सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियां और सुझाव
- ‘डिग्री’ धारक को न्याय मिलने में देरी पर चिंता: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब किसी नागरिक के पक्ष में कोर्ट का फैसला (Decree) आ जाता है, लेकिन निष्पादन याचिका के सालों लंबित रहने के कारण उसे फैसले का लाभ नहीं मिलता, तो इससे न्याय का मूल उद्देश्य ही विफल हो जाता है।
- जमीनी स्तर की दो मुख्य रुकावटें: अदालत की सहायता कर रहे एमिकस क्यूरी (Amicus Curiae) वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने बताया कि निष्पादन याचिकाओं में देरी के दो सबसे बड़े कारण हैं:
- देनदार (Judgment Debtor) का पता न चलना या नोटिस तामील न होना।
- देनदार की संपत्तियों की जानकारी उपलब्ध न होना। इसके अलावा बार-बार मिलने वाली स्थगन (Adjournments) और अंतरिम रोक (Interim Stays) भी बड़ी वजहें हैं।
- स्पेशल मॉनिटरिंग सेल्स (Monitoring Cells) की वकालत: जस्टिस पारदीवाला ने कामर्शियल कोर्ट्स रूल्स के नियम 12 का हवाला देते हुए सुझाव दिया:“उच्च न्यायालय एक विशेष सेल क्यों नहीं स्थापित करते जो विभिन्न अदालतों में निष्पादन की पूरी प्रक्रिया की निगरानी कर सके? केवल हर 6 महीने में आंकड़े जुटाना काफी नहीं है, हमें इससे आगे ठोस कदम उठाने होंगे।” — सर्वोच्च न्यायालय
- CPC और कानून में समय-सीमा जोड़ने का सुझाव: अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी ने पीठ को अवगत कराया कि केंद्र सरकार सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) में आवश्यक संशोधनों पर विचार कर रही है। इस पर कोर्ट ने सुझाव दिया कि अधिनियम के भीतर ही एक समय सारणी (Schedule) तय कर दी जानी चाहिए।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने देश की निचली अदालतों में दीवानी मुकदमों की डिक्री हासिल करने के बाद भी वर्षों तक उसके वास्तविक लाभ (Fruits of the Decree) से वंचित रहने वाले डिक्री-धारकों की दुर्दशा और देशभर में लंबित 8 लाख से अधिक सिविल निष्पादन याचिकाओं (Civil Execution Petitions) के भारी बैकलॉग पर कड़ा रुख अपनाया है।
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों द्वारा दाखिल अनुपालन रिपोर्टों की समीक्षा करते हुए यह टिप्पणी की। यह कार्यवाही 6 मार्च 2025 के उस ऐतिहासिक फैसले से उपजी है, जिसमें शीर्ष अदालत ने 1986 से चले आ रहे चार दशक पुराने संपत्ति विवाद का निपटारा करते हुए सभी उच्च न्यायालयों को निर्देश दिया था कि वे निचली अदालतों को निष्पादन याचिकाओं का फैसला अनिवार्य रूप से 6 महीने के भीतर करने का आदेश दें, अन्यथा संबंधित न्यायिक अधिकारियों को प्रशासनिक रूप से जवाबदेह (Administratively Answerable) ठहराया जाएगा। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि हर छह महीने में केवल लंबित मामलों के आंकड़े मंगाना अब पर्याप्त नहीं है; अदालतों को वास्तविक निपटारे की दिशा में ठोस और व्यावहारिक परिणाम देने होंगे।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख अवलोकन एवं सुझाव
1. ‘केवल आंकड़े मंगाना काफी नहीं, वास्तविक निपटारे की प्रोग्रेस रिपोर्ट चाहिए’: जस्टिस पारदीवाला पीठ ने 8 लाख लंबित मामलों के चौंकाने वाले आंकड़ों पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा: “हम विभिन्न उच्च न्यायालयों से प्रगति रिपोर्ट (Progress Report) मांगेंगे कि वास्तव में क्या प्रगति हुई है—कितनी निष्पादन याचिकाओं पर अंतिम निर्णय हुआ और उनका प्रभावी निपटारा किया गया। हर छह महीने में केवल ये आंकड़े मंगाना ही पर्याप्त नहीं है। हमें इससे आगे बढ़कर कुछ ठोस कदम उठाने होंगे।”
2. वाणिज्यिक न्यायालय नियमों के नियम 12 का मॉडल: ‘स्पेशलाइज्ड मॉनिटरिंग सेल’
- पीठ ने प्रशासनिक निगरानी तंत्र का उल्लेख करते हुए कमर्शियल कोर्ट रूल्स (Commercial Courts Rules) के नियम 12 की ओर ध्यान आकर्षित किया, जिसमें निष्पादन की निगरानी के लिए विशेष निगरानी प्रकोष्ठ (Specialised Monitoring Cell) स्थापित करने की परिकल्पना की गई है।
- न्यायमूर्ति पारदीवाला ने टिप्पणी की:“हमने कमर्शियल कोर्ट रूल्स के नियम 12 पर चर्चा की है, जो एक विशेष सेल की स्थापना की बात करता है। यह एक ऐसा मॉडल है जो हमें काफी व्यावहारिक लगा। उच्च न्यायालय अपने यहां ऐसे सेल क्यों नहीं स्थापित कर सकते? ये समर्पित सेल विभिन्न जिला अदालतों में निष्पादन की पूरी प्रक्रिया की प्रत्यक्ष और नियमित निगरानी कर सकते हैं।”
- जब अदालत को बताया गया कि अब तक केवल एक उच्च न्यायालय ने ऐसा मॉनिटरिंग सेल बनाया है, तो पीठ ने आश्चर्य जताते हुए सवाल किया कि अन्य उच्च न्यायालय इस पर विचार क्यों नहीं कर रहे हैं।
3. सीपीसी (CPC) में ही सांविधिक समय-सारणी (Statutory Timeline) जोड़ने का सुझाव
- केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी ने पीठ को अवगत कराया कि केंद्र सरकार प्रत्यायोजित विधान (Delegated Legislation) की जटिलताओं से बचने के लिए मूल अधिनियम और सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) में आवश्यक विधायी संशोधन लाने पर सक्रिय रूप से विचार कर रही है।
- इस पर न्यायमूर्ति पारदीवाला ने महत्वपूर्ण विधिक सुझाव देते हुए कहा:“आप स्वयं अधिनियम (CPC) के भीतर ही यह प्रावधान कर सकते हैं कि निष्पादन एक निश्चित वैधानिक समय-सारणी (Schedule) के अनुसार पूरा किया जाएगा। कानून में ही एक स्पष्ट समय-सीमा का शेड्यूल जोड़ा जा सकता है।”
एमिकस क्यूरी की दलीलें: निष्पादन में देरी के दो सबसे बड़े जमीनी कारण
वरिष्ठ अधिवक्ता एवं न्यायमित्र (Amicus Curiae) गोपाल शंकरनारायणन ने देश भर के उच्च न्यायालयों से प्राप्त रिपोर्टों का संकलन पीठ के समक्ष पेश किया। उन्होंने जमीनी स्तर पर निष्पादन में आने वाली बाधाओं को स्पष्ट करते हुए कहा:
- अज्ञात देनदार और संपत्तियों का पता न होना:“जमीनी स्तर पर सबसे बड़ी समस्याएं इसलिए आती हैं क्योंकि या तो निर्णय देनदार (Judgment Debtor) को समन/नोटिस की तामील नहीं हो पाती, या फिर उसकी चल-अचल संपत्तियों का कोई अता-पता नहीं होता। जमीन पर ये दो सबसे बड़ी वास्तविक बाधाएं हैं।”
- प्रक्रियागत अड़ंगे: उच्च न्यायालयों ने निष्पादन में देरी के लिए अपीलीय अदालतों द्वारा दिए जाने वाले अंतरिम स्थगन (Interim Stays), निर्णय देनदारों द्वारा दायर की जाने वाली अंतहीन आपत्ति याचिकाएं (Objection Petitions – CPC Order XXI Rule 97-101), वकीलों की अनुपस्थिति और बार-बार स्थगन (Frequent Adjournments) की संस्कृति को मुख्य कारण बताया है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: पेरियम्मल (मृतक) व अन्य बनाम वी. राजमणि व अन्य [सिविल अपील / निष्पादन निगरानी कार्यवाही – भारत का सर्वोच्च न्यायालय]
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- न्यायमित्र (Amicus Curiae): वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन
- केंद्र सरकार की ओर से: अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी
- प्रासंगिक कानून एवं प्रक्रियात्मक प्रावधान:
- सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) का आदेश XXI (Order XXI) — डिक्री और आदेशों का निष्पादन (नियम 1 से नियम 106 तक)
- वाणिज्यिक न्यायालय नियम (Commercial Courts Rules) का नियम 12 (विशेष निष्पादन निगरानी प्रकोष्ठ की स्थापना)
- सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 38, 39 एवं धारा 47 (निष्पादन न्यायालय द्वारा तय किए जाने वाले प्रश्न)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 142 (डिक्री-धारकों को पूर्ण न्याय दिलाने हेतु शीर्ष अदालत की असाधारण शक्ति)
- संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
- राहुल एस. शाह बनाम जिनेंद्र कुमार गांधी (2021, सुप्रीम कोर्ट 3-जज पीठ) — ‘सुप्रीम कोर्ट ने निष्पादन मुकदमों के त्वरित निपटारे के लिए व्यापक दिशा-निर्देश जारी किए थे और ट्रायल कोर्ट्स को निष्पादन याचिकाएं अधिकतम 6 महीने के भीतर निपटाने का निर्देश दिया था।’
- सत्यवती बनाम राजिंदर सिंह (2013, सुप्रीम कोर्ट) — ‘डिक्री प्राप्त करना केवल आधी लड़ाई है; जब तक डिक्री-धारक को उसका वास्तविक लाभ नहीं मिल जाता, तब तक न्याय अधूरा रहता है।’
- पीठ: न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन (सर्वोच्च न्यायालय)
- अगली सुनवाई: 7 अक्टूबर 2026 (एमिकस क्यूरी और एएसजी को आज की सुनवाई पर 3-4 पृष्ठों का संयुक्त विधिक नोट प्रस्तुत करने का निर्देश)।
Civil Petition Pendency: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ के न्यायाधीश | न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला एवं न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन |
| मूल मामला | Periyammal (Dead) and Ors. vs V Rajamani and Anr. (1986 का 40 साल पुराना संपत्ति विवाद) |
| कुल लंबित मामले | देशभर की जिला अदालतों में 8 लाख से अधिक निष्पादन याचिकाएं |
| न्यायालय का लक्ष्य | 6 महीने के भीतर याचिकाओं का निपटारा सुनिश्चित करना |

