हाईकोर्ट की मुख्य व तीखी टिप्पणियां
- न्यायपालिका की गरिमा को नुकसान: खंडपीठ ने तल्ख लहजे में कहा:“इस तरह की प्रक्रियात्मक देरी इस संस्था की गरिमा को गंभीर रूप से ठेस पहुंचाती है और अदालत को एक नौकरशाही सूचना केंद्र (Bureaucratic Information Booth) के स्तर पर ला देती है। यह हमें न्याय करने वाले जजों के रूप में कम, और एक इंक्वायरी काउंटर पर बैठने वाले ‘ग्लोरिफाइड क्लर्क’ के रूप में काम करने पर मजबूर करती है।”
- अनौपचारिक व्यवस्था और प्रक्रियात्मक कमी: जब कोर्ट ने संबंधित सेक्शन ऑफिसर और रजिस्ट्रार को बुलाया, तो उन्होंने बताया कि वकीलों को पेपर बुक तैयार होने पर फोन से सूचना दी जाती है, लेकिन इसका कोई आधिकारिक रिकॉर्ड दर्ज नहीं होता। कोर्ट ने पाया कि इलाहाबाद हाईकोर्ट नियमों में ऐसा कोई नियम नहीं है कि वकीलों को पेपर बुक तैयार होने की आधिकारिक सूचना दी जाए।
हाईकोर्ट का सुधारात्मक प्रस्ताव
अदालत का समय बर्बाद होने से बचाने के लिए खंडपीठ ने सक्षम समिति (Competent Committee) से सिफारिश की है कि:
- साप्ताहिक अधिसूचना (Weekly Notification): हाईकोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर हर हफ्ते एक सूची जारी की जाए, जिसमें बताया जाए कि किन-किन आपराधिक अपीलों की ‘पेपर बुक’ तैयार हो चुकी है।
- संग्रह की समय-सीमा: वकीलों को पेपर बुक एकत्र करने के लिए एक निश्चित समय दिया जाए और वह अवधि पूरी होने के बाद ही मामलों को अंतिम सुनवाई के लिए सूचीबद्ध (List) किया जाए।
प्रयागराज: आपराधिक अपीलों (Criminal Appeals) की सुनवाई में वकीलों द्वारा “पेपर बुक (Paper Book) न मिलने” या “तैयार होने की जानकारी न होने” का आधार लेकर बार-बार तारीख लेने (Adjournment Culture) की बढ़ती प्रवृत्ति पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गहरा आक्रोश और चिंता व्यक्त की है।
न्यायमूर्ति सलिल कुमार राय और न्यायमूर्ति पदम नारायण मिश्रा की खंडपीठ ने वर्ष 2023 की दो संबद्ध आपराधिक अपीलों की सुनवाई के दौरान यह गंभीर अवलोकन दर्ज किया। अदालत ने पाया कि सुनवाई के लिए सूचीबद्ध होने वाली लगभग 80 प्रतिशत अपीलों में वकील केवल इसी एक आधार पर स्थगन की मांग करते हैं। हाईकोर्ट ने दो-टूक कहा कि इस लचर परिपाटी के चलते न्यायिक समय की भारी बर्बादी (Gross Wastage of Judicial Time) हो रही है। अदालत ने आत्ममंथन करते हुए बेहद तल्ख टिप्पणी की कि इस व्यवस्था ने न्याय की सर्वोच्च पीठ को एक “नौकरशाही सूचना बूथ” (Bureaucratic Information Booth) बनाकर रख दिया है, जहां जजों को न्यायिक कार्य करने के बजाय किसी पूछताछ काउंटर पर बैठे “महिमामंडित क्लर्क” (Glorified Clerks) की तरह काम करने के लिए विवश होना पड़ रहा है।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं तल्ख टिप्पणियां
1. ‘अदालत को इनक्वायरी काउंटर और जजों को क्लर्क बना दिया गया है’ न्यायमूर्ति सलिल कुमार राय और न्यायमूर्ति पदम नारायण मिश्रा की पीठ ने न्यायिक संस्था की घटती गरिमा और कार्यप्रणाली पर पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा: “इस प्रकार की कार्यवाहियों की प्रकृति इस संस्था की गरिमा को गंभीर रूप से क्षत-विक्षत (Grievously Erodes) करती है, जिससे कानून की एक अदालत वस्तुतः एक नौकरशाही सूचना बूथ (Bureaucratic Information Booth) के स्तर पर सिमट कर रह जाती है। यह हमें न्यायनिर्णयन के पावन कर्तव्य से संपन्न न्यायाधीशों के रूप में कम, और किसी पूछताछ काउंटर पर पीठासीन ‘महिमामंडित क्लर्कों’ (Glorified Clerks) के रूप में अधिक कार्य करने के लिए विवश करती है।”
2. 80% अपीलों में एक ही ढर्रा: ‘पेपर बुक नहीं मिली’ का बहाना
- खंडपीठ ने व्यापक समस्या को रेखांकित करते हुए दर्ज किया:“अंतिम सुनवाई के लिए सूचीबद्ध होने वाली 80% आपराधिक अपीलों में अपीलकर्ता के वकील केवल इसी आधार पर स्थगन की मांग करते हैं कि उन्हें पेपर बुक प्राप्त नहीं हुई है अथवा उन्हें इस बात की कोई सूचना नहीं थी कि पेपर बुक तैयार हो चुकी है।”
- अदालत ने यह भी नोट किया कि कई गंभीर मामलों में पेपर बुक तीन से चार वर्ष पूर्व ही तैयार होकर कार्यालय में रखी रहती है, लेकिन जब अपील सुनवाई पर आती है, तो वकील बड़े सहज भाव से कह देते हैं कि उन्हें प्रति नहीं मिली है।
3. वर्तमान मामले का विरोधाभास
- पीठ ने स्पष्ट किया कि वह वकील पर कोई व्यक्तिगत लांछन नहीं लगा रही है, लेकिन परिस्थितियों को देखते हुए यह विश्वास करना कठिन है कि उन्हें जानकारी नहीं थी।
- दोनों अपीलें 21 जुलाई 2026 को सूचीबद्ध हुई थीं और उस तारीख तक रजिस्ट्री द्वारा पेपर बुक तैयार कर ली गई थी।
- जब 5 अगस्त को सुनवाई हुई, तो वकील ने अनभिज्ञता जताते हुए स्थगन मांग लिया। अदालत ने माना कि जानकारी न होने की यह दलील केवल “आज मामले को टालने का एक बहाना मात्र” (Only an excuse to get the matter adjourned) प्रतीत होती है।
रजिस्ट्री की अनौपचारिक व्यवस्था और प्रक्रियात्मक खामियां
सुनवाई के दौरान अदालत ने संबंधित अनुभाग अधिकारी (Section Officer) और रजिस्ट्रार को तलब कर पूरी प्रक्रिया की पड़ताल की:
- फोन कॉल की मौखिक व्यवस्था: अधिकारियों ने पीठ को बताया कि पेपर बुक तैयार होने के बाद वकीलों को फोन पर सूचित किया जाता है।
- कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं: अदालत ने पाया कि वकीलों को फोन करने या उन्हें सूचना देने का कोई आधिकारिक रजिस्टर या दस्तावेजी रिकॉर्ड नहीं रखा जाता।
- नियमों में शून्य: पीठ ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय नियमावली (High Court Rules) का अवलोकन किया और पाया कि ऐसा कोई बाध्यकारी नियम मौजूद नहीं है जो रजिस्ट्री या अनुभाग को यह निर्देश दे कि वह कॉज लिस्ट (Cause List) में या आधिकारिक वेबसाइट पर सार्वजनिक नोटिस प्रकाशित कर वकीलों को सूचित करे कि अमुक आपराधिक अपील की पेपर बुक तैयार है और कार्यालय से प्राप्त की जा सकती है।
न्यायिक समय बचाने हेतु हाईकोर्ट के सुधारात्मक सुझाव (Pro-active Reforms)
अदालत ने इस प्रशासनिक खामी को दूर करने और न्यायिक समय की बर्बादी रोकने के लिए सक्षम नियम समिति (Rules Committee) को निम्नलिखित ठोस कदम उठाने का अनुरोध किया:
- हाईकोर्ट रूल्स में संशोधन या प्रशासनिक आदेश: संबंधित नियम समिति या तो उच्च न्यायालय नियमावली में संशोधन करे अथवा एक ऐसा प्रशासनिक आदेश जारी करे जिसके तहत रजिस्ट्री का संबंधित अनुभाग एक साप्ताहिक अधिसूचना (Weekly Notification) जारी करने के लिए बाध्य हो।
- वेबसाइट और कॉज लिस्ट में सार्वजनिक सूचना: यह साप्ताहिक अधिसूचना उच्च न्यायालय की आधिकारिक वेबसाइट और दैनिक कॉज लिस्ट में स्पष्ट रूप से प्रकाशित की जाए, जिसमें उन सभी अपीलों की सूची हो जिनकी पेपर बुक तैयार हो चुकी है।
- संग्रहण अवधि के बाद ही हो लिस्टिंग: आपराधिक अपीलों को अदालत के समक्ष सुनवाई हेतु केवल तभी सूचीबद्ध किया जाए जब वकीलों द्वारा पेपर बुक एकत्र करने के लिए निर्धारित वैधानिक समय-सीमा समाप्त हो चुकी हो।
- पीठ ने कहा कि यह सक्रिय कदम अदालत को गुण-दोष (Merits) के आधार पर अपीलों का फैसला करने में सक्षम बनाएगा और तारीख लेने की इस बहानेबाजी पर पूरी तरह विराम लगाएगा।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: आपराधिक अपील संख्या 2023 (संबद्ध अपीलें) – इलाहाबाद उच्च न्यायालय, प्रयागराज
- प्रासंगिक कानून एवं अदालती नियमावली:
- इलाहाबाद उच्च न्यायालय नियमावली, 1952 (Allahabad High Court Rules, 1952) के सुसंगत अध्याय (आपराधिक अपीलों की तैयारी, पेपर बुक तैयार करने और पक्षकारों को तामीली की प्रक्रिया)
- दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 374 एवं 385 / BNSS, 2023 की धारा 415 एवं 426 (आपराधिक अपीलों की प्रक्रिया, अभिलेख मंगाना और सुनवाई)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 21 (त्वरित न्याय का अधिकार – अपीलों में अनावश्यक स्थगन से जेल में बंद दोषियों व पीड़ितों दोनों के अधिकारों का हनन)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- रमेश चंद्र बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (सुप्रीम कोर्ट) — ‘आपराधिक अपीलों में अभिलेख (Paper Book) की अनुपलब्धता के कारण होने वाला अनावश्यक विलंब न्याय प्रक्रिया का उपहास है; उच्च न्यायालयों को पेपर बुक तैयार करने और तामील कराने की पारदर्शी डिजिटल प्रणाली अपनानी चाहिए।’
- हुसैन बनाम भारत संघ (2017, सुप्रीम कोर्ट) — ‘पुरानी आपराधिक अपीलों का समयबद्ध निस्तारण अदालत का प्राथमिक कर्तव्य है; अनावश्यक स्थगन स्वीकार करना न्यायिक अनुशासन के विपरीत है।’
- पीठ: न्यायमूर्ति सलिल कुमार राय और न्यायमूर्ति पदम नारायण मिश्रा (इलाहाबाद उच्च न्यायालय)
- अंतिम आदेश: कड़ी टिप्पणियों के बावजूद वकील के अनुरोध पर मामले को उस दिन के लिए स्थगित कर सामान्य क्रम (Ordinary Course) में सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया; सक्षम समिति को व्यवस्था सुधारने हेतु सिफारिश प्रेषित।
Glorified Clerks: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) |
| पीठ | न्यायमूर्ति सलिल कुमार राय एवं न्यायमूर्ति पदम नारायण मिश्रा |
| समस्या | आपराधिक अपीलों में 80% मामलों में “पेपर बुक न मिलने” का बहाना बनाकर सुनवाई टालना। |
| हाईकोर्ट की टिप्पणी | “यह व्यवस्था न्यायपालिका की गरिमा को गिराती है और जजों को इंक्वायरी काउंटर के क्लर्क जैसा बना देती है।” |
| प्रस्तावित समाधान | वेबसाइट पर साप्ताहिक नोटिफिकेशन जारी कर आधिकारिक रूप से पेपर बुक तैयार होने की सूचना देना। |

