Friday, September 25, 2026
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TMC Rebel MPS’: अयोग्यता याचिकाओं पर स्पीकर द्वारा 3 महीने का समय लेना ‘रेड फ्लैग’है; पर हम स्पीकर की संवैधानिक भूमिका का भी सम्मान करते हैं

सुप्रीम कोर्ट में क्या हुई बहस?

1. ‘केशम मेघाचंद्र सिंह’ फैसले का हवाला:

  • याचिकाकर्ता के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट के केशम मेघाचंद्र सिंह बनाम मणिपुर विधानसभा अध्यक्ष (2020) मामले का हवाला दिया, जिसमें कोर्ट ने कहा था कि अयोग्यता याचिकाओं का निपटारा 3 महीने की बाहरी सीमा के भीतर किया जाना चाहिए।
  • उन्होंने कहा कि 3 महीने का समय बीत चुका है और मामले को अनिश्चित काल के लिए लंबित नहीं रखा जा सकता।

2. लोकसभा अध्यक्ष और केंद्र का रुख:

  • सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने अध्यक्ष के पक्ष का प्रतिनिधित्व करते हुए कोर्ट द्वारा समय-सीमा (Timeline) तय किए जाने का विरोध किया।
  • उन्होंने तर्क दिया कि अध्यक्ष एक संवैधानिक प्राधिकारी (Constitutional Authority) हैं और दोनों पक्षों को अपनी बात रखने तथा साक्ष्य प्रस्तुत करने का पूरा अवसर दिया जाना चाहिए।

3. अदालत की सख्त टिप्पणी:

  • न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची ने कहा: “3 महीने का समय बीत जाना एक ‘रेड फ्लैग’ है। जब मामला बेहद स्पष्ट हो और इसके परिणाम लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर पड़ रहे हों, तो इसे पूरा करने में देरी क्यों की जा रही है?”
  • पीठ ने स्पष्ट किया कि यद्यपि वे अध्यक्ष को कोई कठोर समय-सीमा देकर दबाव में नहीं डालना चाहते, लेकिन अध्यक्ष को अपनी संवैधानिक भूमिका और जिम्मेदारी के प्रति सचेत रहना चाहिए।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने संविधान की 10वीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून / Anti-Defection Law), पीठासीन अधिकारियों (स्पीकर) द्वारा अयोग्यता याचिकाओं के निस्तारण में होने वाले व्यवस्थागत विलंब, और कैशम मेघचंद्र सिंह (2020) नजीर में निर्धारित ‘3 महीने की बाहरी समय सीमा’ पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधिक रुख अपनाया है।

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय विशेष पीठ ने टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पीकर के लिए कोई कठोर न्यायिक समय सीमा (Rigid Judicial Timeline) तय करने से परहेज किया, परंतु याचिका को अदालत में जीवित (Alive) रखते हुए कार्यवाही की प्रगति की निगरानी करने का निर्णय लिया। अदालत ने मामले को छह सप्ताह बाद सूचीबद्ध करते हुए स्पीकर के समक्ष चल रही कार्यवाही की अद्यतन स्थिति तलब की है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 लोकसभा सांसदों के बगावत कर नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में शामिल होने के बाद उनके खिलाफ दायर अयोग्यता याचिकाओं पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा 3 महीने में भी फैसला न लिए जाने पर शीर्ष अदालत ने इसे “रेड फ्लैग” (Red Flag – चेतावनी का संकेत) करार दिया है।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख विधिक अवलोकन एवं टिप्पणियां

1. ‘3 महीने का विलंब एक रेड फ्लैग है, इसका लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर असर पड़ता है’: न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची अयोग्यता याचिकाओं पर निर्णय में देरी के गंभीर संवैधानिक परिणामों को रेखांकित करते हुए न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने कहा: “मामले-मामले पर निर्भर करता है। कुछ महीनों का समय लगना एक ‘रेड फ्लैग’ हो सकता है और यह बात पूरी तरह स्वीकार्य है। यह याचिका एक चेतावनी का संकेत देती है कि तीन महीने बीत चुके हैं। जब यह पल भर का विषय है और इसके कई परिणामी कार्यवाहियों व देश की संपूर्ण लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर दूरगामी प्रभाव पड़ते हैं, तो आपने इसे अब तक समाप्त क्यों नहीं किया?”

2. स्पीकर और न्यायपालिका की संवैधानिक भूमिकाओं में संतुलन

  • पीठ ने स्वीकार किया कि लोकसभा अध्यक्ष संविधान के तहत विधायिका के प्रमुख हैं और एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्राधिकारी (Constitutional Authority) के रूप में कार्य करते हैं:“स्पीकर की एक दोहरी/विशिष्ट भूमिका होती है क्योंकि वे संविधान के विधायी अंग के प्रमुख हैं। हम संविधान के न्यायिक अंग के प्रमुख हैं। और हमने अपनी स्वयं की समय सीमाओं का कितना पालन किया है? स्पीकर को अपने ऊपर सौंपी गई संवैधानिक भूमिका में स्वयं को गंभीरता से लगाना चाहिए। साथ ही, कुछ मामले पूरी तरह स्पष्ट (Open-and-shut) होते हैं, जबकि कुछ में साक्ष्यों पर कड़ा विवाद होता है। इसलिए हमें स्पीकर को उचित कार्य-क्षेत्र (Elbow Space) भी देना होगा।”

3. याचिका को ‘जीवित’ रखकर प्रगति रिपोर्ट मांगने का व्यावहारिक दृष्टिकोण: CJI सूर्यकांत

  • मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि शीर्ष अदालत स्पीकर के अधिकारों में सीधा अतिक्रमण नहीं करना चाहती, बल्कि यह सुनिश्चित करना चाहती है कि कार्यवाही अनिश्चितकाल तक न लटके:“हमारा इरादा इस याचिका को जीवित रखने और उचित समय के भीतर स्पीकर के स्तर पर हो रही प्रगति की समीक्षा प्राप्त करने का है।”

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (TMC में फूट और 20 बागी सांसद)

  • जून 2026 में टूट: जून 2026 में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 लोकसभा सांसदों ने पार्टी से नाता तोड़ते हुए त्रिपुरा स्थित राजनीतिक दल ‘नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ (NCPI) में शामिल होने की घोषणा की और लोकसभा में एक अलग समूह के रूप में मान्यता की मांग की।
  • 18 जून 2026 को अयोग्यता याचिकाएं: टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी ने 18 जून को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के समक्ष संविधान की 10वीं अनुसूची के पैरा 2(1)(a) के तहत 20 अलग-अलग अयोग्यता याचिकाएं दायर कीं, जिसमें आरोप लगाया गया कि सांसदों ने स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ दी है।
  • नोटिस और समय विस्तार की समयरेखा:
    • लोकसभा सचिवालय ने 5 अगस्त को बागी सांसदों को नोटिस जारी कर 14 दिनों के भीतर जवाब मांगा था।
    • सांसदों के अनुरोध पर समय सीमा को बढ़ाकर 22 सितंबर 2026 किया गया था।
    • 22 सितंबर को सांसदों (संसदीय दल की अध्यक्ष काकोली घोष दस्तीदार आदि) ने दस्तावेज जुटाने का हवाला देते हुए लोकसभा सचिवालय से 4 और हफ्तों का अतिरिक्त समय मांगा।

दोनों पक्षों की प्रमुख विधिक दलीलें

1. वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी (याचिकाकर्ता अभिषेक बनर्जी की ओर से):

  • वरिष्ठ वकील ने दलील दी कि 10वीं अनुसूची के तहत अयोग्यता की कार्यवाहियों को अनिश्चितकाल के लिए लंबित नहीं रखा जा सकता।
  • उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले कैशम मेघचंद्र सिंह (2020) का हवाला दिया, जिसमें शीर्ष अदालत ने स्पष्ट रूप से व्यवस्था दी थी कि असाधारण परिस्थितियों को छोड़कर स्पीकर को अयोग्यता याचिकाओं का निपटारा 3 महीने की बाहरी समय सीमा (Outer limit of 3 months) के भीतर अनिवार्य रूप से कर देना चाहिए। Bar and Bench
  • उन्होंने कहा कि सांसदों को बार-बार समय विस्तार दिया जाना केवल मामले को लटकाने की रणनीति है।

2. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता (लोकसभा अध्यक्ष की ओर से):

  • सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत द्वारा कोई भी न्यायिक समय सीमा (Judicial Deadline) तय किए जाने का कड़ा विरोध किया।
  • एसजी ने तर्क दिया:“अदालत को किसी समय सीमा के निर्धारण पर विचार नहीं करना चाहिए। स्पीकर एक संवैधानिक प्राधिकारी हैं और वे भली-भांति जानते हैं कि क्या किया जाना आवश्यक है। प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के तहत हर पक्ष को अपना जवाब और साक्ष्य प्रस्तुत करने का पूरा अवसर दिया जाना अनिवार्य है।”
  • उन्होंने अदालत को अवगत कराया कि सांसद अपना जवाब तैयार करने की प्रक्रिया में हैं और इसके लिए उन्हें लगभग 4 सप्ताह का समय अपेक्षित है।

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम प्रक्रियात्मक आदेश

  1. कोई निश्चित समय सीमा नहीं: शीर्ष अदालत ने न्यायिक संयम (Judicial Restraint) बरतते हुए लोकसभा अध्यक्ष के लिए कोई बाध्यकारी तारीख तय नहीं की।
  2. समीक्षा हेतु याचिका जीवित: अदालत ने अभिषेक बनर्जी की याचिका को लंबित/जीवित रखा ताकि स्पीकर के समक्ष हो रही प्रगति की समीक्षा की जा सके।
  3. अगली सुनवाई: इस संपूर्ण मामले की अगली सुनवाई छह सप्ताह बाद तय की गई है।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: अभिषेक बनर्जी बनाम माननीय अध्यक्ष, लोकसभा एवं अन्य [रिट याचिका (सिविल) – भारत का सर्वोच्च न्यायालय]
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • याचिकाकर्ता (अभिषेक बनर्जी / TMC) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी
    • प्रतिवादी (लोकसभा अध्यक्ष) की ओर से: भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता
  • प्रासंगिक संवैधानिक प्रावधान:
    • भारत का संविधान – 10वीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) का पैरा 2(1)(a) (स्वेच्छा से राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ना) एवं पैरा 6 (अयोग्यता के प्रश्नों पर सभापति/अध्यक्ष का निर्णय) LawBeat
    • 91वां संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 (दल-बदल से बचने के लिए न्यूनतम दो-तिहाई सदस्यों के विलय की अनिवार्यता)
    • भारत का संविधान – अनुच्छेद 32 (संवैधानिक उपचारों का अधिकार)
  • संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
    • कैशम मेघचंद्र सिंह बनाम माननीय अध्यक्ष, मणिपुर विधानसभा (2020, सुप्रीम कोर्ट 3-जज पीठ) — ‘स्पीकर एक ट्रिब्यूनल के रूप में कार्य करते हैं; बिना किसी ठोस असाधारण कारण के अयोग्यता याचिकाओं का निपटारा 3 महीने के भीतर हो जाना चाहिए।’
    • किहोतो होलोहन बनाम ज़ाचिल्हू (1992, सुप्रीम कोर्ट 5-जज संविधान पीठ) — ’10वीं अनुसूची के तहत स्पीकर के निर्णय न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे में आते हैं; यद्यपि सामान्यतः अदालतें निर्णय से पूर्व हस्तक्षेप नहीं करतीं, परंतु असहनीय व अनुचित देरी की स्थिति में न्यायिक समीक्षा के द्वार खुले हैं।’
    • राजेंद्र सिंह राणा बनाम स्वामी प्रसाद मौर्य (2007, सुप्रीम कोर्ट संविधान पीठ) — ‘यदि स्पीकर अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करने में जानबूझकर विफलता या अनुचित विलंब करते हैं, तो अदालतें प्रभावी हस्तक्षेप कर सकती हैं।’
  • पीठ: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना (सर्वोच्च न्यायालय)
  • आदेश तिथि: 23 सितंबर 2026

TMC Rebel MPS’: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतभारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठ (Judges)CJI सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची, न्यायमूर्ति वी. मोहना
याचिकाकर्ताअभिषेक बनर्जी (नेता, TMC संसदीय दल)
मुख्य मुद्दासंविधान की 10वीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) के तहत बागी सांसदों की अयोग्यता
बागी सांसदों की संख्या20 टीएमसी सांसद (जो NCPI में शामिल हुए)
अगली सुनवाई6 सप्ताह बाद
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