पीठ में मतभेद (Split Verdict)
केंद्र सरकार ने इस मामले को 5 न्यायाधीशों की संविधान पीठ (Constitution Bench) को भेजने का अनुरोध किया था:
- जस्टिस दीपांकर दत्ता ने केंद्र के अनुरोध को खारिज कर दिया और कहा कि स्थापित कानूनी सिद्धांतों के आधार पर वर्तमान पीठ ही इसका निर्णय कर सकती है।
- जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने केंद्र के अनुरोध से सहमति जताई कि मामले में महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न शामिल हैं, इसलिए इसे बड़ी पीठ को भेजा जाना चाहिए।
दोनों जजों के बीच सहमति न बनने के कारण मामले को अब भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के समक्ष भेजा गया है, जो इस पर संविधान पीठ के गठन का निर्णय लेंगे।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों (ECs) की नियुक्ति से संबंधित ‘मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023’ की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर आए विभाजित फैसले (Split Verdict) में न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता ने अपने पृथक निर्णय में चयन प्रक्रिया में कार्यपालिका के भारी बहुमत, चयन पैनल में विपक्ष के नेता (LoP) की कमजोर स्थिति और जन-धारणा (Public Perception Test) पर अत्यंत तीखे और विस्तृत विधिक अवलोकन दर्ज किए हैं।
जस्टिस दत्ता ने स्पष्ट रूप से माना कि कानून में प्रधानमंत्री और उनके द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को पैनल में रखकर कार्यपालिका को जो ‘भारी प्रभुत्व’ (Overwhelming Selection Power) सौंपा गया है, उसने चयन समिति में लोकसभा में विपक्ष के नेता की उपस्थिति को मात्र “सजावटी” (Ornamental) बना दिया है। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि चुनाव आयोग का केवल आंतरिक रूप से निष्पक्ष होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि जनता की नजरों में उसकी निष्पक्षता और स्वतंत्रता का प्रत्यक्ष दिखना (Appearance of Independence) संविधान के अनुच्छेद 324 और मूल ढांचे की अनिवार्य शर्त है।
जस्टिस दीपांकर दत्ता के अलग निर्णय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं रूपक
1. ‘कैबिनेट मंत्री कभी प्रधानमंत्री की राय के खिलाफ नहीं जा सकता’: सामूहिक उत्तरदायित्व का सिद्धांत
2023 के अधिनियम के तहत तीन सदस्यीय चयन समिति गठित की गई है: प्रधानमंत्री (अध्यक्ष), लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री। इस व्यवस्था की विनियामक विफलता पर जस्टिस दत्ता ने कहा: “प्रधानमंत्री द्वारा अपने ही नेतृत्व वाली चयन समिति में तीसरे सदस्य के रूप में नामित कोई कैबिनेट मंत्री व्यवहारिक रूप से कभी अपने ही नामितकर्ता (Prime Minister) की अवज्ञा करने और समिति में अपनी सदस्यता को जोखिम में डालने का साहस नहीं कर सकता। इसके अतिरिक्त, संविधान के अनुच्छेद 75(3) के तहत ‘मंत्रिपरिषद के सामूहिक उत्तरदायित्व’ (Collective Responsibility) का सिद्धांत भी एक मंत्री को अपने प्रधानमंत्री का विरोध करने से रोकता है।”
- तटस्थ संतुलन का अभाव: जस्टिस दत्ता ने जोड़ा कि संवेदनशील संवैधानिक पदों पर नियुक्ति के मामले में कैबिनेट मंत्री से यह अपेक्षा करना दूर की कौड़ी है कि वह अपनी सरकार से भिन्न रुख अपनाएगा। ऐसी स्थिति में कैबिनेट मंत्री केवल अपने नेता की आवाज़ को दोहराएगा (Echo the voice of his leader)। परिणामतः, विपक्ष के नेता की मौजूदगी चयन समिति में बिना किसी उद्देश्य की पूर्ति किए केवल एक ‘सजावटी तत्व’ बनकर रह जाती है।
2. क्रिकेट और अंपायर का रूपक: ‘विजेता टीम के कप्तान द्वारा अंपायर का चयन’
याचिकाकर्ताओं की दलीलों के मर्म को स्वीकार करते हुए जस्टिस दत्ता ने क्रिकेट का दृष्टांत देते हुए दर्ज किया: “याचिकाकर्ताओं की दलीलों का सार यह है: यदि यह कहा जाए कि एक क्रिकेट मैच में अंपायर को एक टीम के कप्तान द्वारा चुना गया है और वही टीम जीत जाती है, तो भले ही अंपायर द्वारा लिए गए सभी फैसले पूरी तरह सही क्यों न हों, फिर भी उन फैसलों पर हमेशा संदेह की एक परत (Patina of suspicion) बनी रहेगी, क्योंकि दिन के अंत में अंपायर को वास्तव में जीतने वाले कप्तान द्वारा ही चुना गया था। यह कोई भ्रामक रूपक नहीं है; ये बेहद प्रभावशाली और विचारणीय दलीलें हैं।”
3. ‘पब्लिक परसेप्शन टेस्ट’ (सार्वजनिक धारणा का परीक्षण)
- जस्टिस दत्ता ने माना कि यद्यपि 2023 का अधिनियम तकनीकी रूप से चयन समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को बाहर रखने की प्रत्यक्ष कानूनी चुनौती से बच भी जाए, फिर भी उसे ‘धारणा के परीक्षण’ (Perception Test) पर खरा उतरना होगा।
- उन्होंने सवाल उठाया कि क्या कार्यपालिका के भारी बहुमत वाला मौजूदा तंत्र जनता में वही विश्वास पैदा कर सकता है जो एक निष्पक्ष और तटस्थ तीसरे सदस्य (CJI) की उपस्थिति से पैदा होता था? उन्होंने प्रथम दृष्टया माना कि कार्यपालिका को भारी चयन शक्ति सौंपने से अनुच्छेद 324 और मूल ढांचे के लिए आवश्यक स्वतंत्रता का प्रकटन खंडित होता है।
4. राजनीतिक सत्ता का शाश्वत लक्षण: ‘संस्थाओं पर नियंत्रण की प्रवृत्ति’
देश में संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता पर राजनीतिक दलों के रवैये पर जस्टिस दत्ता ने बेबाक टिप्पणी की: “इस अदालत की समझ में, यह किसी एक राजनीतिक दल या किसी एक कालखंड की विफलता नहीं रही है। दशकों से राजनीतिक सत्ता का एक सतत और सुसंगत लक्षण यह रहा है कि वह उस संस्था पर अपना प्रभाव और नियंत्रण (Leverage) बनाए रखना चाहती है, जिसे उसके सत्ता के दावे पर निष्पक्ष फैसला देना होता है। अनुच्छेद 324(2) के तहत कानून बनाने का अर्थ निर्वाचन आयोग को कार्यपालिका के अनन्य नियंत्रण से मुक्त करना था, लेकिन यह सत्ताधारी दलों के लिए असुविधाजनक स्थिति पैदा करता; इसलिए सभी शासनों ने ऐसी संस्थाओं को अपने नियंत्रण में रखना ही सुविधाजनक पाया।”
5. अनूप बरनवाल (2023) फैसले की बाध्यकारिता की सीमा
- जस्टिस दत्ता ने स्पष्ट किया कि अनूप बरनवाल (मार्च 2023) की संविधान पीठ के फैसले में चयन पैनल में CJI को शामिल करने का निर्देश केवल एक अस्थायी व्यवस्था (Transient mechanism) थी, जब तक कि संसद कानून न बना दे। संसद कानूनी रूप से CJI को समिति में रखने के लिए बाध्य नहीं थी।
- परंतु, जस्टिस दत्ता ने दो टूक कहा कि अनूप बरनवाल फैसले का यह सिद्धांत पूरी तरह बाध्यकारी (Binding) है कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को ‘कार्यपालिका के अनन्य नियंत्रण’ (Exclusive Executive Control) से पूरी तरह मुक्त और स्वतंत्र होना चाहिए।
विभाजित फैसले (Split Verdict) का प्रभाव
- जस्टिस दत्ता: उन्होंने केंद्र की संदर्भ अर्जी खारिज की और माना कि स्वतंत्र चुनाव संविधान का मूल ढांचा हैं; इस विधिक सिद्धांत को वर्तमान कानून पर लागू करने के लिए किसी संविधान पीठ की जरूरत नहीं है, खंडपीठ ही फैसला कर सकती है।
- जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा: उन्होंने केंद्र की मांग स्वीकार करते हुए माना कि संसदीय कानून की वैधता में संविधान की व्याख्या का सारभूत प्रश्न (Substantial question of law) शामिल है, जिसे अनुच्छेद 145(3) के तहत 5-जजों की संविधान पीठ द्वारा ही तय किया जाना चाहिए।
- परिणाम: दोनों जजों की राय विभाजित होने के कारण अब मामला भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के पास भेजा गया है, जो 5 जजों की संविधान पीठ गठित करने पर अंतिम निर्णय लेंगे।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) बनाम भारत संघ [W.P.(C) No. 87/2024] सहपठित डॉ. जया ठाकुर बनाम भारत संघ [W.P.(C) No. 14/2024 – भारत का सर्वोच्च न्यायालय]
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ताओं की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन, शादान फरासत एवं अधिवक्ता प्रशांत भूषण
- भारत संघ (केंद्र) की ओर से: अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी एवं सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता
- प्रासंगिक संवैधानिक व वैधानिक प्रावधान:
- मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 की धारा 7 एवं 8
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 324(2) (चुनाव आयोग में नियुक्तियां), अनुच्छेद 75(3) (मंत्रिपरिषद का सामूहिक उत्तरदायित्व), अनुच्छेद 145(3) (संविधान पीठ संदर्भ) एवं अनुच्छेद 14
- संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
- अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (2023, सुप्रीम कोर्ट 5-जज संविधान पीठ) — ‘चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति कार्यपालिका के अनन्य नियंत्रण से मुक्त होनी चाहिए।’
- केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) एवं इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण (1975) — ‘स्वतंत्र एवं निष्पक्ष लोकतांत्रिक चुनाव प्रणाली संविधान के बुनियादी ढांचे का हिस्सा है।’
- पीठ: न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा (सर्वोच्च न्यायालय)
- फैसले की तिथि: 23 सितंबर 2026
Election Commission:मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ के न्यायाधीश | न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता एवं न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा |
| विवादित कानून | मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 |
| मुख्य मुद्दा | चयन समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को हटाकर कैबिनेट मंत्री को शामिल करना |
| फैसले का नतीजा | संविधान पीठ (5-Judge Bench) के गठन पर दो जजों में असहमति (Split Verdict); अंतिम निर्णय CJI पर छोड़ा गया |

