हाईकोर्ट का रुख और मुख्य कानूनी टिप्पणियां
- वयस्क नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार: हाईकोर्ट ने याचिका पर संज्ञान लेते हुए कहा कि याचिकाकर्ता एक वयस्क नागरिक है और उसे अपने जीवन से जुड़े निजी फैसले लेने का पूरा संवैधानिक अधिकार है:“मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, विशेष रूप से याचिकाकर्ता के जीवन और स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार (Fundamental Right to Life and Liberty) की रक्षा के लिए—जो एक वयस्क नागरिक होने के बावजूद अपनी व्यक्तिगत पसंद के मामलों में जबरदस्ती का शिकार हो रही है—वह संबंधित थाना प्रभारी (SHO) से संपर्क करने के लिए स्वतंत्र होगी।”
- पुलिस अधिकारियों को निर्देश: अदालत ने संबंधित थाना प्रभारी (SHO) और बीट कांस्टेबलों को निर्देश दिया कि वे कानून के अनुसार महिला को जब भी आवश्यकता हो, तुरंत सहायता और पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करने के लिए सभी संभव कदम उठाएं।
- स्थान परिवर्तन पर प्रक्रिया: अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि याचिकाकर्ता किसी अन्य थाना क्षेत्र के अधिकार क्षेत्र में रहने का फैसला करती है, तो वह शिफ्ट होने के तीन दिनों के भीतर संबंधित थाना प्रमुख को अपने नए पते की पूरी जानकारी प्रदान करेगी। इसके बाद उस क्षेत्र के SHO को भी महिला को सुरक्षा प्रदान करने का दायित्व होगा।
नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने वयस्क नागरिकों की व्यक्तिगत स्वायत्तता (Personal Autonomy), जीवन साथी चुनने की स्वतंत्रता (Right to choose a life partner) और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन व व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संरक्षण पर एक संवेदनशील व कड़ा आदेश पारित किया है।
न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी की एकल पीठ ने महिला अधिवक्ता द्वारा अपने जीवन, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा (Life, Personal Liberty and Dignity) की रक्षा के लिए दायर रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए यह सुरक्षात्मक आदेश पारित किया। अदालत ने दो टूक शब्दों में रेखांकित किया कि याचिकाकर्ता एक वयस्क और परिपक्व नागरिक है, जिसे उसकी विशुद्ध व्यक्तिगत पसंद के मामलों में किसी भी प्रकार के दबाव या बल प्रयोग का शिकार नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने दिल्ली बार काउंसिल में पंजीकृत 26 वर्षीय एक महिला अधिवक्ता को पुलिस सुरक्षा प्रदान करने का निर्देश दिया है, जिसने अपने माता-पिता और परिजनों पर उसकी मर्जी के खिलाफ जबरन विवाह का दबाव बनाने, धमकियां देने और जबरन पैतृक घर ले जाने के प्रयास का आरोप लगाया था।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं टिप्पणियां
1. ‘वयस्क नागरिक की व्यक्तिगत पसंद पर दबाव नहीं बनाया जा सकता’: न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी महिला वकील की मौलिक स्वतंत्रता की रक्षा करते हुए अदालत ने अपने आदेश में कहा: “मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, विशेष रूप से याचिकाकर्ता के जीवन और स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार की रक्षा के लिए—जो एक बालिग और परिपक्व वयस्क होने के बावजूद अपनी विशुद्ध रूप से व्यक्तिगत पसंद के मामलों में कथित तौर पर बल प्रयोग और दबाव का सामना कर रही है—उसे संबंधित थाना प्रभारी (SHO) से तुरंत संपर्क करने की पूरी स्वतंत्रता होगी।”
2. जीवन और गरिमा का संवैधानिक अधिकार (अनुच्छेद 21)
- अदालत ने माना कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक वयस्क नागरिक को अपनी पसंद का जीवन साथी चुनने, विवाह से इनकार करने और अपनी मर्जी से निवास स्थान चुनने का अविभाज्य मौलिक अधिकार देता है।
- कोई भी परिवार, परिजन या सामाजिक दबाव वयस्क व्यक्ति की इस स्वायत्तता का अतिक्रमण नहीं कर सकता।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (उत्तम नगर निवास विवाद)
- याचिकाकर्ता की स्थिति: 26 वर्षीय याचिकाकर्ता एक पेशेवर वकील हैं और बार काउंसिल ऑफ दिल्ली (Bar Council of Delhi) में पंजीकृत हैं।
- पारिवारिक दबाव और धमकियां: याचिका में आरोप लगाया गया कि उनके माता-पिता और रिश्तेदार उन पर अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी करने का लगातार दबाव बना रहे थे। जब उन्होंने इससे इनकार कर दिया, तो उन्हें धमकियां दी गईं, मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया और जबरन पैतृक घर वापस ले जाकर उनकी मर्जी के खिलाफ बंधक बनाकर रखने का प्रयास किया गया।
- अलग निवास: उत्पीड़न से बचने के लिए महिला वकील ने अपने परिवार से अलग होकर पश्चिमी दिल्ली के उत्तम नगर इलाके में स्वतंत्र रूप से रहना शुरू किया। इसके बावजूद परिजनों द्वारा पीछा करने, धमकी देने और दबाव बनाने का सिलसिला जारी रहा, जिसके चलते उन्होंने सुरक्षा के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
उच्च न्यायालय के दिशा-निर्देश
- तत्काल पुलिस सुरक्षा: संबंधित थाना प्रभारी (SHO) और संबंधित हेड कांस्टेबल/बीट कांस्टेबल को निर्देश दिया गया कि वे कानून सम्मत प्रक्रिया का पालन करते हुए आवश्यकता पड़ने पर महिला वकील को तत्काल हर संभव सहायता और पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करें।
- थाना क्षेत्र बदलने की प्रक्रिया: अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि याचिकाकर्ता भविष्य में किसी अन्य पुलिस स्टेशन के अधिकार क्षेत्र में रहने का विकल्प चुनती हैं, तो उन्हें नया ठिकाना बदलने के 3 दिनों के भीतर संबंधित नए एसएचओ को अपने पते और संपर्क विवरण की पूरी जानकारी देनी होगी।
- नए एसएचओ का दायित्व: नए थाना क्षेत्र के एसएचओ को भी निर्देश दिया गया है कि वे सूचना मिलते ही आवश्यकतानुसार महिला को पूरी सहायता और सुरक्षा सुनिश्चित करेंगे।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: महिला अधिवक्ता बनाम राज्य (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली) एवं अन्य [आपराधिक रिट याचिका – दिल्ली उच्च न्यायालय]
- प्रासंगिक कानून: भारत का संविधान – अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण), अनुच्छेद 19 (आवागमन व निवास की स्वतंत्रता) एवं अनुच्छेद 226; भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) के नागरिक सुरक्षा व संज्ञेय अपराध निवारण संबंधी प्रावधान
- संबद्ध ऐतिहासिक सुप्रीम कोर्ट नजीरें:
- शक्ति वाहिनी बनाम भारत संघ (2018, सुप्रीम कोर्ट) — ‘किसी भी वयस्क पुरुष या महिला को अपनी पसंद के साथी से विवाह करने या न करने का पूर्ण अधिकार है; माता-पिता या खाप पंचायतों द्वारा इसमें किसी भी तरह का दखल या धमकी अनुच्छेद 21 का सीधा हनन है।’
- शफीन जहां बनाम असोकन के.एम. / हादिया केस (2018, सुप्रीम कोर्ट) — ‘वयस्क नागरिक का जीवन साथी चुनने का अधिकार उसकी व्यक्तिगत स्वायत्तता और गरिमा का मूल तत्व है, जिसे कोई भी अदालत या परिवार छीन नहीं सकता।’
- पीठ: न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी (दिल्ली उच्च न्यायालय)
Personal Liberty: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी (Justice Saurabh Banerjee) |
| याचिकाकर्ता | बार काउंसिल ऑफ दिल्ली में पंजीकृत 26 वर्षीय महिला अधिवक्ता |
| मुख्य मुद्दा | अपनी पसंद से जीने और बिना सहमति के विवाह के खिलाफ व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा |
| अदालत का फैसला | संबंधित थाना प्रभारी (SHO) को महिला को पर्याप्त सुरक्षा व सहायता देने का निर्देश |

