टाटा सेलुलर बनाम भारत संघ (सुप्रीम कोर्ट) — ‘सरकारी निविदाओं में अदालती हस्तक्षेप सीमित है और सार्वजनिक हित में प्रक्रियागत बदलाव किए जा सकते हैं।’
- विधिक प्रतिनिधित्व: * याचिकाकर्ता (सेकलिंक) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रह्मण्यम
- महाराष्ट्र सरकार की ओर से: सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता
- पीठ: न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले (सर्वोच्च न्यायालय)
Dharavi Slum:न्यायाधीशों और सॉलिसिटर जनरल की मुख्य टिप्पणियां
| व्यक्ति | अदालत में की गई महत्वपूर्ण टिप्पणी |
| जस्टिस पी.बी. वराले | इतने घने आबादी वाले क्षेत्र में जहां चिकित्सा सहायता पहुंचाना कठिन था, वहां धारावीवासियों के सहयोग और निगम अधिकारियों के असाधारण प्रयासों से कोरोना को नियंत्रित किया जा सका। यह पूरे मुंबई के लिए एक मिसाल बना। |
| सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता | धारावी में एक-एक घर में 10-15 लोग रहते हैं और गलियां इतनी संकरी हैं कि सोशल डिस्टेंसिंग एक सपना थी। लेकिन लोगों के स्वयं-लगाए गए अनुशासन और निगम कर्मियों की निस्वार्थ सेवा से स्थिति संभली। |
| जस्टिस एम.एम. सुंदरेश | “कई बार गरीबी और सुविधाओं का अभाव आपको व्यापक सोच वाला और परिपक्व बनाता है। जैसे संयुक्त परिवार में लोग एक-दूसरे के साथ तालमेल बिठाना और त्याग करना सीखते हैं, वैसे ही वे समस्याओं से बेहतर ढंग से निपटते हैं।” |

