Monday, September 28, 2026
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NI Act: वकील कोई यांत्रिक एजेंट नहीं बल्कि अदालत का अधिकारी होता है; वकील के बयानों से मुकरना न्यायिक व्यवस्था में अराजकता लाएगा, चेक बाउंस केस पढ़ें

हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी सिद्धांत

  1. वकील का स्थान और वकालतनामा: हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि वकील कोई केवल मैकेनिकल एजेंट नहीं होता, बल्कि वह ‘Officer of the Court’ (अदालत का अधिकारी) होता है, जो बैंक द्वारा निष्पादित वैध वकालतनामा के तहत काम करता है।
  2. देरी और वकील पर कोई कार्रवाई न करना: अदालत ने नोट किया कि बैंक ने 13 महीने की लंबी देरी के बाद यह मुद्दा उठाया। इसके अलावा, बैंक ने उस वकील के खिलाफ न तो कोई विभागीय/कानूनी कार्यवाही शुरू की और न ही उससे इस संबंध में कोई स्पष्टीकरण मांगा।
  3. अराजकता की स्थिति (Chaotic Situation) का खतरा: न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी ने कहा:“यदि किसी पक्षकार को अपने वकील द्वारा दिए गए बयानों से बाद में मुकरने की अनुमति दे दी गई, तो इससे अदालती कार्यवाही में भारी अराजकता की स्थिति पैदा हो जाएगी और वकील-क्लाइंट के रिश्ते व न्यायिक प्रक्रिया पर से जनता का विश्वास उठ जाएगा।”

नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (NI Act) की धारा 138 के तहत चेक बाउंस मामलों, राष्ट्रीय लोक अदालत के समझौतों (Lok Adalat Awards) की विधिक बाध्यकारिता और वकील तथा मुवक्किल (Advocate-Client Relationship) के बीच प्राधिकार की सीमाओं पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधिक फैसला सुनाया है।

इक्विटास स्मॉल फाइनेंस बैंक लिमिटेड की रिट याचिका खारिज

न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी की एकल पीठ ने इक्विटास स्मॉल फाइनेंस बैंक लिमिटेड (Equitas Small Finance Bank Ltd.) द्वारा दायर रिट याचिका को खारिज करते हुए मजिस्ट्रेट अदालत द्वारा कंपाउडिंग (समझौता) के आधार पर आरोपियों को बरी करने और 14 सितंबर 2024 के लोक अदालत अवार्ड को रद्द कर चेक बाउंस शिकायत बहाल करने की मांग को सिरे से ठुकरा दिया। अदालत ने रेखांकित किया कि वकील केवल एक “यांत्रिक एजेंट” नहीं होता बल्कि वह “अदालत का अधिकारी” (Officer of the Court) होता है, जिसके द्वारा दिए गए बयानों के आधार पर पारित न्यायिक आदेशों से मुकरने की अनुमति देने पर पूरी न्याय प्रणाली में अराजक स्थिति (Chaotic Situation) पैदा हो जाएगी। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट व्यवस्था दी है कि जब किसी पक्षकार के विधिवत नियुक्त वकील ने मजिस्ट्रेट अदालत और राष्ट्रीय लोक अदालत दोनों मंचों पर स्वेच्छा से यह बयान दे दिया हो कि “मामला पूरी तरह सुलझ गया है और पूरा भुगतान प्राप्त हो चुका है”, तो बैंक महीनों बाद यह दावा करके मामले को पुनर्जीवित (Revive) नहीं करा सकता कि उसके तत्कालीन वकील ने निर्देशों को गलत समझ लिया था या उसके पास समझौता करने का अधिकार नहीं था।

उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं अवलोकन

1. ‘दो मंचों पर दिए गए बयानों के बाद नई कहानी गढ़ने की अनुमति नहीं दी जा सकती’ न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी ने बैंक द्वारा 13 महीने के भारी विलंब के बाद उठाए गए तकनीकी बहानों पर तीखा प्रहार करते हुए कहा: “परिणामस्वरूप, याचिकाकर्ता बैंक को अब वर्तमान याचिका के माध्यम से दो अलग-अलग मंचों के समक्ष दिए गए स्वैच्छिक और निर्विवाद बयानों से बचने के लिए एक नई कहानी (New Version) पेश करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। वह भी तब, जब विद्वान जेएमएफसी के समक्ष 13 महीने के लंबे अंतराल के बाद यह कदम उठाया गया और उसके बाद इस न्यायालय के समक्ष 9 महीने से अधिक के अतिरिक्त अंतराल के बाद याचिका दाखिल की गई।”

2. वकील महज एजेंट नहीं, बल्कि अदालत का अधिकारी (Officer of the Court) है

  • अदालत ने वकील-मुवक्किल संबंध और वकालतनामे के विधिक महत्व को रेखांकित करते हुए कहा:
    • वकील के पास बैंक द्वारा हस्ताक्षरित विधिवत निष्पादित वकालतनामा (Vakalatnama) मौजूद था।
    • एक अधिवक्ता मात्र मुवक्किल का कोई निर्जीव यांत्रिक एजेंट (Mere Mechanical Agent) नहीं होता, बल्कि वह अदालत का एक जिम्मेदार अधिकारी होता है।
    • अदालतें न्यायिक कार्यवाहियों के निष्पादन में वकीलों द्वारा दिए गए आधिकारिक बयानों पर भरोसा करती हैं। यदि पक्षकारों को बाद में यह कहकर आदेशों से पलटने की छूट दी गई कि “वकील के पास निर्देश नहीं थे”, तो न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता ही समाप्त हो जाएगी।

3. वकील पर कोई कार्रवाई न करना बैंक की दलीलों पर संदेह पैदा करता है

  • उच्च न्यायालय ने इस तथ्य को अत्यंत महत्वपूर्ण माना कि बैंक ने उस तत्कालीन वकील (शमीम सैफी) के खिलाफ न तो बार काउंसिल में कोई अनुशासनात्मक शिकायत दर्ज कराई, न कोई कानूनी कार्यवाही की और न ही इस तथाकथित गलतबयानी पर उससे कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण मांगा।
  • बैंक की अपनी दलीलों में अंतर्विरोध था: एक तरफ बैंक ने दावा किया कि कोई भुगतान नहीं हुआ, तो दूसरी तरफ यह कहा कि उसने मौखिक अनुरोध पर भुगतान का अवसर दिया था और आरोपी बाद में अपने वादे से मुकर गए।

4. लोक अदालत अवार्ड की अंतिमता और आपराधिक अदालत द्वारा पुनरीक्षण की मनाही

  • लीगल सर्विसेज अथॉरिटीज एक्ट, 1987 की धारा 21 के तहत लोक अदालत द्वारा पारित अवार्ड सिविल कोर्ट की डिक्री के समान अंतिम और बाध्यकारी होता है, जिसके खिलाफ कोई अपील नहीं होती।
  • इसके अलावा, CrPC की धारा 362 के तहत एक बार जब आपराधिक अदालत (मजिस्ट्रेट) किसी मामले को धारा 147 NI Act के तहत कंपाउंड कर अंतिम फैसला दे देती है, तो उसे अपने ही फैसले की समीक्षा (Review) या उसे बदलने (Alter) का कोई विधिक अधिकार नहीं होता।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं कानूनी घटनाक्रम

  • ₹14.50 लाख का ऋण और एनपीए (2021-2023):
    • इक्विटास स्मॉल फाइनेंस बैंक ने मार्च 2021 में प्रतिवादियों को ₹14.50 लाख का व्यावसायिक/व्यक्तिगत ऋण स्वीकृत किया था, जिसके एवज में अचल संपत्ति गिरवी रखी गई थी और पोस्ट-डेटेड चेक दिए गए थे।
    • ऋण खाता अनियमित होने पर बैंक ने 3 अगस्त 2023 को इसे एनपीए (NPA) घोषित किया और सरफेसी अधिनियम (SARFAESI Act) की धारा 13(2) के तहत मांग नोटिस जारी किया।
  • चेक बाउंस और 138 NI Act का मुकदमा (2024):
    • बैंक ने 8 जनवरी 2024 को चेक बैंक में प्रस्तुत किया, जो 18 जनवरी 2024 को ‘रेफर टू ड्रॉअर’ (Refer to Drawer) की टिप्पणी के साथ अनादृत (बाउंस) हो गया।
    • विधिक नोटिस के बाद भी भुगतान न होने पर बैंक ने 19 मार्च 2024 को न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC) के समक्ष एनआई एक्ट की धारा 138 और 142 के तहत आपराधिक शिकायत दर्ज कराई।
  • अदालत और लोक अदालत में समझौते का बयान:
    • 8 अगस्त 2024: शिकायत की सुनवाई के दौरान बैंक के तत्कालीन अधिवक्ता शमीम सैफी ने मजिस्ट्रेट के समक्ष बयान दिया कि दोनों पक्षों के बीच विवाद सुलझ गया है और बैंक को चेक राशि का पूर्ण और अंतिम भुगतान प्राप्त हो चुका है।
    • 14 सितंबर 2024 (राष्ट्रीय लोक अदालत): मामले को राष्ट्रीय लोक अदालत भेजा गया, जहां बैंक के वकील ने दोबारा वही बयान दर्ज कराया। लोक अदालत ने एनआई एक्ट की धारा 147 के तहत अपराध को शमित (Compounded) मानते हुए शिकायत का निपटारा कर दिया और प्रतिवादियों को दोषमुक्त (Acquitted) कर दिया।
  • 13 महीने बाद बैंक का यू-टर्न और मजिस्ट्रेट द्वारा खारिज:
    • 25 सितंबर 2025 को बैंक ने मजिस्ट्रेट अदालत में अर्जी दाखिल कर दावा किया कि उसके वकील ने गलतफहमी में बिना प्राधिकार के यह बयान दिया था और वास्तव में बैंक को कोई पैसा नहीं मिला।
    • मजिस्ट्रेट अदालत ने यह कहते हुए अर्जी खारिज कर दी कि आपराधिक अदालत के पास अपने ही अंतिम आदेश की समीक्षा या बदलाव का अधिकार क्षेत्र नहीं है। इसके खिलाफ बैंक ने दिल्ली हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: इक्विटास स्मॉल फाइनेंस बैंक लिमिटेड बनाम प्रतिवादी [रिट याचिका (आपराधिक) – दिल्ली उच्च न्यायालय]
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
    • परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 (NI Act):
      • धारा 138 (खाते में अपर्याप्त निधि आदि के कारण चेक का अनादर)
      • धारा 142 (चेक बाउंस अपराधों का संज्ञान)
      • धारा 147 (चेक बाउंस अपराधों का शमनीय / Compoundable होना)
    • विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 (LSA Act, 1987) की धारा 21 (लोक अदालत के पंचाट/अवार्ड की अंतिमता और बाध्यकारिता)
    • दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 362 (अदालत द्वारा अपने निर्णय या अंतिम आदेश में परिवर्तन या समीक्षा पर पूर्ण प्रतिबंध)
    • भारत का संविधान – अनुच्छेद 226/227 (उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार)
  • संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
    • के.एन. गोविंदन कुट्टी मेनन बनाम सी.डी. शाजी (2012, सुप्रीम कोर्ट) — ‘लोक अदालत द्वारा धारा 138 एनआई एक्ट के मामले में पारित अवार्ड एक दीवानी डिक्री की तरह निष्पादनीय और अंतिम होता है; पक्षकार बाद में मनमाने ढंग से इससे पीछे नहीं हट सकते।’
    • स्टेट ऑफ महाराष्ट्र बनाम रामदास श्रीनिवास नायक (1982, सुप्रीम कोर्ट) — ‘अदालत के समक्ष किसी अधिवक्ता द्वारा दर्ज कराया गया बयान न्यायालय के रिकॉर्ड का हिस्सा होता है और उसकी सत्यता पर बाद में सवाल नहीं उठाया जा सकता; मुवक्किल अपने वकील के आधिकारिक प्रस्तुतीकरण से बंधा होता है।’
    • ब्योमकेश चक्रवर्ती बनाम कलकत्ता उच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) — ‘अधिवक्ता केवल एक संविदात्मक प्रतिनिधि नहीं है; वह न्यायिक प्रशासन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और उसकी ओर से की गई सहमति मुवक्किल पर बाध्यकारी होती है।’
  • पीठ: न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी (दिल्ली उच्च न्यायालय)
  • अंतिम निर्णय: रिट याचिका खारिज; लोक अदालत द्वारा चेक बाउंस मामले के निपटारे और आरोपियों की दोषमुक्ति का आदेश पूरी तरह बहाल; बैंक पर कोई वाद-व्यय अधिरोपित नहीं।

NI Act: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतदिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court)
पीठन्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी
याचिकाकर्ताइक्विटास स्मॉल फाइनेंस बैंक लिमिटेड
संबंधित कानूननेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (NI Act) की धारा 138, 142 एवं 147
मुख्य विवादक्या बैंक वकील की ‘गलतफहमी’ या बिना अधिकार दिए गए बयान का हवाला देकर लोक अदालत के फैसले को चुनौती दे सकता है?
हाईकोर्ट का फैसलायाचिका खारिज; वकील केवल एक एजेंट नहीं बल्कि ‘Officer of the Court’ है, उसके बयान से मुकरा नहीं जा सकता।
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