Sunday, September 27, 2026
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Muslim Personal Law: विवाह से बच्चे की उम्र नहीं बढ़ती; जो 16 साल की थी वह निकाह के बाद भी 16 साल की ही रहेगी; POCSO FIR रद्द करने से इनकार

हाईकोर्ट का मुख्य कानूनी विश्लेषण

  1. शादी से बच्चे की उम्र नहीं बढ़ती: न्यायालय ने बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहा:“सरल शब्दों में, विवाह करने से किसी बच्चे की उम्र नहीं बढ़ जाती। जो व्यक्ति शादी के पहले 16 साल का था, वह शादी के बाद भी 16 साल का ही रहता है। POCSO और BNS की धारा 63 के लिए यही तथ्य शारीरिक संबंध की सहमति देने की कानूनी क्षमता तय करता है।”
  2. सिविल वैधता बनाम आपराधिक दायित्व: कोर्ट ने विवाह की नागरिक वैधता (Civil Validity) और नाबालिग के साथ शारीरिक संबंध के आपराधिक परिणामों (Criminal Liability) के बीच अंतर स्पष्ट किया। भले ही पर्सनल लॉ के तहत निकाह को वैध माना जाए, फिर भी 18 साल से कम उम्र के बच्चे के साथ शारीरिक संबंध POCSO के तहत यौन अपराध ही माना जाएगा।
  3. सहमति (Consent) का कोई महत्व नहीं: POCSO अधिनियम 18 वर्ष से कम आयु के प्रत्येक व्यक्ति को ‘बच्चा’ मानता है और बच्चे के साथ पेनिट्रेटिव यौन संबंध को अपराध घोषित करता है — चाहे इसमें बच्चे की सहमति हो या न हो। BNS की धारा 63 में भी वैवाहिक दुष्कर्म की छूट केवल उन पत्नियों पर लागू होती है जिनकी उम्र 18 वर्ष या उससे अधिक हो।
  4. संसद की मंशा: अदालत ने कहा कि यदि पर्सनल लॉ को छूट दी गई, तो यह न्यायिक फैसले के जरिए एक ऐसा अपवाद बनाने जैसा होगा जिसे संसद ने कानून बनाते समय स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया था।

नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत होने वाले बाल विवाह (Child Marriage) और पॉक्सो (POCSO) तथा भारतीय न्याय संहिता (BNS) के आपराधिक दायित्वों के टकराव पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधिक निर्णय सुनाया है। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट व्यवस्था दी है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत वैध माना जाने वाला निकाह भी किसी पुरुष को 18 वर्ष से कम आयु की नाबालिग पत्नी के साथ शारीरिक संबंध बनाने पर आपराधिक अभियोजन से कोई संरक्षण या कानूनी उन्मुक्ति (Immunity) प्रदान नहीं कर सकता। अदालत ने जोर देकर कहा कि पर्सनल लॉ के नियम संसद द्वारा बनाए गए विशेष धर्मनिरपेक्ष कानूनों—POCSO Act, 2012 और BNS, 2023—के सुरक्षात्मक प्रावधानों को निष्प्रभावी नहीं कर सकते।

न्यायमूर्ति संजीव नरूला की एकल पीठ ने आरोपी पति और उसकी नाबालिग पत्नी द्वारा संयुक्त रूप से दायर उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें BNS की धारा 64(1) और POCSO कानून की धारा 6 के तहत दर्ज आपराधिक मामले (FIR) को रद्द करने की मांग की गई थी। इसके साथ ही अदालत ने पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई और कथित उत्पीड़न के लिए मुआवजे की प्रार्थना को भी सिरे से नामंजूर कर दिया।

उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं अवलोकन

1. ‘संसद द्वारा अस्वीकृत अपवाद को अदालत न्यायिक आदेश से नहीं जोड़ सकती’ न्यायमूर्ति संजीव नरूला ने पर्सनल लॉ बनाम वैधानिक आपराधिक कानून की प्राथमिकता को स्पष्ट करते हुए अपने आदेश में कहा: “मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत वैध होने का दावा किया गया विवाह, केवल उस स्थिति के कारण, प्रासंगिक समय पर 18 वर्ष से कम आयु की पत्नी के साथ शारीरिक संबंध बनाने के लिए POCSO या BNS से कोई उन्मुक्ति प्रदान नहीं कर सकता। कोई भी अन्य दृष्टिकोण अपनाना न्यायिक निर्णय के माध्यम से एक ऐसा अपवाद (Judicial Exception) गढ़ना होगा जिसे संसद ने स्पष्ट रूप से बहिष्कृत कर दिया है।”

2. ‘विवाह से बच्चे की उम्र नहीं बढ़ती’: सहमति का तर्क खारिज

  • याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि निकाह दोनों परिवारों की सहमति से हुआ था, लड़की यौवन (Puberty) प्राप्त कर चुकी थी और उसने शारीरिक संबंधों के लिए अपनी स्वतंत्र सहमति दी थी।
  • अदालत ने सहमति के तर्क को खारिज करते हुए विधिक स्थिति को स्पष्ट किया:“सीधे शब्दों में कहें तो विवाह से किसी बच्चे की उम्र आगे नहीं बढ़ जाती। जो व्यक्ति निकाह की रस्म से पहले सोलह वर्ष का था, वह रस्म के बाद भी सोलह वर्ष का ही रहता है। पॉक्सो अधिनियम और बीएनएस की धारा 63 के लिए, यह तथ्य ही शारीरिक संबंध की सहमति देने की कानूनी क्षमता (Legal Capacity) को निर्धारित करने वाला निर्णायक तत्व है।”

3. निकाह की दीवानी वैधता (Civil Validity) बनाम यौन संबंध के आपराधिक परिणाम

  • अदालत ने निकाह की दीवानी वैधता और नाबालिग के साथ यौन संबंध के आपराधिक परिणामों के बीच एक स्पष्ट विधिक अंतर खींचा।
  • उच्च न्यायालय ने रेखांकित किया कि भले ही मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत यौवन प्राप्त करने के बाद किए गए निकाह को सिविल दृष्टि से मान लिया जाए, परंतु यह POCSO या BNS के तहत अपराध के गठन को नहीं रोक सकता।
  • सख्त वैधानिक दायरा: पॉक्सो कानून 18 वर्ष से कम आयु के प्रत्येक व्यक्ति को ‘बच्चा’ (Child) मानता है और सहमति के अस्तित्व को पूरी तरह अप्रासंगिक मानते हुए प्रवेशन लैंगिक हमले (Penetrative Sexual Assault) को संज्ञेय अपराध बनाता है। इसी प्रकार, BNS की धारा 63 दुष्कर्म की परिभाषा में वैवाहिक अपवाद (Marital Exception) को केवल 18 वर्ष या उससे अधिक आयु की पत्नी तक ही सीमित रखती है।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि

  • विवाह और गर्भावधि: घटना के समय लड़की की आयु मात्र 16 वर्ष 3 महीने थी, जबकि पुरुष की आयु 28 वर्ष थी। दोनों ने निकाह किया और साथ रहने लगे, जिसके बाद लड़की गर्भवती हो गई।
  • अस्पताल में आयु का खुलासा: गर्भावस्था के दौरान जब लड़की नियमित चिकित्सकीय जांच के लिए एक सरकारी अस्पताल गई, तो डॉक्टरों ने उसकी आयु 18 वर्ष से कम पाई। बाल विवाह और नाबालिग की गर्भावस्था की सूचना अनिवार्य वैधानिक रिपोर्टिंग के तहत पुलिस को दी गई।
  • FIR का पंजीकरण: पुलिस ने कानून के अनुपालन में पति के खिलाफ BNS की धारा 64(1) (दुष्कर्म की सजा) और POCSO Act की धारा 6 (गंभीर प्रवेशन लैंगिक हमला) के तहत प्राथमिकी दर्ज की।
  • याचिकाकर्ताओं का रुख: दंपती ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाकर दलील दी कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत 15 वर्ष या यौवन प्राप्त मुस्लिम लड़की अपनी मर्जी से निकाह करने के लिए सक्षम है; अतः विवाह के बाद बने शारीरिक संबंध आपराधिक दायित्व के दायरे में नहीं आते। पत्नी ने स्वयं पति की जमानत का समर्थन किया और गर्भावस्था में उसकी मौजूदगी की गुहार लगाई, परंतु अदालत ने कानून के कठोर प्रावधानों के मद्देनजर राहत देने से इनकार कर दिया।

विभिन्न उच्च न्यायालयों की न्यायिक स्थिति और विधिक संघर्ष

यह निर्णय बाल अधिकारों और पर्सनल लॉ के बीच चल रहे राष्ट्रीय विधिक विमर्श में एक मजबूत मिसाल जोड़ता है:

  • केरल हाईकोर्ट का दृष्टिकोण (समान मत): केरल उच्च न्यायालय ने भी वर्ष 2026 में स्पष्ट रूप से माना था कि पर्सनल लॉ के तहत नाबालिग से निकाह पॉक्सो कानून के तहत आपराधिक अभियोजन से बचने की कोई ढाल (No Shield) नहीं है।
  • पूर्व निर्णयों से भिन्नता:
    • वर्ष 2022 में दिल्ली उच्च न्यायालय की एक अन्य पीठ ने एक मामले में यह विपरीत दृष्टिकोण अपनाया था कि वैध मुस्लिम निकाह के बाद नाबालिग पत्नी और पति के बीच बने शारीरिक संबंध में पॉक्सो आकर्षित नहीं हो सकता।
    • वर्ष 2022 में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने व्यवस्था दी थी कि 15 वर्ष से अधिक आयु की मुस्लिम लड़की पर्सनल लॉ के तहत निकाह के लिए सक्षम है, हालांकि उस फैसले में पॉक्सो की कानूनी प्रयोज्यता पर कोई प्रत्यक्ष विधिक टिप्पणी नहीं की गई थी।
  • न्यायमूर्ति संजीव नरूला के वर्तमान फैसले ने यह स्थापित किया है कि POCSO एक विशेष कानून (Special Law) है जो किसी भी पर्सनल लॉ पर सर्वोपरि (Overriding Effect) रहेगा।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: बिलाल व अन्य बनाम राज्य (NCT दिल्ली), थाना प्रभारी (SHO) के माध्यम से व अन्य [आपराधिक विविध (मेन) – दिल्ली उच्च न्यायालय]
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • याचिकाकर्ताओं (दंपती) की ओर से: अधिवक्ता अवनीश सिंह, महेंद्र विक्रम सिंह एवं सूरज शर्मा
    • राज्य (NCT दिल्ली) की ओर से: अतिरिक्त लोक अभियोजक राहुल त्यागी (साथ में अधिवक्ता संगीत सिबोऊ, प्रिया राय, नेहा घुघत्याल, अजय जांगड़ा, अविनाश कुमार सिंह, प्रियांश राज सिंह)
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
    • लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act) की धारा 2(1)(d) (बच्चे की परिभाषा – 18 वर्ष से कम), धारा 5/6 (गंभीर प्रवेशन लैंगिक हमला) एवं धारा 42A (कानून का अध्यारोही प्रभाव / Overriding Effect)
    • भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 63 (दुष्कर्म की परिभाषा व 18 वर्ष से कम आयु पर वैवाहिक अपवाद की समाप्ति) एवं धारा 64(1)
    • बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 (PCMA) की धारा 3 व 12
    • मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) अनुप्रयोग अधिनियम, 1937
  • संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
    • इंडिपेंडेंट थॉट बनाम भारत संघ (2017, सुप्रीम कोर्ट 2-जज पीठ) — ‘सर्वोच्च न्यायालय ने आईपीसी की धारा 375 के अपवाद 2 को निरस्त करते हुए स्पष्ट किया था कि 18 वर्ष से कम आयु की पत्नी के साथ शारीरिक संबंध दुष्कर्म है; किसी भी धर्म या सामाजिक मान्यता के आधार पर बालिकाओं के शारीरिक शोषण को छूट नहीं दी जा सकती।’
    • एक्स बनाम महाराष्ट्र राज्य (सुप्रीम कोर्ट) — ‘पॉक्सो अधिनियम एक विशेष और लैंगिक-तटस्थ संरक्षण कानून है; इसमें बच्चे की सहमति विधि की दृष्टि में पूर्णतः शून्य (Non-est) है।’
  • पीठ: न्यायमूर्ति संजीव नरूला (दिल्ली उच्च न्यायालय)
  • अंतिम आदेश: प्राथमिकी (FIR) रद्द करने, पुलिस पर कार्रवाई और मुआवजे की याचिका पूरी तरह खारिज।

Muslim Personal Law: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतदिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court)
न्यायाधीशन्यायमूर्ति संजीव नरुला (Justice Sanjeev Narula)
मामला/पक्षकारबिलाल व अन्य बनाम राज्य (एनसीटी दिल्ली)
प्रासंगिक कानूनBNS की धारा 63 व 64(1) और POCSO एक्ट की धारा 6
मुख्य निष्कर्षशादी से नाबालिग की उम्र नहीं बदल जाती; 18 वर्ष से कम उम्र की पत्नी के साथ शारीरिक संबंध POCSO के तहत अपराध ही रहेगा।
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