Tuesday, October 27, 2026
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RTI Act: सहकारी समिति ‘पब्लिक अथॉरिटी’ न होने पर भी रजिस्ट्रार जिस रिकॉर्ड तक पहुंच सकता है, उसे सदस्य को RTI में देने से इनकार नहीं किया जा सकता

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मामले की पृष्ठभूमि: क्या था पूरा विवाद?

  1. RTI आवेदन और निचली अदालतों का रुख:सहकारी बैंक के एक सदस्य ने सहकारी समितियों के संयुक्त रजिस्ट्रार (General) के माध्यम से बैंक के भवन निर्माण ठेके और आम सभा की बैठक के मिनट्स की प्रति मांगी। शुरुआत में आवेदन खारिज कर दिया गया था, लेकिन राज्य सूचना आयुक्त और केरल उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने सदस्य के सूचना पाने के अधिकार को बरकरार रखा। इसके खिलाफ बैंक सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
  2. बैंक की दलील:अपीलकर्ता बैंक ने तर्क दिया कि वह RTI अधिनियम के तहत ‘पब्लिक अथॉरिटी’ नहीं है। बैंक ने कहा कि केरल सहकारिता समिति अधिनियम, 1969 की धारा 65 के तहत रजिस्ट्रार केवल औपचारिक जांच (Inquiry) शुरू करने का फैसला करने के बाद ही रिकॉर्ड एक्सेस कर सकता है।
  3. सुप्रीम कोर्ट का रुख और धारा 2(f) का दायरा:न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन द्वारा लिखे गए फैसले में अदालत ने बैंक की दलीलों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि RTI अधिनियम की धारा 2(f) में स्पष्ट रूप से वह जानकारी शामिल है जो किसी निजी निकाय (Private Body) से संबंधित हो और जिसे कोई सार्वजनिक प्राधिकरण किसी अन्य लागू कानून के तहत प्राप्त कर सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी तर्क

1. “व्यापारिक गोपनीयता या व्यक्तिगत जानकारी की छूट लागू नहीं”:

अदालत ने बैंक द्वारा RTI अधिनियम की धारा 8(1)(d) (व्यापारिक विश्वसनीयता/व्यापार रहस्य) और धारा 8(1)(j) (व्यक्तिगत जानकारी) के तहत मांगी गई छूट के दावे को पूरी तरह खारिज कर दिया: “उक्त दस्तावेजों में कोई व्यापार रहस्य या बौद्धिक संपदा या व्यावसायिक गोपनीयता शामिल नहीं है, क्योंकि निविदा/बिड पहले ही समाप्त हो चुकी है और एक श्रम अनुबंध समिति को ठेका मिल चुका है। जहां तक धारा 8(1)(j) का संबंध है, मांगी गई जानकारी को ‘व्यक्तिगत जानकारी’ नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यह ब्योरा समिति के ही एक सदस्य द्वारा मांगा गया है।”

2. तीसरे पक्ष बनाम समिति के सदस्य में अंतर:

  • कोर्ट ने माना कि यदि यही जानकारी किसी तीसरे पक्ष (Unconnected Third Party) द्वारा मांगी जाती, तो स्थिति भिन्न होती। लेकिन समिति का सदस्य संस्था के मामलों में सीधे तौर पर हितधारक (Stakeholder) होता है।

3. रजिस्ट्रार की पर्यवेक्षी शक्तियां (धारा 66):

  • पीठ ने केरल सहकारिता अधिनियम की धारा 66 का हवाला दिया, जो रजिस्ट्रार को समिति की बहियों (Books) के निरीक्षण और बार-बार पर्यवेक्षण करने की शक्ति प्रदान करती है। रजिस्ट्रार को दस्तावेज एक्सेस करने के लिए किसी पूर्व औपचारिक जांच का आदेश देने की आवश्यकता नहीं है।

नई दिल्ली: सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI Act) की धारा 2(f) (निजी निकायों की उस जानकारी की परिभाषा जिस तक किसी अन्य कानून के तहत लोक प्राधिकरण पहुँच सकता है / Information accessible by a public authority), धारा 8(1)(d) (व्यावसायिक विश्वास/व्यापारिक गोपनीयता की छूट), धारा 8(1)(j) (व्यक्तिगत जानकारी और जनहित का दायरा), केरल सहकारी समिति अधिनियम, 1969 की धारा 65 एवं 66 (रजिस्ट्रार के अधीक्षण, निरीक्षण व रिकॉर्ड तलब करने की शक्तियां), तथा ऐतिहासिक नजीर थलप्पलम सर्विस कोऑपरेटिव बैंक लि. बनाम केरल राज्य (2013) के विधिक सिद्धांतों पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है।

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला (Justice JB Pardiwala) और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन (Justice K Vinod Chandran) की खंडपीठ ने केरल उच्च न्यायालय की खंडपीठ के उस फैसले को पूरी तरह बरकरार रखा है, जिसने सहकारी बैंक को अपने सदस्य को आरटीआई अधिनियम के तहत मांगे गए महत्वपूर्ण दस्तावेज उपलब्ध कराने का निर्देश दिया था।

न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन द्वारा लिखे गए निर्णय में शीर्ष अदालत ने स्पष्ट व्यवस्था दी कि यदि किसी कानून (जैसे सहकारी समिति अधिनियम) के तहत रजिस्ट्रार (जो कि एक लोक प्राधिकरण / Public Authority है) को किसी सहकारी संस्था के बही-खातों और रिकॉर्ड्स का निरीक्षण करने या उन्हें तलब करने की वैधानिक शक्ति प्राप्त है, तो आरटीआई कानून की धारा 2(f) के प्रभाव से सहकारी समिति का कोई भी सदस्य लोक प्राधिकरण (रजिस्ट्रार कार्यालय) के माध्यम से वह जानकारी प्राप्त करने का पूर्ण विधिक हकदार है। अदालत ने बैंक की इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया कि यह जानकारी संस्था के लिए ‘व्यक्तिगत’ (Personal) है या इसमें कोई जनहित शामिल नहीं है।

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां

1. ‘सोसायटी के सदस्य हेतु उसके कामकाज की जानकारी व्यक्तिगत नहीं हो सकती’

खंडपीठ ने निर्णय में स्पष्ट किया: “सोसायटी के किसी सदस्य को इस आधार पर ऐसी जानकारी से वंचित नहीं किया जा सकता कि यह जानकारी सोसायटी के लिए ‘व्यक्तिगत’ (Personal to the Society) है या इसमें कोई सार्वजनिक गतिविधि या लोकहित शामिल नहीं है। जब किसी अन्य कानून के तहत एक लोक प्राधिकरण (रजिस्ट्रार) को सहकारी समिति के दस्तावेजों तक पहुँचने का अधिकार प्राप्त है, तो आरटीआई के तहत उसके सदस्य से जानकारी छिपाई नहीं जा सकती।”

2. धारा 2(f) RTI Act का व्यापक दायरा: ‘रजिस्ट्रार के पास पहले से दस्तावेज होना जरूरी नहीं’:

  • बैंक ने दलील दी थी कि वह आरटीआई कानून के तहत सीधे ‘पब्लिक अथॉरिटी’ नहीं है और रजिस्ट्रार धारा 65 के तहत रिकॉर्ड केवल तभी मंगा सकता है जब उसने औपचारिक जांच (Inquiry) शुरू करने का फैसला कर लिया हो।
  • न्यायालय ने इस संकीर्ण व्याख्या को खारिज करते हुए कहा कि आरटीआई अधिनियम की धारा 2(f) निजी निकायों से संबंधित उन सभी सूचनाओं को कवर करती है, जिन तक कोई लोक प्राधिकरण किसी अन्य कानून के तहत पहुँच सकता है।
  • अदालत ने व्यवस्था दी:“रजिस्ट्रार के पास वे दस्तावेज पहले से भौतिक रूप से मौजूद होने या जांच शुरू करने का निर्णय लेने की कोई पूर्व-शर्त नहीं है। जैसे ही रजिस्ट्रार के पास उन दस्तावेजों तक पहुँचने की वैधानिक शक्ति (Power to Access) होती है, धारा 2(f) के प्रभाव से बैंक अपने सदस्य को जानकारी उपलब्ध कराने के लिए बाध्य हो जाता है।”

3. धारा 8(1)(d) और 8(1)(j) के तहत छूट के दावे खारिज:

  • धारा 8(1)(d) (व्यावसायिक गोपनीयता): बैंक ने दावा किया था कि निर्माण अनुबंध का ब्योरा वाणिज्यिक विश्वास का विषय है। अदालत ने कहा कि चूंकि निविदा प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और एक लेबर कॉन्ट्रैक्ट सोसायटी को अनुबंध आवंटित किया जा चुका है, इसलिए इसमें कोई ट्रेड सीक्रेट या प्रतिस्पर्धी स्थिति को नुकसान पहुंचाने वाला तत्व नहीं बचा है। समिति का प्रत्येक सदस्य अनुबंध की शर्तों को जानने का हकदार है।
  • धारा 8(1)(j) (व्यक्तिगत जानकारी): अदालत ने स्पष्ट किया कि जब बैंक द्वारा किए गए अनुबंध और आम सभा (General Body Meeting – GBM) के कार्यवृत्त (Minutes) की मांग उसी समिति के सदस्य द्वारा की जा रही है, तो इसे ‘व्यक्तिगत जानकारी’ नहीं कहा जा सकता।

4. ‘सदस्य’ बनाम ‘अनजान तीसरे पक्ष’ (Third Party) के अधिकारों में अंतर:

  • अदालत ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधिक अंतर स्पष्ट किया कि यह अधिकार हर सामान्य नागरिक को प्राप्त नहीं होगा:“प्रत्येक नागरिक को इन दस्तावेजों को मांगने का अधिकार नहीं होगा, क्योंकि व्यक्तिगत जानकारी की अवधारणा केवल हाड़-मांस के जीवित ‘व्यक्ति’ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक निजी संस्था पर भी लागू होती है, जिसके आंतरिक मामलों में हर नागरिक की रुचि नहीं हो सकती (जब तक कि उसका संबंध किसी व्यापक लोक गतिविधि से न हो)।किंतु प्रस्तुत मामले में, न तो भवन निर्माण अनुबंध और न ही आम सभा का मिनट्स किसी ऐसे पक्ष से संबंधित है जो सोसायटी से पूरी तरह असंबद्ध हो—मांगकर्ता स्वयं सोसायटी का सदस्य है।”

मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम

चरण / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
अपीलकर्ताकेरल स्थित एक सहकारी बैंक (Co-operative Bank)।
मांगकर्ता (प्रतिवादी संख्या 4)बैंक/सोसायटी का एक पंजीकृत सदस्य (Member of the Society)।
मांगे गए दस्तावेज1. बैंक की आम सभा की बैठक (General Body Meeting – GBM) के अधिकृत मिनट्स।
2. बैंक द्वारा एक लेबर कॉन्ट्रैक्ट सोसायटी के साथ निष्पादित भवन निर्माण अनुबंध (Building Contract) की प्रति।
फोरम जहां आवेदन किया गयासहकारी समितियों के संयुक्त रजिस्ट्रार (जनरल) के लोक सूचना अधिकारी (CPIO) के समक्ष।
बैंक का प्राथमिक बचावबैंक आरटीआई अधिनियम की धारा 2(h) के तहत ‘सार्वजनिक प्राधिकरण’ (Public Authority) नहीं है; रजिस्ट्रार केवल धारा 65 के तहत औपचारिक जांच का आदेश देने के बाद ही रिकॉर्ड मांग सकता है; मांगी गई सामग्री बैंक की आंतरिक व ‘व्यक्तिगत’ है।
संबद्ध वैधानिक प्रावधानकेरल सहकारी समिति अधिनियम, 1969 की धारा 66(1)—जो रजिस्ट्रार या उसके द्वारा अधिकृत अधिकारी को जितनी बार आवश्यक समझे, उतनी बार समिति के बही-खातों के निरीक्षण और अधीक्षण की व्यापक शक्ति प्रदान करती है।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेशअपील पूर्णतः खारिज; संयुक्त रजिस्ट्रार को निर्देश दिया गया कि वह दो सप्ताह के भीतर बैंक से दोनों दस्तावेज तलब कर प्रतिवादी सदस्य को उपलब्ध कराए।

विधिक एवं प्रशासनिक विश्लेषण: ‘थलप्पलम नजीर’ और धारा 2(f) का व्यावहारिक सामंजस्य

  • थलप्पलम सर्विस कोऑपरेटिव बैंक लि. बनाम केरल राज्य [(2013) 16 SCC 82] का सही अनुप्रयोग:
    • सुप्रीम कोर्ट ने थलप्पलम मामले में व्यवस्था दी थी कि गैर-सहायता प्राप्त सहकारी समितियां सीधे तौर पर आरटीआई कानून की धारा 2(h) के तहत “लोक प्राधिकरण” नहीं हैं।
    • किंतु उसी ऐतिहासिक फैसले में न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया था कि आरटीआई की धारा 2(f) एक विधिक सेतु (Statutory Bridge) का काम करती है। यदि राज्य का कोई कानून सहकारी समितियों के निबंधक (Registrar) को किसी सोसायटी से जानकारी या रिकॉर्ड मांगने का अधिकार देता है, तो नागरिक उस निबंधक के माध्यम से वह जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
  • केरल सोसायटी अधिनियम की धारा 66 (अधीक्षण और निरीक्षण शक्ति):
    • बैंक ने केवल धारा 65 (जांच) पर जोर दिया था, किंतु सुप्रीम कोर्ट ने धारा 66(1) को रेखांकित किया। धारा 66 रजिस्ट्रार को नियमित अधीक्षण और ‘समिति के बही-खातों के निरीक्षण’ (Inspection of the books of the society) की निरंतर शक्ति देती है।
    • जब रजिस्ट्रार सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया में किसी भी समय सोसायटी से रिकॉर्ड तलब कर सकता है, तो आरटीआई के तहत आवेदन आने पर वह यह बहाना नहीं बना सकता कि कोई औपचारिक जांच लंबित नहीं है।
  • सहकारी लोकतंत्र और पारदर्शिता:
    • सहकारी समितियां अपने सदस्यों के अंशदान और लोकतांत्रिक भागीदारी से संचालित होती हैं। प्रबंध समिति (Managing Committee) सदस्यों के प्रति जवाबदेह होती है।
    • आम सभा के मिनट्स या बड़े वित्तीय निर्माण ठेकों की जानकारी अपने ही सदस्यों से छिपाना सहकारी आंदोलन की मूल आत्मा और वित्तीय पारदर्शिता के सिद्धांतों के विपरीत है।

विधिक विवरण

  • न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय (दीवानी अपीलीय क्षेत्राधिकार)
  • पीठ: न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला एवं न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन
  • आदेश की तिथि: 26 अक्टूबर 2026
  • संबद्ध क्षेत्राधिकार: केरल उच्च न्यायालय (खंडपीठ का पुष्टीकृत निर्णय)

प्रासंगिक कानून एवं सांविधिक प्रावधान:

  • सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI Act):
    • धारा 2(f) — “सूचना” की परिभाषा (निजी निकाय से संबंधित वह जानकारी जिसे लोक प्राधिकरण प्राप्त कर सकता है)
    • धारा 2(h) — “लोक प्राधिकरण” की परिभाषा
    • धारा 8(1)(d) — वाणिज्यिक गोपनीयता व बौद्धिक संपदा की छूट (अमान्य ठहराई गई)
    • धारा 8(1)(j) — व्यक्तिगत सूचना की छूट (अमान्य ठहराई गई)
  • केरल सहकारी समिति अधिनियम, 1969:
    • धारा 65 — समिति के कार्यों की औपचारिक जांच
    • धारा 66 — रजिस्ट्रार द्वारा अधीक्षण एवं बही-खातों का नियमित निरीक्षण
  • महत्वपूर्ण नजीरें:
    • थलप्पलम सर्विस कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड बनाम केरल राज्य [(2013) 16 SCC 82]
    • केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी, सुप्रीम कोर्ट बनाम सुभाष चंद्र अग्रवाल [(2020) 5 SCC 1]
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • सहकारी समितियों से आरटीआई के तहत सूचना प्राप्ति का विधिक मानक: ‘यद्यपि सहकारी समिति सीधे तौर पर लोक प्राधिकरण नहीं है, किंतु यदि रजिस्ट्रार को राज्य कानून के तहत उसके रिकॉर्ड्स का निरीक्षण करने की वैधानिक शक्ति है, तो आरटीआई की धारा 2(f) के तहत वह सूचना प्राप्त की जा सकती है; समिति का सदस्य कोई बाहरी अजनबी नहीं है, अतः उसके लिए आम सभा के मिनट्स या अनुबंध का विवरण धारा 8(1)(j) के तहत व्यक्तिगत या गोपनीय बताकर नहीं रोका जा सकता।’
  • वर्तमान स्थिति व अनुपालन निर्देश: सहकारी बैंक की सिविल अपील पूर्णतः खारिज; उच्च न्यायालय का आदेश बहाल; संयुक्त रजिस्ट्रार (प्रतिवादी सं. 2) को दो सप्ताह के भीतर बैंक से दोनों संबंधित दस्तावेज मंगाकर शिकायतकर्ता सदस्य (प्रतिवादी सं. 4) को उपलब्ध कराने का सख्त निर्देश जारी।

RTI Act:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतभारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठन्यायमूर्ति जे. बी. पारडीवाला एवं न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन
अपीलकर्तासहकारी बैंक (Cooperative Bank)
प्रतिवादी/आवेदकबैंक का सदस्य (4था प्रतिवादी; जिसने सहकारी समितियों के संयुक्त रजिस्ट्रार से RTI के तहत दस्तावेज मांगे थे)
मांगे गए दस्तावेज1. भवन निर्माण ठेके (Building Contract) से संबंधित दस्तावेज;
2. आम सभा की बैठक (General Body Meeting) के कार्यवृत्त/मिनट्स।
अदालत का फैसलाअपील खारिज; रजिस्ट्रार 2 सप्ताह के भीतर बैंक से दस्तावेज मंगवाकर सदस्य को प्रदान करे।
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