अदालत के मुख्य निष्कर्ष (Key Findings)
- धर्मांतरण का स्वतंत्र सबूत आवश्यक:हाईकोर्ट ने माना कि केवल आर्य समाज या हिंदू रीति-रिवाजों से शादी कर लेना ही धर्मांतरण सिद्ध नहीं करता। अदालत ने कहा:“धर्मांतरण को साबित करने वाली किसी स्वतंत्र सामग्री के अभाव में, केवल हिंदू रीति-रिवाजों से विवाह संपन्न होना यह स्थापित नहीं कर सकता कि याचिकाकर्ता का पति HMA की धारा 2 के तहत ‘हिंदू’ था। HMA के तहत विवाह केवल तभी वैध है जब वह दो हिंदुओं के बीच संपन्न हुआ हो।”
- नागरिकता की शर्त और पोर्टल में बदलाव के निर्देश:अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता को संवैधानिक चुनौती देने का अधिकार (Locus Standi) नहीं है। हालांकि, विदेशी नागरिकों, ओवरसीज सिटीजन्स ऑफ इंडिया (OCI) कार्डधारकों और भारतीय मूल के लोगों (PIO) के हित में हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार को ऑनलाइन पोर्टल में तकनीकी सुधार करने का निर्देश दिया।
- वैकल्पिक पहचान सत्यापन (Alternative ID Verification):अदालत ने निर्देश दिया कि जो विदेशी नागरिक या OCI कार्डधारक अन्य भारतीय विशिष्ट पहचान पत्र (जैसे आधार) का उपयोग करने में असमर्थ हैं, उन्हें अपने वैध पासपोर्ट (Passports) या OCI कार्ड के माध्यम से पहचान सत्यापित करने की सुविधा दी जाए।
नई दिल्ली: हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (HMA) के व्यक्तिगत दायरे (Personal Scope), विदेशी नागरिकों द्वारा आर्य समाज मंदिर में किए गए विवाह की कानूनी मान्यता, और दिल्ली में अनिवार्य विवाह पंजीकरण के डिजिटल नियमों पर दिल्ली हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है।
स्वीडिश महिला की याचिका का निस्तारण करते हुए फैसला सुनाया
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की खंडपीठ ने एक स्वीडिश महिला की याचिका का निस्तारण करते हुए यह फैसला सुनाया। याचिका में दिल्ली सरकार के राजस्व विभाग के उन दिशा-निर्देशों और ‘दिल्ली (विवाह का अनिवार्य पंजीकरण) आदेश, 2014’ के नागरिकता संबंधी मापदंडों को चुनौती दी गई थी, जिनके तहत HMA के अंतर्गत विवाह पंजीकरण के लिए कम से कम एक पक्षकार का भारतीय नागरिक और संबंधित विवाह अधिकारी के क्षेत्राधिकार का स्थायी निवासी होना अनिवार्य किया गया है। उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि मात्र हिंदू रीति-रिवाजों और संस्कारों के अनुसार विवाह संपन्न कर लेना इस बात का निर्णायक या अकाट्य प्रमाण (Conclusive Proof) नहीं माना जा सकता कि किसी व्यक्ति ने हिंदू धर्म अपना लिया है या वह हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 2 के अर्थ में हिंदू है।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. केवल रस्में धर्म परिवर्तन साबित नहीं करतीं; दोनों पक्षों का हिंदू होना जरूरी: मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की खंडपीठ ने हिंदू विवाह अधिनियम की प्रयोज्यता स्पष्ट करते हुए कहा:
“धर्म परिवर्तन (Conversion) को प्रमाणित करने वाली किसी स्वतंत्र और पुख्ता सामग्री के अभाव में, केवल हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह का संपन्न होना अपने आप में यह स्थापित नहीं कर सकता कि याचिकाकर्ता का पति हिंदू विवाह अधिनियम (HMA) की धारा 2 के अर्थ में एक हिंदू था।
हिंदू विवाह अधिनियम के तहत एक विवाह केवल तभी पूर्णतः वैध माना जाता है जब वह दो हिंदुओं के बीच हिंदू विधि द्वारा निर्धारित अनिवार्य रीति-रिवाजों और संस्कारों (Essential Rites and Ceremonies) के अनुसार संपन्न हुआ हो।”
2. नागरिकता और अधिवास संबंधी नियमों की संवैधानिकता:
- अदालत ने माना कि दिल्ली सरकार के दिशा-निर्देश—जिनके तहत कम से कम एक जीवनसाथी का भारतीय नागरिक और विवाह अधिकारी के स्थानीय क्षेत्राधिकार का स्थायी निवासी होना आवश्यक है—पूरी तरह तर्कसंगत हैं।
- अदालत ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता विदेशी नागरिक होने के नाते संविधान के मूल अधिकारों के तहत इस नीति को मनमाना बताकर चुनौती देने का उचित विधिक अधिकार (Locus Standi) नहीं रखती थी।
3. ऑनलाइन पोर्टल में तकनीकी सुधार और वैकल्पिक सत्यापन का निर्देश: विदेशी नागरिकों, प्रवासी भारतीयों (NRIs), ओसीआई (OCI) कार्डधारकों और भारतीय मूल के व्यक्तियों (PIOs) को होने वाली व्यावहारिक कठिनाइयों को संज्ञान में लेते हुए उच्च न्यायालय ने दिल्ली सरकार को स्पष्ट सुधारात्मक निर्देश जारी किए:
“दिल्ली सरकार ऑनलाइन विवाह पंजीकरण पोर्टल में तकनीकी बाधाओं को दूर करते हुए आवश्यक संशोधन करे और इसे पूरी तरह संचालित करे। यह व्यवस्था उन आवेदकों को—जो आधार-आधारित प्रमाणीकरण का उपयोग करने में असमर्थ हैं (जिनमें विदेशी नागरिक और OCI कार्डधारक शामिल हैं)—वैध पासपोर्ट या ओसीआई कार्ड जैसे उपयुक्त वैकल्पिक दस्तावेजों के माध्यम से अपनी पहचान सत्यापित करने और विवाह पंजीकरण प्रक्रिया को पूरा करने की प्रभावी सुविधा प्रदान करेगी।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि: स्वीडिश जोड़े का विवाह और पंजीकरण विवाद
- आर्य समाज विवाह और प्रमाण पत्र:
- याचिकाकर्ता (एक स्वीडिश महिला) ने मार्च 2026 में एक स्वीडिश पुरुष से विवाह किया था।
- महिला का दावा था कि उसके पति ने विवाह से पूर्व दिल्ली स्थित एक आर्य समाज मंदिर में वैदिक रीति-रिवाजों के अनुसार हिंदू धर्म स्वीकार किया था।
- आर्य समाज मंदिर ने विवाह संपन्न कराने के बाद उन्हें औपचारिक विवाह प्रमाण पत्र जारी किया था।
- पंजीकरण में अस्वीकृति और हाईकोर्ट में चुनौती:
- महिला ने दिल्ली सरकार के राजस्व पोर्टल पर हिंदू विवाह अधिनियम के तहत अनिवार्य पंजीकरण के लिए ऑनलाइन आवेदन किया।
- पोर्टल ने आवेदन को आगे प्रोसेस करने से रोक दिया क्योंकि दिल्ली सरकार के नियमों के अनुसार कम से कम एक पक्षकार का भारतीय नागरिक होना और स्थानीय पते का प्रमाण होना अनिवार्य है।
- महिला ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर तर्क दिया कि HMA में हिंदू पहचान या धर्मांतरण को साबित करने के लिए कोई अलग प्रक्रिया निर्धारित नहीं है, अतः आर्य समाज के विवाह प्रमाण पत्र और रीति-रिवाजों के साक्ष्य के बाद अतिरिक्त स्वतंत्र प्रमाण मांगना मनमाना है।
- दिल्ली सरकार का विधिक विरोध:
- दिल्ली सरकार ने दलील दी कि केवल विवाह की रस्मों को निभा लेना कानूनन धर्म की स्थिति का स्वतः प्रमाण नहीं बन सकता।
- चूंकि HMA स्पष्ट रूप से केवल हिंदू धर्म मानने वाले व्यक्तियों पर लागू होता है, इसलिए किसी विदेशी नागरिक के वास्तविक धर्मांतरण के स्वतंत्र दस्तावेजी साक्ष्य के बिना उसे अधिनियम के दायरे में नहीं लाया जा सकता।
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: क्या कहता है हिंदू विवाह अधिनियम, 1955?
- धारा 2 (अधिनियम की प्रयोज्यता – Application of Act):
- HMA की धारा 2(1) स्पष्ट करती है कि यह कानून किसी भी ऐसे व्यक्ति पर लागू होता है जो धर्म से हिंदू, वीरशैव, लिंगायत, ब्रह्म समाजी, प्रार्थना समाजी या आर्य समाजी हो, अथवा जो बौद्ध, जैन या सिख धर्म का अनुयायी हो।
- धारा 2(3): इसमें स्पष्ट किया गया है कि ‘हिंदू’ शब्द की व्याख्या उसी संदर्भ में की जाएगी। यदि कोई व्यक्ति केवल औपचारिकता के लिए विवाह की रस्में निभाता है और वास्तविक धर्मांतरण (Bona fide conversion) सिद्ध नहीं होता, तो वह अधिनियम के लाभ का दावा नहीं कर सकता।
- धारा 5 (हिंदू विवाह की अनिवार्य शर्तें):
- अधिनियम की धारा 5 की प्रस्तावना ही कहती है: “दो हिंदुओं के बीच विवाह अनुष्ठापित किया जा सकता है…” (A marriage may be solemnized between any two Hindus)।
- यदि दोनों पक्षों में से कोई एक भी हिंदू नहीं है, तो उनका विवाह HMA के तहत पंजीकृत या वैध नहीं हो सकता; ऐसे मामलों में विवाह केवल विशेष विवाह अधिनियम, 1954 (Special Marriage Act, 1954) के तहत ही संपन्न या पंजीकृत कराया जा सकता है।
- धारा 7 (विवाह के संस्कार):
- सप्तपदी और आवश्यक संस्कारों का पालन तभी वैधानिक माना जाता है जब दोनों पक्षकार विधिक रूप से हिंदू हों।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: याचिकाकर्ता (स्वीडिश नागरिक) बनाम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार [रिट याचिका (सिविल) – दिल्ली उच्च न्यायालय]
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया (खंडपीठ)
- आदेश की तिथि: 1 अक्टूबर 2026
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक नियमावली:
- हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (HMA, 1955):
- धारा 2 (अधिनियम की प्रयोज्यता एवं हिंदू की परिभाषा)
- धारा 5 (वैध विवाह की अनिवार्य पूर्व-शर्तें – दोनों का हिंदू होना)
- धारा 7 (विवाह के आवश्यक संस्कार व रस्में)
- धारा 8 (हिंदू विवाहों का पंजीकरण)
- विशेष विवाह अधिनियम, 1954 (SMA, 1954) (विभिन्न धर्मों या विदेशी नागरिकों के मध्य सिविल विवाह पंजीकरण)
- दिल्ली (विवाह का अनिवार्य पंजीकरण) आदेश, 2014
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार)
- हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (HMA, 1955):
- संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
- सरला मुद्गल बनाम भारत संघ (1995, सुप्रीम कोर्ट) एवं लिली थॉमस बनाम भारत संघ (2000) — ‘धर्मांतरण वास्तविक, सच्चा और अंतःकरण से होना चाहिए; केवल किसी वैधानिक कानून का लाभ उठाने या विवाह करने के उद्देश्य से किया गया दिखावटी धर्मांतरण कानून की नजर में अमान्य है।’
- पेरुमल नादर बनाम पोन्नुस्वामी (सुप्रीम कोर्ट) — ‘हिंदू धर्म में औपचारिक रूपांतरण के लिए संबंधित व्यक्ति का वास्तविक इरादा और समाज द्वारा उसे स्वीकार किया जाना आवश्यक है, मात्र रस्में पर्याप्त नहीं हैं।’
- अंतिम निर्णय: संवैधानिक चुनौती खारिज; व्यवस्था दी गई कि मात्र रस्मों से धर्मांतरण या हिंदू दर्जा स्वतः सिद्ध नहीं होता; दिल्ली सरकार को ऑनलाइन पोर्टल में सुधार कर विदेशी नागरिकों/OCI कार्डधारकों हेतु पासपोर्ट आधारित वैकल्पिक पहचान सत्यापन उपलब्ध कराने का निर्देश।
Hindu Marriage: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| पीठ | मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय एवं न्यायमूर्ति तेजस कारिया |
| याचिकाकर्ता | एक स्वीडिश महिला (जिसने स्वीडिश पुरुष से आर्य समाज मंदिर में विवाह किया था) |
| मूल विवाद | दिल्ली राजस्व विभाग के उन दिशानिर्देशों को चुनौती, जिनमें HMA के तहत विवाह पंजीकरण के लिए कम से कम एक पति या पत्नी का भारतीय नागरिक होना अनिवार्य है। |
| अदालत का फैसला | संवैधानिक चुनौती खारिज; लेकिन विदेशी नागरिकों/OCI कार्डधारकों के लिए विवाह पंजीकरण पोर्टल में तकनीकी सुधार का निर्देश। |

