Friday, September 25, 2026
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Election Expenditure: इस्तीफा देने वाले विधायकों से उपचुनाव का खर्च वसूलने और 5 साल का चुनावी प्रतिबंध…यह संसद का नीतिगत अधिकार है, अदालतें कानून नहीं बना सकतीं

हाईकोर्ट का मुख्य निर्णय और कानूनी तर्क

  1. अदालत नया कानून या अयोग्यता तय नहीं कर सकती:खंडपीठ ने कहा कि संविधान या जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (Representation of the People Act, 1951) में इस्तीफा देने वाले विधायकों पर ऐसा कोई दंड लगाने का प्रावधान नहीं है: “हमसे एक ऐसा दंडात्मक और वित्तीय ढांचा तैयार करने के लिए कहा जा रहा है जो भारतीय संविधान के तहत एक नई अयोग्यता के रूप में काम करेगा। हमारी सुविचारित राय में, यह विधायी नीति का मामला है, न कि न्यायिक निर्देश का।” — मद्रास हाईकोर्ट
  2. इस्तीफा देना संवैधानिक अधिकार का हिस्सा:अदालत ने माना कि सदन की सदस्यता से इस्तीफा देने का अधिकार संवैधानिक व्यवस्था का एक पहलू है। जब तक संसद कानून बनाकर इस पर कोई शर्त न लगाए, तब तक अदालती आदेश से गैर-सांविधिक शर्तें नहीं थोपी जा सकतीं।
  3. चुनाव आयोग (ECI) की सीमाओं को रेखांकित किया:याचिकाकर्ता का तर्क था कि चुनाव आयोग अनुच्छेद 324 के तहत यह नियम लागू कर सकता है। कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि चुनाव आयोग के पास चुनावी अयोग्यता के नए आधार जोड़ने की कोई स्वतंत्र शक्ति नहीं है। जो शक्ति आयोग के पास नहीं है, उसे अदालत रिट ऑफ मंडामस (Writ of Mandamus) के जरिए प्रदान नहीं कर सकती।
  4. 2004 के चुनाव आयोग प्रस्ताव का हवाला:हाईकोर्ट ने ध्यान दिलाया कि 2004 में चुनाव आयोग ने ही प्रस्ताव दिया था कि दो सीटों से जीतकर एक सीट छोड़ने वाले उम्मीदवारों से उप-चुनाव का खर्च लिया जाए, लेकिन संसद ने इस पर कानून नहीं बनाया। इससे साबित होता है कि यह निर्णय लेने का अधिकार केवल संसद के पास है।

चेन्नई: मद्रास हाईकोर्ट ने निर्वाचित विधायकों द्वारा पद से समय से पहले त्यागपत्र दिए जाने के परिणामस्वरूप होने वाले उपचुनावों के वित्तीय भार और राजनीतिक दलबदल पर अंकुश लगाने से जुड़ी एक अत्यंत महत्वपूर्ण जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया है।

मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी (Chief Justice SA Dharmadhikari) और न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन की प्रथम खंडपीठ ने दो टूक व्यवस्था दी कि किसी संवैधानिक पद से इस्तीफा देने के बाद नए सिरे से अयोग्यता (Disqualification) या वित्तीय दायित्व (Financial Liability) थोपना केवल विधायिका और संसद का अधिकार क्षेत्र है, जिसमें न्यायपालिका परमादेश (Mandamus) के जरिए हस्तक्षेप नहीं कर सकती। याचिका में मांग की गई थी कि भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) को निर्देश दिया जाए कि वह अपनी सीट से स्वेच्छा से इस्तीफा देने वाले विधायकों से उपचुनाव का संपूर्ण खर्च वसूलने के लिए ‘इलेक्शन एक्सपेंडिचर सिक्योरिटी’ (Election Expenditure Security) तंत्र लागू करे और ऐसे नेताओं पर 5 वर्ष का चुनावी प्रतिबंध (Cooling-off Period) लगाए।

उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं अवलोकन

1. ‘अदालतें कानून नहीं बना सकतीं, विधायी विकल्प को न्यायिक हुक्म में नहीं बदला जा सकता’

याचिकाकर्ता द्वारा एक नया वित्तीय और दंडात्मक ढांचा बनाने के अनुरोध को खारिज करते हुए मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने कहा: “हमसे एक ऐसा दंडात्मक और वित्तीय तंत्र (Punitive and Financial Regime) तैयार करने का आग्रह किया जा रहा है जो भारत के संविधान के तहत एक नई अयोग्यता के रूप में कार्य करेगा और चुनाव लड़ने के सांविधिक अधिकार को सीमित करेगा। हमारी सुविचारित राय में, यह विधायी नीति (Legislative Policy) का विषय है, न कि न्यायिक निर्देश का। यह अदालत किसी कार्यपालिका या विधायी विकल्प को न्यायिक हुक्म (Judicial Command) में परिवर्तित नहीं कर सकती। कानून बनाना विधायिका का काम है; हम कानून नहीं बना सकते।”

2. त्यागपत्र देने का अधिकार संवैधानिक योजना का हिस्सा

  • खंडपीठ ने रेखांकित किया कि न तो भारत का संविधान (अनुच्छेद 190) और न ही लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (RPA, 1951) अपनी सीट से त्यागपत्र देने वाले सांसदों या विधायकों पर इस प्रकार का कोई दंडात्मक परिणाम या वित्तीय भार थोपते हैं।
  • पीठ ने स्पष्ट किया: “किसी विधायी सदन की सदस्यता से त्यागपत्र देने का अधिकार स्वयं सदन की सदस्यता को संचालित करने वाली संवैधानिक योजना का एक वैधानिक पहलू है। अंतर्निहित चिंता चाहे कितनी भी उचित क्यों न हो, न्यायिक आदेश के माध्यम से इसे कानून से परे की अतिरिक्त शर्तों (Extra-statutory Conditions) से नहीं बांधा जा सकता।”

3. अनुच्छेद 324 के तहत निर्वाचन आयोग की शक्तियों की सीमा

  • याचिकाकर्ता के इस तर्क को अदालत ने खारिज कर दिया कि निर्वाचन आयोग संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत अपनी पूर्ण शक्तियों (Plenary Powers) का प्रयोग करते हुए इस तरह की शर्तें लागू कर सकता है।
  • अदालत ने माना कि अनुच्छेद 324 आयोग को चुनाव संचालन के लिए नियम बनाने की शक्ति देता है, परंतु आयोग के पास चुनाव लड़ने की मौजूदा सांविधिक अयोग्यताओं (Disqualifications) में कोई नया कानूनी आधार जोड़ने की स्वतंत्र शक्ति नहीं है। जब आयोग के पास स्वयं यह शक्ति नहीं है, तो अदालत रिट जारी करके उसे यह अधिकार नहीं दे सकती।

4. 2004 के ईसीआई प्रस्ताव और संसद की निष्क्रियता का हवाला

  • उच्च न्यायालय ने दर्ज किया कि वर्ष 2004 में स्वयं निर्वाचन आयोग ने केंद्र सरकार को यह विधायी प्रस्ताव भेजा था कि दो सीटों से जीतने वाले और एक सीट खाली करने वाले प्रत्याशियों से उपचुनाव का खर्च जमा कराया जाए।
  • परंतु, संसद ने उस सिफारिश को लागू करने के लिए आज तक लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम में कोई संशोधन नहीं किया है। यह तथ्य स्वयं साबित करता है कि यह विषय विशुद्ध रूप से विधायी नीति के दायरे में आता है।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि

  • तमिलनाडु के 6 विधायकों का इस्तीफा: यह जनहित याचिका चेन्नई के अधिवक्ता के. सुथन द्वारा दायर की गई थी। वर्ष 2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनावों के तुरंत बाद अन्नाद्रमुक (AIADMK) के छह विधायकों ने सदन में मई में हुए विश्वास मत के दौरान पार्टी व्हिप का उल्लंघन कर टीवीके (TVK) नीत राज्य सरकार का समर्थन किया और बाद में अपनी विधानसभा सीटों से इस्तीफा देकर टीवीके पार्टी में शामिल हो गए।
  • उपचुनाव और करदाताओं का धन: विधायकों के इस्तीफे के कारण मदुरंतकम और धारापुरम सहित छह विधानसभा क्षेत्रों में उपचुनाव की नौबत आ गई।
  • याचिकाकर्ता की दलील: याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि व्यक्तिगत या राजनीतिक लाभ के लिए जनता के जनादेश को त्यागने वाले विधायकों के कारण सरकारी खजाने और करदाताओं पर बार-बार चुनाव कराने का अनावश्यक वित्तीय बोझ पड़ता है। इसलिए इस्तीफा देने वाले विधायकों से उपचुनाव का पूरा खर्च वसूला जाना चाहिए और दल-बदल विरोधी कानून से बचने के लिए तुरंत उसी सीट से दोबारा लड़ने पर 5 साल की रोक लगाई जानी चाहिए।

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विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: के. सुथन बनाम भारत संघ, मुख्य चुनाव आयुक्त, तमिलनाडु मुख्य निर्वाचन अधिकारी व अन्य [W.P. No. 37274 of 2026 | 2026 LiveLaw (Mad) 458 – मद्रास उच्च न्यायालय]
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • याचिकाकर्ता की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता आर. सिंगारवेलन (निर्देशन: अधिवक्ता आर. जयप्रकाश)
    • केंद्र सरकार की ओर से: केंद्र सरकार के स्थायी वकील (CGSC) के. थिरुक्कुमारन
    • निर्वाचन आयोग (ECI) की ओर से: अधिवक्ता निरंजन राजागोपालन
    • तमिलनाडु राज्य की ओर से: तमिलनाडु के महाधिवक्ता (Advocate General) विजय नारायण (सहयोगी: विशेष सरकारी प्लीडर जे. लेनिन)
  • प्रासंगिक संवैधानिक व सांविधिक प्रावधान:
    • भारत का संविधान – अनुच्छेद 190(3)(b) (विधानसभा/विधान परिषद की सदस्यता से त्यागपत्र देने का अधिकार)
    • भारत का संविधान – अनुच्छेद 191 (विधानसभा सदस्यता के लिए अयोग्यताएं)
    • भारत का संविधान – दसवीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून)
    • भारत का संविधान – अनुच्छेद 324 (चुनावों का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण)
    • लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (RPA, 1951) की धारा 8 से 11A (चुनावी अयोग्यताएं) एवं धारा 150 (आकस्मिक रिक्तियों को भरने हेतु उपचुनाव)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
    • श्रीमंत बालासाहेब पाटिल बनाम कर्नाटक विधानसभा अध्यक्ष (2020, सुप्रीम कोर्ट 3-जज पीठ) — ‘सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि विधानसभा अध्यक्ष किसी अयोग्य घोषित या इस्तीफा देने वाले विधायक को आगामी उपचुनाव लड़ने से वंचित करने या उसका कार्यकाल तय करने की शक्ति नहीं रखते; चुनाव लड़ने का अधिकार केवल संसद द्वारा बनाए गए कानूनों के अधीन ही सीमित किया जा सकता है।’
    • पी.यू.सी.एल. बनाम भारत संघ (2003, सुप्रीम कोर्ट) एवं मोहिंदर सिंह गिल बनाम मुख्य चुनाव आयुक्त (1978) — ‘अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग की शक्तियां संसद द्वारा बनाए गए वैधानिक कानूनों की पूरक हो सकती हैं, लेकिन वे संसदीय कानूनों का अतिक्रमण नहीं कर सकतीं और न ही नई वैधानिक अयोग्यताएं सृजित कर सकती हैं।’
  • पीठ: मुख्य न्यायाधीश सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन (मद्रास उच्च न्यायालय)
  • अंतिम निर्णय: जनहित याचिका खारिज (PIL Dismissed); कानून में संशोधन का दायित्व संसद के क्षेत्राधिकार में छोड़ा गया।

Election Expenditure:मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतमद्रास उच्च न्यायालय (Madras High Court)
पीठ के न्यायाधीशमुख्य न्यायाधीश सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी एवं न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन
याचिकाकर्ताअधिवक्ता के. सुथन (Suthan Vs Union of India)
मुख्य मांगें1. उप-चुनाव खर्च की भरपाई के लिए ‘इलेक्शन एक्सपेंडिचर सिक्योरिटी’ व्यवस्था।
2. इस्तीफा देने वाले विधायकों पर 5 साल का चुनावी प्रतिबंध।
हाईकोर्ट का अंतिम फैसलायाचिका खारिज; अदालत ने कहा कि वह कानून बनाने या नई अयोग्यताएं तय करने का काम नहीं कर सकती।
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