Friday, October 2, 2026
HomeDecision 30'sPolice Working: विस्फोटक सामग्री के दोबारा भंडारण की सूचना न होने पर...

Police Working: विस्फोटक सामग्री के दोबारा भंडारण की सूचना न होने पर पुलिस अधिकारी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता; इलाहाबाद हाईकोर्ट का जवाब

हाईकोर्ट की मुख्य टिप्पणियाँ और कानूनी तर्क (Key Findings)

  • सूचना के बिना कार्रवाई न होना लापरवाही नहीं:हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा कि क्या 7 नवंबर 2023 के बाद चौकी प्रभारी को आरोपी द्वारा दोबारा विस्फोटक इकट्ठा करने की कोई खुफिया सूचना या इनपुट मिलने का कोई रिकॉर्ड है? राज्य सरकार ऐसा कोई सबूत पेश नहीं कर सकी। इस पर पीठ ने टिप्पणी की:“पुलिस सूचना/इनपुट पर काम करती है। सूचना के अभाव में कोई कदम न उठा पाने को कर्तव्य में लापरवाही (Negligence) नहीं कहा जा सकता।”
  • पूर्व की जानकारी का मतलब भावी जानकारी नहीं:अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता 7 नवंबर की छापेमारी के दौरान मौजूद थे, जिससे यह तो सिद्ध होता है कि उन्हें पुरानी घटना की जानकारी थी। हालांकि, केवल इस आधार पर यह मान लेना गलत होगा कि उन्हें 22 जनवरी के धमाके से पहले दोबारा सामग्री इकट्ठा किए जाने की भी जानकारी थी।
  • त्वरित कार्रवाई:अदालत ने नोट किया कि 22 जनवरी को विस्फोट की घटना होते ही अधिकारी ने तुरंत आवश्यक कानूनी कदम उठाए थे।

प्रयागराज: पुलिस अधिकारियों के वैधानिक कर्तव्यों, विभागीय जांच में ‘लापरवाही’ (Negligence) के निर्धारण के विधिक मानकों और गुप्त सूचना/आसूचना (Intelligence/Information) के अभाव में पीठासीन अधिकारी की जवाबदेही पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अत्यंत महत्वपूर्ण और व्यावहारिक व्यवस्था दी है।

मुजफ्फरनगर जिले के खतौली थाना क्षेत्र के तत्कालीन चौकी प्रभारी (उप-निरीक्षक नरेश सिंह) द्वारा दायर रिट याचिका

न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति सत्य वीर सिंह की खंडपीठ ने मुजफ्फरनगर जिले के खतौली थाना क्षेत्र के एक तत्कालीन चौकी प्रभारी (उप-निरीक्षक नरेश सिंह) द्वारा दायर रिट याचिका को स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया। उच्च न्यायालय ने राज्य लोक सेवा अधिकरण (State Public Services Tribunal) के 23 मार्च 2026 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसने याचिकाकर्ता के खिलाफ पारित ‘परिनिंदा’ (Censure) के अनुशासनात्मक दंड को बरकरार रखा था। उच्च न्यायालय ने इस अनुशासनात्मक दंड और उसके सभी परिणामी प्रभावों को पूरी तरह निरस्त (Quash) कर दिया। उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि यदि पुलिस अधिकारी के पास किसी अवैध गतिविधि के दोबारा शुरू होने की कोई विशिष्ट सूचना या इनपुट नहीं था, तो उस गतिविधि को न पकड़ पाने की चूक (Omission to detect) को अपने आप में पदीय कर्तव्य में लापरवाही नहीं ठहराया जा सकता।

उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां

1. ‘पुलिस सूचना पर काम करती है; सूचना का अभाव लापरवाही नहीं’ न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति सत्य वीर सिंह की खंडपीठ ने पुलिसिंग की मूल कार्यप्रणाली को रेखांकित करते हुए स्पष्ट व्यवस्था दी: “पुलिस सूचना मिलने पर ही कार्रवाई करती है (The Police do act on information)। किसी गुप्त सूचना या आसूचना के अभाव में कार्रवाई न हो पाना या चूक हो जाना पदीय कर्तव्य में लापरवाही (Negligence) की श्रेणी में नहीं आ सकता।”

अदालत ने पाया कि राज्य सरकार यह सिद्ध करने में पूरी तरह विफल रही कि 7 नवंबर 2023 के बाद संबंधित पुलिस चौकी पर शादाब द्वारा दोबारा अवैध पटाखे या विस्फोटक जमा करने की कोई भी गुप्त सूचना, मुखबिर की रिपोर्ट या शिकायत पहुंची थी।

2. पिछली बरामदगी की जानकारी का अर्थ बाद के भंडारण की जानकारी नहीं: राज्य सरकार और अधिकरण का तर्क था कि चूंकि चौकी प्रभारी पूर्व में हुई छापेमारी और बरामदगी के समय मौजूद थे, अतः उन्हें क्षेत्र में कड़ी निगरानी रखनी चाहिए थी। इस पर उच्च न्यायालय ने विधिक भेद स्पष्ट करते हुए कहा:

  • अधिकारी को पूर्व की अवैध गतिविधि की जानकारी होना और बाद में दोबारा किए गए अवैध भंडारण की जानकारी होना—दोनों पूरी तरह अलग-अलग विधिक बातें हैं।
  • केवल 7 नवंबर को बरामदगी के समय उपस्थित रहने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि अधिकारी को 22 जनवरी के विस्फोट से पहले नए सिरे से हो रहे विस्फोटकों के संग्रह या निर्माण का स्वतः ज्ञान था।
  • अदालत ने माना कि जब तक अधिकारी को उपलब्ध विशिष्ट सूचना या आसूचना के आधार पर कर्तव्य की स्पष्ट अवहेलना (Dereliction of duty) साबित न हो, तब तक विभागीय दंड कानूनन टिक नहीं सकता।

3. विस्फोट के तुरंत बाद अधिकारी की त्वरित कार्रवाई: खंडपीठ ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए यह भी दर्ज किया कि 22 जनवरी 2024 को विस्फोट की दुखद घटना घटित होते ही याचिकाकर्ता (चौकी प्रभारी) ने मौके पर पहुंचकर त्वरित और आवश्यक कानूनी कदम उठाए थे, जो उनकी कर्तव्यनिष्ठा को दर्शाता है।

Also Read; Actual Detention: 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करने की संवैधानिक समय-सीमा वास्तविक हिरासत से शुरू होती है; न कि अरेस्ट मेमो में दर्ज समय से

मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि: नवंबर 2023 की बरामदगी से जनवरी 2024 का विस्फोट

  • 7 नवंबर 2023 की पहली बरामदगी:
    • मुजफ्फरनगर जिले के थाना खतौली के अंतर्गत ग्राम कैलावाड़ा में एक अभियुक्त शादाब के मकान पर पुलिस ने गुप्त सूचना के आधार पर छापा मारा था।
    • छापेमारी में लगभग 1,732 किग्रा अवैध पटाखे, 176 किग्रा कच्चा माल, 6 किग्रा शोरा (Saltpetre) और 5 किग्रा बारूद बरामद किया गया था।
    • 8 नवंबर 2023 को आईपीसी की धारा 286 और विस्फोटक अधिनियम, 1884 की धारा 9B(1)(a) के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई।
    • इस मामले की विवेचना (Investigation) एक अन्य उप-निरीक्षक को सौंपी गई थी, जिन्होंने 28 नवंबर 2023 को अदालत में आरोप-पत्र दाखिल कर दिया था। याचिकाकर्ता इस आपराधिक मामले के जांच अधिकारी (IO) नहीं थे, बल्कि वे केवल संबंधित पुलिस चौकी के प्रभारी थे और छापे के दौरान वरिष्ठ अधिकारियों के साथ उपस्थित रहे थे।
  • 22 जनवरी 2024 का दुखद विस्फोट:
    • पहली बरामदगी के लगभग दो महीने बाद, 22 जनवरी 2024 को शादाब के उसी घर में एक जोरदार विस्फोट हुआ।
    • विस्फोट की तीव्रता से मकान की कंक्रीट की छत (Slab) गिर गई, जिसके मलबे में दबकर दो मासूम बच्चों की दुखद मौत हो गई।
  • विभागीय आरोप-पत्र और परिनिंदा प्रविष्टि:
    • घटना के बाद पुलिस विभाग ने चौकी प्रभारी (याचिकाकर्ता) के खिलाफ यह आरोप लगाते हुए विभागीय जांच शुरू कर दी कि भारी मात्रा में विस्फोटकों की पूर्व बरामदगी के बावजूद उन्होंने अपने क्षेत्र में सतर्कता नहीं बरती, शादाब द्वारा दोबारा विस्फोटक जमा करने की सूचना उच्चाधिकारियों को नहीं दी और इसे रोकने में विफल रहे।
    • इसे राजकीय कर्तव्य में घोर लापरवाही, अनुशासनहीनता और स्वेच्छाचारिता मानते हुए उन्हें ‘परिनिंदा’ (Censure Entry) का दंड दिया गया।
  • अधिकरण का आदेश और हाईकोर्ट में चुनौती:
    • अधिकारी ने इस दंड के खिलाफ राज्य लोक सेवा अधिकरण, लखनऊ का दरवाजा खटखटाया। अधिकरण ने 23 मार्च 2026 के फैसले में उनके दावे को खारिज कर दिया, जिसके बाद उन्होंने अधिवक्ता विनोद कुमार मिश्रा के माध्यम से इलाहाबाद उच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर की।

विधिक एवं प्रशासनिक विश्लेषण

  • विभागीय जांच में साक्ष्य का मानक (Preponderance of Probabilities):
    • प्रशासनिक कानून के तहत भले ही विभागीय जांच में आपराधिक मुकदमों की तरह ‘संदेह से परे’ (Beyond reasonable doubt) साक्ष्य की आवश्यकता नहीं होती, परंतु आरोप की पुष्टि के लिए न्यूनतम प्राथमिक साक्ष्य और तार्किक अंतर्संबंध का होना अनिवार्य है।
    • बिना किसी खुफिया सूचना या शिकायत के केवल ‘क्षेत्राधिकार में घटना हो जाने’ मात्र से किसी पुलिसकर्मी को व्यक्तिगत रूप से लापरवाही का दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
  • विस्फोटक अधिनियम, 1884 एवं पुलिस नियम:
    • पुलिस व्यवस्था में सूचना तंत्र (Intelligence Machinery) की विफलता और किसी अधिकारी की व्यक्तिगत पदीय लापरवाही में स्पष्ट अंतर होता है। जब तक यह साबित न हो कि जानकारी होने के बावजूद अधिकारी निष्क्रिय रहा, तब तक दंडात्मक कार्रवाई मनमानी मानी जाती है।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: नरेश सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व 4 अन्य [रिट – ए संख्या 10542/2026 – इलाहाबाद उच्च न्यायालय, प्रधान पीठ प्रयागराज]
  • पीठ: न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति सत्य वीर सिंह (खंडपीठ)
  • निर्णय की तिथि: 21 सितंबर 2026
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • याचिकाकर्ता (चौकी प्रभारी) की ओर से: अधिवक्ता विनोद कुमार मिश्रा
    • प्रतिवादी (उत्तर प्रदेश राज्य व पुलिस विभाग) की ओर से: स्थायी शासकीय अधिवक्ता
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
    • उत्तर प्रदेश पुलिस अधिकारी (अधीनस्थ श्रेणी) दंड एवं अपील नियमावली, 1991 (परिनिंदा प्रविष्टि का प्रावधान)
    • विस्फोटक अधिनियम, 1884 (Explosives Act, 1884) की धारा 9B(1)(a) (अवैध विस्फोटक निर्माण व भंडारण)
    • भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 286 [समतुल्य: भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 288 — विस्फोटक पदार्थ के संबंध में उपेक्षापूर्ण आचरण]
    • भारत का संविधान – अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
    • भारत संघ बनाम जे. अहमद (1979, सुप्रीम कोर्ट) — ‘प्रत्येक भूल या किसी घटना को न रोक पाना ‘कदाचार’ (Misconduct) नहीं होता; कदाचार में जानबूझकर की गई पदीय अवहेलना या बदनियती का पुट होना आवश्यक है।’
    • उत्तर प्रदेश राज्य बनाम शत्रुघ्न लाल (सुप्रीम कोर्ट) — ‘विभागीय कार्यवाहियों में दंड के आदेश को ठोस और प्रासंगिक साक्ष्यों पर आधारित होना चाहिए, न कि मात्र अनुमानों या पूर्व-धारणाओं पर।’
  • अंतिम निर्णय: रिट याचिका स्वीकृत; राज्य लोक सेवा अधिकरण का 23 मार्च 2026 का निर्णय निरस्त; याचिकाकर्ता पर लगाया गया ‘परिनिंदा’ (Censure) का विभागीय दंड और उसके समस्त प्रतिकूल प्रभाव पूरी तरह समाप्त व निरस्त।

Police Working: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतइलाहाबाद उच्च न्यायालय (खंडपीठ)
पीठन्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा एवं न्यायमूर्ति सत्य वीर सिंह
याचिकाकर्तानरेश सिंह (तत्कालीन पुलिस चौकी प्रभारी, खतौली, मुजफ्फरनगर)
मूल मामलाशादाब नामक व्यक्ति के घर से भारी मात्रा में अवैध पटाखे/विस्फोटक बरामदगी और उसके बाद धमाका।
अदालत का फैसलाट्रिब्यूनल के आदेश और अधिकारी पर लगाई गई सजा रद्द; सूचना के अभाव में कार्रवाई न करने को लापरवाही नहीं माना जा सकता।
RELATED ARTICLES

Most Popular

Patna
scattered clouds
26.8 ° C
26.8 °
26.8 °
77 %
2.5kmh
25 %
Fri
27 °
Sat
33 °
Sun
33 °
Mon
33 °
Tue
33 °

Recent Comments