At A Glance | एक नजर में
- मुख्य मांग: सुप्रीम कोर्ट से 23 सितंबर के उस खंडित फैसले को रद्द करने और मामले को किसी अन्य बेंच के समक्ष नए सिरे से सूचीबद्ध करने की मांग।
- विवाद की वजह: याचिकाकर्ता के अनुसार, जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा के बेटे सिद्धार्थ शर्मा जुलाई 2024 से मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में चुनाव आयोग (ECI) के स्टैंडिंग काउंसिल (वकील) हैं।
- मूल मामला: चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े ‘2023 कानून’ (जिसमें प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और एक केंद्रीय मंत्री की चयन समिति का प्रावधान है) को चुनौती देने वाली याचिकाएं।
- पूर्वाग्रह की आशंका: याचिका में कहा गया है कि न्याय न केवल होना चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए; इसलिए जस्टिस शर्मा को इस मामले की सुनवाई से खुद को अलग (Recuse) कर लेना चाहिए था।
नई दिल्ली: मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाल ही में दिए गए खंडित फैसले (Split Verdict) में एक बड़ा विधिक व प्रक्रियात्मक मोड़ आ गया है।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि खंडपीठ के सदस्य न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा को हितों के प्रत्यक्ष टकराव (Direct Conflict of Interest) के चलते इस मामले की सुनवाई से स्वयं को अलग (Recusal) कर लेना चाहिए था, क्योंकि उनके पुत्र सिद्धार्थ शर्मा जुलाई 2024 से मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के आधिकारिक स्टैंडिंग काउंसिल (Standing Counsel) के रूप में कार्यरत हैं। मामले में मुख्य याचिकाकर्ता डॉ. जया ठाकुर ने सुप्रीम कोर्ट में एक औपचारिक क्यूरेटिव याचिका (Curative Petition) दायर कर 23 सितंबर 2026 के उस आदेश को वापस (Recall) लेने और मामले की नए सिरे से निष्पक्ष पीठ द्वारा सुनवाई कराने की मांग की है।
वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया द्वारा तैयार और प्रमाणित (Settled and Certified) इस उपचारात्मक याचिका में तर्क दिया गया है कि प्राकृतिक न्याय के स्थापित सिद्धांतों और ऐतिहासिक रूपा अशोक हुर्रा मामले की नजीर के अनुसार, पक्षपात की वास्तविक मौजूदगी नहीं बल्कि “पक्षपात की उचित आशंका” (Reasonable Apprehension of Bias) ही किसी न्यायिक आदेश को दूषित करने के लिए पर्याप्त आधार है।
क्यूरेटिव याचिका के मुख्य आधार एवं विधिक दलीलें
1. ‘हितों का सीधा टकराव और प्रकटीकरण (Disclosure) में चूक’ डॉ. जया ठाकुर ने याचिका में कहा कि उन्हें न्यायमूर्ति शर्मा के पुत्र के चुनाव आयोग के वकील होने की जानकारी 25 सितंबर 2026 को मीडिया रिपोर्टों के माध्यम से मिली: “याचिकाकर्ता का यह अत्यंत विनम्र निवेदन है कि भारत निर्वाचन आयोग की ओर से श्री सिद्धार्थ शर्मा के पेशेवर दायित्वों और माननीय न्यायमूर्ति श्री सतीश चंद्र शर्मा द्वारा चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को चुनौती देने वाले वाद के न्यायिक निर्धारण के बीच हितों का सीधा टकराव (Direct Conflict of Interest) मौजूद है।”
याचिका में रेखांकित किया गया है कि न्याय प्रशासन में आम जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए यह आवश्यक था कि सुनवाई शुरू होने से पूर्व ही इस संबंध का औपचारिक प्रकटीकरण (Prior Disclosure) किया जाता या पीठ से स्वतः अलग होने का निर्णय लिया जाता।
2. वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया का प्रमाणन: ‘न्याय होते हुए दिखना भी चाहिए’ क्यूरेटिव याचिका के लिए अनिवार्य वरिष्ठ अधिवक्ता के प्रमाणन नोट में वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया ने लिखा: “मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि महामहिम (His Lordship) ने इस मामले का फैसला पूरी तरह से इसके गुण-दोष (Merits) के आधार पर किया है। तथापि, इस सर्वमान्य न्यायिक सिद्धांत के आलोक में कि ‘न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होते हुए स्पष्ट दिखना भी चाहिए’ (Justice must not only be done but also seem to be done), यह उचित होता कि माननीय न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा इन याचिकाओं की सुनवाई से स्वयं को अलग (Recuse) कर लेते।”
3. रूपा अशोक हुर्रा नजीर: पक्षपात की आशंका उपचारात्मक राहत का वैध आधार
- याचिका में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के मील के पत्थर फैसले—रूपा अशोक हुर्रा बनाम अशोक हुर्रा (2002)—का विशेष सहारा लिया गया है।
- हुर्रा मामले में शीर्ष अदालत ने यह सिद्धांत स्थापित किया था कि यदि किसी न्यायाधीश का किसी पक्षकार के साथ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबंध हो और उसका प्रकटीकरण न किया गया हो, तो वह प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन के तहत क्यूरेटिव क्षेत्राधिकार (अनुच्छेद 142) को आकर्षित करने का एक पुख्ता आधार बनता है।
- याचिका में स्पष्ट किया गया कि इसके लिए “वास्तविक दुर्भावना” (Actual Bias) साबित करना जरूरी नहीं है, बल्कि निष्पक्षता को लेकर एक सामान्य नागरिक के मन में उठने वाली “सद्भावपूर्ण आशंका” (Real Likelihood/Apprehension of Bias) ही आदेश को निरस्त करने के लिए पर्याप्त है।
4. रिव्यू पिटीशन (पुनर्विचार याचिका) से छूट की मांग
- सामान्य प्रक्रिया के अनुसार क्यूरेटिव याचिका दाखिल करने से पहले पुनर्विचार याचिका (Review Petition) का खारिज होना आवश्यक होता है।
- हालांकि, याचिकाकर्ता ने इस अनिवार्यता से विशेष छूट (Exemption) मांगी है। उनका तर्क है कि चूंकि रिव्यू पिटीशन उसी दो-सदस्यीय पीठ के समक्ष चैंबर में सूचीबद्ध होती जहां से यह मतभेद उपजा था, अतः कोई उपयोगी विधिक उद्देश्य पूरा नहीं होता।
केंद्र के रुख में अचानक बदलाव: अनुच्छेद 145(3) की आपत्ति पर सवाल
याचिका में केंद्र सरकार के आचरण और संविधान पीठ के संदर्भ (Reference to Constitution Bench) की मांग के समय पर भी सवाल उठाए गए हैं:
- मई 2026 के जवाबी हलफनामे में मौन: याचिका में बताया गया कि मई 2026 में केंद्र सरकार द्वारा दाखिल किए गए विस्तृत जवाबी हलफनामे में ऐसा कोई आक्षेप या आपत्ति नहीं उठाई गई थी कि दो जजों की खंडपीठ इस मामले की सुनवाई नहीं कर सकती।
- 14 मई को मौखिक आपत्ति: भारत के अटॉर्नी जनरल (AG) आर. वेंकटरमणी ने पहली बार 14 मई 2026 को मौखिक बहस के दौरान अनुच्छेद 145(3) का हवाला देते हुए मामले को 5 जजों की संविधान पीठ को भेजने की मांग उठाई थी।
23 सितंबर 2026 का खंडित फैसला (Split Verdict): क्या था मतभेद?
सर्वोच्च न्यायालय की दो-सदस्यीय खंडपीठ (न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा) ने 23 सितंबर को मामले को बड़ी पीठ के पास भेजने के केंद्र के अनुरोध पर खंडित निर्णय सुनाया था:
- न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता का दृष्टिकोण:
- जस्टिस दत्ता ने मामले को बड़ी पीठ को संदर्भित करने के केंद्र के अनुरोध को स्पष्ट रूप से अस्वीकार (Rejected) कर दिया था।
- उनका मानना था कि अनूप बरनवाल (2023) के संविधान पीठ के फैसले के बाद 2023 का नया कानून संसद द्वारा उस न्यायिक व्यवस्था को निष्प्रभावी करने के लिए लाया गया था, और वर्तमान पीठ स्वयं इसकी संवैधानिकता तय करने में सक्षम है।
- न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा का दृष्टिकोण:
- जस्टिस शर्मा ने केंद्र सरकार की दलील से सहमति (Agreed) जताई कि चूंकि इसमें संविधान की व्याख्या और धारा 7 व 8 की वैधता से जुड़ा महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न शामिल है, इसलिए इसे 5 जजों की संविधान पीठ के पास भेजा जाना चाहिए।
- परिणामी निर्देश:
- जजों के बीच परस्पर मतभेद (Difference of Opinion) के बावजूद, पीठ ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) से अनुरोध किया था कि वे इस विषय पर विचार के लिए संविधान पीठ गठित करने पर निर्णय लें।
मामले की मूल कानूनी पृष्ठभूमि: 2023 का नया चुनाव आयुक्त कानून
- विवादित प्रावधान: याचिका में ‘मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023’ की धारा 7 और धारा 8 को चुनौती दी गई है।
- चयन समिति की संरचना: इस नए कानून के तहत चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए बनाई गई तीन-सदस्यीय चयन समिति में:
- प्रधानमंत्री (अध्यक्ष),
- लोकसभा में विपक्ष के नेता / सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता, और
- प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल हैं।
- सीजेआई को बाहर करने का विरोध: यह व्यवस्था सुप्रीम कोर्ट के अनूप बरनवाल (मार्च 2023) के संविधान पीठ के फैसले के विपरीत है, जिसमें अदालत ने संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक बनाई गई अंतरिम समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को अनिवार्य रूप से शामिल किया था। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि कार्यपालिका के दो सदस्यों (PM + कैबिनेट मंत्री) का बहुमत चुनाव आयोग की निष्पक्षता और स्वतंत्रता को नष्ट करता है।
- अधिकार-पृच्छा (Quo Warranto) की मांग: याचिका में नए कानून के तहत नियुक्त किए गए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू की नियुक्तियों को अवैध घोषित करने और उनके विरुद्ध अधिकार-पृच्छा रिट जारी करने की भी मांग की गई है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: डॉ. जया ठाकुर बनाम भारत संघ व अन्य [क्यूरेटिव याचिका (सिविल) – भारत का सर्वोच्च न्यायालय]
- आक्षेपित आदेश: दो-न्यायाधीशों की खंडपीठ (न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता एवं न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा) द्वारा दिनांक 23 सितंबर 2026 को पारित खंडित आदेश (Split Verdict)
- याचिका का प्रमाणन: वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया
- प्रासंगिक कानून एवं संवैधानिक प्रावधान:
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 142 (पूर्ण न्याय करने हेतु सर्वोच्च न्यायालय की असाधारण अंतर्निहित शक्ति / Curative Jurisdiction)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 145(3) (संविधान की व्याख्या के महत्वपूर्ण विधिक प्रश्नों पर न्यूनतम 5 जजों की संविधान पीठ की अनिवार्यता)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 324 (चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और अधीक्षण शक्ति)
- मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 की धारा 7 एवं 8
- प्राकृतिक न्याय के मूलभूत सिद्धांत — नेमो जुडेक्स इन कौसा सुआ (Nemo Judex In Causa Sua – कोई भी व्यक्ति अपने ही मामले में न्यायाधीश नहीं हो सकता)
- संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
- रूपा अशोक हुर्रा बनाम अशोक हुर्रा (2002, 5-जज संविधान पीठ) — ‘यदि प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन हुआ हो या किसी जज के संबंध/पक्षपात की उचित आशंका रही हो, तो समीक्षा खारिज होने के बाद भी सुप्रीम कोर्ट अपने अंतिम आदेश को वापस ले सकता है।’
- अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (2023, 5-जज संविधान पीठ) — ‘चुनाव आयोग का स्वतंत्र होना लोकतंत्र की बुनियादी संरचना (Basic Structure) का हिस्सा है; नियुक्तियों में कार्यपालिका का पूर्ण एकाधिकार नहीं हो सकता।’
- ए.के. क्रेपाक बनाम भारत संघ (1969, सुप्रीम कोर्ट) — ‘प्रशासनिक व न्यायिक दोनों प्रक्रियाओं में वास्तविक पक्षपात (Actual Bias) साबित करना अनिवार्य नहीं है; निष्पक्षता की उचित और युक्तियुक्त आशंका ही कार्यवाही को अवैध ठहराने के लिए पर्याप्त है।’
- याचिका में मांगी गई अंतिम राहत: 23 सितंबर 2026 के खंडित आदेश को वापस लिया जाए, मामले से न्यायमूर्ति शर्मा के अलग होने के बाद मुख्य मामले को नए सिरे से किसी अन्य उपयुक्त पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाए।
ECI Case Verdict: Key Indicators | मुख्य बिंदु
| संकेत बिंदु | विवरण |
| याचिकाकर्ता | डॉ. जया ठाकुर |
| संबंधित न्यायाधीश | जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ |
| 23 सितंबर का फैसला | स्प्लिट वर्डिक्ट (खंडित फैसला): जस्टिस दत्ता ने मामले को बड़ी पीठ के पास भेजने की केंद्र की मांग खारिज की, जबकि जस्टिस शर्मा सहमत हुए। |
| कानूनी आधार | रूपा अशोक हुर्रा बनाम अशोक हुर्रा मामले का हवाला, जिसमें न्यायाधीश द्वारा संबंधों का खुलासा न करना क्यूरेटिव याचिका का आधार माना गया है। |
| मुख्य तर्क | वास्तविक पक्षपात साबित होना जरूरी नहीं, केवल ‘पक्षपात का अंदेशा’ (Appearance of bias) ही फैसले को अमान्य करने के लिए काफी है। |

