Tuesday, October 6, 2026
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SIR Row: मतदाताओं के लिए यह पूरी तरह से एक कैच-22(धर्मसंकट) की स्थिति है; फॉर्म 8 के स्वतः निरस्तीकरण और व्यक्तिगत नोटिस के बिना ड्राफ्ट रोल से नाम हटाने पर सख्त

At A Glance | एक नजर में

  • अदालत की मुख्य टिप्पणी: पीठ ने कहा कि यदि SIR प्रक्रिया के जरिए पात्र भारतीय नागरिक ही मतदाता सूची से बाहर हो रहे हैं, तो आयोग का संवैधानिक उद्देश्य ही विफल हो रहा है।
  • विवाद की वजह: जिन मतदाताओं ने हाल ही में घर बदला है, उनके फॉर्म 8 (पता बदलने का आवेदन) को ECI का सॉफ्टवेयर खारिज कर रहा है और उन्हें फॉर्म 6 (नया मतदाता फॉर्म) भरने को कहा जा रहा है।
  • झूठी घोषणा का दबाव: फॉर्म 6 में यह घोषणा करनी होती है कि आवेदक का नाम कहीं और दर्ज नहीं है। अदालत ने कहा कि किसी मतदाता को ऐसी गलत/झूठी घोषणा करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
  • ECI का तर्क: चुनाव आयोग के अनुसार, SIR में गणक प्रपत्र (Enumeration Form) न मिलने पर नाम स्वतः ही ड्राफ्ट लिस्ट से हट जाता है, जिसके बाद फॉर्म 8 स्वीकार नहीं किया जा सकता।

पणजी/मुंबई: भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा मतदाता सूचियों के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (Special Intensive Revision – SIR) के दौरान हाल ही में निवास स्थान बदलने वाले मतदाताओं के फॉर्म 8 (पता संशोधन आवेदन) को सॉफ्टवेयर द्वारा स्वतः निरस्त (Automated Rejection) करने, व्यक्तिगत नोटिस जारी किए बिना ड्राफ्ट रोल से नाम हटाने, और नागरिकों को गलत घोषणा वाले फॉर्म 6 भरने पर विवश करने की प्रक्रिया पर बॉम्बे उच्च न्यायालय (गोवा पीठ) ने गंभीर चिंता व्यक्त की है। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट व्यवस्था दी है कि चुनाव आयोग का प्राथमिक और सर्वोच्च संवैधानिक दायित्व यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी पात्र भारतीय नागरिक मताधिकार से वंचित न हो।

न्यायमूर्ति वाल्मीकि मेनेजेस और न्यायमूर्ति अमित जामसांडेकर की खंडपीठ ने परेश सालगांवकर व अन्य द्वारा दायर याचिकाओं के समूह पर सुनवाई करते हुए चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को आड़े हाथों लिया। अदालत ने कहा कि वर्तमान दिशा-निर्देशों ने उन मतदाताओं को एक असमंजसकारी “कैच-22” स्थिति में ला खड़ा किया है जिन्होंने हाल ही में अपना निवास बदला है, क्योंकि उनके पास संशोधन का कोई वैध व प्रभावी कानूनी उपाय नहीं छोड़ा गया है।

उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां

1. ‘मतदाताओं के सामने झूठी घोषणा देने की विचित्र विवशता (Catch-22)’ न्यायमूर्ति वाल्मीकि मेनेजेस और न्यायमूर्ति अमित जामसांडेकर की पीठ ने ईसीआई के प्रक्रियात्मक विरोधाभास को रेखांकित करते हुए कहा:

“मतदाताओं के लिए यह पूरी तरह से कैच-22 (Catch-22) की स्थिति बन गई है। जब कोई मतदाता निवास परिवर्तन के लिए फॉर्म 8 देता है, तो आप कहते हैं कि हम आपके फॉर्म 8 को छू भी नहीं सकते, आपको प्रगणना (Enumeration) देनी होगी। वह कहता है कि मैं प्रगणना नहीं देना चाहता, मैं आपको फॉर्म 8 दे रहा हूँ।

फिर उसके फॉर्म 8 को खारिज कर दिया जाता है और उसे नए पंजीकरण के लिए फॉर्म 6 भरने को विवश किया जाता है। परंतु फॉर्म 6 में यह घोषणा अनिवार्य होती है कि वह कहीं और पंजीकृत नहीं है—जो कि उसके मामले में एक झूठी घोषणा (False Declaration) होगी। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 21 स्पष्ट करती है कि मूल मतदाता सूची से किसी का नाम हटाने से पहले उसे सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य है।”

2. एसआईआर का मूल उद्देश्य नागरिकता जांचना था, मतदाताओं को बाहर करना नहीं:

  • जब ईसीआई के वकील ने तर्क दिया कि प्रक्रिया में “अवैध प्रवासी भी शामिल थे”, तो पीठ ने प्रतिवाद करते हुए पूछा:“तो क्या यह उद्देश्य फॉर्म 6 या फॉर्म 8 के जरिए पूरा होगा? बिहार एसआईआर पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि इसे करने का तरीका फॉर्म 6 ही होगा। कानून या तो विधायिका द्वारा बनता है या फिर प्रत्यायोजित नियम-निर्माण शक्ति के तहत।”
  • अदालत ने जोर देकर कहा कि एसआईआर का आधार यह पता लगाना था कि मतदाता भारतीय नागरिक है या नहीं, न कि साधारण प्रक्रियागत कारणों से नागरिकों को मतदाता सूची से बाहर कर देना।

3. मताधिकार से वंचित होने से रोकना आयोग का संवैधानिक दायित्व:

  • खंडपीठ ने आयोग के वृहद संवैधानिक कर्तव्यों पर सवाल उठाते हुए दो-टूक कहा:“यदि इस स्वचालित सॉफ्टवेयर प्रक्रिया से वास्तविक नागरिक ही मताधिकार से बाहर हो रहे हैं, तो हम चुनाव आयोग के इस जनादेश को कैसे पढ़ें? चुनाव आयोग का प्राथमिक संवैधानिक दायित्व पात्र नागरिकों को मताधिकार से वंचित (Prevention of disenfranchisement) होने से बचाना है।“

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि: गोवा में फॉर्म 8 का सॉफ्टवेयर द्वारा रिजेक्शन

  • याचिकाकर्ताओं का आक्षेप:
    • गोवा में चलाए जा रहे एसआईआर अभियान के दौरान जिन पंजीकृत मतदाताओं ने हाल ही में अपने पते बदले थे, उन्होंने निवास स्थान संशोधन के लिए विहित फॉर्म 8 ऑनलाइन दाखिल किया था।
    • चुनाव आयोग के स्वचालित सॉफ्टवेयर सिस्टम ने इन सभी फॉर्म 8 आवेदनों को बिना किसी मानवीय जांच या व्यक्तिगत सुनवाई के खारिज कर दिया।
    • इसके साथ ही, प्रगणना फॉर्म (Enumeration Form) न मिलने के आधार पर मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट रोल से सीधे हटा दिए गए।
  • याचिकाकर्ताओं के विधिक तर्क:
    • याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि बिना किसी व्यक्तिगत नोटिस के ड्राफ्ट रोल से मतदाताओं का नाम हटाना लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और निर्वाचकों का रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 के अनिवार्य प्रावधानों का उल्लंघन है।
    • मतदाताओं को नए मतदाता के रूप में फॉर्म 6 भरने के लिए बाध्य किया जा रहा है, जिससे उन्हें झूठा हलफनामा देना पड़ रहा है कि वे पूर्व से पंजीकृत मतदाता नहीं हैं।
  • चुनाव आयोग का बचाव:
    • ईसीआई के अधिवक्ता गौरेश अग्नि ने तर्क दिया कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 25(2) के तहत गहन पुनरीक्षण (Intensive Revision) में मतदाता सूचियां पूरी तरह नए सिरे से तैयार की जाती हैं।
    • उन्होंने कहा कि जिसे प्रगणना फॉर्म नहीं मिलता, उसका नाम स्वतः ड्राफ्ट रोल से बाहर हो जाता है; और जब नाम ड्राफ्ट रोल में ही नहीं है, तो उसे फॉर्म 8 के जरिए किसी अन्य पते पर स्थानांतरित नहीं किया जा सकता।
    • नोटिस के मुद्दे पर आयोग ने दावा किया कि मतदाताओं के नए पते उपलब्ध न होने के कारण सार्वजनिक नोटिस बोर्ड पर सामान्य सूचना चस्पा कर दी गई थी।
  • अदालत द्वारा आयोग के तर्क का खंडन:
    • पीठ ने आयोग के इस रुख को खारिज करते हुए स्पष्ट किया:“जब तक एसआईआर की पूरी प्रक्रिया समाप्त नहीं हो जाती, तब तक ड्राफ्ट रोल अस्तित्व में नहीं आता। यहां एसआईआर अभी प्रक्रियाधीन (In process) है, पूरी नहीं हुई है।”

विधिक एवं सांविधिक विश्लेषण: क्या कहता है निर्वाचन कानून?

  • फॉर्म 6 बनाम फॉर्म 8 (निर्वाचकों का रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960):
    • फॉर्म 6 (Form 6): केवल उन व्यक्तियों के लिए है जो पहली बार मतदाता के रूप में पंजीकरण करा रहे हैं अथवा नए सिरे से नाम जुड़वा रहे हैं। इसमें आवेदक को घोषणा करनी होती है कि उसका नाम देश के किसी अन्य निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में शामिल नहीं है।
    • फॉर्म 8 (Form 8): पहले से पंजीकृत मतदाताओं के लिए निवास स्थान परिवर्तन (Shifting of Residence), प्रविष्टियों के सुधार, अथवा मतदाता पहचान पत्र बदलने के लिए विहित वैधानिक प्रारूप है।
  • लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (Representation of the People Act, 1950):
    • धारा 21 एवं 22: मतदाता सूची के पुनरीक्षण और नामों के संशोधन/विलोपन का प्रावधान। स्थापित विधिक नियम है कि किसी भी वैध रूप से पंजीकृत मतदाता का नाम बिना उचित जांच और प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) के सिद्धांतों के तहत व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर दिए बिना विलोपित नहीं किया जा सकता।
  • अनुच्छेद 324 एवं 326 (संवैधानिक गारंटी):
    • संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव कराने का अधीक्षण सौंपता है।
    • अनुच्छेद 326 प्रत्येक वयस्क नागरिक को मतदान का अधिकार देता है; प्रशासनिक या सॉफ्टवेयर की तकनीकी कमियों के चलते इस अधिकार को छीना नहीं जा सकता।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: परेश सालगांवकर बनाम गोवा राज्य व अन्य [रिट याचिका (सिविल) – बॉम्बे उच्च न्यायालय, पणजी गोवा पीठ]
  • पीठ: न्यायमूर्ति वाल्मीकि मेनेजेस और न्यायमूर्ति अमित जामसांडेकर (खंडपीठ)
  • कार्यवाही की तिथि: 5 अक्टूबर 2026
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • याचिकाकर्ताओं की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्तागण
    • भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की ओर से: अधिवक्ता गौरेश अग्नि
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक नियम:
    • लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (RPA, 1950):
      • धारा 21, 22 एवं 25(2) (मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण एवं विलोपन प्रक्रिया)
    • निर्वाचकों का रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 (Registration of Electors Rules, 1960):
      • फॉर्म 6 (नया मतदाता पंजीकरण)
      • फॉर्म 8 (निवास परिवर्तन एवं प्रविष्टियों का संशोधन)
    • भारत का संविधान:
      • अनुच्छेद 324 (निर्वाचन आयोग की शक्तियां व संवैधानिक दायित्व)
      • अनुच्छेद 326 (सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार)
      • अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • मतदाता समावेशन का सिद्धांत — ‘तकनीकी या सॉफ्टवेयर एल्गोरिदम के आधार पर स्वतः नाम खारिज करना प्रशासनिक शक्तियों का मनमाना प्रयोग है; जब तक नागरिकता या अयोग्यता साबित न हो, वास्तविक मतदाताओं के नाम नहीं काटे जा सकते।’
  • वर्तमान स्थिति: बॉम्बे हाईकोर्ट ने फॉर्म 8 के सॉफ्टवेयर रिजेक्शन और नोटिस के बिना विलोपन पर चुनाव आयोग से जवाब तलब किया; मामले की विस्तृत सुनवाई जारी।

SIR Row: Key Indicators | मुख्य बिंदु

संकेत बिंदुविवरण
संबंधित पीठजस्टिस वाल्मीकि मेनेजस और जस्टिस अमित जमसांडेकर की पीठ
मामलापरेश सालगांवकर बनाम गोवा राज्य व अन्य (Paresh Salgaonkar v. State of Goa & Ors.)
मुख्य विवादित प्रपत्रफॉर्म 8 (Form 8): मतदाता सूची में स्थान/पता परिवर्तन हेतु आवेदन।
फॉर्म 6 (Form 6): पहली बार मतदाता के रूप में पंजीकरण कराने हेतु आवेदन।
मूल वैधानिक प्रावधानलोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21, 22 एवं 25(2)
सॉफ्टवेयर की खामीECI की स्वचालित प्रणाली (Software System) फॉर्म 8 को स्वीकार न कर सीधे खारिज कर रही है।
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