पति की याचिका और हाईकोर्ट का रुख
- विकलांगता और आय छिपाने की दलील:पति ने फैमिली कोर्ट के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी और 70% स्थायी लोकोमोटर विकलांगता (Permanent Locomotor Disability) के मेडिकल रिकॉर्ड प्रस्तुत करते हुए तर्क दिया कि वह कमाने में असमर्थ है।
- पर्याप्त साधनों की पुष्टि:हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के निष्कर्षों को सही ठहराया। अदालत ने कहा कि केवल शारीरिक रूप से सक्षम (Able-bodied) न होना भरण-पोषण से बचने का आधार नहीं हो सकता। फैमिली कोर्ट ने पाया था कि पति और उसकी माँ के पास पर्याप्त वित्तीय संसाधन हैं (शादी का खर्च उठाने और पत्नी के साथ रहने के दौरान उसका खर्च उठाने के आधार पर) और वह भरण-पोषण से बचने के लिए अपनी वास्तविक आय छिपा रहा था।
- पत्नी का साधनहीन होना:अदालत ने यह भी नोट किया कि पूर्व पत्नी के पास अपना गुजारा करने का कोई स्वतंत्र जरिया या आय का स्रोत नहीं है।
कोच्चि: वैवाहिक संस्था की गरिमा और शुचिता, विवाह प्रस्ताव के दौरान अपनी शारीरिक अक्षमता को जानबूझकर छिपाकर पत्नी को केवल “देखभाल करने वाली नौकरानी” (Maid Servant) बनाने की कुत्सित रणनीति, तथा शारीरिक दिव्यांगता (Locomotor Disability) की आड़ लेकर तलाकशुदा पत्नी को वैधानिक भरण-पोषण (Maintenance) देने से बचने के प्रयासों पर केरल हाईकोर्ट ने कड़ा फैसला सुनाया है।
न्यायमूर्ति जी. गिरीश की एकल पीठ ने एट्टूमानूर स्थित फैमिली कोर्ट (Family Court at Ettumanoor) के उस आदेश को पूरी तरह बरकरार रखा, जिसमें लकवाग्रस्त (Paralysed) पति को अपनी पूर्व पत्नी को ₹10,000 प्रति माह गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया गया था। उच्च न्यायालय ने पति की इस दलील को तीखी फटकार लगाते हुए खारिज कर दिया कि उनके बीच कभी शारीरिक संबंध नहीं बने थे और उसने केवल अपनी व अपनी बुजुर्ग मां की देखभाल के लिए एक “नौकरानी” के रूप में महिला से शादी की थी। अदालत ने माना कि 70% शारीरिक दिव्यांगता होने के बावजूद पति के पास पर्याप्त वित्तीय संसाधन हैं और वह गुजारा भत्ता देने से बचने के लिए अपनी वास्तविक आय छिपा रहा था। अदालत ने स्पष्ट व्यवस्था दी है कि किसी महिला की जिंदगी से छल करके शादी करने वाला व्यक्ति बाद में अपनी बीमारी या अक्षमता का रोना रोकर भरण-पोषण के दायित्व से पल्ला नहीं झाड़ सकता।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘नौकरानी पाने के लिए शादी का छल करने वाला पति जिम्मेदारी से नहीं बच सकता’ न्यायमूर्ति जी. गिरीश ने पति के चौंकाने वाले दावों पर कड़ी नाराजगी व्यक्त करते हुए अपने निर्णय में दर्ज किया: “याचिकाकर्ता (पति) के स्वयं के बयानों के अनुसार भी, उसने एक नौकरानी प्राप्त करने के स्पष्ट उद्देश्य के लिए अखबार में वैवाहिक विज्ञापन देने की कपटपूर्ण चाल (Deceitful tactics) अपनाई, और इस पूर्ण ज्ञान के बावजूद कि वह अपनी पत्नी के प्रति दांपत्य दायित्वों (Conjugal obligations) को निभाने में पूरी तरह असमर्थ है, प्रत्यर्थी (पत्नी) के साथ विवाह रचाने में सफल रहा। इस प्रकार की संदिग्ध पद्धति का सहारा लेकर एक महिला का जीवन बर्बाद करने के बाद, याचिकाकर्ता अब अपनी पूर्व पत्नी को भरण-पोषण का भुगतान करने की अपनी कानूनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता।”
2. 70% दिव्यांगता बनाम वित्तीय साधन (Sufficient Means):
- पति ने दलील दी थी कि अक्टूबर 2012 में पैरालिसिस अटैक (Paralytic Stroke) आने के कारण वह 70% स्थायी लोकोमोटर दिव्यांगता से ग्रस्त है, जिससे वह काम करने और कमाने में अक्षम है, अतः वह गुजारा भत्ता नहीं दे सकता।
- अदालत ने इस तर्क को खारिज करते हुए स्पष्ट किया:“पति की भरण-पोषण देने की क्षमता केवल इस बात पर निर्भर नहीं करती कि वह एक शारीरिक रूप से सक्षम (Able-bodied) व्यक्ति है या नहीं। पारिवारिक अदालत ने सभी समग्र परिस्थितियों का मूल्यांकन करने के बाद यह सटीक निष्कर्ष निकाला कि पति के पास गुजारा भत्ता देने के पर्याप्त वित्तीय साधन मौजूद हैं, परंतु वह इससे बचने के लिए जानबूझकर अपनी आय को छिपा रहा है।”
- अदालत ने रेखांकित किया कि पति ने स्वयं दावा किया था कि उसने और उसकी मां ने शादी का पूरा खर्च वहन किया था और जब तक पत्नी साथ रही, उसने उसका वित्तीय भरण-पोषण भी किया था, जो उसकी संपन्नता को दर्शाता है।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि: वैवाहिक विज्ञापन से एट्टूमानूर फैमिली कोर्ट तक
- वैवाहिक विज्ञापन और दूसरा विवाह (अगस्त 2015):
- पति ने एक प्रमुख समाचार पत्र में शादी का वैवाहिक विज्ञापन (Matrimonial Advertisement) दिया था, जिसके बाद अगस्त 2015 में दोनों का विवाह हुआ। यह पति का दूसरा विवाह था।
- लकवा और दांपत्य संबंधों का अभाव:
- पति का दावा था कि अक्टूबर 2012 में उसे लकवे का दौरा पड़ा था, जिसके कारण वह शारीरिक संबंध बनाने में पूरी तरह असमर्थ था।
- उसने अदालत में यह विचित्र व असंवेदनशील बचाव लिया कि उसने विवाह केवल इसलिए किया था ताकि उसे और उसकी मां को संभालने के लिए घर में एक नौकरानी मिल सके। इस कारण विवाह कभी फलीभूत (Consummated) नहीं हो सका।
- वैवाहिक संबंध विच्छेद और तलाक का फैसला:
- सच्चाई सामने आने और क्रूरता के चलते वैवाहिक संबंध पूरी तरह टूट गए। पत्नी ने पारिवारिक अदालत में क्रूरता के आधार पर तलाक, मासिक भरण-पोषण और अपने सोने के आभूषण वापस पाने की अर्जी दाखिल की।
- पारिवारिक अदालत (Family Court, Ettumanoor) का आदेश:
- फैमिली कोर्ट ने पति के आचरण को मानसिक व शारीरिक क्रूरता मानते हुए विवाह विच्छेद (Divorce) की डिक्री पारित की।
- अदालत ने माना कि पत्नी के पास जीवनयापन का कोई स्वतंत्र वित्तीय साधन नहीं है, जबकि पति संपन्न है। अदालत ने पति को ₹10,000 प्रति माह गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया।
- पति ने इस गुजारा भत्ते के आदेश के खिलाफ केरल हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दाखिल की थी।
उच्च न्यायालय द्वारा जारी अंतिम निर्देश
- पारिवारिक अदालत का आदेश बरकरार: फैमिली कोर्ट, एट्टूमानूर द्वारा पत्नी के पक्ष में दिए गए ₹10,000 प्रति माह के गुजारा भत्ते के आदेश में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप करने से इनकार।
- पति की याचिका खारिज: पति की पुनरीक्षण याचिका को गुण-दोष के आधार पर खारिज किया गया।
- नियमित भुगतान का आदेश: पति को अपनी तलाकशुदा पत्नी को निर्धारित ₹10,000 की मासिक राशि बिना किसी रुकावट के नियमित रूप से अदा करने का निर्देश।
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: क्या कहता है कानून?
- दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 (CrPC) / भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 144 (BNSS):
- भरण-पोषण का उद्देश्य परित्यक्त या तलाकशुदा पत्नी को भुखमरी और बेसहारा होने से बचाना है।
- कानून स्पष्ट करता है कि यदि किसी व्यक्ति के पास “पर्याप्त साधन” (Sufficient Means) हैं और वह अपनी पत्नी का भरण-पोषण करने से इनकार या उपेक्षा करता है, तो अदालत उचित गुजारा भत्ता तय कर सकती है।
- ‘सक्षम शरीर’ (Able-bodied) बनाम वास्तविक संपत्ति/साधन:
- न्यायिक सिद्धांतों के तहत यद्यपि शारीरिक अक्षमता एक प्रासंगिक कारक है, परंतु यदि पति के पास अचल संपत्ति, पारिवारिक संपदा या अन्य गुप्त आय स्रोत मौजूद हैं, तो केवल शारीरिक अक्षमता का हवाला देकर वह पत्नी को निराश्रित नहीं छोड़ सकता।
- विवाह में कपट और क्रूरता:
- विवाह जैसे पवित्र बंधन में अपनी पूर्व अक्षमता को छिपाना और पत्नी को केवल घरेलू कामगार/नौकरानी समझकर शादी करना भारतीय वैवाहिक न्यायशास्त्र में मानसिक क्रूरता (Mental Cruelty) का चरम रूप माना जाता है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: पति (याचिकाकर्ता) बनाम पत्नी (प्रत्यर्थी) [वैवाहिक पुनरीक्षण याचिका – केरल उच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति जी. गिरीश (एकल पीठ)
- निर्णय की तिथि: अक्टूबर 2026
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (पति) की ओर से: अधिवक्ता के. सनीश कुमार एवं वी.बी. शांति
- प्रत्यर्थी (पत्नी) की ओर से: अधिवक्ता अनंतकृष्णन ए. कार्था, अनिल डी. कार्था, सुरेश जी., शरथ एल्दो फिलिप, श्रीकृष्ण कुमार जी. एवं अनंतशंकर ए. कार्था
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
- दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 125 [पत्नी के भरण-पोषण का वैधानिक अधिकार]
- हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(ia) (क्रूरता के आधार पर विवाह विच्छेद) एवं धारा 25 (स्थायी गुजारा भत्ता एवं भरण-पोषण)
- फैमिली कोर्ट्स एक्ट, 1984 (पारिवारिक न्यायालयों की अधिकारिता)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- रजनेश बनाम नेहा (2020, सुप्रीम कोर्ट) — ‘भरण-पोषण तय करते समय पति की वास्तविक आर्थिक स्थिति और दोनों पक्षों के जीवन स्तर का समग्र मूल्यांकन किया जाना चाहिए; आय छिपाने के प्रयासों पर अदालत सख्त रुख अपनाएगी।’
- श्रीमती विमला बनाम वी.एस. राजाराम (सुप्रीम कोर्ट) — ‘धारा 125 एक सामाजिक न्याय का कानून है; इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी महिला को वैवाहिक छल के बाद बेसहारा न छोड़ दिया जाए।’
- अंतिम परिणाम: पति की याचिका पूर्णतः खारिज; फैमिली कोर्ट द्वारा तलाकशुदा पत्नी को स्वीकृत ₹10,000 मासिक भरण-पोषण का आदेश पूरी तरह बहाल।
Locomotor Disability:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | केरल उच्च न्यायालय (न्यायमूर्ति जी. गिरीश) |
| याचिकाकर्ता (पति) | 70% लोकोमोटर विकलांगता से पीड़ित व्यक्ति |
| प्रतिवादी (पूर्व पत्नी) | भरण-पोषण और तलाक मांगने वाली महिला |
| मासिक भरण-पोषण राशि | ₹10,000 प्रति माह (फैमिली कोर्ट एट्टुमानूर द्वारा निर्धारित) |
| हाईकोर्ट का निष्कर्ष | धोखे से शादी कर महिला की जिंदगी बर्बाद करने के बाद पति अपनी वित्तीय और कानूनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता। |

