सुनवाई के दौरान कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां
- न्यायिक आदेशों से सुधार संभव नहीं:CJI सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता के वकील से कहा:“ये चीज़ें कोर्ट के आदेशों से नहीं होती हैं। ये सुधारों के हिस्से के रूप में धीरे-धीरे और चरणबद्ध तरीके से होती हैं। और ऐसा काम हम पहले से ही कर रहे हैं।”
- क्षेत्रीय भाषाओं का सम्मान और प्रशासनिक प्रयास:मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि शीर्ष अदालत अपनी आधिकारिक वेबसाइट और रिपोर्टों में धीरे-धीरे हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं का समावेश कर रही है। उन्होंने कहा कि हम देश की विविधता और सभी क्षेत्रीय भाषाओं की संस्कृति का पूरा सम्मान करते हैं और इसे बनाए रखेंगे।
- संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता:सुनवाई के दौरान जब वकील ने केवल आयोग बनाने के निर्देश देने का आग्रह किया, तो न्यायमूर्ति वी. मोहाना ने टिप्पणी की:“आप वास्तव में एक संवैधानिक संशोधन की मांग कर रहे हैं। कोई अदालत ऐसा कैसे कर सकती है?”
- संसद का अधिकार क्षेत्र:न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि याचिकाकर्ता को यह मुद्दा विधायिका (संसद) के समक्ष उठाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब ऐसे नीतिगत निर्णय अदालतों के माध्यम से लिए जाते हैं, तो उन्हें समाज पर थोपे गए अलोकतांत्रिक फैसले के रूप में देखा जाता है।
संविधान में क्या है प्रावधान? (Article 348)
- अनुच्छेद 348(1)(a): भारतीय संविधान के अनुसार, जब तक संसद कानून बनाकर कोई अन्य प्रावधान न करे, तब तक सर्वोच्च न्यायालय और प्रत्येक उच्च न्यायालय की सभी कार्यवाहियां केवल अंग्रेजी भाषा (English) में ही संचालित की जाएंगी।
- अनुच्छेद 348(2): यह अनुच्छेद केवल राज्यों के उच्च न्यायालयों (High Courts) को यह छूट देता है कि राज्यपाल, राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से हाईकोर्ट की कार्यवाही में हिंदी या राज्य की किसी अन्य आधिकारिक भाषा के उपयोग की अनुमति दे सकते हैं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के लिए संविधान में ऐसा कोई अपवाद या प्रावधान नहीं बनाया गया है।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने देश की शीर्ष अदालत की न्यायिक कार्यवाही में हिंदी को आधिकारिक भाषा (Official Language) के रूप में अपनाने की संभावनाओं की जांच करने और सिफारिश देने के लिए केंद्र सरकार को एक उच्चस्तरीय आयोग गठित करने का निर्देश देने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने 25 सितंबर 2026 को याचिका पर विचार करने से इनकार करते हुए याचिकाकर्ता को याद दिलाया कि शीर्ष अदालत पहले से ही प्रशासनिक स्तर पर फैसलों के संक्षिप्त विवरण हिंदी व अन्य भारतीय क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध कराने की व्यापक पहल चला रही है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट रूप से व्यवस्था दी कि न्यायिक कार्यवाही की भाषा में बदलाव अदालती आदेशों या न्यायिक परमादेश (Judicial Writs) के जरिए लागू नहीं किया जा सकता; यह एक विधायी और नीतिगत विषय है जो धीरे-धीरे संस्थागत सुधारों (Phased Institutional Reforms) के माध्यम से ही संभव है।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख अवलोकन एवं संवाद
1. ‘संस्थागत सुधार धीरे-धीरे होते हैं, अदालती आदेश से नहीं’: CJI सूर्यकांत
सुनवाई के दौरान जब याचिकाकर्ता के वकील ने केंद्र सरकार को आयोग गठित करने का निर्देश देने पर बल दिया, तो मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने अदालत द्वारा उठाए जा रहे कदमों का हवाला देते हुए कहा: “ऐसी चीजें अदालती आदेशों के माध्यम से नहीं होती हैं। ये सुधारों (Reforms) के हिस्से के रूप में धीरे-धीरे और चरणबद्ध तरीके से होती हैं। इस दिशा में हम पहले से ही ठोस कदम उठा रहे हैं। क्या आपने हमारी अद्यतन वेबसाइट देखी है? अब हम सुप्रीम कोर्ट के सभी महत्वपूर्ण निर्णयों और रिपोर्टों का संक्षिप्त विवरण (Brief Description/Summaries) हिंदी में उपलब्ध करा रहे हैं। इसके बाद हम अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में भी इसकी शुरुआत करेंगे। हमें अखिल भारतीय संस्कृति को बनाए रखना है और हम सभी क्षेत्रीय भाषाओं का समान रूप से सम्मान करेंगे।”
2. ‘आप अप्रत्यक्ष रूप से संविधान संशोधन की मांग कर रहे हैं’: जस्टिस वी. मोहना
- जब वकील ने आग्रह किया कि अदालत कम से कम विचार करने के लिए एक आयोग (Commission) के गठन का आदेश दे दे, तो पीठ की सदस्य न्यायमूर्ति वी. मोहना ने सवाल किया: “आप जो राहत मांग रहे हैं, उसके लिए प्रभावी रूप से संविधान संशोधन (Constitutional Amendment) की आवश्यकता होगी। एक अदालत ऐसा कैसे कर सकती है?”
- अदालत ने रेखांकित किया कि संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद 348 के तहत स्पष्ट व्यवस्था बनाई है, जिसमें बदलाव केवल संसद द्वारा कानून पारित करके ही किया जा सकता है।
3. ‘अदालत से ऐसे फैसले समाज पर अलोकतांत्रिक थोपने जैसे माने जाते हैं’: जस्टिस बागची
- न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची ने न्यायिक और विधायी सीमाओं को स्पष्ट करते हुए कहा:“आपको यह मुद्दा विधायिका (संसद) के समक्ष उठाना चाहिए। अन्यथा क्या होता है—अदालतें निश्चित रूप से संविधान की संरक्षक हैं—लेकिन जब इस तरह के निर्णय अदालतों के माध्यम से लिए जाते हैं, तो उनकी हमेशा आलोचना की जाती है कि समाज पर अलोकतांत्रिक फैसले थोपे जा रहे हैं।”
4. ‘लाइव स्ट्रीमिंग के लिए बहस न करें’
जब याचिकाकर्ता के वकील बार-बार आयोग के गठन की बात दोहराते रहे, तो मुख्य न्यायाधीश ने सख्त लहजे में टिप्पणी की: “यदि आप केवल लाइव स्ट्रीमिंग के प्रसारण के लिए बहस करना चाहते हैं, तो वह एक अलग बात है। अन्यथा हमने अपना दृष्टिकोण पर्याप्त रूप से स्पष्ट कर दिया है।” इसके साथ ही पीठ ने जनहित याचिका को औपचारिक रूप से खारिज कर दिया।
संवैधानिक ढांचा: सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में भाषा का प्रावधान
भारतीय संविधान का भाग XVII (अध्याय III – उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालयों आदि की भाषा) अदालती कार्यवाही की भाषा को स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है:
- अनुच्छेद 348(1)(a) का अनिवार्य नियम:
- भारत के संविधान का अनुच्छेद 348(1)(a) यह अनिवार्य करता है कि जब तक संसद विधि द्वारा अन्यथा उपबंध न करे, तब तक सर्वोच्च न्यायालय और प्रत्येक उच्च न्यायालय में सभी कार्यवाहियां केवल अंग्रेजी भाषा (English) में ही संचालित की जाएंगी।
- अनुच्छेद 348(2) का अपवाद केवल उच्च न्यायालयों के लिए:
- अनुच्छेद 348(2) राज्य के राज्यपाल को यह अधिकार देता है कि वह राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से उस राज्य के उच्च न्यायालय की कार्यवाहियों में हिंदी या राज्य की किसी अन्य राजभाषा के उपयोग को अधिकृत कर सकते हैं।
- सर्वोच्च न्यायालय के लिए कोई अपवाद नहीं: संविधान में सर्वोच्च न्यायालय के लिए ऐसा कोई राज्यपाल-स्तरीय अपवाद नहीं है; शीर्ष अदालत की आधिकारिक कार्यवाही की भाषा बदलने की एकमात्र शक्ति संसद के पास है।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा क्षेत्रीय भाषाओं को बढ़ावा देने की हालिया पहल
अदालत ने सुनवाई के दौरान उल्लेख किया कि तकनीक और अनुवाद के माध्यम से आम नागरिकों तक न्याय की पहुंच आसान बनाने के लिए प्रशासनिक सुधार लगातार लागू किए जा रहे हैं:
- हिंदी जन सूचना सेवा: 14 सितंबर (हिंदी दिवस) पर शीर्ष अदालत ने अपनी नई जन सूचना सेवा शुरू की, जिसके तहत महत्वपूर्ण फैसलों के सरल हिंदी सार (Summaries) तथा दैनिक 15 से 30 मिनट के ऑडियो व वीडियो बुलेटिन जारी किए जा रहे हैं।
- ई-एससीआर (e-SCR) और क्षेत्रीय भाषा अनुवाद: एआई-संचालित सॉफ्टवेयर (सुवास / SUVAS) के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय के हजारों ऐतिहासिक और समकालीन निर्णयों का हिंदी, तमिल, तेलुगु, बंगाली, गुजराती, मराठी, उड़िया सहित संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल कई भारतीय भाषाओं में अनुवाद कर आम जनता के लिए निशुल्क उपलब्ध कराया गया है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्र बनाम भारत संघ व अन्य [रिट याचिका (सिविल) / जनहित याचिका – भारत का सर्वोच्च न्यायालय]
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्र) की ओर से: निजी अधिवक्ता
- प्रासंगिक संवैधानिक प्रावधान:
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 348(1)(a) (सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों की कार्यवाही की अनिवार्य भाषा अंग्रेजी होना)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 348(2) (उच्च न्यायालयों में राष्ट्रपति की सहमति से हिंदी/स्थानीय भाषा के प्रयोग का प्रावधान)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 343 एवं 344 (संघ की राजभाषा एवं राजभाषा आयोग)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 32 (संवैधानिक उपचार और रिट का दायरा)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- मदुरै बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ एवं संतोष कुमार बनाम मानव संसाधन विकास मंत्रालय (1994, सुप्रीम कोर्ट) — ‘न्यायिक आदेशों के माध्यम से संसद को कानून बनाने या संविधान में संशोधन करने का परमादेश (Mandamus to Legislate) जारी नहीं किया जा सकता।’
- भाषाई धर्मनिरपेक्षता (Linguistic Secularism) का सिद्धांत — ‘विविध भाषाई पहचान वाले संघीय ढांचे में शीर्ष अदालत सभी क्षेत्रीय भाषाओं की गरिमा बनाए रखते हुए सर्वसमावेशी दृष्टिकोण अपनाएगी।’
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना (सर्वोच्च न्यायालय)
- अंतिम निर्णय: जनहित याचिका खारिज (PIL Dismissed); प्रशासनिक स्तर पर चल रहे सुधारों को जारी रखने की व्यवस्था।
Hindi Language: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ के न्यायाधीश | CJI सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची, न्यायमूर्ति वी. मोहाना |
| याचिकाकर्ता | ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्रा (Brahmeshwar Nath Mishra) |
| मुख्य मांग | केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट में हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाने हेतु आयोग गठित करने का निर्देश देना |
| कोर्ट का फैसला | याचिका खारिज; कहा कि भाषा संबंधी सुधार प्रशासनिक स्तर पर धीरे-धीरे लागू किए जा रहे हैं। |

