अदालत की सख्त टिप्पणियाँ (Key Observations)
- मामला बहुत सरल था:अदालत ने कहा कि शिकायत मिलते ही विभाग को अतिरिक्त राशि वापस कर देनी चाहिए थी। इसके बजाय विभाग ने मामला लंबित रखा और अदालत में सेंट्रल एक्साइज एक्ट, 1944 की धारा 11B का हवाला देते हुए हलफनामा दायर किया, जो उनकी नीयत पर सवाल उठाता है।
- दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई का आदेश:पीठ ने कहा:“याचिकाकर्ता को अनावश्यक रूप से इस अदालत का रुख करने के लिए मजबूर किया गया। दूसरी रसीद की तारीख से भुगतान की तारीख तक 12% वार्षिक ब्याज और ₹25,000 मुकदमेबाजी लागत के साथ ₹1,24,175 का रिफंड 4 सप्ताह के भीतर किया जाए।”अदालत ने निर्देश दिया कि विभाग यह जांच करे कि फाइल कहां रुकी हुई थी और ब्याज तथा हर्जाने की राशि दोषी अधिकारियों (Erring Officials) के वेतन/व्यक्तिगत खाते से वसूल की जाए।
पटना: सरकारी ई-गवर्नेंस पोर्टलों की तकनीकी खामियों, करदाताओं के खातों से दोहरी राशि की कटौती के बावजूद रिफंड अटकाने की प्रशासनिक हठधर्मिता और राजस्व अधिकारियों द्वारा मुकदमेबाजी को बढ़ावा देने की प्रवृत्ति पर पटना उच्च न्यायालय ने अत्यंत तल्ख टिप्पणी करते हुए पीड़ित करदाता को बड़ी विधिक राहत दी है।
न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद और न्यायमूर्ति सुनील दत्त मिश्रा की खंडपीठ ने 28 सितंबर 2026 के अपने विस्तृत आदेश में कर विभाग की कार्यप्रणाली पर कड़ा प्रहार किया। अदालत ने दो-टूक कहा कि विभाग ने अपनी ओर से मामले को लंबित रखकर कोई सद्भावना (Bonafide) प्रदर्शित नहीं की, जबकि मामला बेहद सीधा और स्पष्ट था। खंडपीठ ने विभाग को यह छूट भी दी कि वह देरी के लिए जिम्मेदार दोषी अधिकारियों (Erring Officials) की पहचान करे और चुकाए गए ब्याज व हर्जाने की राशि की वसूली उनके व्यक्तिगत वेतन से करे। उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने सेंट्रल जीएसटी एवं सीमा शुल्क (Customs) विभाग को निर्देश दिया है कि वह याचिकाकर्ता द्वारा अपील के पूर्व-जमा (Pre-deposit) के रूप में दो बार काटी गई ₹1.24 लाख की अतिरिक्त राशि को 12% वार्षिक ब्याज और ₹25,000 के मुकदमेबाजी खर्च (Litigation Costs) के साथ चार सप्ताह के भीतर वापस करे।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘बात बिल्कुल सीधी थी, रिफंड तुरंत होना चाहिए था’ न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद और न्यायमूर्ति सुनील दत्त मिश्रा की खंडपीठ ने विभाग द्वारा दायर जवाबी हलफनामे (Counter-Affidavit) में केंद्रीय उत्पाद शुल्क अधिनियम, 1944 की धारा 11B की तकनीकी आड़ लेने पर नाराजगी जताते हुए कहा:
“मामले को अपने स्तर पर लंबित रखकर विभाग ने अपनी कोई सद्भावना (Bonafide) नहीं दिखाई है। बात बिल्कुल सीधी और स्पष्ट (Things were very simple) थी। जैसे ही करदाता की ओर से शिकायतें प्राप्त हुई थीं, पैसा तत्काल वापस कर दिया जाना चाहिए था, न कि विभाग केंद्रीय उत्पाद शुल्क अधिनियम, 1944 की धारा 11B पर भरोसा करते हुए अदालत में जवाबी हलफनामा दायर कर इस गलती का बचाव करे।”
2. नागरिक को बेवजह अदालत की चौखट तक घसीटा गया: खंडपीठ ने पाया कि विभाग की प्रशासनिक निष्क्रियता और असंवेदनशीलता के कारण नागरिक को न्याय पाने के लिए मजबूरन संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय की शरण में आना पड़ा: “याचिकाकर्ता को अनावश्यक रूप से इस न्यायालय का दरवाजा खटखटाने के लिए बाध्य (Unnecessarily compelled to approach this Court) किया गया है। इसलिए, विभाग द्वारा 4 सप्ताह के भीतर ₹1,24,175 की मूल राशि दूसरी रसीद की तिथि से वास्तविक भुगतान तक 12% प्रति वर्ष के ब्याज के साथ लौटाई जाएगी, साथ ही ₹25,000 का वाद-व्यय भी दिया जाएगा।”
3. दोषी अधिकारियों से वसूली (Personal Accountability) का आदेश: अदालत ने स्पष्ट किया कि राजस्व खजाने या जनता के कर के पैसे से इस लापरवाही की भरपाई नहीं होनी चाहिए:
- प्रतिवादी विभाग इस बात की आंतरिक जांच कर सकता है कि फाइल किस अधिकारी की टेबल पर कितने समय तक रुकी रही।
- अदालत ने विभाग को निर्देश दिया कि ब्याज और मुकदमेबाजी खर्च के रूप में दी जाने वाली अतिरिक्त राशि की वसूली सीधे उन “दोषी अधिकारियों” (Erring Officials) से की जाए जिन्होंने शिकायत पर ससमय कार्रवाई नहीं की।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि: ICEGATE पोर्टल का एरर और दोहरी अदायगी
- सेवा कर (Service Tax) की मांग:
- सितंबर 2022 में संयुक्त आयुक्त, सीजीएसटी और केंद्रीय उत्पाद शुल्क, पटना-I द्वारा पटना निवासी शशि कांत सिंह के खिलाफ ₹16.56 लाख की सेवा कर मांग का आदेश पारित किया गया था।
- अपील और अनिवार्य पूर्व-जमा (Pre-deposit):
- सिंह ने नवंबर 2022 में आयुक्त (अपील) के समक्ष इस मांग को चुनौती दी। अपीलीय प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए कानूनन मांग का एक निश्चित प्रतिशत (लगभग ₹1.24 लाख) प्री-डिपॉजिट के रूप में जमा करना अनिवार्य था।
- ICEGATE पोर्टल की तकनीकी विफलता:
- याचिकाकर्ता के अधिवक्ता कुमारेश सिंह के अनुसार, 16 जून 2023 को सिंह ने भारतीय सीमा शुल्क इलेक्ट्रॉनिक गेटवे (ICEGATE Portal) के माध्यम से एसबीआई (SBI) इंटरनेट बैंकिंग का उपयोग कर ₹1,24,175 का भुगतान किया।
- बैंक खाते से पैसे तुरंत कट गए (Debited), परंतु ICEGATE पोर्टल पर एक तकनीकी त्रुटि (Error) दिखाई दी जिसमें कहा गया कि “क्लाइंट मौजूद नहीं है और बैंक ने गलत क्लाइंट आईडी प्रदान की है।”
- RTGS के जरिए दूसरा भुगतान और अधूरी राहत:
- पोर्टल द्वारा कोई रसीद या पावती जारी न किए जाने और अपील दायर करने की वैधानिक समय-सीमा समाप्त होने के डर से करदाता ने उसी दिन (16 जून 2023) आरटीजीएस (RTGS) के माध्यम से दोबारा ₹1,24,175 का भुगतान कर दिया।
- करदाता ने तुरंत ICEGATE हेल्पडेस्क से संपर्क किया, जहां उन्हें 72 घंटे के भीतर पहली राशि स्वतः वापस (Refund) होने का आश्वासन दिया गया। परंतु महीनों बीत जाने और बार-बार शिकायतें दर्ज कराने के बाद भी विभाग ने राशि वापस नहीं की और फाइल को दबाए रखा।
विधिक एवं प्रशासनिक विश्लेषण: सरकारी पोर्टलों की जवाबदेही
- केंद्रीय उत्पाद शुल्क अधिनियम, 1944 की धारा 11B (रिफंड के दावे):
- विभाग ने दलील दी थी कि किसी भी रिफंड के लिए धारा 11B के तहत विधिवत औपचारिक आवेदन और प्रक्रिया का पालन किया जाना आवश्यक है।
- उच्च न्यायालय ने इस औपचारिकता को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि धारा 11B कर के रूप में अधिक चुकाए गए धन के लिए है; पोर्टल के तकनीकी एरर के कारण सिस्टम द्वारा काटा गया दोहरा प्री-डिपॉजिट सरकार का वैध राजस्व (Revenue) नहीं है, बल्कि यह अनुचित प्रतिधारण (Unjust Retention) है, जिसे बिना किसी तकनीकी अड़ंगे के तुरंत वापस किया जाना चाहिए।
- संविधान का अनुच्छेद 265 (विधि के प्राधिकार के बिना कर नहीं):
- संविधान का अनुच्छेद 265 यह सुनिश्चित करता है कि कानून के अधिकार के बिना कोई कर न तो लगाया जा सकता है और न ही वसूला जा सकता है। सरकार किसी नागरिक के खाते से तकनीकी खराबी के चलते कटे धन को बिना किसी विधिक प्राधिकार के अपने पास नहीं रख सकती।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: शशि कांत सिंह बनाम भारत संघ व अन्य [सिविल रिट क्षेत्राधिकार – पटना उच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद और न्यायमूर्ति सुनील दत्त मिश्रा (खंडपीठ)
- आदेश की तिथि: 28 सितंबर 2026
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (करदाता) की ओर से: अधिवक्ता कुमारेश सिंह
- प्रतिवादी विभाग (CGST एवं सीमा शुल्क) की ओर से: केंद्र सरकार/राजस्व अधिवक्ता
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
- वित्त अधिनियम, 1994 (Service Tax Provisions):
- धारा 35F (अपील दायर करने हेतु अनिवार्य पूर्व-जमा / Pre-deposit)
- केंद्रीय उत्पाद शुल्क अधिनियम, 1944:
- धारा 11B (रिफंड दावा प्रक्रिया की सीमाएं)
- भारत का संविधान:
- अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार)
- अनुच्छेद 265 (विधि के प्राधिकार के बिना करों का अधिरोपण न किया जाना)
- अनुच्छेद 300A (संपत्ति का अधिकार – बिना विधिक प्रक्रिया के नागरिक के धन को रोकना अवैध)
- वित्त अधिनियम, 1994 (Service Tax Provisions):
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- सैल स्टील लिमिटेड बनाम भारत संघ (सुप्रीम कोर्ट) — ‘सरकारी पोर्टलों (GSTN/ICEGATE) की तकनीकी विफलताओं का खामियाजा करदाताओं पर नहीं डाला जा सकता; सिस्टम ग्लिच पर त्वरित प्रशासनिक सुधार राज्य का दायित्व है।’
- लखनऊ विकास प्राधिकरण बनाम एम.के. गुप्ता (1994, सुप्रीम कोर्ट) — ‘प्रशासनिक उत्पीड़न और नागरिकों को अनावश्यक अदालत घसीटने के मामलों में मुआवजा और हर्जाना दोषी अधिकारियों के व्यक्तिगत वेतन से वसूला जाना चाहिए।’
- अंतिम परिणाम: रिट याचिका स्वीकृत; सीजीएसटी और सीमा शुल्क विभाग को 4 सप्ताह के भीतर ₹1,24,175 की मूल राशि, 12% वार्षिक ब्याज और ₹25,000 मुकदमेबाजी खर्च चुकाने का आदेश; दोषी अधिकारियों से वसूली की छूट।
Custom Tax: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | पटना उच्च न्यायालय (Patna High Court) |
| पीठ | न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद एवं न्यायमूर्ति सुनील दत्त मिश्रा |
| करदाता (याचिकाकर्ता) | शशिकांत सिंह (पटना निवासी) |
| विवाद का कारण | ICEGATE पोर्टल की तकनीकी खराबी के कारण अपील के लिए आवश्यक पूर्व-जमा राशि (₹1.24 लाख) दो बार कट जाना। |
| अदालत का आदेश | ₹1,24,175 का रिफंड, 12% वार्षिक ब्याज, ₹25,000 हर्जाना; दोषी अधिकारियों से राशि वसूलने की छूट। |

