याचिकाकर्ता का कानूनी तर्क
- संविधान के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन: याचिका में तर्क दिया गया कि केवल 1 सीट आरक्षित करना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15 (लिंग के आधार पर भेदभाव का निषेध), और अनुच्छेद 16 (सार्वजनिक रोजगार में अवसर की समानता) का सीधा उल्लंघन है।
- 2018 के ऐतिहासिक फैसले का उल्लंघन:
- याचिकाकर्ता ने अपने ही पूर्व मामले (Kush Kalra v. Union of India, 2018) का हवाला दिया, जिसमें दिल्ली हाईकोर्ट ने माना था कि टेरिटोरियल आर्मी एक्ट, 1948 की धारा 6 में प्रयुक्त “कोई भी व्यक्ति” (Any Person) शब्द में पुरुष और महिला दोनों शामिल हैं।
- इसी फैसले के बाद महिलाओं के लिए टेरिटोरियल आर्मी के दरवाजे खुले थे।
- याचिका में कहा गया कि कानूनी रूप से अनुमति मिलने के बावजूद, व्यावहारिक रूप से नाममात्र (केवल 1) सीट देकर महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित रखा जा रहा है।
नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने भारतीय प्रादेशिक सेना (Territorial Army – TA) में अधिकारियों की भर्ती में भारी लैंगिक असमानता, पुरुषों की तुलना में महिलाओं के लिए नगण्य रिक्तियां निर्धारित करने की नीति, और सशस्त्र बलों में समानता के संवैधानिक अधिकारों (अनुच्छेद 14, 15 एवं 16) पर एक नई याचिका पर कड़ा संज्ञान लिया है।
दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति देवेन्द्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की खंडपीठ ने अधिवक्ता कुश कालरा द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार को अपना जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। अदालत ने उस नीति की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर केंद्र सरकार व प्रादेशिक सेना निदेशालय को औपचारिक नोटिस जारी कर विस्तृत जवाब तलब किया है, जिसके तहत लगातार भर्ती चक्रों में महिलाओं के लिए केवल एक (1) पद आरक्षित रखा जा रहा है।
याचिका में प्रस्तुत प्रमुख विधिक दलीलें एवं लैंगिक असमानता के आंकड़े
1. 2018 के ऐतिहासिक फैसले की मूल भावना को निष्प्रभावी करना
याचिकाकर्ता कुश कालरा ने दलील दी कि केंद्र सरकार का वर्तमान भर्ती रवैया दिल्ली उच्च न्यायालय के उस ऐतिहासिक फैसले के उद्देश्य को विफल करता है, जिसने प्रादेशिक सेना में महिलाओं के प्रवेश के द्वार खोले थे:
- कुश कालरा बनाम भारत संघ (2018, दिल्ली हाईकोर्ट): 2018 में दिल्ली हाईकोर्ट की खंडपीठ ने फैसला सुनाते हुए प्रादेशिक सेना अधिनियम, 1948 की धारा 6 में प्रयुक्त शब्दावली “कोई भी व्यक्ति” (Any Person) की व्यापक व्याख्या की थी और व्यवस्था दी थी कि इसमें पुरुष और महिला दोनों समान रूप से शामिल हैं। अदालत ने महिलाओं को प्रादेशिक सेना से बाहर रखने के तत्कालीन नियम को असंवैधानिक घोषित किया था।
- असमान रिक्तियों का निर्धारण: याचिका में आरोप लगाया गया है कि 2018 के फैसले के बावजूद प्रादेशिक सेना ने महिलाओं के लिए एक समान और खुली चयन प्रक्रिया अपनाने के बजाय पुरुष और महिला उम्मीदवारों के लिए अलग-अलग और अत्यधिक असमान रिक्तियां अधिसूचित करने की भेदभावपूर्ण प्रथा जारी रखी है।
2. 2022 से 2026 तक के भर्ती आंकड़े (केवल 1 सीट तक सीमित रखना)
याचिका में पिछले चार भर्ती चक्रों के आधिकारिक आंकड़ों का हवाला देते हुए दिखाया गया कि किस प्रकार महिलाओं के प्रतिनिधित्व को जानबूझकर सांकेतिक (Tokenism) बनाए रखा गया है:
| भर्ती वर्ष | पुरुष रिक्तियां (Men) | महिला रिक्तियां (Women) |
| 2022 | 12 | 1 |
| 2023 | 18 | 1 |
| 2025 | 18 | 1 |
| 2026 | 11 | 1 |
- याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि पुरुषों के लिए 11 से 18 तक पद विज्ञापित किए जाते हैं, जबकि पूरी चयन प्रक्रिया में योग्य महिला उम्मीदवारों की भारी संख्या के बावजूद उनके लिए केवल एक ही सीट आवंटित की जाती है, जो स्पष्ट रूप से मनमाना और असंगत है।
संवैधानिक उल्लंघन और विधिक आधार
- अनुच्छेद 14 (विधि के समक्ष समानता): याचिका में कहा गया है कि समान योग्यता और पात्रता रखने वाली महिला अभ्यर्थियों के साथ लिंग के आधार पर असमान व्यवहार किया जा रहा है, जो किसी भी तर्कसंगत वर्गीकरण (Intelligible Differentia) पर खरा नहीं उतरता।
- अनुच्छेद 15(1) (लिंग आधारित भेदभाव का निषेध): राज्य को केवल लिंग के आधार पर नागरिकों के बीच अवसर सीमित करने का कोई संवैधानिक अधिकार नहीं है।
- अनुच्छेद 16 (सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर): राज्य के अधीन किसी भी सेवा या पद पर नियोजन के मामले में सभी नागरिकों के लिए समान अवसर की गारंटी का यह खुला उल्लंघन है।
उच्च न्यायालय का निर्देश
मुख्य न्यायाधीश देवेन्द्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की खंडपीठ ने मामले के महत्व और संवैधानिक अधिकारों पर इसके प्रभाव को देखते हुए केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया और निर्देश दिया कि वह प्रादेशिक सेना में रिक्तियों के इस असंतुलित आवंटन और नीतिगत आधार पर अपना औपचारिक जवाब दाखिल करे।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: कुश कालरा बनाम भारत संघ एवं अन्य [W.P.(C) – दिल्ली उच्च न्यायालय]
- याचिकाकर्ता: अधिवक्ता कुश कालरा (व्यक्तिगत रूप से / जनहित याचिका)
- प्रासंगिक कानून एवं धाराएं:
- प्रादेशिक सेना अधिनियम, 1948 (Territorial Army Act, 1948) की धारा 6 (सेवा के लिए पात्रता – ‘Any Person’)
- प्रादेशिक सेना नियम, 1948
- प्रासंगिक संवैधानिक प्रावधान: भारत का संविधान – अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15(1) (लिंग आधारित भेदभाव का निषेध), अनुच्छेद 16 (सार्वजनिक पदों पर अवसर की समानता) एवं अनुच्छेद 226
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- कुश कालरा बनाम भारत संघ (2018, दिल्ली हाईकोर्ट) — ‘प्रादेशिक सेना अधिनियम की धारा 6 में किसी भी व्यक्ति का अर्थ लिंग-तटस्थ है; महिलाओं को टीए में अधिकारी बनने से वंचित करना असंवैधानिक है।’
- द सेक्रेटरी, मिनिस्ट्री ऑफ डिफेंस बनाम बबिता पुनिया व अन्य (2020, सुप्रीम कोर्ट) — ‘सशस्त्र बलों में महिलाओं को स्थायी कमीशन (Permanent Commission) न देना रूढ़िवादी धारणाओं पर आधारित है और समानता के मौलिक अधिकार का हनन है।’
- लेफ्टिनेंट कर्नल नितिशा बनाम भारत संघ (2021, सुप्रीम कोर्ट) — ‘अप्रत्यक्ष भेदभाव (Indirect Discrimination) और संरचनात्मक बाधाएं जो महिलाओं को समान अवसर से रोकती हैं, संविधान के विरुद्ध हैं।’
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश देवेन्द्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया (दिल्ली उच्च न्यायालय)
Territorial Army: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| पीठ (Judges) | मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय एवं न्यायमूर्ति तेजस कारिया |
| याचिकाकर्ता | कुश कालरा (Kush Kalra) |
| उत्तरदाता | केंद्र सरकार एवं प्रादेशिक सेना प्रबंधन |
| मुख्य विवाद | प्रादेशिक सेना (TA) में महिला अधिकारियों के पदों का अत्यधिक सीमित होना |

