हाईकोर्ट की मुख्य टिप्पणियाँ और चिंताएँ (Key Highlights)
- ‘चीफ जस्टिस-केंद्रित’ (Chief Justice-Centric) मॉडल पर सवाल:न्यायमूर्ति दिवाकर ने हाईकोर्ट प्रशासन के मुख्य न्यायाधीश-केंद्रित मॉडल में बदलाव का आह्वान किया। उन्होंने अधिक विचारशील, संस्थागत रूप से संतुलित, सहभागी दृष्टिकोण और मजबूत संस्थागत जवाबदेही की आवश्यकता पर बल दिया।
- फुटनोट में तीखी टिप्पणी:फैसले के एक फुटनोट में जज ने लिखा:“ऐसा आभास दिया गया जैसे हाईकोर्ट की पिछली दो फुल कोर्ट बैठकों को इस तरह व्यवस्थित (Stage-managed) किया गया था, मानो सरकार अपने सदस्यों के जरिए विश्वास मत पारित करा रही हो। यह जज के पद की गरिमा के खिलाफ है।”
- नियमों का उल्लंघन और बैठकों का एजेंडा:
- इलाहाबाद हाईकोर्ट रूल्स, 1952 (अध्याय III, नियम 8): मुख्य न्यायाधीश को ग्रीष्मकालीन अवकाश को छोड़कर हर तीन महीने में कम से कम एक बार फुल कोर्ट बैठक बुलाना अनिवार्य है। यदि कम से कम 5 जज अनुरोध करें, तो एक सप्ताह के भीतर बैठक बुलानी होगी।
- पिछले 10 वर्षों के एजेंडे का विश्लेषण करने पर पाया गया कि इनमें मुख्य रूप से वरिष्ठ अधिवक्ताओं के नामांकन और न्यायिक अधिकारियों की सेवा शर्तों से जुड़े मुद्दे ही रखे गए। नीतिगत मामलों या न्याय प्रशासन की वार्षिक रिपोर्ट को कभी फुल कोर्ट के समक्ष पेश ही नहीं किया गया।
- असहमति/सहमति दर्ज न होना:अदालत ने कहा कि फुल कोर्ट बैठकों के कार्यवृत्त (Minutes) में अलग-अलग जजों की असहमति (Dissent) या सहमति को दर्ज नहीं किया जाता। जब तक जजों के विचारों को रिकॉर्ड पर नहीं लाया जाता, तब तक फुल कोर्ट का मूल संस्थागत उद्देश्य पूरा नहीं होता।
- समितियों की गोपनीयता और पदोन्नति के मापदंड:
- मुख्य न्यायाधीश द्वारा गठित विभिन्न समितियों की बैठकों के ब्योरे कभी फुल कोर्ट से साझा नहीं किए गए।
- न्यायिक कार्यों के आवंटन (Bench Allocation) और जजों की पदोन्नति/उन्नयन (Elevation/Promotion) के लिए कोई स्पष्ट, सहताबद्ध (Codified) और अधिसूचित मापदंड मौजूद नहीं हैं।
- जवाबदेही का अभाव:न्यायमूर्ति दिवाकर ने कहा कि प्रशासनिक स्तर पर लिए गए फैसलों की कोई स्वतंत्र ऑडिटिंग या जवाबदेही तय नहीं होती, जिससे पक्षपात (Favouritism) या बाहरी कारणों से फैसले लेने की गुंजाइश बनती है। इसका न्याय प्रशासन पर विनाशकारी प्रभाव पड़ता है।
प्रयागराज: उच्च न्यायालयों के आंतरिक प्रशासनिक संचालन, मुख्य न्यायाधीश के प्रशासनिक एकाधिकार बनाम अन्य साथी न्यायाधीशों की सहभागिता (Collegiate Deliberation), और उच्चतर न्यायपालिका में जवाबदेही व पारदर्शिता के गंभीर प्रश्नों पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक वर्तमान न्यायाधीश ने ऐतिहासिक और अप्रत्याशित आत्मनिरीक्षण वाली न्यायिक टिप्पणी दर्ज की है।
‘मुख्य न्यायाधीश-केंद्रित मॉडल’ को पुनर्संतुलित करने का आह्वान
अदालत ने अधीनस्थ न्यायपालिका में मामलों के निस्तारण में हो रही देरी, जमानत निर्देशों की अवहेलना और न्यायिक अनुशासन से जुड़े चार मामलों का निस्तारण करते हुए यह टिप्पणियां कीं। न्यायमूर्ति दिवाकर ने उच्च न्यायालय प्रशासन के ‘मुख्य न्यायाधीश-केंद्रित मॉडल’ (Chief Justice-Centric Model) को पुनर्संतुलित (Recalibrate) करने का आह्वान किया। निर्णय के एक फुटनोट में उन्होंने यहां तक दर्ज किया कि अदालत की पिछली दो फुल कोर्ट बैठकें ऐसी प्रतीत हुईं जैसे सत्तारूढ़ सरकार विश्वास मत के दौरान अपने सदस्यों को ‘व्हिप’ जारी करके प्रबंधित (Stage-managed) करती है, जो एक न्यायाधीश के संवैधानिक पद की गरिमा के प्रतिकूल है। न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने 80 पृष्ठों के अपने विस्तृत निर्णय में तल्ख टिप्पणी करते हुए रेखांकित किया कि पिछले 10 वर्षों में उच्च न्यायालय की केवल 16 फुल कोर्ट (Full Court) बैठकें आयोजित की गई हैं, जो संस्थागत संवाद की घोर कमी और प्रशासनिक असंतुलन को उजागर करता है।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ’10 वर्षों में मात्र 16 बैठकें; जजों की असहमति या सहमति का कोई रिकॉर्ड नहीं’ न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने फुल कोर्ट की विधिक प्रकृति का विश्लेषण करते हुए सवाल उठाया: “पिछले 10 वर्षों में मुख्य न्यायाधीश द्वारा केवल 16 फुल कोर्ट बैठकें बुलाई गई हैं। यह प्रश्न उठता है कि क्या फुल कोर्ट एक ऐसे सार्थक सामूहिक मंच (Meaningful Collegiate Forum) के रूप में कार्य कर रहा है जहां न्यायाधीशों के व्यक्तिगत विचारों पर विचार-विमर्श किया जाता है और उन्हें मान्यता दी जाती है?
फुल कोर्ट की कार्यवाहियों में व्यक्तिगत न्यायाधीशों की सहमति (Concurrence) या असहमति (Dissent) तक दर्ज नहीं की जाती। जहां कोई सामूहिक संस्था अपने सदस्यों के विचारों को दर्ज किए बिना प्रस्ताव पारित कर देती है, वहां वह विमर्श—जिसके लिए यह मंच अस्तित्व में है—रिकॉर्ड पर परिलक्षित ही नहीं होता।“
2. बैठकों को ‘स्टेज-मैनेज्ड’ करने पर तल्ख फुटनोट: निर्णय के फुटनोट में दर्ज न्यायिक टिप्पणी ने न्यायिक बिरादरी का ध्यान खींचा: “यह आभास हुआ कि इस न्यायालय की पिछली दो फुल कोर्ट बैठकें उसी तरह से स्टेज-मैनेज्ड (Stage-managed) थीं, जैसे कोई सरकार विश्वास मत के दौरान अपने सदस्यों को व्हिप जारी करके नियंत्रित करती है; और यह आचरण एक न्यायाधीश के पद की गरिमा पर सीधा आघात (Affronts the dignity of a Judge’s office) करता है।”
3. इलाहाबाद हाईकोर्ट नियमावली, 1952 के नियम 8 का खुला उल्लंघन: न्यायमूर्ति दिवाकर ने नियमों का हवाला देते हुए विधिक स्थिति स्पष्ट की:
- अध्याय III का नियम 8: मुख्य न्यायाधीश के लिए यह अनिवार्य है कि वह ग्रीष्मकालीन अवकाश को छोड़कर प्रत्येक तीन महीने में कम से कम एक बार फुल कोर्ट की बैठक बुलाए।
- नियम यह भी निर्धारित करता है कि यदि कम से कम 5 न्यायाधीश लिखित अनुरोध करते हैं, तो मुख्य न्यायाधीश को एक सप्ताह के भीतर अनिवार्य रूप से फुल कोर्ट बैठक आयोजित करनी होगी।
- 10 वर्षों में मात्र 16 बैठकों का होना दर्शाता है कि वैधानिक नियमों का पालन नियमित रूप से नहीं किया गया।
4. बैठकों के एजेंडे का अभाव और न्याय प्रशासन पर वार्षिक रिपोर्ट नदारद:
- अदालत ने पिछली 10 बैठकों के कार्यवृत्त (Minutes) का परीक्षण करते हुए पाया कि एजेंडा केवल न्यायिक अधिकारियों की सेवा शर्तों या वरिष्ठ अधिवक्ताओं के पदनाम (Senior Advocate Designation) तक ही सीमित रहा।
- अदालत ने दर्ज किया:“इस पूरी अवधि के दौरान न तो कोई सामान्य नीतिगत मामला, न ही न्यायालय की शक्तियों व प्रास्थिति को प्रभावित करने वाला कोई विषय, और न ही न्याय प्रशासन पर कोई वार्षिक रिपोर्ट (Annual Report on Administration of Justice) फुल कोर्ट के समक्ष रखी गई। वार्षिक रिपोर्ट न तो फुल कोर्ट में प्रस्तुत की गई और न ही नियमों के अनुसार शासन को भेजी गई, जो उच्च न्यायालय की प्रशासनिक संस्कृति को दर्शाता है।”
प्रशासनिक सुधारों की मांग: रोस्टर, पदोन्नति और स्वतंत्र ऑडिट
न्यायमूर्ति दिवाकर ने उच्च न्यायालय प्रशासन को अधिक लोकतांत्रिक और पारदर्शी बनाने के लिए निम्नलिखित गंभीर विधिक व संस्थागत मुद्दे उठाए:
- मुख्य न्यायाधीश द्वारा गठित कमेटियों की स्वायत्तता:
- मुख्य न्यायाधीश द्वारा विभिन्न विषयों पर गठित समितियों के निर्णयों या कार्यवृत्तों को कभी फुल कोर्ट के साथ साझा नहीं किया जाता। इससे यह गलत धारणा बनती है कि ये कमेटियां उच्च न्यायालय की संस्थागत व्यवस्था से पूरी तरह स्वतंत्र होकर कार्य कर रही हैं।
- न्यायिक कार्य का आवंटन (Allocation of Judicial Business / Roster):
- रोस्टर और मुकदमों के आवंटन में न्यायाधीशों के बीच किसी “सचेत और सहभागी संवाद” (Conscious and participative dialogue) का अभाव है।
- कार्य आवंटन का प्रदर्शन (Performance) से कोई संबंध नहीं है और उच्चतर स्तर पर पदोन्नति/उन्नयन (Elevation) के लिए कोई “परिभाषित, संहिताबद्ध और अधिसूचित मानदंड” (Codified and Notified Parameters) तय नहीं हैं।
- प्रशासनिक निर्णयों की स्वतंत्र ऑडिट (Independent Audit):
- अदालत ने रेखांकित किया कि प्रशासनिक पक्ष पर लिए जाने वाले निर्णयों की कोई जवाबदेही नहीं होती और वे किसी स्वतंत्र एजेंसी द्वारा ऑडिट के अधीन नहीं होते:
निर्णय का आदेशात्मक भाग (Directive)
न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने अपने निर्णय में चिन्हित किए गए गंभीर प्रशासनिक व संस्थागत मुद्दों के औपचारिक समाधान हेतु निर्देश दिया:
- उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार (अनुपालन) [Registrar (Compliance)] को आदेश दिया गया कि वे इस 80-पृष्ठों के विस्तृत निर्णय को तत्काल मुख्य न्यायाधीश के समक्ष विचारार्थ प्रस्तुत करें, ताकि मुख्य न्यायाधीश इन विधिक व प्रशासनिक विसंगतियों के निवारण हेतु उचित कदम उठा सकें।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: पप्पू मेट उर्फ पप्पू बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य [आपराधिक विविध याचिका – इलाहाबाद उच्च न्यायालय, प्रधान पीठ प्रयागराज]
- पीठ: न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर (एकल पीठ)
- निर्णय की तिथि: 28 सितंबर 2026
- निर्णय का आकार: 80 पृष्ठ (विस्तृत प्रशासनिक एवं न्यायिक दिशानिर्देश)
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक नियमावली:
- इलाहाबाद उच्च न्यायालय नियमावली, 1952 (Allahabad High Court Rules, 1952):
- अध्याय III का नियम 8 (फुल कोर्ट बैठक की अनिवार्यता – प्रत्येक 3 माह में एक बार अथवा 5 जजों के अनुरोध पर 1 सप्ताह के भीतर बैठक बुलाने का नियम)
- नियम 9 एवं 10 (न्याय प्रशासन पर वार्षिक रिपोर्ट तैयार करने व शासन को प्रेषित करने का वैधानिक दायित्व)
- भारत का संविधान:
- अनुच्छेद 216 (उच्च न्यायालय का गठन – मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीशों से मिलकर उच्च न्यायालय का बनना)
- अनुच्छेद 225 एवं 227 (उच्च न्यायालय की नियम बनाने की शक्ति और सभी अधीनस्थ न्यायालयों पर अधीक्षण की शक्ति)
- अनुच्छेद 235 (अधीनस्थ न्यायपालिका पर उच्च न्यायालय का नियंत्रण – जो व्यक्तिगत मुख्य न्यायाधीश में नहीं बल्कि संपूर्ण ‘उच्च न्यायालय’ यानी फुल कोर्ट में सामूहिक रूप से निहित है)
- इलाहाबाद उच्च न्यायालय नियमावली, 1952 (Allahabad High Court Rules, 1952):
- संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
- चीफ जस्टिस ऑफ आंध्र प्रदेश बनाम एल.वी.ए. दीक्षितुलु (1979, सुप्रीम कोर्ट 5-जज संविधान पीठ) — ‘अनुच्छेद 235 के तहत नियंत्रण केवल मुख्य न्यायाधीश का व्यक्तिगत अधिकार नहीं है, बल्कि यह उच्च न्यायालय की फुल कोर्ट में निहित सामूहिक शक्ति है।’
- स्टेट ऑफ राजस्थान बनाम प्रकाश चंद (1998, सुप्रीम कोर्ट) — ‘मुख्य न्यायाधीश मास्टर ऑफ रोस्टर हैं, परंतु संस्थागत शुचिता और प्रशासनिक मर्यादा बनाए रखना सर्वोपरि है।’
- सी. रविचंद्रन अय्यर बनाम जस्टिस ए.एम. भट्टाचार्जी (1995, सुप्रीम कोर्ट) — ‘न्यायिक स्वतंत्रता और न्यायिक आत्म-अनुशासन एक ही सिक्के के दो पहलू हैं; उच्च न्यायपालिका के भीतर आंतरिक लोकतंत्र संस्था के सम्मान की रक्षा करता है।’
- वर्तमान स्थिति: निर्णय की प्रति मुख्य न्यायाधीश के समक्ष औपचारिक अवलोकन और उपचारात्मक प्रशासनिक कदमों के लिए प्रेषित।
Full Court: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) |
| पीठ | न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर |
| मूल मामला | अधीनस्थ न्यायपालिका में देरी, जमानत निर्देशों का पालन न होना और न्यायिक अनुशासन से जुड़े 4 मामले। |
| मुख्य चिंता | नियम के तहत हर 3 महीने में होने वाली फुल कोर्ट बैठकों का न होना और प्रशासनिक निर्णयों में पारदर्शिता की कमी। |
| निर्देश | फैसले को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष विचारार्थ प्रस्तुत करने का निर्देश। |

