हाईकोर्ट की मुख्य तीखी टिप्पणियां
- कानून से ऊपर कोई नहीं: न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने केंद्र सरकार के वकील को फटकार लगाते हुए कहा:“इसमें पीड़िता का नाम कैसे उजागर किया गया? आप ऐसा कैसे कर सकते हैं? आप भारत सरकार हैं। आप खुद पीड़िता का नाम उजागर करके हैंडबुक प्रकाशित कर रहे हैं और इसे अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर प्रसारित कर रहे हैं।”
- जज भी नाम छिपाने के लिए ‘X’ लिखते हैं: शैक्षणिक उद्देश्य की दलील को पूरी तरह खारिज करते हुए जज ने कहा:“तो क्या आप पीड़िता का नाम उजागर कर देंगे? एक न्यायिक फैसला भी नाम उजागर नहीं कर सकता। शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए पीड़िता के नाम की आवश्यकता नहीं होती। यहाँ तक कि न्यायाधीश भी अपने फैसलों में पीड़िता का नाम छिपाने के लिए ‘X’ लिखते हैं। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के स्पष्ट निर्देश मौजूद हैं।”
- देरी से आना जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करता: अदालत ने कहा कि भले ही पक्षकार देरी से कोर्ट पहुंचे हों, लेकिन यह केंद्र सरकार को कानून का पालन करने की उसकी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करता। यौन उत्पीड़न पीड़िता की पहचान उजागर करना दंडनीय अपराध है।
नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न की रोकथाम से संबंधित आधिकारिक हैंडबुक (POSH Handbook) में यौन उत्पीड़न पीड़िता (Survivor) की पहचान और नाम उजागर करने पर केंद्र सरकार और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय (MWCD) को कड़ी फटकार लगाई है।
न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा की एकल पीठ ने केंद्र सरकार के वकील को निर्देश दिया कि वे संबंधित अधिकारियों से स्पष्ट निर्देश प्राप्त कर अगली सुनवाई पर अदालत को बताएं कि इस सामग्री को प्रकाशित करने के लिए कौन से अधिकारी व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार (Responsible) हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानूनन यौन अपराध या उत्पीड़न की पीड़िता का नाम उजागर करना एक दंडनीय अपराध है, और शैक्षणिक उद्देश्यों (Educational Purposes) की आड़ में भी सरकार कानून से ऊपर नहीं हो सकती।
उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक टिप्पणियां
1. जज भी पहचान छुपाने के लिए ‘X’ लिखते हैं केंद्र सरकार द्वारा यह दलील दिए जाने पर कि हैंडबुक नवंबर 2015 में केवल जागरूकता और शैक्षणिक उद्देश्य के लिए प्रकाशित की गई थी, अदालत ने तीखा ऐतराज जताते हुए कहा: “तो क्या शैक्षणिक उद्देश्य के लिए आप पीड़िता का नाम उजागर कर देंगे? एक न्यायिक फैसले में भी ऐसा नहीं किया जा सकता। शैक्षणिक उद्देश्य के लिए आपको पीड़िता का नाम लिखने की कोई आवश्यकता नहीं होती। यहां तक कि अदालत के न्यायाधीश भी पीड़िता की जगह ‘X’ लिखते हैं। सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट फैसले और हाई कोर्ट के सख्त दिशा-निर्देश मौजूद हैं। आप पीड़िता की पहचान उजागर नहीं कर सकते, यह कानूनन दंडनीय अपराध है।”
2. सरकार भी कानून के दायरे से बाहर नहीं मंत्रालय की आधिकारिक वेबसाइट पर सामग्री उपलब्ध होने पर नाराजगी जताते हुए न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा: “इसमें पीड़िता का नाम कैसे उजागर हुआ? आप ऐसा कैसे कर सकते हैं? आप भारत सरकार हैं। आप खुद ऐसी हैंडबुक प्रकाशित और प्रसारित कर रहे हैं जिसमें पीड़िता का नाम लिखा है, और यह आपकी आधिकारिक वेबसाइट पर मौजूद है। अगर पक्षकार अदालत आने में देर भी करते हैं, तब भी यह सरकार को कानून का पालन करने की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करता। कानून का पालन सभी के लिए अनिवार्य है—सरकार के लिए भी।”
मामले की पृष्ठभूमि (POSH हैंडबुक विवाद)
- विवादित हैंडबुक: केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने ‘कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न की रोकथाम’ (POSH Act, 2013) के क्रियान्वयन को लेकर एक आधिकारिक हैंडबुक प्रकाशित की थी।
- श्रम न्यायाधिकरण (Labour Tribunal) का आदेश शामिल: हैंडबुक में एक केस स्टडी/उपाख्यान (Anecdote) के रूप में एक लेबर ट्रिब्यूनल के आदेश को हूबहू शामिल किया गया, जिसमें घटना के विवरण के साथ-साथ पीड़िता और आरोपी दोनों का वास्तविक नाम सार्वजनिक कर दिया गया।
- याचिकाकर्ता की मांग: मामले के कथित आरोपी ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख करते हुए कहा कि दोनों पक्षों के बीच विवाद काफी पहले आपसी सहमति से सुलझ (Settle) चुका है। इसके बावजूद सरकारी हैंडबुक इंटरनेट पर हर जगह उपलब्ध है, जिससे उसकी और पीड़िता की पहचान लगातार सार्वजनिक हो रही है।
याचिका में मांगी गई राहतें
- हैंडबुक से नाम हटाना: महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की हैंडबुक और वेबसाइट से तत्काल प्रभाव से दोनों पक्षों के नाम और पहचान से जुड़े ब्योरे हटाए जाएं।
- गूगल से डी-इंडेक्सिंग (De-indexing & De-linking): सर्च इंजन ‘गूगल’ (Google) को निर्देश दिया जाए कि वह इंटरनेट पर मौजूद इस विवादित हैंडबुक और संबंधित वेब पेजों को सर्च परिणामों से डी-लिंक और डी-इंडेक्स करे, ताकि पीड़िता की निजता और पहचान की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
विधिक ढांचा
- कानूनी प्रतिबंध: कानून के तहत यौन उत्पीड़न और यौन अपराधों की पीड़िताओं की पहचान गुप्त रखना अनिवार्य है। भारतीय न्याय संहिता / आईपीसी और पॉक्सो जैसे कानूनों के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक दिशा-निर्देशों के तहत पीड़िता की पहचान उजागर करना गैरकानूनी और संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है।
- अगली सुनवाई: अदालत ने मामले को आगे की त्वरित सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करते हुए केंद्र सरकार से जिम्मेदार अधिकारियों की सूची पेश करने का निर्देश दिया है।
Disclosing Identity: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा (Justice Swarana Kanta Sharma) |
| प्रकाशक | महिला एवं बाल विकास मंत्रालय (Ministry of Women and Child Development) |
| मुख्य मुद्दा | POSH हैंडबुक में श्रम न्यायाधिकरण के आदेश के जरिए पीड़िता और आरोपी का नाम सार्वजनिक करना |
| याचिकाकर्ता की मांग | इंटरनेट/गूगल से नाम हटाने (De-linking & De-indexing) का निर्देश देने की मांग |

