याचिकाकर्ता द्वारा मांगी गई प्रमुख कानूनी राहतें
- आपराधिक मुकदमा (Prosecution): लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 32 (Breach of Official Duty) के तहत CEC ज्ञानेश कुमार व अन्य अधिकारियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर आपराधिक कार्रवाई शुरू की जाए।
- एकतरफा फैसलों का रद्दीकरण: CEC और अन्य ECs अधिनियम, 2023 की धारा 18 (जिसमें स्पष्ट है कि मतभेद की स्थिति में बहुमत का फैसला मान्य होगा) का उल्लंघन करके लिए गए सभी निर्देशों को ‘अकृत और शून्य’ (Void Ab Initio) घोषित किया जाए।
- मूल Form 6 की बहाली: पंजीकरण नियमों (1960) के तहत मूल Form 6 को पुनर्स्थापित किया जाए और बिना किसी मनमानी शर्त के पात्र नागरिकों को वोटर बनाया जाए।
नई दिल्ली: भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयोग के वरिष्ठ उप-चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग और सूचना प्रौद्योगिकी (IT) महानिदेशक सीमा खन्ना के खिलाफ कानूनी व आपराधिक कार्रवाई की मांग को लेकर देश की शीर्ष अदालत में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है।
संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दायर
अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी द्वारा एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड (AoR) चांद कुरैशी के माध्यम से संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर इस याचिका में मांग की गई है कि मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा दोनों साथी आयुक्तों के बहुमत के बिना लिए गए सभी फैसलों को अधिकार-विहीन (Ultra Vires) और शून्य (Void ab initio) घोषित किया जाए। साथ ही, SIR प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूचियों से लगभग 13 करोड़ मतदाताओं के नाम काटे जाने की सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की निगरानी में न्यायिक आयोग या विशेष जांच दल (SIT) से फॉरेंसिक व तकनीकी जांच कराई जाए। याचिका में आरोप लगाया गया है कि निर्वाचन आयोग (ECI) के भीतर दोनों अन्य चुनाव आयुक्तों—डॉ. सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी—की लिखित असहमति (Dissent) और आपत्तियों को दरकिनार करते हुए मतदाता सूचियों के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (Special Intensive Revision – SIR) और सॉफ्टवेयर बदलावों से जुड़े एकतरफा, असंवैधानिक और मनमाने फैसले लिए गए।
याचिका में लगाए गए गंभीर आरोप एवं प्रमुख विधिक बिंदु
1. 10 महीनों में 14 बार औपचारिक असहमति (Written Dissents) की अनदेखी
याचिका में ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की हालिया खोजी रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया गया है कि आधिकारिक फाइलों के अनुसार:
- नवंबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच (10 महीनों की अवधि में), चुनाव आयुक्त डॉ. सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी ने कम से कम 14 अलग-अलग अवसरों पर (जिनमें एक ही दिन में 4 बार शामिल हैं) आयोग के नाम पर लिए जा रहे एकतरफा निर्णयों पर औपचारिक रूप से अपनी लिखित आपत्तियां और असहमति दर्ज कराईं।
- याचिकाकर्ता के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 (CEC & Other ECs Act, 2023) की धारा 18 के तहत बहु-सदस्यीय आयोग का कामकाज सर्वसम्मति या बहुमत की राय (Majority Opinion) से संचालित होना अनिवार्य है। दोनों आयुक्तों के विरोध के बावजूद एकतरफा आदेश पारित करना संविधान के अनुच्छेद 324(2) की बहुलवादी संस्थागत व्यवस्था (Plural Design) को नष्ट करता है।
2. युवा मतदाताओं के लिए ‘फॉर्म 6’ में मनमाना संशोधन: ‘अवैध और अनधिकृत’
- पूर्वजों के रिकॉर्ड की बाध्यता (Last SIR Linkage): याचिका में कहा गया है कि नए मतदाताओं या अपना निर्वाचन क्षेत्र बदलने वालों के लिए सांविधिक ‘फॉर्म 6’ (निर्वाचकों का रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 के तहत) में बिना किसी विधायी संशोधन के एकतरफा बदलाव कर दिया गया। युवा पहली बार के मतदाताओं के लिए “अंतिम SIR लिंकेज” (माता-पिता/पूर्वजों के रिकॉर्ड का मिलान) अनिवार्य शर्त बना दिया गया।
- चुनाव आयुक्त संधू की आपत्ति: 13 अगस्त 2026 को चुनाव आयुक्त संधू ने आधिकारिक नोट पर दर्ज किया कि यह बदलाव “पूरी तरह अनधिकृत और अवैध” (Unauthorised and illegal) है, जिससे नए युवा मतदाताओं का मनमाना उत्पीड़न हो रहा है, और इसे तत्काल वापस लेने का निर्देश दिया। इसके बावजूद सॉफ्टवेयर पोर्टल पर इसे लागू रखा गया।
3. सॉफ्टवेयर से ‘रोलबैक’ हटाना: गोवा के 97 वैध नागरिकों का मताधिकार छीनना
- याचिका में आरोप है कि निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों (EROs) के लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 13B, 22 और 23 के तहत प्रदत्त वैधानिक अधिकारों को छीनकर पूरे डेटाबेस प्रबंधन को दिल्ली में बैठे आईटी महानिदेशक (DG-IT) के अधीन केंद्रीकृत कर दिया गया।
- गोवा का मामला: न्यायिक निर्देशों के बाद गोवा के EROs ने जब 97 निष्कासित मतदाताओं को पूरी तरह पात्र और वैध पाया, तो ECINet सॉफ्टवेयर में जानबूझकर “रोलबैक/रिवर्सल” (Rollback) का विकल्प नहीं दिया गया। गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) द्वारा आयोग को 8 बार लिखित अनुरोध भेजे जाने के बावजूद आईटी डिवीजन ने रोलबैक शुरू नहीं किया, जिससे वे 97 नागरिक मताधिकार से वंचित रह गए।
4. पश्चिम बंगाल में 16.10 लाख “फर्जी/अनधिकृत” अपीलें
- याचिका में सनसनीखेज आरोप लगाया गया है कि पश्चिम बंगाल अपीलीय न्यायाधिकरणों के समक्ष नागरिकों के खिलाफ आयोग की ओर से 16.10 लाख अपीलें दायर की गईं।
- ये अपीलें उन मतदाताओं के नाम बहाल किए जाने के खिलाफ थीं जिन्हें न्यायिक अधिकारियों ने वैध पाया था।
- आयुक्त संधू का सवाल: अगस्त 2026 में चुनाव आयुक्त संधू ने लिखित रूप से पूछा: “ECI की ओर से इन अपीलों को दायर करने के लिए किसे अधिकृत किया गया था, और वास्तव में ECI की ओर से ये अपीलें किसने दायर कीं?” याचिका के अनुसार, न तो दोनों साथी आयुक्तों और न ही पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को इन अपीलों की कोई जानकारी या मंजूरी थी।
5. आईटी निगरानी संरचना बदलना और कैबिनेट सचिव को पत्र
- याचिका में कहा गया है कि वरिष्ठ उप-चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग ने आयोग की पूर्व मंजूरी के बिना एक प्रशासनिक आदेश जारी कर उप-चुनाव आयुक्त संजय कुमार को आईटी मामलों की निगरानी से हटा दिया।
- इस आदेश के कारण दोनों चुनाव आयुक्तों (संधू और जोशी) को सीधे कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन को पत्र लिखकर इस विधिक उल्लंघन पर हस्तक्षेप करने की मांग करनी पड़ी।
आपराधिक दायित्व और 2023 के कानून की धारा 16 की कानूनी व्याख्या
याचिकाकर्ता ने सीईसी को प्राप्त वैधानिक संरक्षण (Statutory Immunity) के संबंध में महत्वपूर्ण संवैधानिक व कानूनी दलीलें प्रस्तुत की हैं:
- धारा 16 का दायरा सीमित: मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 16 अदालतों को सीईसी के खिलाफ आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में किए गए कृत्यों पर कार्रवाई से रोकती है। परंतु, याचिका का तर्क है कि कानून और नियमों का जानबूझकर उल्लंघन कर मतदाता सूची में हेरफेर करना “आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन” के दायरे में नहीं आता।
- ‘उचित संबंध’ (Reasonable Nexus) का अभाव: सुप्रीम कोर्ट के फैसलों (उत्तर प्रदेश राज्य बनाम पारस नाथ सिंह और देवेंद्र सिंह बनाम भारत संघ) का हवाला देते हुए याचिका में कहा गया है कि पद किसी अपराध को वैधता प्रदान नहीं करता। जब अपराध और आधिकारिक कर्तव्य के बीच कोई विधिक संबंध नहीं रहता, तो BNSS, 2023 की धारा 218 (पूर्ववर्ती CrPC 197) के तहत पूर्व अभियोजन मंजूरी (Prior Sanction) की आवश्यकता भी समाप्त हो जाती है।
- धारा 32 RPA के तहत संज्ञान: मतदाता सूची से जानबूझकर छेड़छाड़ करना लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 32 (आधिकारिक कर्तव्य के उल्लंघन हेतु दंड) और भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत एक संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) है, जिसके लिए सीईसी व दोषी अधिकारियों पर सीधे प्राथमिकी दर्ज होनी चाहिए।
याचिका में की गई मुख्य प्रार्थनाएं (Prayers Before Supreme Court)
- सीईसी ज्ञानेश कुमार द्वारा साथी आयुक्तों की सहमति या बहुमत की राय के बिना लिए गए सभी फैसलों, दिशा-निर्देशों और सॉफ्टवेयर बदलावों को असंवैधानिक व शून्य (Void ab initio) घोषित किया जाए।
- सीईसी ज्ञानेश कुमार, सीनियर डीईसी मनीष गर्ग, आईटी डीजी सीमा खन्ना और अन्य संबंधित अधिकारियों के खिलाफ लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 32 के तहत आपराधिक अभियोजन (Criminal Prosecution) शुरू करने का निर्देश दिया जाए।
- 13 करोड़ मतदाताओं के नाम काटे जाने की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में और आईआईटी के स्वतंत्र साइबर/आईटी विशेषज्ञों से युक्त एक उच्चाधिकार प्राप्त न्यायिक जांच आयोग या एसआईटी (SIT) गठित की जाए।
- मूल सांविधिक ‘फॉर्म 6’ को बहाल किया जाए और पहली बार पंजीकरण कराने वाले युवाओं से “पूर्वजों के रिकॉर्ड/लास्ट एसआईआर” की अवैध शर्त को तत्काल हटाया जाए।
- गोवा के 97 पात्र नागरिकों के नाम ECINet में रोलबैक फीचर सक्रिय कर तुरंत जोड़े जाएं।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: शैलेंद्र मणि त्रिपाठी (अधिवक्ता) बनाम भारत संघ, विधि एवं न्याय मंत्रालय, भारत निर्वाचन आयोग, सीईसी ज्ञानेश कुमार, कैबिनेट सचिव व अन्य [रिट याचिका (सिविल) – भारत का सर्वोच्च न्यायालय]
- याचिकाकर्ता के अधिवक्ता: अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी (द्वारा AoR चांद कुरैशी)
- प्रासंगिक कानून एवं संवैधानिक प्रावधान:
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 32, अनुच्छेद 19(1)(a), और अनुच्छेद 324 (चुनाव आयोग का अधीक्षण व बहु-सदस्यीय ढांचा)
- मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें एवं कार्यावधि) अधिनियम, 2023 की धारा 16 (सिविल/आपराधिक संरक्षण का दायरा) एवं धारा 18 (बहुमत से निर्णय का सिद्धांत)
- लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 32 (आधिकारिक कर्तव्य के उल्लंघन हेतु अभियोजन) तथा धारा 13B, 22 एवं 23 (EROs के वैधानिक अधिकार)
- निर्वाचकों का रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 (Registration of Electors Rules, 1960) — फॉर्म 6 का सांविधिक प्रारूप
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 218 / पूर्ववर्ती CrPC धारा 197 (अभियोजन मंजूरी का परीक्षण)
- संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
- टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ (1995, सुप्रीम कोर्ट 5-जज संविधान पीठ) — ‘चुनाव आयोग एक बहु-सदस्यीय संस्था (Multi-member body) है जहां मुख्य चुनाव आयुक्त केवल “समानों में प्रथम” (Primus inter pares) हैं; निर्णय बहुमत की राय से ही लिए जा सकते हैं, मुख्य चुनाव आयुक्त अकेले संस्था नहीं हैं।’
- अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (2023, सुप्रीम कोर्ट 5-जज संविधान पीठ) — ‘चुनाव आयोग की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और संस्थागत शुचिता संविधान के मूल ढांचे (Basic Structure) का अभिन्न अंग है।’
- उत्तर प्रदेश राज्य बनाम पारस नाथ सिंह (2009, सुप्रीम कोर्ट) — ‘पब्लिक सर्वेंट द्वारा अपने आधिकारिक पद का दुरुपयोग कर किया गया गैर-कानूनी आचरण वैधानिक संरक्षण के दायरे में नहीं आता।’
Election Commission-V: मामले का विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| याचिकाकर्ता | अधिवक्ता शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी (प्रतिनिधित्व: वकील चंद कुरैशी) |
| प्रतिवादी | CEC ज्ञानेश कुमार, ECI, केंद्र सरकार, मनीष गर्ग (DEC-IT) और सीमा खन्ना (DG-IT) |
| मुख्य मांग | CEC के खिलाफ RP Act की धारा 32 के तहत आपराधिक केस; 13 करोड़ वोटरों के कटने की SIT/न्यायिक जांच |
| मुख्य आधार | CEC और अन्य आयुक्तों अधिनियम, 2023 की धारा 18 (बहुमत का सिद्धांत) का उल्लंघन |

