हाईकोर्ट की सुनवाई और मुख्य कानूनी बिंदु
- पुलिस पक्ष का तर्क: उत्तरदाताओं की ओर से पेश वकील ने तर्क दिया कि संबंधित मूल FIR को हाईकोर्ट द्वारा 10 अगस्त को ही रद्द (Quash) कर दिया गया है, इसलिए अब अवमानना का मामला नहीं बनता।
- हाईकोर्ट की मुख्य टिप्पणी: न्यायाधीश मिनी पुष्करणा ने इस तर्क को स्वीकार न करते हुए स्पष्ट किया कि भले ही मुख्य एफआईआर रद्द कर दी गई हो, लेकिन पुलिस अधिकारी की लापरवाही पर विभागीय जांच शुरू करने के आदेश 14 फरवरी और 24 फरवरी 2025 को ही पारित कर दिए गए थे, जिसका पालन पुलिस प्रशासन को करना अनिवार्य था।
हाईकोर्ट ने पुलिस अधिकारियों की इस निष्क्रियता को प्रथम दृष्टया अदालती आदेशों की जानबूझकर की गई अवहेलना (Wilful Disobedience) मानते हुए अधिकारियों को अपना पक्ष स्पष्ट करने के लिए 4 सप्ताह के भीतर हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है।
नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने पुलिस जांच में वर्षों की असहनीय देरी, अदालती आदेशों के बावजूद लापरवाह जांच अधिकारियों (IO) पर विभागीय कार्रवाई न करने और शीर्ष पुलिस नेतृत्व द्वारा न्यायिक निर्देशों की कथित अवहेलना पर कड़ा संज्ञान लिया है।
विभागीय जांच शुरू करने के निर्देश 14 फरवरी और 24 फरवरी 2025 को ही पारित कर दिए गए थे
न्यायमूर्ति मिनी पुष्करणा की एकल पीठ ने अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए यह नोटिस जारी किया। जब पुलिस पक्ष के वकील ने यह दलील देकर पल्ला झाड़ने की कोशिश की कि जिस मूल एफआईआर को लेकर यह विवाद था, उसे उच्च न्यायालय पहले ही 10 अगस्त को रद्द (Quashed) कर चुका है, तो अदालत ने इसे सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट रूप से रेखांकित किया कि संबंधित पुलिस अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच शुरू करने के निर्देश 14 फरवरी और 24 फरवरी 2025 को ही पारित कर दिए गए थे, अतः मूल केस के रद्द होने से पुलिस अधिकारी की 9 साल की घोर लापरवाही और अदालती आदेशों के उल्लंघन का दायित्व समाप्त नहीं हो जाता। अदालत ने दिल्ली के पुलिस आयुक्त (CP) अनुराग कुमार और कालकाजी के सहायक पुलिस आयुक्त (ACP) राकेश कुमार शर्मा के खिलाफ अवमानना नोटिस जारी किया है। यह नोटिस 2016 के एक मामले में 9 साल तक जांच पूरी न करने वाले आईओ के खिलाफ विभागीय जांच (Departmental Inquiry) शुरू करने और उसे तार्किक परिणति तक पहुंचाने के अदालती आदेशों की जानबूझकर की गई अवज्ञा (Wilful Disobedience) के आरोप में जारी किया गया है।
उच्च न्यायालय के प्रमुख निष्कर्ष एवं अवमानना कार्यवाही का आधार
1. ‘मूल एफआईआर रद्द होने से विभागीय जांच के आदेश निष्प्रभावी नहीं होते’: न्यायमूर्ति मिनी पुष्करणा
- अदालत के संज्ञान में जब यह लाया गया कि मूल एफआईआर 10 अगस्त को रद्द हो चुकी है, तो पीठ ने स्पष्ट किया कि मुख्य मुकदमे की स्थिति चाहे जो भी हो, न्यायिक निर्देशों के अनुपालन की समयसीमा और शुचिता सर्वोपरि है।
- अदालत ने प्रतिवादी शीर्ष पुलिस अधिकारियों को 4 सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाबी हलफनामा (Affidavit) दाखिल करने का निर्देश दिया कि फरवरी 2025 में पारित स्पष्ट आदेशों के बावजूद आईओ के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई की अंतिम स्थिति रिपोर्ट रिकॉर्ड पर क्यों नहीं रखी गई।
- मामले की अगली सुनवाई 3 फरवरी 2027 को नियत की गई है।
2. जांच में 9 साल की आपराधिक सुस्ती और न्यायिक आदेशों की उपेक्षा
- अदालत ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए पाया कि 2016 से लंबित मामले में फरवरी 2025 तक आईओ ने न तो जांच पूरी की थी और न ही औपचारिक नोटिस के बावजूद स्टेटस रिपोर्ट पेश की थी।
- हाईकोर्ट को 24 फरवरी 2025 को राज्य के अतिरिक्त स्थायी वकील (ASC) द्वारा यह औपचारिक आश्वासन दिया गया था कि लापरवाह आईओ के खिलाफ विभागीय कार्यवाही शुरू कर दी गई है और उसकी अंतिम रिपोर्ट कोर्ट के समक्ष रखी जाएगी।
- इसके बावजूद 24 अप्रैल, 17 जुलाई, 27 अक्टूबर 2025 तथा 17 फरवरी व 15 जुलाई की क्रमिक अदालती तारीखों पर कोई अनुपालन या स्टेटस रिपोर्ट दाखिल नहीं की गई, जो प्रथम दृष्टया अदालत की अवमानना का गंभीर मामला बनाता है।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (थाना अमर कॉलोनी का 2016 का मामला)
- मूल मामला (2016 की FIR): 16 जनवरी 2016 को दक्षिण-पूर्वी दिल्ली के थाना अमर कॉलोनी में आईपीसी की धारा 509 (महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाना/अपशब्द) के तहत एक एफआईआर दर्ज की गई थी।
- 9 साल तक फाइलों में दबी रही जांच: जांच अधिकारी इंस्पेक्टर आशीष कुमार ने 9 वर्षों तक न तो आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की और न ही क्लोजर रिपोर्ट। थक-हारकर पीड़िता/शिकायतकर्ता ने वर्ष 2024 में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
- हाईकोर्ट की 2025 की सख्ती और एसीपी की रिपोर्ट:
- 14 फरवरी 2025 को हाईकोर्ट ने आईओ के गैर-जिम्मेदाराना आचरण पर गहरी नाराजगी जताते हुए कालकाजी के एसीपी को जांच अधिकारी की लापरवाही पर विभागीय जांच बैठाने का आदेश दिया।
- 21 फरवरी 2025 को एसीपी कालकाजी ने स्वयं स्वीकार किया कि इंस्पेक्टर आशीष कुमार की ओर से कर्तव्य निर्वहन में घोर लापरवाही और उपेक्षा बरती गई है तथा अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए रिपोर्ट वरिष्ठ अधिकारियों को भेज दी गई है।
- साकेत कोर्ट में 9 साल की देरी की माफी की अर्जी और मजिस्ट्रेट की फटकार:
- मई 2025 में पुलिस ने आनन-फानन में साकेत जिला अदालत (JMFC कोर्ट) के समक्ष आरोप पत्र पेश किया और साथ में 9 साल की देरी को माफ करने (Condonation of 9-year delay) की अर्जी लगाई।
- न्यायिक मजिस्ट्रेट (JMFC) ने पुलिस की इस मनमानी पर संज्ञान लेने से इनकार कर दिया और संबंधित डीसीपी (DCP) को पत्र लिखकर इंस्पेक्टर आशीष कुमार के खिलाफ कानून सम्मत दंडात्मक कार्रवाई शुरू करने का औपचारिक अनुरोध किया।
- अवमानना का कारण: न तो हाईकोर्ट के 14 व 24 फरवरी 2025 के आदेशों का पालन किया गया और न ही साकेत कोर्ट के मजिस्ट्रेट के निर्देशों पर कोई ठोस विभागीय परिणाम सामने आया, जिसके कारण शीर्ष पुलिस अधिकारियों के खिलाफ न्यायालय की अवमानना अधिनियम के तहत याचिका दाखिल की गई।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: शिकायतकर्ता/याचिकाकर्ता बनाम अनुराग कुमार (पुलिस कमिश्नर, दिल्ली) एवं अन्य [कंटेम्प्ट पिटीशन (सिविल) – दिल्ली उच्च न्यायालय]
- प्रतिवादी पक्ष:
- अनुराग कुमार, पुलिस कमिश्नर, दिल्ली पुलिस (अवमाननाकर्ता संख्या 1)
- राकेश कुमार शर्मा, एसीपी, कालकाजी (अवमाननाकर्ता संख्या 2)
- इंस्पेक्टर आशीष कुमार, तत्कालीन जांच अधिकारी (प्रोफार्मा प्रतिवादी)
- प्रासंगिक कानून: न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 11 एवं 12 (न्यायिक आदेशों की जानबूझकर अवज्ञा हेतु दंड); भारत का संविधान – अनुच्छेद 215 (अभिलेख न्यायालय के रूप में उच्च न्यायालय की अवमानना शक्तियां); दिल्ली पुलिस अधिनियम, 1978 एवं दिल्ली पुलिस (दंड एवं अपील) नियम, 1980 (विभागीय जांच प्रक्रिया)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- अब्दुल रहमान अंतुले बनाम आर.एस. नायक (1992, सुप्रीम कोर्ट संविधान पीठ) — ‘त्वरित जांच और शीघ्र विचारण (Speedy Trial & Investigation) संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार है; पुलिस द्वारा अनावश्यक वर्षों तक जांच लटकाए रखना न्याय प्रक्रिया का गला घोंटने के समान है।’
- प्रिया गुप्ता बनाम राज्य (2013, सुप्रीम कोर्ट) — ‘संवैधानिक अदालतों द्वारा दिए गए निर्देशों और हलफनामे पर किए गए वादों का समय पर पालन न करना सीधा अवमानना का दायित्व आकर्षित करता है; अधिकारी बाद में मूल कार्यवाही समाप्त होने की आड़ लेकर बच नहीं सकते।’
- पीठ: न्यायमूर्ति मिनी पुष्करणा (दिल्ली उच्च न्यायालय)
Delhi Police: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति मिनी पुष्करणा (Justice Mini Pushkarna) |
| उत्तरदाता (Respondents) | अनुराग कुमार (पुलिस आयुक्त, दिल्ली), राकेश कुमार शर्मा (ACP कालकाजी) और इंस्पेक्टर आशिष कुमार |
| मूल मामला | थाना अमर कॉलोनी में IPC की धारा 509 के तहत दर्ज 2016 की FIR की जांच में 9 साल की देरी |
| अवमानना का कारण | हाईकोर्ट के 14 फरवरी और 24 फरवरी 2025 के विभागीय जांच के आदेशों का पालन न करना |
| अगली सुनवाई | 3 फरवरी, 2027 |

