फरवरी 2026 का मूल अंतरिम आदेश क्या था?
उच्च न्यायालय ने अपने 6 फरवरी 2026 के अंतरिम आदेश में निर्देश दिया था कि:
- प्लास्टिक या PET बोतलों में बिकने वाले पानी पर कम से कम 10 फोंट साइज में गहरे लाल रंग (Bold Red Letters) में लिखा जाना चाहिए: “This water may contain Micro/Nano Plastics” (इस पानी में माइक्रो/नैनो प्लास्टिक हो सकते हैं)।
- प्लास्टिक या पॉलिथीन में पैक कर बेचे जाने वाले नमक और चीनी पर भी इसी तरह की चेतावनी अंकित की जानी चाहिए।
- FSSAI को निर्माताओं को इस संबंध में अधिसूचित कर इसे लागू करने का निर्देश दिया गया था।
यह आदेश राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, चंडीगढ़, हरियाणा, कर्नाटक और महाराष्ट्र से एकत्र किए गए बोतलबंद पानी और पैक्ड नमक/चीनी के नमूनों में माइक्रोप्लास्टिक पाए जाने के अध्ययनों के बाद जारी किया गया था।
अदालत के प्रमुख निष्कर्ष और टिप्पणियां (Key Findings)
- 1. सच उजागर करना अनिवार्य (Disclosure of Truth):अदालत ने कहा कि जब FSSAI और निर्माताओं ने स्वयं उत्पादों के भीतर माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी से इनकार नहीं किया है, तो लेबल पर इसकी जानकारी देना अनिवार्य है। पीठ ने कहा:“यदि किसी उत्पाद के भीतर कुछ मौजूद है, तो उसे लेबल पर उजागर करना अनिवार्य होगा। लेबलिंग के पीछे का मूल सिद्धांत जानकारी और सच को उजागर करना है।”
- 2. व्यावसायिक नुकसान की आड़ नहीं ली जा सकती:अदालत ने उद्योग निकायों के इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया कि इस चेतावनी से व्यवसाय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। कोर्ट ने कहा कि संभावित व्यावसायिक नुकसान के डर से असुविधाजनक तथ्यों को दबाया नहीं जा सकता।
- 3. स्वास्थ्य जोखिम की निश्चितता बनाम संभावना (Food Safety Act, 2006):FSSAI का तर्क था कि चूंकि मानव स्वास्थ्य पर इसके वास्तविक नुकसान की सटीक मात्रा अभी वैज्ञानिक रूप से पूरी तरह सिद्ध नहीं हुई है, इसलिए आदेश समयपूर्व है। इसके जवाब में कोर्ट ने ‘खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006’ का हवाला देते हुए कहा कि सुरक्षा उपायों के लिए शब्द ‘संभावित’ (Potential) और ‘संदेह के वाजिब कारण’ (Reasonable grounds to suspect) होते हैं, न कि शत-प्रतिशत अकाट्य सबूत।
- 4. जैविक प्रभाव और गंभीर चिंताएं:कोर्ट ने वैज्ञानिक अध्ययनों का हवाला देते हुए कहा कि माइक्रो/नैनो प्लास्टिक जैविक सीमाओं (Biological Barriers) को पार कर भ्रूण (Placenta) और मां के दूध में भी पाए गए हैं। यदि यह कण भ्रूण तक पहुंचते हैं, तो स्थिति अत्यंत चिंताजनक है।
- 5. अन्य देशों से तुलना खारिज:उद्योग निकायों का तर्क था कि अन्य देशों में ऐसा लेबल अनिवार्य नहीं है और भारत में इसे लागू करने से अनावश्यक भय फैलेगा। इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि भारत में बोतलबंद पानी पर अत्यधिक निर्भरता, जलवायु परिस्थितियां और नकली पैकेजिंग जैसी समस्याएं हैं, इसलिए भारत की तुलना दूसरे देशों से नहीं की जा सकती।
चेन्नई: पैकेज्ड पेयजल (Bottled Water), प्लास्टिक पैकेटों में बिकने वाले नमक और चीनी में मौजूद माइक्रो एवं नैनो प्लास्टिक्स (Micro/Nano Plastics), उपभोक्ताओं के सूचना पाने के मौलिक अधिकार और खाद्य सुरक्षा मानकों पर मद्रास हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक एवं जनहितकारी फैसला सुनाया है।
न्यायमूर्ति एन. सतीश कुमार और न्यायमूर्ति डी. भरत चक्रवर्ती की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि जब तक FSSAI मानव स्वास्थ्य पर माइक्रोप्लास्टिक के सटीक जोखिमों का अध्ययन पूरा कर रहा है, तब तक उपभोक्ताओं को यह सूचित करना कि उत्पाद में माइक्रो/नैनो प्लास्टिक हो सकते हैं, एक न्यूनतम पारदर्शी कदम (Bare Minimum Measure) है। अदालत ने पैकेजिंग उद्योग के इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया कि इस प्रकार की चेतावनियों से व्यापार को नुकसान पहुंचेगा। उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) और पैकेजिंग उद्योग संगठनों की पुनर्विचार (Review) व रिकॉल याचिकाओं को पूरी तरह खारिज करते हुए 6 फरवरी 2026 के अपने उस अंतरिम आदेश को वापस लेने से साफ इनकार कर दिया, जिसके तहत निर्माताओं को उत्पादों पर चेतावनी लेबल लगाना अनिवार्य किया गया था।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘असुविधाजनक सत्यों को कालीन के नीचे नहीं दबाया जा सकता’ न्यायमूर्ति एन. सतीश कुमार और न्यायमूर्ति डी. भरत चक्रवर्ती की खंडपीठ ने उद्योग संगठनों द्वारा संभावित व्यापारिक नुकसान (Commercial Backlash) की दलीलों पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा:
*”यदि किसी उत्पाद के भीतर कोई तत्व मौजूद है, तो लेबल पर उसका प्रकटीकरण (Disclosure) करना वैधानिक रूप से अनिवार्य होगा। लेबलिंग का मूल सिद्धांत ही सूचना और सत्य का प्रकटीकरण (Disclosure of Information/Truth) है।
उद्योग की ये दलीलें केवल एक कल्पित व्यापारिक नुकसान के डर से असुविधाजनक तथ्यों को कालीन के नीचे दबाने (Sweeping inconvenient facts under the carpet) जैसी हैं, जिन्हें स्वीकार नहीं किया जा सकता।”*
2. 6 फरवरी 2026 का आदेश निष्पक्ष और न्यूनतम था: पीठ ने आदेश को वापस लेने की मांग को खारिज करते हुए रेखांकित किया:
“6 फरवरी 2026 का आदेश बिना किसी सुरक्षा पर आक्षेप लगाए या बिना कोई अनावश्यक घबराहट पैदा किए, केवल नितांत आवश्यक न्यूनतम कदम उठाता है—अर्थात उपभोक्ता को यह सूचित करना कि खाद्य सामग्री में माइक्रो/नैनो प्लास्टिक हो सकते हैं। पुनर्विचार याचिकाकर्ताओं का यह तर्क कि मानव शरीर इन कणों को किस हद तक सहन कर सकता है इसका निर्धारण पहले होना चाहिए, अप्रासंगिक हो जाता है। हमें अपने आदेश की समीक्षा या उसे वापस लेने का कोई कारण नजर नहीं आता।”
3. पानी के स्रोत बनाम प्लास्टिक बोतल के बहाने पर दो-टूक:
- उद्योग की इस दलील को भी अदालत ने खारिज कर दिया कि माइक्रोप्लास्टिक बोतल से नहीं बल्कि मूल जल स्रोत (Water Source) से आ रहे हैं:“कारण चाहे जो भी हो, स्रोत चाहे जो हो, यदि बोतल के भीतर बंद पानी में माइक्रो/नैनो प्लास्टिक पाए जाते हैं, तो उपभोक्ता को इसकी जानकारी पाने का पूरा अधिकार है।”
क्या था 6 फरवरी 2026 का अंतरिम निर्देश?
उच्च न्यायालय ने अपने पूर्ववर्ती आदेश में निम्नलिखित अनिवार्य निर्देश जारी किए थे, जिन्हें अब यथावत लागू रखने का आदेश दिया गया है:
- बोतलबंद पानी पर लाल अक्षरों में लेबल: प्लास्टिक या पीईटी (PET) बोतलों में बिकने वाले पेयजल पर कम से कम 10 फॉन्ट साइज (Font Size 10) और बोल्ड लाल अक्षरों (Bold Red Letters) में यह घोषणा अनिवार्य रूप से छपी होनी चाहिए:“This water may contain Micro/Nano Plastics” (इस पानी में माइक्रो/नैनो प्लास्टिक हो सकते हैं)
- चीनी और नमक की प्लास्टिक पैकेजिंग पर चेतावनी: प्लास्टिक या पॉलिथीन पाउच में बिकने वाली चीनी और नमक पर भी इसी प्रकार की चेतावनी अंकित की जानी चाहिए।
- FSSAI का प्रवर्तन दायित्व: FSSAI को निर्देश दिया गया था कि वह सभी निर्माताओं को इसकी अधिसूचना जारी करे और देश भर में इसका कड़ा प्रवर्तन सुनिश्चित करे।
राजस्थान से महाराष्ट्र तक के नमूनों में मिले थे माइक्रोप्लास्टिक
- वैज्ञानिक साक्ष्य: यह न्यायिक निर्देश तब सामने आया था जब राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, चंडीगढ़, हरियाणा, कर्नाटक और महाराष्ट्र से एकत्र किए गए व्यावसायिक बोतलबंद पानी के नमूनों में माइक्रोप्लास्टिक कणों की उपस्थिति सिद्ध हुई थी। इसके अलावा प्लास्टिक पाउच में बिकने वाले नमक और चीनी में भी इसके उच्च स्तर दर्ज किए गए थे।
- भ्रूण और प्लेसेंटा में प्रवेश का गंभीर खतरा:
- उच्च न्यायालय ने अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक अनुसंधानों का हवाला देते हुए रेखांकित किया कि माइक्रो और नैनो प्लास्टिक जैविक बाधाओं (Biological Barriers) को पार कर रहे हैं।
- अदालत ने चिंता जताई कि ये कण मानव प्लेसेंटा (गर्भनाल) और मां के दूध (Breast Milk) तक में पाए गए हैं:“यदि ये कण प्लेसेंटा को पार करके विकासशील भ्रूण (Developing Embryo) का हिस्सा बन रहे हैं, तो स्थिति वास्तव में अत्यंत गंभीर और चिंताजनक है।”
‘दूसरे देशों से तुलना नहीं की जा सकती’: भारत की विशिष्ट जमीनी हकीकत
याचिकाकर्ताओं के इस तर्क पर कि विकसित देशों ने ऐसी लेबलिंग लागू नहीं की है, अदालत ने भारतीय परिस्थितियों का विश्लेषण करते हुए कहा:
- भारत में बोतलबंद पानी पर व्यापक निर्भरता है।
- यहां की अत्यधिक गर्म जलवायु, धूप में खुले रखे जाने वाले प्लास्टिक कंटेनरों की स्थिति और बोतलों की अवैध रीफिलिंग व जालसाजी (Counterfeiting) जैसी जमीनी समस्याएं अन्य देशों से बिल्कुल अलग हैं।
- अतः इसे किसी अन्य देश की नीतियों से तौला नहीं जा सकता; यह भारत के जनस्वास्थ्य से जुड़ा अत्यंत संवेदनशील मामला है।
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: एहतियाती सिद्धांत (Precautionary Principle)
- खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 (FSSA, 2006):
- अधिनियम के प्रावधान स्पष्ट करते हैं कि जब किसी संभावित हानिकारक प्रभाव की पहचान हो चुकी हो, भले ही उस पर अंतिम वैज्ञानिक निश्चितता (Definitive Epidemiological Proof) लंबित हो, तब भी विनियामक संस्थाएं अनंतिम जोखिम-प्रबंधन उपाय (Provisional Risk-Management Measures) अपना सकती हैं।
- अदालत ने रेखांकित किया कि कानून की भाषा में ‘संभावित’ (Potential) और ‘उचित संदेह’ (Reasonable grounds to suspect) के आधार पर कदम उठाना वैध है, न कि पूर्ण नुकसान होने तक हाथ पर हाथ धरे बैठे रहना।
- संविधान का अनुच्छेद 21 एवं उपभोक्ता संरक्षण:
- स्वास्थ्य का अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार है। उपभोक्ताओं को यह जानने का विधिक अधिकार है कि वे जो उपभोग कर रहे हैं उसमें क्या निहित है, ताकि वे सूचित विकल्प (Informed Choice) चुन सकें।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) बनाम पेट पैकेजिंग एसोसिएशन फॉर क्लीन एनवायरनमेंट (PACE) व अन्य [समीक्षा / रिकॉल आवेदन – मद्रास उच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति एन. सतीश कुमार और न्यायमूर्ति डी. भरत चक्रवर्ती (खंडपीठ)
- निर्णय की तिथि: 28 सितंबर 2026
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- FSSAI की ओर से: अपर सॉलिसिटर जनरल (ASG) ए.आर.एल. सुंदरेशन
- उद्योग निकायों (PACE, पैकेज्ड वाटर एसोसिएशन) एवं अन्य की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्तागण
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 (FSSA, 2006):
- धारा 18 (सामान्य सिद्धांत – एहतियाती दृष्टिकोण और पारदर्शिता)
- धारा 23 एवं 24 (पैकेजिंग और खाद्य पदार्थों की लेबलिंग के मानक तथा भ्रामक दावों पर रोक)
- खाद्य सुरक्षा और मानक (पैकेजिंग एवं लेबलिंग) विनियम
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 21 (स्वास्थ्य का अधिकार, स्वच्छ खाद्य एवं जल का अधिकार)
- खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 (FSSA, 2006):
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- वेल्लोर सिटिजन्स वेलफेयर फोरम बनाम भारत संघ (सुप्रीम कोर्ट) — ‘एहतियाती सिद्धांत (Precautionary Principle): वैज्ञानिक अनिश्चितता को संभावित स्वास्थ्य जोखिमों को रोकने वाले सुरक्षात्मक कदम उठाने में देरी का बहाना नहीं बनाया जा सकता।’
- एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) सिद्धांत — ‘उपभोक्ताओं और नागरिकों का सूचना पाने का अधिकार (Right to Know) पारदर्शी समाज की अनिवार्य शर्त है।’
- अंतिम निर्णय: FSSAI और पैकेजिंग उद्योग की रिकॉल याचिकाएं खारिज; पैकेज्ड पानी, नमक और चीनी पर ‘मे कंटेन माइक्रो/नैनो प्लास्टिक्स’ की अनिवार्य चेतावनी का आदेश बरकरार; अध्ययन जारी रखने की छूट।
Microplastic Packaging:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | मद्रास उच्च न्यायालय (Madras High Court) |
| पीठ | न्यायमूर्ति एन. सतीश कुमार एवं न्यायमूर्ति डी. भरत चक्रवर्ती |
| याचिकाकर्ता | FSSAI, PET पैकेजिंग एसोसिएशन फॉर क्लीन एनवायरनमेंट (PACE) और पैकेज्ड ड्रिंकिंग वॉटर मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन्स |
| विवाद | पैकेज्ड पानी, चीनी और नमक पर माइक्रो/नैनो प्लास्टिक की मौजूदगी की चेतावनी वाले लेबल की अनिवार्यता। |
| अदालत का फैसला | समीक्षा याचिकाएं खारिज; उत्पादों पर स्पष्ट चेतावनी लेबल लगाने का आदेश बरकरार। |

