प्रमुख बिंदु: देरी और आंकड़ों पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियां
- अनिश्चितता और आत्मनिरीक्षण की जरूरत:“यदि आंकड़े कोई मार्गदर्शन करते हैं, तो कोई भी निश्चितता के साथ यह नहीं कह सकता कि लंबे समय से लंबित संदर्भ कब हल होंगे। निस्संदेह, यह गंभीर चिंता का क्षेत्र है और संदर्भों के निपटारे में अत्यधिक देरी खुद संस्थागत शर्मिंदगी का एक स्रोत है जिससे सभी हितधारकों को बचना चाहिए। वास्तव में, आत्मनिरीक्षण (Self-introspection) की आवश्यकता है।” — सुप्रीम कोर्ट
- सालों पुरानी देरी के उदाहरण:
- अनूप बरनवाल (Anoop Baranwal) मामला: 2015 में रिट याचिका दायर हुई, 2018 में संविधान पीठ को भेजा गया और फैसला आने में 2023 तक का समय लगा — कुल 8 साल।
- जयबीर सिंह (Jai Bir Singh) मामला: 2002 में 7-जजों की पीठ ने मामला बड़ी पीठ को भेजा था, जिसे 9-जजों की पीठ तक पहुंचने में 15 साल लगे और कुल 24 साल बाद इसका निपटारा हो सका।
- स्थाई संविधान पीठ का प्रस्ताव नया नहीं: दोनों जजों ने स्पष्ट किया कि स्थाई संविधान पीठ का प्रस्ताव कोई अनोखा विचार नहीं है, बल्कि देश के ज़िम्मेदार नागरिक और न्यायविद लंबे समय से इसकी मांग कर रहे हैं। पीठ ने जोर देकर कहा कि शुद्ध संवैधानिक मामलों को तय करना ही सर्वोच्च न्यायालय का प्राथमिक और मुख्य कार्य होना चाहिए।
- त्वरित सुनवाई की उम्मीद: अदालत ने उम्मीद जताई कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया वाले 2023 के कानून से जुड़े इस महत्वपूर्ण संदर्भ को वैसी लंबी देरी का सामना नहीं करना पड़ेगा, क्योंकि यह मुद्दा भारत के लोकतांत्रिक ढांचे (Democratic Fabric) के लिए मौलिक महत्व रखता है।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठ न्यायाधीशों—न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा—ने शीर्ष अदालत द्वारा संवैधानिक व्याख्या से जुड़े संदर्भों (Constitutional References) के निपटारे में होने वाली दशकों लंबी देरी पर गहरी संस्थागत पीड़ा और चिंता व्यक्त की है।
पीठ ने स्पष्ट रूप से दर्ज किया कि आंकड़ों के आधार पर कोई निश्चितता से नहीं कह सकता कि वर्षों से लंबित संदर्भ कब तय होंगे। अदालत ने माना कि 5 से 20 या 24 वर्षों तक मामलों का अनिर्णीत रहना न्यायपालिका के लिए गंभीर ‘संस्थागत शर्मिंदगी’ (Institutional Embarrassment) का कारण बन रहा है, जिससे उबरने के लिए संस्था को आत्मनिरीक्षण (Self-introspection) करने की तत्काल आवश्यकता है। मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर विभाजित फैसला सुनाते हुए दोनों न्यायाधीशों ने अपने संयुक्त आदेश में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत से एक ऐतिहासिक आग्रह किया है कि वे सुप्रीम कोर्ट में शुद्ध संवैधानिक प्रश्नों के त्वरित निस्तारण के लिए एक स्थायी 5-न्यायाधीशों की संविधान पीठ (Permanent 5-Judge Constitution Bench) गठित करने की आवश्यकता पर विचार करें।
संयुक्त आदेश के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं कटु आत्मनिरीक्षण
1. ‘संवैधानिक प्रश्नों का समाधान इस अदालत का प्राथमिक कार्य और सर्वोच्च प्राथमिकता होना चाहिए’
दोनों न्यायाधीशों ने संयुक्त आदेश में संविधान पीठ की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए दर्ज किया: “यदि सांख्यिकी को कोई मार्गदर्शक माना जाए, तो कोई भी उचित निश्चितता के साथ यह नहीं कह सकता कि लंबे समय से लंबित संदर्भ कब हल होंगे। निर्विवाद रूप से, यह अत्यधिक गंभीर चिंता का विषय है और संदर्भों के निपटारे में अत्यधिक देरी अपने आप में एक ‘संस्थागत शर्मिंदगी’ का स्रोत है, जिससे बचने के लिए सभी हितधारकों को प्रयास करना चाहिए। वास्तव में, संस्थागत आत्मनिरीक्षण (Self-introspection) की आवश्यकता है।”
पीठ ने आगे जोड़ा: “हम भारत के माननीय मुख्य न्यायाधीश से यह अवसर लेते हुए अनुरोध करते हैं कि वे शुद्ध संवैधानिक मुद्दों को तय करने के लिए एक स्थायी 5-न्यायाधीशों की पीठ गठित करने की आवश्यकता का परीक्षण करें। यह कोई नई बात नहीं है जो हम कह रहे हैं; देश के जिम्मेदार नागरिकों और विधिवेत्ताओं द्वारा समय-समय पर यह राय व्यक्त की गई है और हम केवल उनकी राय का समर्थन कर रहे हैं। चूंकि संवैधानिक मुद्दों को हल करना इस न्यायालय के न्यायाधीशों का प्राथमिक कार्य है, इसलिए यह इसकी मूल प्राथमिकता (Core Priority) बनी रहनी चाहिए। किसी भी संदर्भ का 5, 10, 15, 20 वर्ष या उससे अधिक समय तक लंबित रहना संस्था के लिए अच्छा नहीं है। समय आ गया है कि संस्था इस मुद्दे को उस तत्परता और तात्कालिकता के साथ संबोधित करे जिसका यह हकदार है।”
Election Commission-I: अत्यधिक देरी के उदाहरण: अनूप बरनवाल (8 वर्ष) और जय बीर सिंह (24 वर्ष)
अदालत ने याचिकाकर्ताओं द्वारा व्यक्त की गई इस चिंता को पूरी तरह वाजिब और न्यायोचित ठहराया कि यदि मामले को बड़ी पीठ को भेजा जाता है, तो यह वर्षों तक ठंडे बस्ते में चला जाएगा। अपनी बात के समर्थन में पीठ ने दो ऐतिहासिक मामलों का ब्योरा दिया:
- अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (चुनाव आयोग नियुक्ति मामला):
- अनुच्छेद 32 के तहत मूल रिट याचिका वर्ष 2015 में दायर की गई थी।
- मामले को संविधान पीठ को संदर्भित करने में 3 साल लगे (वर्ष 2018)।
- 5-जजों की संविधान पीठ ने फैसला सुनाने में और 5 साल का समय लिया, और निर्णय मार्च 2023 में आया—अर्थात याचिका दायर होने से लेकर निपटारे तक कुल 8 वर्ष बीत गए।
- उत्तर प्रदेश राज्य बनाम जय बीर सिंह (2026 INSC 897):
- दोनों न्यायाधीश (जस्टिस दत्ता और जस्टिस शर्मा) इस 9-जजों की संविधान पीठ के सदस्य रहे हैं।
- पीठ ने दर्ज किया कि 7-जजों की पीठ द्वारा किया गया संदर्भ 9-जजों की पीठ तक पहुंचने में ही 9 वर्ष लग गए, जिसके बाद पीठ ने इसे तय करने में 5 महीने लिए।
- उससे पहले यह संदर्भ वर्ष 2002 से 15 वर्षों तक अनिर्णीत पड़ा रहा था—अर्थात कुल मिलाकर लगभग 24 वर्षों का लंबा समय लगा।
प्रक्रियागत विलंब टालने के लिए 3-जज पीठ को किया दरकिनार
यद्यपि दोनों न्यायाधीशों के बीच इस बात पर मतभेद था कि 2023 के चुनाव आयुक्त नियुक्ति कानून को संविधान पीठ को भेजा जाना चाहिए या नहीं (जस्टिस दत्ता ने वर्तमान 2-जज पीठ द्वारा ही तय किए जाने का समर्थन किया, जबकि जस्टिस शर्मा ने माना कि अनुच्छेद 145(3) के तहत 5-जज पीठ अनिवार्य है), लेकिन दोनों ने प्रक्रिया को तेज करने पर पूर्ण सहमति जताई:
- 3-जज पीठ की निरर्थकता: सामान्य न्यायिक परंपरा के तहत दो जजों के विभाजित फैसले के बाद मामला किसी तीसरी बड़ी पीठ (3-जज बेंच) के पास जाता है जो केवल यह तय करती है कि दोनों में से किसका मत सही है।
- सीधे CJI को पत्रावली: दोनों जजों ने माना कि पहले 3 जजों की पीठ द्वारा यह तय कराना केवल समय की बर्बादी होगी। अतः उन्होंने इस औपचारिकता को छोड़ते हुए निर्देश दिया कि पत्रावली सीधे मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के समक्ष रखी जाए, ताकि वे 2023 के अधिनियम की धारा 6, 7 और 8 की वैधता तय करने के लिए सीधे उपयुक्त संख्या वाली संविधान पीठ का गठन कर सकें।
- लोकतांत्रिक ताने-बाने का सवाल: पीठ ने यह उम्मीद जताई कि चूंकि यह मामला देश के लोकतांत्रिक ढांचे और नागरिकों के मताधिकार से जुड़ा बुनियादी प्रश्न है, इसलिए इस संदर्भ को पूर्ववर्ती मामलों जैसी अत्यधिक देरी का सामना नहीं करना पड़ेगा।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: डॉ. जया ठाकुर व अन्य बनाम भारत संघ [W.P.(C) No. 14/2024 / डायरी संख्या 146/2024 सहपठित ADR बनाम भारत संघ – W.P.(C) No. 87/2024]
- संबंधित कानून: मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 की धारा 7 (चयन समिति की संरचना)
- प्रासंगिक संवैधानिक प्रावधान:
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 145(3) (संविधान की व्याख्या के सारभूत विधि प्रश्नों पर न्यूनतम 5-न्यायाधीशों की पीठ की अनिवार्यता)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 324(2) (संसदीय कानून के तहत चुनाव आयोग की नियुक्तियां)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 142 एवं अनुच्छेद 32
- संबद्ध ऐतिहासिक संदर्भ नजीरें:
- अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (2023, 5-जज संविधान पीठ – 8 वर्ष में निस्तारण)
- उत्तर प्रदेश राज्य बनाम जय बीर सिंह (2026 INSC 897, 9-जज संविधान पीठ – 24 वर्ष बाद निस्तारण)
- पीठ: न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा (सर्वोच्च न्यायालय)
- आदेश तिथि: 23 सितंबर 2026

