Wednesday, September 30, 2026
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Detained Couple: परिजनों के अवैध हिरासत से मुक्त कराकर नवविवाहित जोड़े को अदालत ने मिलाया; फिर कोर्ट ने कहा- ‘हैप्पी मैरिड लाइफ’, जाएं जीएं

At A Glance | एक नजर में

  • कोर्ट का रुख: हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि बालिग महिला को अपनी पसंद के अनुसार अपने पति के साथ रहने और वैवाहिक जीवन जीने का पूर्ण अधिकार है।
  • मामले की पृष्ठभूमि: युवती के परिवार वाले इस अंतरजातीय/पसंद के विवाह के खिलाफ थे और उन्होंने उसे घर में जबरन रोककर रखा था, जिसके बाद पति ने बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका दायर की।
  • शुभकामनाएं: सुनवाई पूरी करते हुए पीठ ने आदेश में लिखा, “यह अदालत उन्हें सुखी वैवाहिक जीवन (Happy Married Life) की शुभकामनाएं देती है।”
  • पुलिस/आश्रय गृह की स्थिति: याचिका के लंबित रहने के दौरान युवती को सरकारी शेल्टर होम में रखा गया था, जहां से उसे कोर्ट में पेश किया गया।

जोधपुर: बालिग नागरिकों के विवाह के अधिकार, अपनी पसंद के जीवनसाथी के चयन की संवैधानिक स्वतंत्रता और परिवार द्वारा अंतर्जातीय या प्रेम विवाहों में अवैध हिरासत (Illegal Confinement) के मामलों पर राजस्थान हाईकोर्ट ने एक स्पष्ट और संवेदनशील फैसला सुनाया है।

न्यायमूर्ति अरुण मोंगा और न्यायमूर्ति आशुतोष कुमार की खंडपीठ ने पति द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका का निपटारा करते हुए नवदंपति को सुखद वैवाहिक जीवन की शुभकामनाएं दीं। अदालत ने दो-टूक व्यवस्था दी कि जब दोनों पक्षकार वयस्क हैं और महिला ने स्वतंत्र इच्छा से विवाह की पुष्टि की है, तो माता-पिता की असहमति के आधार पर किसी बालिग युवती को उसकी इच्छा के विरुद्ध रोका नहीं जा सकता। उच्च न्यायालय ने 24 वर्षीय महिला को उसके 23 वर्षीय पति के साथ वैवाहिक जीवन पुनः शुरू करने की पूरी आजादी देते हुए उसे पति के साथ जाने की अनुमति प्रदान की है।

उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां

1. ‘महिला को अपनी पसंद के अनुसार पति के साथ रहने का अधिकार’ न्यायमूर्ति अरुण मोंगा और न्यायमूर्ति आशुतोष कुमार की खंडपीठ ने 25 सितंबर 2026 के अपने आदेश में कहा: “कथित बंदी (महिला) ने हमारे समक्ष स्पष्ट रूप से अपनी इच्छा व्यक्त की है। वह अपनी पसंद के अनुसार अपने पति के साथ रहने की पूरी हकदार है। इसलिए इस मामले में आगे किसी भी न्यायिक कार्यवाही की आवश्यकता नहीं है।

बंदी याचिकाकर्ता (पति) के साथ अपना वैवाहिक जीवन पुनः शुरू करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है, जो अदालत में उपस्थित हैं। याचिकाकर्ता अपनी पत्नी को अपने साथ ले जाने के लिए स्वतंत्र है। इसके साथ ही सभी लंबित अंतरिम आवेदन भी निस्तारित किए जाते हैं। ‘यह अदालत उन्हें एक सुखी वैवाहिक जीवन (Happy Married Life) की शुभकामनाएं देती है।’“

2. इन-कैमरा/अदालती बातचीत में महिला का दो-टूक बयान

  • अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए 24 वर्षीय युवती से सीधे अदालत कक्ष में बातचीत की।
  • महिला ने बिना किसी हिचकिचाहट के स्पष्ट किया कि उसने 23 वर्षीय युवक से किसी दबाव, डर या जोर-जबरदस्ती (Without Coercion or Duress) के बिना अपनी स्वतंत्र मर्जी से विवाह किया था।
  • उसने पीठ को बताया कि पुलिस उसे उसके मायके से उसकी मर्जी के खिलाफ अदालत लाई थी, और न्यायिक प्रक्रिया लंबित रहने के दौरान उसे सरकारी शेल्टर होम (नारी निकेतन) में रहना पड़ा था। उसने अदालत से गुहार लगाई कि वह केवल अपने पति के साथ वापस लौटना चाहती है।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि

  • याचिकाकर्ता (पति) का पक्ष:
    • 23 वर्षीय पति ने अधिवक्ता नीरज शर्मा और अधिवक्ता दयाल चौधरी के माध्यम से राजस्थान हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की थी।
    • याचिका में आरोप लगाया गया था कि उसकी 24 वर्षीय पत्नी को उसके माता-पिता और परिजनों ने अवैध रूप से बंधक बनाकर रखा हुआ है, जिससे उन्हें उनके दांपत्य अधिकारों (Conjugal Rights) से वंचित किया जा रहा है।
    • विवाह को साबित करने के लिए याचिकाकर्ता ने शादी की तस्वीरें और आवश्यक दस्तावेज अदालत में प्रस्तुत किए, जिसमें दिखाया गया कि विवाह दोनों परिवारों के शुभचिंतकों, रिश्तेदारों और दोस्तों की मौजूदगी में हुआ था।
  • माता-पिता की असहमति:
    • महिला के माता-पिता इस विवाह के खिलाफ थे और उन्होंने युवती को घर में बंद कर रखा था, जिसके कारण पति को उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
  • राज्य सरकार और पुलिस की रिपोर्ट:
    • लोक अभियोजक (Public Prosecutor) मानवेंद्र सिंह शेखावत ने अदालत को सूचित किया कि पुलिस ने महिला का पता लगाकर उसका औपचारिक बयान दर्ज कर लिया है, जिसमें उसने स्वेच्छा से विवाह करने की बात स्वीकार की थी। दोनों पक्षकारों की आयु और विवाह की वैधता पर कोई विवाद नहीं पाया गया।

विधिक एवं संवैधानिक सिद्धांत: ‘पसंद का अधिकार’ और अनुच्छेद 21

  • जीवनसाथी चुनने का मौलिक अधिकार (Right to Choose a Life Partner):
    • भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 (प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत प्रत्येक बालिग नागरिक (18 वर्ष से अधिक आयु की महिला और 21 वर्ष से अधिक आयु का पुरुष) को अपनी पसंद के व्यक्ति से विवाह करने और जीवन जीने का पूर्ण मौलिक अधिकार है।
    • किसी भी बालिग व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता में परिवार, समाज या राज्य की नैतिक पुलिसिंग (Moral Policing) को आड़े नहीं आने दिया जा सकता।
  • बंदी प्रत्यक्षीकरण का सीमित दायरा:
    • बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट में अदालत का प्राथमिक कार्य यह देखना होता है कि क्या संबंधित व्यक्ति को उसकी मर्जी के खिलाफ निरुद्ध रखा गया है। जैसे ही वयस्क व्यक्ति अदालत के समक्ष स्वेच्छा से अपनी स्थिति स्पष्ट करता है, अदालत उसे तत्काल रिहा करने का आदेश देती है।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: पति बनाम राजस्थान राज्य व अन्य [बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (D.B. Habeas Corpus Writ Petition) – राजस्थान उच्च न्यायालय, मुख्य पीठ]
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • याचिकाकर्ता (पति) की ओर से: अधिवक्ता नीरज शर्मा एवं अधिवक्ता दयाल चौधरी
    • राज्य सरकार की ओर से: लोक अभियोजक (Public Prosecutor) मानवेंद्र सिंह शेखावत
  • प्रासंगिक कानून एवं संवैधानिक प्रावधान:
    • भारत का संविधान – अनुच्छेद 226 (बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट जारी करने की उच्च न्यायालय की शक्ति)
    • भारत का संविधान – अनुच्छेद 21 (व्यक्तिगत स्वतंत्रता, निजता और जीवनसाथी चुनने का अधिकार)
    • भारत का संविधान – अनुच्छेद 19(1)(d) (भारत के राज्यक्षेत्र में सर्वत्र अबाध संचरण की स्वतंत्रता)
  • संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
    • शफीन जहां बनाम असोकन के.एम. (हादिया केस, 2018, सुप्रीम कोर्ट संविधान पीठ) — ‘समाज या माता-पिता की सहमति किसी बालिग व्यक्ति के जीवनसाथी चुनने के मौलिक अधिकार से ऊपर नहीं हो सकती; व्यक्तिगत स्वायत्तता का सम्मान करना अदालतों का संवैधानिक कर्तव्य है।’
    • शक्ति वाहिनी बनाम भारत संघ (2018, सुप्रीम कोर्ट) — ‘दो वयस्कों के आपसी सहमति से किए गए विवाह में खाप पंचायतों, परिजनों या किसी तीसरे पक्ष का हस्तक्षेप पूरी तरह गैरकानूनी है।’
    • लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2006, सुप्रीम कोर्ट) — ‘यदि कोई लड़का और लड़की बालिग हैं और अपनी मर्जी से विवाह करते हैं, तो उन्हें परेशान करने वाले परिजनों या पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।’
  • पीठ: न्यायमूर्ति अरुण मोंगा और न्यायमूर्ति आशुतोष कुमार (राजस्थान उच्च न्यायालय)
  • अंतिम आदेश: याचिका का निस्तारण; 24 वर्षीय युवती को पति के साथ जाने की पूर्ण स्वतंत्रता; दंपति को सुखी वैवाहिक जीवन की न्यायिक शुभकामनाएं।

Detained Couple: Key Indicators | मुख्य बिंदु

संकेत बिंदुविवरण
संबंधित पीठजस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस आशुतोष कुमार की पीठ
पक्षकार24 वर्षीय पत्नी और 23 वर्षीय पति
मुख्य कानूनी आधारबालिग नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अपनी पसंद के साथी से शादी/रहने का संवैधानिक अधिकार।
अदालत की टिप्पणी“महिला ने स्पष्ट रूप से अपनी इच्छा जताई है। उसे अपनी पसंद के पति के साथ रहने का पूरा हक है।”
याचिका का निस्तारण25 सितंबर के आदेश के तहत याचिका का निस्तारण कर महिला को पति के साथ जाने की तुरंत अनुमति दी गई।
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