मद्रास उच्च न्यायालय का फैसला और टिप्पणी
- मौन रहना सहमति माना जाएगा: अदालत ने टिप्पणी की कि जो सदस्य सदन में मौजूद थे और जिनके पास विरोध करने का पूरा मौका था, उन्होंने या तो समर्थन में वोट दिया या मौन रहे। वे हफ़्तों बाद अपनी ही चुप्पी को अमान्य ठहराने के लिए अदालत नहीं आ सकते।“बिना विरोध के किसी कार्य को होते देखने वाला व्यक्ति बाद में उसकी शिकायत नहीं कर सकता — यह सिद्धांत जितना सार्वजनिक कार्यवाही पर लागू होता है, उतना ही विधायिका के पटल पर भी लागू होता है।” — मद्रास हाईकोर्ट
- अनुच्छेद 212 के तहत न्यायिक हस्तक्षेप पर रोक: हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान का अनुच्छेद 212 (Article 212) अदालतों को केवल प्रक्रियात्मक अनियमितताओं (Procedural Irregularities) के आधार पर विधानसभा की आतंरिक कार्यवाहियों की जांच करने से रोकता है।
- उच्च न्यायालय अपीलीय प्राधिकारी नहीं: पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि उच्च न्यायालय राज्य विधायिका का कोई अपीलीय निकाय (Appellate Authority) नहीं है। विधायी कार्यवाही की न्यायिक समीक्षा केवल अधिकार क्षेत्र की पूर्ण कमी (Lack of Jurisdiction), मौलिक अवैधता या असंवैधानिक उल्लंघन के मामलों में ही की जा सकती है, जो इस मामले में साबित नहीं हुआ।
चेन्नई: मद्रास हाईकोर्ट ने संसदीय प्रक्रिया, विधायी विशेषाधिकार (Legislative Privileges), संविधान के अनुच्छेद 212 के तहत न्यायिक समीक्षा की सीमा, तथा सदन के भीतर उपस्थित विधायकों के आचरण और मौन की विधिक स्थिति पर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।
ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम (AIADMK) की ओर से दायर थी याचिका
मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन की खंडपीठ ने ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम (AIADMK) के आधिकारिक व्हिप और पूर्व मंत्री एग्री एस.एस. कृष्णमूर्ति द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए यह निर्णय पारित किया। याचिका में तमिलनाडु विधानसभा द्वारा कर्नाटक के प्रस्तावित मेकेदातु बांध के विरुद्ध पारित प्रस्ताव में एक नया जल विवाद न्यायाधिकरण (New Tribunal) गठित करने की मांग वाले संशोधन को जोड़े जाने की प्रक्रिया को चुनौती दी गई थी। अदालत ने दो टूक व्यवस्था दी है कि यदि कोई विधायक (MLA) सदन में किसी संशोधन प्रस्ताव के पेश होने और उस पर मतदान के समय आपत्ति जताने के बजाय चुप रहता है या समर्थन में वोट देता है, तो वह हफ्तों बाद अदालत का दरवाजा खटखटाकर यह मांग नहीं कर सकता कि उसकी अपनी ही चुप्पी को अमान्य (Nullity) घोषित किया जाए।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं सिद्धांत
1. ‘अपनी चुप्पी को शून्य घोषित कराने अदालत नहीं आ सकते विधायक’: मुख्य न्यायाधीश की पीठ सदन के भीतर उपस्थित सदस्यों के आचरण पर कड़ी टिप्पणी करते हुए खंडपीठ ने कहा: “यदि सदन में उपस्थित सदस्य—जिनके पास उस समय और वहीं पर आपत्ति दर्ज कराने का पूरा अवसर था—इसके बजाय ‘हां’ (Aye) में वोट देना चुनते हैं या चुप रहना पसंद करते हैं, तो वे हफ्तों बाद अदालत से यह नहीं कह सकते कि वह उनकी अपनी ही चुप्पी को एक विधिक शून्यता (Nullity) के रूप में मान ले। यह स्थापित विधिक सिद्धांत कि ‘जो व्यक्ति बिना किसी विरोध के किसी कृत्य को घटित होते देखता है, वह बाद में उसकी शिकायत नहीं कर सकता’, विधायिका के पटल पर भी उतनी ही दृढ़ता से लागू होता है जितना कि किसी अन्य सार्वजनिक कार्यवाही में लागू होता है।”
2. संविधान का अनुच्छेद 212: प्रक्रियात्मक अनियमितता पर अदालती हस्तक्षेप का निषेध
- अदालत ने रेखांकित किया कि याचिकाकर्ता की चुनौती मूल रूप से विधानसभा की आंतरिक संचालन प्रक्रिया के विरुद्ध है।
- संविधान का अनुच्छेद 212(1) स्पष्ट रूप से अदालतों को विधायिका की किसी भी कार्यवाही की वैधता पर केवल इस आधार पर सवाल उठाने से रोकता है कि प्रक्रिया में कोई अनियमितता (Irregularity of Procedure) हुई थी।
- खंडपीठ ने कहा कि तमिलनाडु विधानसभा को मेकेदातु मुद्दे पर प्रस्ताव पारित करने और केंद्र से नया न्यायाधिकरण गठित करने का आग्रह करने का पूर्ण विधायी व संस्थागत अधिकार (Jurisdiction) प्राप्त था। यदि नियमों का पूरी बारीकी से पालन नहीं भी किया गया, तो यह अधिकतम क्षेत्राधिकार का ‘अनियमित प्रयोग’ (Irregular Exercise of Jurisdiction) हो सकता है, क्षेत्राधिकार का पूर्ण अभाव (Lack of Jurisdiction) नहीं।
3. ‘हाईकोर्ट विधानसभा के ऊपर कोई अपीलीय अदालत नहीं है’ खंडपीठ ने शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) को दोहराते हुए कहा:
- उच्च न्यायालय राज्य विधायिका के ऊपर कोई ‘अपीलीय प्राधिकारी’ (Appellate Authority) नहीं है, और न ही राज्य विधानसभा उच्च न्यायालय का कोई अधीनस्थ या कनिष्ठ अंग है।
- विधायी कार्यवाहियों की न्यायिक समीक्षा केवल अत्यंत सीमित और असाधारण परिस्थितियों में ही की जा सकती है—जैसे कि क्षेत्राधिकार का पूर्ण अभाव (Want of Jurisdiction), प्रत्यक्ष सारभूत गैर-कानूनी कृत्य (Substantive Illegality), दुर्भावना (Mala Fides) या किसी संवैधानिक सीमा का सीधा उल्लंघन। वर्तमान मामले में इनमें से एक भी आधार सिद्ध नहीं हुआ।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं विधिक विवाद
- 19 जून 2026 का मेकेदातु प्रस्ताव: कर्नाटक द्वारा कावेरी नदी पर प्रस्तावित मेकेदातु बांध परियोजना का विरोध करने और केंद्र सरकार से इसकी पर्यावरण व अन्य स्वीकृतियां रोकने का आग्रह करने के लिए तमिलनाडु विधानसभा में 19 जून को एक आधिकारिक प्रस्ताव पेश किया गया।
- संशोधन का विवाद:
- याचिकाकर्ता एग्री कृष्णमूर्ति के अनुसार, सदस्यों को एक दिन पहले जो मूल प्रस्ताव वितरित किया गया था, उसमें केवल बांध का विरोध करने की बात थी। उसमें अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत केंद्र से एक नए न्यायाधिकरण (Fresh Tribunal) के गठन की मांग का कोई उल्लेख नहीं था।
- सदन में बहस के दौरान विपक्ष के नेता (LoP) ने सुझाव दिया कि इसमें नए ट्रिब्यूनल की मांग भी जोड़ी जाए। मुख्यमंत्री ने इस सुझाव को स्वीकार करते हुए विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) से इसे प्रस्ताव में शामिल करने का अनुरोध किया।
- याचिकाकर्ता के आरोप:
- एग्री कृष्णमूर्ति ने दलील दी कि विधानसभा नियमों के अनुसार इस संशोधन को न तो अलग से औपचारिक रूप से पेश (Moved) किया गया, न किसी ने इसका समर्थन (Seconded) किया, न इस पर अलग बहस हुई और न ही इस विशिष्ट खंड पर अलग से कोई मतदान कराया गया।
- विधानसभा सचिवालय और राज्य का पक्ष:
- तमिलनाडु विधानसभा के सचिव और महाधिवक्ता विजय नारायण ने अदालत को सूचित किया कि पूरे संशोधित प्रस्ताव को सदन में पढ़कर सुनाया गया था।
- इसके बाद स्पीकर ने पूरे प्रस्ताव को ध्वनि मत (Voice Vote) के लिए रखा। किसी भी सदस्य ने इसके विरोध में ‘ना’ नहीं कहा और स्पीकर ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव के पारित होने की घोषणा की।
उच्च न्यायालय का अंतिम आदेश
- ध्वनि मत वैध: अदालत ने माना कि जब संशोधित प्रस्ताव को पढ़कर सुनाया गया और किसी सदस्य ने कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराई, तो पूरे प्रस्ताव पर लिया गया ध्वनि मत उसके संशोधित स्वरूप पर भी एक वैध मतदान माना जाएगा।
- याचिका खारिज: विधानसभा की आंतरिक कार्यप्रणाली और विशेषाधिकार में न्यायिक दखल की मांग को अनुच्छेद 212 के तहत बाधित पाते हुए उच्च न्यायालय ने एग्री कृष्णमूर्ति की याचिका को पूर्णतः खारिज कर दिया।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: एग्री एस.एस. कृष्णमूर्ति बनाम सचिव, तमिलनाडु विधानसभा एवं अन्य [W.P. No. 23145 of 2026 – मद्रास उच्च न्यायालय]
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (AIADMK व्हिप) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता एस.आर. राजगोपाल (सहयोगी: अधिवक्ता लामेख इंडियन एवं आई.एस. इनबदुरै)
- तमिलनाडु राज्य व विधानसभा सचिव की ओर से: महाधिवक्ता (Advocate General) विजय नारायण (सहयोगी: विशेष सरकारी वकील जे. लेनिन एवं सरकारी अधिवक्ता आकाश श्रीनंदा)
- भारत संघ (केंद्र सरकार) की ओर से: वरिष्ठ पैनल वकील ए. कुमारगुरु
- प्रासंगिक संवैधानिक प्रावधान:
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 212 (विधानमंडल की कार्यवाहियों की प्रक्रियागत अनियमितता के आधार पर न्यायिक समीक्षा पर रोक)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 194 (सदन के सदस्यों की वाक्-स्वतंत्रता, उन्मुक्तियां और विधायी विशेषाधिकार)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 262 सहपठित अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 (Inter-State River Water Disputes Act, 1956)
- संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
- राजा राम पाल बनाम माननीय अध्यक्ष, लोकसभा (2007, सुप्रीम कोर्ट 5-जज संविधान पीठ) — ‘विधायिका के आंतरिक कामकाज में प्रक्रियात्मक खामियों के आधार पर अदालतें हस्तक्षेप नहीं करेंगी; न्यायिक समीक्षा केवल क्षेत्राधिकार की पूर्ण कमी या संवैधानिक उल्लंघनों तक ही सीमित है।’
- एम.एस.एम. शर्मा बनाम श्री कृष्ण सिन्हा (सर्चलाइट केस, सुप्रीम कोर्ट) एवं श्रीमती इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण (1975) — ‘सदन के पटल पर मतदान और प्रक्रिया का संचालन पूरी तरह पीठासीन अधिकारी और सदन के आंतरिक अधिकार क्षेत्र में आता है।’
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन (मद्रास उच्च न्यायालय)
AIADMK Plea: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | मद्रास उच्च न्यायालय (Madras High Court) |
| पीठ (Judges) | मुख्य न्यायाधीश सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी एवं न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन |
| याचिकाकर्ता | एग्री एस.एस. कृष्णमूर्ति (AIADMK विधायक व सचेतक) |
| विवाद का विषय | मेकेदातु बांध विवाद पर तमिलनाडु विधानसभा प्रस्ताव का संशोधन |
| कानूनी आधार | भारतीय संविधान का अनुच्छेद 212 (संसदीय/विधायी कार्यवाही पर न्यायिक संरक्षण) |

