अदालत की मुख्य टिप्पणियां और दिशा-निर्देश
- न्यायपालिका की गरिमा और वकीलों का कर्तव्य: पीठ ने अधिवक्ता को याद दिलाया कि वकील केवल अपने मुवक्किल का प्रतिनिधित्व नहीं करते, बल्कि वे अदालत के अधिकारी (Officers of the Court) भी हैं। इसलिए न्यायपालिका की गरिमा और सम्मान को बनाए रखना उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी है।
- बिना वजह पूर्वाग्रह के आरोप लगाना गलत: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वकीलों की पेशेवर फीस से जुड़े मामलों पर पहले से ही स्पष्ट कानूनी फैसले मौजूद हैं। जब अदालत ने पक्षों को उन फैसलों का अध्ययन कर प्रतियों को रिकॉर्ड पर रखने का निर्देश दिया, तो ऐसे में पीठ पर किसी प्रकार का मनसूबा या दुर्भावना का आरोप लगाने का कोई औचित्य नहीं था।
- अदालत की कार्यवाही में हस्तक्षेप का नियम: हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पीठ किसी भी वकील को वैध कानूनी दलीलें (Submissions) रखने से कभी नहीं रोकती। अदालत केवल तभी हस्तक्षेप करती है जब बहस अनावश्यक, दोहराव वाली या अप्रासंगिक (Irrelevant) हो जाती है।
अमरावती: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने अदालती कार्यवाही की अनधिकृत रिकॉर्डिंग (Unauthorised Recording), सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर वीडियो क्लिप्स पोस्ट करने, ऑनलाइन चर्चाओं के जरिए जजों को निशाना बनाने और न्यायिक पीठ पर दुर्भावनापूर्ण मंशा (Ulterior Motives) थोपने की प्रवृत्ति पर सख्त नाराजगी व्यक्त की है।
आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति लीसा गिल (Chief Justice Lisa Gill) और न्यायमूर्ति चल्ला गुणरंजन की खंडपीठ ने सड़कों पर मूर्तियों की स्थापना को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई के दौरान अधिवक्ता जादा श्रवण कुमार (Advocate Jada Sravan Kumar) के आचरण और ऑनलाइन पोस्ट पर यह कड़ी मौखिक टिप्पणी की। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वकील केवल मुवक्किल के प्रवक्ता नहीं, बल्कि अदालत के अधिकारी (Officers of the Court) हैं, जिनका प्राथमिक दायित्व न्यायपालिका की गरिमा और कोर्ट रूम की मर्यादा (Courtroom Decorum) की रक्षा करना है।
सुनवाई के दौरान खंडपीठ के प्रमुख अवलोकन एवं निर्देश
1. ‘जजों को निशाना बनाना और सोशल मीडिया पर वीडियो डालना बंद हो’: मुख्य न्यायाधीश की पीठ अदालत के भीतर चल रही बहस को रिकॉर्ड कर इंटरनेट पर प्रसारित करने और उस पर की जा रही टिप्पणियों पर गंभीर असंतोष जताते हुए खंडपीठ ने कहा:
- अदालती कार्यवाही को गुप्त या अनधिकृत रूप से रिकॉर्ड करना और सोशल मीडिया पर डालकर जजों को व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाना न्यायिक स्वतंत्रता और न्याय प्रशासन की शुचिता पर हमला है।
- पीठ ने अधिवक्ता जादा श्रवण कुमार को स्मरण कराया कि एक अधिवक्ता के रूप में उनका दायित्व संस्थागत सम्मान को अक्षुण्ण रखना है, न कि ऑनलाइन नैरेटिव बनाकर पीठ के आचरण पर सवाल खड़े करना।
2. अदालती हस्तक्षेप की सीमा: ‘अनावश्यक बहस पर ही रोक, वैध दलीलों पर नहीं’
- खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि अदालत कभी भी किसी वकील को अपने मामले में वैध और प्रासंगिक कानूनी दलीलें (Legitimate Submissions) पेश करने से नहीं रोकती।
- पीठ ने स्पष्टीकरण दिया:“न्यायालय केवल तभी हस्तक्षेप करता है जब दलीलें अनावश्यक, असंबद्ध (Irrelevant) या कानूनी दायरे से बाहर भटकने लगती हैं। वकीलों को अपनी बात रखने की पूरी स्वतंत्रता है, परंतु यह स्वतंत्रता अदालती मर्यादा और अनुशासन के दायरे में ही प्रयुक्त होनी चाहिए।”
3. वकीलों की फीस से जुड़ा मुद्दा और पीठ पर मंशा थोपने की भर्त्सना
- सुनवाई के दौरान वकीलों की व्यावसायिक फीस (Professional Fees) के भुगतान का विषय उठने पर पीठ ने रेखांकित किया कि संवैधानिक न्यायालयों द्वारा इस संबंध में पहले ही सुस्पष्ट और बाध्यकारी निर्णय दिए जा चुके हैं।
- पीठ ने कड़ा ऐतराज जताते हुए कहा कि जब अदालत ने केवल इतना निर्देश दिया था कि पक्षकार उन पूर्व निर्णयों का अध्ययन करें और उनकी प्रतियां पीठ के समक्ष प्रस्तुत करें, तो ऐसे सामान्य न्यायिक निर्देश के पीछे पीठ के प्रति कोई ‘छिपी हुई मंशा’ या ‘दुर्भावनापूर्ण इरादा’ (Ulterior Motives) थोपने का कोई कानूनी या नैतिक औचित्य नहीं था।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि
- सार्वजनिक सड़कों पर मूर्तियों की स्थापना: यह मामला आंध्र प्रदेश के विभिन्न शहरों और राजमार्गों पर यातायात को बाधित कर सार्वजनिक चौराहों और सड़कों पर अवैध रूप से राजनीतिक व अन्य मूर्तियों की स्थापना के खिलाफ दायर जनहित याचिका से जुड़ा है।
- सोशल मीडिया पर टिप्पणियां: याचिका पर सुनवाई के दौरान पूर्व की कार्यवाहियों और फीस के मामलों को लेकर अधिवक्ता जादा श्रवण कुमार ने ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर टिप्पणियां की थीं और वीडियो साझा किए थे, जिसका संज्ञान लेते हुए खंडपीठ ने बुधवार (23 सितंबर 2026) को उन्हें सीधे चेतावनी दी और भविष्य में पूर्ण संयम बरतने की ताकीद की।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: सार्वजनिक सड़कों पर अनधिकृत मूर्तियों की स्थापना को चुनौती देने वाली जनहित याचिका [PIL – आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय]
- संबंधित अधिवक्ता: अधिवक्ता जादा श्रवण कुमार
- प्रासंगिक कानून एवं विनियम:
- अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (Advocates Act, 1961) की धारा 35 एवं बार काउंसिल ऑफ इंडिया रूल्स (BCI Rules) का भाग VI, अध्याय II (न्यायालय के प्रति अधिवक्ता के कर्तव्य एवं आचरण संहिता)
- न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971) की धारा 2(c) (न्यायिक मर्यादा को ठेस पहुंचाना एवं प्रक्रिया में बाधा)
- आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय लाइव स्ट्रीमिंग एवं कोर्ट रूम रिकॉर्डिंग नियम (अनधिकृत ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग पर वैधानिक रोक)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 215 (उच्च न्यायालय की अभिलेख न्यायालय के रूप में अवमानना दंडित करने की अंतर्निहित शक्ति)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- स्वप्निल त्रिपाठी बनाम भारत संघ (2018, सुप्रीम कोर्ट) — ‘अदालती कार्यवाहियों का सीधा प्रसारण पारदर्शिता के लिए है, परंतु किसी भी पक्षकार या वकील द्वारा कार्यवाही की अनधिकृत रिकॉर्डिंग, संपादन या सोशल मीडिया पर विकृत प्रसार पूरी तरह निषिद्ध और दंडनीय है।’
- ओ.पी. शर्मा बनाम पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय (2011, सुप्रीम कोर्ट) — ‘वकील अदालत के सम्मानित अधिकारी हैं; न्यायिक पीठ पर निराधार आरोप लगाना और अदालत की मर्यादा को धूमिल करना घोर व्यावसायिक कदाचार (Professional Misconduct) है।’
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश लीसा गिल और न्यायमूर्ति चल्ला गुणरंजन (आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय)
Young Advocate: AIBE पास किए बिना वकालत करना अवैध; बार काउंसिल 2021 के बाद नामांकित ऐसे वकीलों की पहचान कर सूची प्रकाशित करे और जिला अदालतों को भेजेमामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय (Andhra Pradesh High Court) |
| पीठ के न्यायाधीश | मुख्य न्यायाधीश लिसा गिल एवं न्यायमूर्ति चेल्ला गुणरंजन |
| संबंधित अधिवक्ता | जेड. श्रवण कुमार (Jada Sravan Kumar) |
| मूल विषय/मामला | सड़कों पर मूर्तियों की स्थापना को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (PIL) |
| मुख्य मुद्दा | कोर्ट कार्यवाही की अनधिकृत रिकॉर्डिंग, सोशल मीडिया पर वकीलों द्वारा जजों पर टिप्पणी और कोर्टरूम डेकोरम |

