Monday, September 21, 2026
HomeLaworder HindiQuota Demand: बाल देखभाल गृह से बाहर निकलने वाले युवाओं को सरकारी...

Quota Demand: बाल देखभाल गृह से बाहर निकलने वाले युवाओं को सरकारी नौकरियों और शिक्षा में 1% आरक्षण मिले; हाईकोर्ट की भावुक टिप्पणी

हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और प्रमुख दिशा-निर्देश

  1. 1% क्षैतिज आरक्षण की नीति (1% Horizontal Reservation Policy): अदालत ने कहा कि बाल देखभाल गृहों में पलने वाले बच्चों को 18 वर्ष का होते ही बिना किसी सामाजिक, वित्तीय या पारिवारिक सहारे के अचानक दुनिया का सामना करना पड़ता है। इसलिए:
    • केंद्र और राज्य सरकारें 12 सप्ताह में नीति तैयार करें जिसके तहत सरकारी/सहायता प्राप्त शैक्षणिक संस्थानों, सरकारी नौकरियों, सार्वजनिक रोजगार और आउटसोर्स अनुबंधित नौकरियों में 1% क्षैतिज आरक्षण दिया जाए।
    • जब तक नीति तैयार नहीं होती, तब तक राज्य सरकार इन युवाओं को सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं में 5 वर्ष की आयु छूट और आवेदन/परीक्षा शुल्क से छूट प्रदान करे।
  2. पहचान पत्र और पहचान पत्र जारी करना: कोर्ट ने चिंता व्यक्त की कि देखभाल गृह छोड़ने वाले कई युवाओं के पास बुनियादी दस्तावेज भी नहीं होते।
    • अदालत ने निर्देश दिया कि जब बच्चा 17.5 वर्ष का हो, तभी से उसके पहचान पत्र (जैसे पहचान प्रमाण, निवास प्रमाण पत्र आदि) बनाने की प्रक्रिया शुरू की जाए ताकि 18 वर्ष पूरा होने पर उसे ‘आफ्टरकेयर पहचान पत्र’ (Aftercare Identity Card) के साथ भेजा जाए।
  3. आफ्टरकेयर और वित्तीय सहायता (Care Leaver Fund):
    • स्नातक स्तर तक सरकारी संस्थानों में मुफ्त शिक्षा और हॉस्टल की सुविधा मिले।
    • उच्च शिक्षा के लिए कम से कम 4,000 रुपये प्रतिमाह और व्यावसायिक पाठ्यक्रमों (Professional Courses) के लिए 6,000 रुपये प्रतिमाह की छात्रवृत्ति दी जाए।
    • ‘केयर लीवर्स सचिवालय’ (Care Leavers Secretariat) और एक डिजिटल डेटाबेस बनाया जाए जो इन युवाओं के पुनर्वास की निगरानी करे।
  4. किशोर न्याय बोर्ड (JJB) के मूल्यांकन पर सख्त टिप्पणियां: 16 से 18 वर्ष की आयु के किशोरों द्वारा किए गए गंभीर अपराधों के मामले में होने वाले प्रारंभिक मूल्यांकन (Preliminary Assessment) पर अदालत ने कहा कि यह प्रक्रिया केवल औपचारिकता बनकर रह गई है:
    • कोर्ट ने निर्देश दिया कि NIMHANS दिशानिर्देशों के तहत जिला स्तर पर क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट और चाइल्ड साइकियाट्रिस्ट का पैनल गठित किया जाए।
    • बिना NIMHANS प्रारूप के किसी भी आकलन रिपोर्ट को स्वीकार न किया जाए और मूल्यांकन में कम से कम 3 बैठकें व परिजनों/शिक्षकों से साक्षात्कार शामिल हो।

जयपुर: राजस्थान हाईकोर्ट ने बाल देखरेख संस्थानों (Child Care Institutions – CCIs) में पले-बढ़े बच्चों के 18 वर्ष पूरा होने पर उत्पन्न होने वाले संकट, उनके व्यवस्थित पुनर्वास (Aftercare & Rehabilitation) और किशोर न्याय अधिनियम, 2015 (JJ Act) के तहत 16 से 18 वर्ष के बच्चों के मानसिक परिपक्वता मूल्यांकन (Preliminary Assessment) पर एक ऐतिहासिक और संवेदनशील फैसला सुनाया है।

अनाथ व बेसहारा बच्चे बालिग होते ही अचानक एक ऐसी कठोर दुनिया में धकेल दिए जाते हैं

न्यायमूर्ति अनूप कुमार ढंड की एकल पीठ ने पोक्सो मामले में दायर एक याचिका पर सुनवाई के दौरान यह आदेश पारित किया। यद्यपि अदालत ने याचिकाकर्ता के घटना के समय 18 वर्ष से कम होने (नाबालिग होने) के दावे को खारिज कर दिया, लेकिन मामले का निस्तारण करने से पूर्व अदालत ने किशोर न्याय व्यवस्था के व्यापक पहलुओं पर संज्ञान लेते हुए केंद्र और राज्य सरकार को 12 सप्ताह के भीतर बाल देखरेख संस्थानों से निकलने वाले युवाओं (केयर लीवर्स – Care Leavers) के लिए सरकारी शिक्षा और नौकरियों में 1 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण (1% Horizontal Reservation) प्रदान करने की व्यापक नीति बनाने का अनिवार्य निर्देश दिया। अदालत ने अत्यंत पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा कि राज्य संरक्षण में बड़े होने वाले हजारों अनाथ व बेसहारा बच्चे बालिग होते ही अचानक एक ऐसी कठोर दुनिया में धकेल दिए जाते हैं जहां उनके पास न तो कोई स्थायी छत होती है, न पहचान पत्र, न शिक्षा-रोजगार का साधन और न ही कोई संबल।

उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं संवेदनशील टिप्पणियां

1. ’18 साल की दहलीज पर बेसहारा छोड़ देना गंभीर विफलता’: न्यायमूर्ति अनूप कुमार ढंड अदालत ने 3 सितंबर के अपने विस्तृत आदेश में कहा: “इस न्यायालय को यह देखकर अत्यंत पीड़ा होती है कि बाल देखरेख संस्थानों (CCIs) में बड़े होने वाले हजारों युवाओं को 18 वर्ष की आयु पूरी करते ही अचानक बाहरी दुनिया में धकेल दिया जाता है। ये युवा बिना किसी स्थायी पहचान, स्थायी पते, छत या किसी भरोसेमंद सपोर्ट सिस्टम के बाहर निकलते हैं। उन्हें वयस्कता में कदम रखने के लिए शिक्षा, आवास, रोजगार और भावनात्मक कल्याण के क्षेत्र में ठोस संस्थागत सहायता की सख्त आवश्यकता है। जब तक राज्य आगे आकर उनका हाथ नहीं थामेगा, तब तक वे समाज की मुख्यधारा में शामिल नहीं हो सकते।”

2. पहचान पत्रों का अभाव: 17.5 वर्ष की आयु से शुरू हो अनिवार्य प्रक्रिया

  • अदालत ने रेखांकित किया कि कई युवाओं के पास बुनियादी पहचान दस्तावेज—जैसे आधार कार्ड, पैन कार्ड, वोटर आईडी और मूल निवास प्रमाण पत्र—तक नहीं होते, जिससे उन्हें बैंक खाता खोलने, उच्च शिक्षा में प्रवेश लेने और रोजगार पाने में गंभीर बाधाओं का सामना करना पड़ता है।
  • पीठ ने निर्देश दिया कि जब बच्चा 17.5 वर्ष का हो, तभी से उसके सभी पहचान पत्र बनवाने की प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए ताकि 18 वर्ष का होने पर संस्थान छोड़ते समय उसके पास सभी कानूनी दस्तावेज उपलब्ध हों।
  • किसी भी युवा को बिना ‘आफ्टरकेयर पहचान पत्र’ (Aftercare Identity Card) जारी किए संस्थान से विदा नहीं किया जाएगा।

3. 16-18 वर्ष के किशोरों का ‘यांत्रिक मूल्यांकन’ (Mechanical Assessment) बंद हो

  • जघन्य अपराधों के आरोपी 16 से 18 वर्ष के बच्चों के वयस्क के रूप में ट्रायल के संबंध में जेजे एक्ट की धारा 15 के तहत होने वाले प्रारंभिक मूल्यांकन पर पीठ ने गंभीर चिंता जताई।
  • अदालत ने स्पष्ट किया कि यह मूल्यांकन यह तय करने के लिए नहीं होता कि बच्चे ने अपराध किया है या नहीं, बल्कि इसका उद्देश्य उसकी मानसिक व शारीरिक क्षमता, परिणामों को समझने की समझ और परिस्थितियों का आकलन करना है।
  • अदालत ने पाया कि वर्तमान में बोर्ड ऐसे मूल्यांकन यांत्रिक रूप से बिना किसी ठोस मनोवैज्ञानिक परीक्षण के तैयार कर रहे हैं।
  • NIMHANS प्रारूप अनिवार्य: राजस्थान सरकार को निर्देश दिया गया कि वह निमहंस (NIMHANS) के दिशा-निर्देशों के अनुरूप प्रशिक्षित क्लिनिकल मनोवैज्ञानिकों और बाल मनोचिकित्सकों के जिला स्तरीय पैनल गठित करे। कोई भी जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (JJB) तब तक रिपोर्ट स्वीकार नहीं करेगा जब तक कि बच्चे के साथ कम से कम 3 अलग-अलग सत्र, माता-पिता और स्कूल शिक्षकों के साक्षात्कार और मानकीकृत मनोवैज्ञानिक परीक्षण पूरे न किए गए हों।

Also Read; Questions of Fact: 25 साल की लंबी पेंडेंसी भी रिट कोर्ट को टैक्स मामले में विवादित तथ्यों पर निर्णय लेने की अनुमति नहीं दे सकती; राजस्थान हाईकोर्ट

केंद्र एवं राज्य सरकारों के लिए जारी विस्तृत दिशानिर्देश

1. शिक्षा एवं सरकारी नौकरियों में 1% आरक्षण (12 सप्ताह में अधिसूचना):

  • केंद्र और राज्य सरकार को 12 सप्ताह के भीतर एक व्यापक नीति अधिसूचित करने का निर्देश दिया गया है जिसके तहत:
    • सरकारी और सहायता प्राप्त शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश में 1% क्षैतिज आरक्षण दिया जाएगा।
    • राज्य लोक सेवा, सरकारी विभागों, सार्वजनिक उपक्रमों और आउटसोर्स/संविदा नियुक्तियों में 1% आरक्षण सुनिश्चित किया जाएगा।

2. अंतरिम राहत (आयु सीमा में 5 वर्ष की छूट व मुफ्त फॉर्म):

  • जब तक आरक्षण की विस्तृत नीति अधिसूचित नहीं हो जाती, तब तक राज्य की सभी सरकारी भर्ती परीक्षाओं में केयर लीवर्स को अधिकतम आयु सीमा में 5 वर्ष की छूट और आवेदन/परीक्षा शुल्क से पूर्ण छूट प्रदान की जाएगी।

3. केयर लीवर्स सचिवालय व डिजिटल डेटाबेस:

  • केंद्र और राज्य स्तर पर ‘केयर लीवर्स सेक्रेटेरिएट’ (Care Leavers Secretariat) की स्थापना नोडल एजेंसी व सिंगल-विंडो शिकायत निवारण तंत्र के रूप में की जाएगी।
  • 18 वर्ष के बाद इन युवाओं की निगरानी, प्रगति और सुरक्षा ट्रैक करने के लिए एक राज्यव्यापी डिजिटल डेटाबेस तैयार किया जाएगा।

4. मुफ्त स्नातक शिक्षा, हॉस्टल और छात्रवृत्ति कोष:

  • सरकारी कॉलेजों/विश्वविद्यालयों में स्नातक स्तर तक पूर्णतः निःशुल्क शिक्षा और छात्रावास की सुविधा अनिवार्य की गई है।
  • ‘केयर लीवर एजुकेशन एंड स्कॉलरशिप फंड’ की स्थापना की जाएगी, जिसके तहत उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों को कम से कम ₹4,000 प्रति माह और व्यावसायिक/प्रोफेशनल कोर्स करने वालों को ₹6,000 प्रति माह की वित्तीय छात्रवृत्ति दी जाएगी।

5. एक वर्ष का संपूर्ण पुनर्वास (आवास, भोजन व कौशल विकास):

  • सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग को एक वर्ष तक आवास, भोजन, व्यावसायिक प्रशिक्षण, मनोवैज्ञानिक परामर्श और वित्तीय सहायता की संपूर्ण ‘आफ्टरकेयर नीति’ तैयार करने का आदेश दिया गया है।
  • योजना के क्रियान्वयन और निगरानी के लिए राज्य किशोर न्याय परिषद (State Juvenile Justice Council) और संभागीय स्तर पर किशोर न्याय आयोगों का गठन किया जाएगा।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: याचिकाकर्ता (नाबालिगता के दावेदार) बनाम राजस्थान राज्य [आपराधिक पुनरीक्षण / विविध याचिका – राजस्थान उच्च न्यायालय]
  • प्रासंगिक कानून: किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 (JJ Act, 2015) की धारा 15 (जघन्य अपराधों में प्रारंभिक मूल्यांकन), धारा 46 (आफ्टरकेयर संगठन व 18 वर्ष के बाद पुनर्वास); भारत का संविधान – अनुच्छेद 14 (समानता), अनुच्छेद 15(3) (महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष प्रावधान), अनुच्छेद 16 (लोक नियोजन में अवसर), अनुच्छेद 21 (गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार) एवं अनुच्छेद 39(f) व 46 (राज्य के नीति निदेशक तत्व)
  • संबद्ध दिशानिर्देश एवं नजीरें:
    • NIMHANS Guidelines — ’16 से 18 वर्ष के बच्चों के मानसिक क्षमता निर्धारण हेतु मानकीकृत मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन प्रोटोकॉल।’
    • बचपन बचाओ आंदोलन बनाम भारत संघ (सुप्रीम कोर्ट) एवं एक्स बनाम महाराष्ट्र राज्य (सुप्रीम कोर्ट) — ‘संस्थागत देखभाल से बाहर आने वाले बच्चों के पुनर्वास के लिए राज्य को ‘पैरेन्स पैट्रिया’ (Parens Patriae – अभिभावक के रूप में राज्य) का दायित्व निभाना अनिवार्य है।’
  • पीठ: न्यायमूर्ति अनूप कुमार ढंड (राजस्थान उच्च न्यायालय)
  • अगली सुनवाई: 22 नवंबर 2026 (अनुपालन रिपोर्ट के अवलोकन हेतु)

Quota Demand: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतराजस्थान उच्च न्यायालय (Rajasthan High Court)
न्यायाधीशन्यायमूर्ति अनूप कुमार डंड (Justice Anoop Kumar Dhand)
मुख्य निर्णयबाल देखभाल गृहों से निकलने वाले युवाओं को सरकारी सेवाओं व शिक्षा में 1% आरक्षण
नीति की समय-सीमा12 सप्ताह के भीतर केंद्र और राज्य सरकार को नीति बनाने का निर्देश
अन्य प्रमुख निर्देशNIMHANS दिशानिर्देशों के तहत प्रारंभिक मूल्यांकन और डिजिटल डेटाबेस का निर्माण
RELATED ARTICLES

Most Popular

Patna
scattered clouds
32 ° C
32 °
32 °
70 %
2.1kmh
28 %
Mon
30 °
Tue
34 °
Wed
35 °
Thu
28 °
Fri
24 °

Recent Comments