Monday, October 26, 2026
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Custodial Death: अनपढ़ विधवा की लड़ाई पर ₹25 लाख अंतरिम मुआवजा, दोषी पुलिसकर्मियों पर आपराधिक केस और CBI जांच के आदेश, पढ़ें केस

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मामले की पृष्ठभूमि और घटनाक्रम

  1. गिरफ्तारी और संदिग्ध मौत (जनवरी 2024):18 जनवरी 2024 को बिलासपुर जिले के मोहरा गांव से सीपत पुलिस स्टेशन की टीम ने श्रवण को छत्तीसगढ़ आबकारी अधिनियम की धारा 34(2) के तहत गिरफ्तार किया। परिजनों को मिलने नहीं दिया गया। 21 जनवरी की रात पुलिस की सूचना पर परिजन अस्पताल पहुंचे, जहां 22 जनवरी को सुबह 6 बजे श्रवण को मृत घोषित कर दिया गया।
  2. शारीरिक प्रताड़ना के प्रमाण:शुरुआती रिपोर्ट में बाहरी चोट न होने की बात कही गई, लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने मौत का कारण “सिर में भोली वस्तु से लगी चोट (Blunt Injury) और कार्डियो-रेस्पिरेटरी अरेस्ट” बताया। रिपोर्ट में खोपड़ी पर घाव (Laceration), शरीर पर कई जगह नीले निशान और निजी अंगों से रक्तस्राव दर्ज था।
  3. कानूनी लड़ाई (हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट):
    • बिलासपुर हाईकोर्ट (दिसंबर 2024): अधिवक्ता राजीव कुमार दुबे की मदद से लेहरा बाई ने हाईकोर्ट का रुख किया। हाईकोर्ट ने अधिकारियों की “लापरवाही” मानते हुए केवल ₹1 लाख का मुआवजा दिया और अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग पर कोई आदेश नहीं दिया।
    • सुप्रीम कोर्ट (2026): मामूली मुआवजे और दोषी पुलिसकर्मियों को बचाने के खिलाफ लेहरा बाई सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं।

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य निष्कर्ष और कड़ा रुख

1. शीर्ष अधिकारियों के ढुलमुल रवैये पर प्रहार:

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने राज्य के गृह सचिव, डीजीपी (तत्कालीन अशोक जुनेजा) और डीजी (जेल) की खिंचाई करते हुए कहा कि न्यायिक जांच रिपोर्ट (22 जुलाई 2024) में स्पष्ट सिर की चोट का जिक्र होने के बावजूद पुलिस अधिकारियों द्वारा एफआईआर न दर्ज करना वैधानिक प्रक्रियाओं का घोर उल्लंघन है: “पुलिस महानिदेशक (DGP) का यह तर्क कि ‘जांच रिपोर्ट प्राप्त न होने के कारण आपराधिक मामला दर्ज नहीं किया गया’, पूरी तरह से असत्य और निंदनीय है। यह अदालत की आंखों में धूल झोंकने और मामले को दबाने (Cover-up story) का प्रयास है।”

2. पीड़ित परिवार और पारिवारिक विवाद:

  • याचिकाकर्ता लेहरा बाई (जो खेत मजदूर के रूप में ₹300 प्रतिदिन कमाकर अपनी दो बेटियों 13 वर्षीय संध्या और 11 वर्षीय साक्षी का पालन-पोषण कर रही हैं) ने अपने पति के सपनों के अनुसार बेटियों को उच्च शिक्षा दिलाने की प्रतिबद्धता जताई।
  • इस बीच, मृतक के पिता अमृतलाल (सरकारी शिक्षक) ने भी मुआवजे में हिस्सेदारी की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में आवेदन किया है, जिस पर कोर्ट अंतिम राहत के समय निर्णय लेगा।

नई दिल्ली: भारत का संविधान के अनुच्छेद 21 (जीने का मौलिक अधिकार एवं हिरासत में हिंसा से संरक्षण / Right to Life and Dignity), अनुच्छेद 32 (संवैधानिक उपचारों का अधिकार), दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 176(1A) (हिरासत में हुई मौतों की अनिवार्य न्यायिक जांच / Mandatory Judicial Inquiry), राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के दिशा-निर्देश, पुलिस हिरासत में प्रताड़ना (Custodial Torture), राज्य का प्रतिनिधिक दायित्व (Vicarious Liability of the State), तथा शीर्ष प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा न्यायिक जांच रिपोर्ट को दबाने के आपराधिक आचरण पर सुप्रीम कोर्ट ने एक अत्यंत कठोर, सुधारात्मक और ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है।

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति विक्रम नाथ (Justice Vikram Nath) और न्यायमूर्ति संदीप मेहता (Justice Sandeep Mehta) की खंडपीठ ने 35 वर्षीय अनपढ़ विधवा लेहरा बाई द्वारा अपने पति श्रवण सूर्यवंशी तामरे की पुलिस हिरासत में हुई बर्बर मौत के खिलाफ दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुनवाई करते हुए छत्तीसगढ़ प्रशासन के शीर्ष नेतृत्व को कटघरे में खड़ा कर दिया।

शीर्ष अदालत ने छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक (DGP), महानिदेशक (कारागार), और प्रमुख सचिव (गृह) द्वारा अपनाए गए गैर-जिम्मेदाराना रवैये को ‘अपमानजनक’ (Sacrilegious), उनके बयानों को ‘प्रत्यक्षतः झूठा और सर्वथा निंदनीय’ (Patently False and Wholly Reprehensible) तथा अदालत की आंखों में धूल झोंकने का एक ‘लीपापोती का प्रयास’ (Cover-up Story) करार दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट द्वारा दिए गए ₹1 लाख के मामूली मुआवजे को खारिज करते हुए राज्य सरकार को ₹25,00,000 (पच्चीस लाख रुपये) का अंतरिम मुआवजा जारी करने, दोषी पुलिसकर्मियों के विरुद्ध तत्काल आपराधिक प्राथमिकी दर्ज करने, और मामले की संपूर्ण जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंपने के आदेश दिए।

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां

1. ‘शीर्ष अधिकारियों द्वारा अज्ञानता का नाटक घोर अपमानजनक और चौंकाने वाला’

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ ने डीजीपी, डीजी जेल और प्रमुख सचिव (गृह) के आचरण की तीखी आलोचना करते हुए अपने आदेश में दर्ज किया: “इस तथ्य पर कोई विवाद नहीं है कि 22 जुलाई 2024 को प्रस्तुत न्यायिक जांच रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया था कि तामरे की मृत्यु सिर में चोट लगने के कारण हुई थी। इसके बावजूद, गृह विभाग के प्रमुख सचिव, पुलिस महानिदेशक (DGP) और महानिदेशक (कारागार) द्वारा अपनाया गया ‘आनंदमय अज्ञानता’ (Blissful Ignorance) का रुख घोर अपमानजनक (Sacrilegious) है और यह हिरासत में होने वाली मौतों को नियंत्रित करने वाली वैधानिक प्रक्रियाओं के प्रति एक विचलित करने वाली उपेक्षा (Disturbing Disregard) को दर्शाता है।”

2. डीजीपी का हलफनामा ‘प्रत्यक्षतः झूठा और अदालत की आंखों में धूल झोंकने का प्रयास’:

  • अदालत ने छत्तीसगढ़ के तत्कालीन डीजीपी (अशोक जुनेजा) के उस हठधर्मिता भरे रुख की भर्त्सना की, जिसमें उन्होंने दलील दी थी कि चूंकि पुलिस मुख्यालय को औपचारिक रूप से न्यायिक जांच रिपोर्ट प्राप्त नहीं हुई थी, इसलिए आपराधिक मामला (FIR) दर्ज करने का कोई अवसर नहीं बना।
  • पीठ ने कहा:“डीजीपी का यह सबमिशन प्रत्यक्षतः झूठा और पूरी तरह निंदनीय (Patently false and wholly reprehensible) है। यह पूरी कहानी केवल एक लीपापोती (Cover-up story) और अदालत की आंखों में धूल झोंकने का प्रयास (Attempt to pull the wool over the Court’s eyes) है।”
  • अदालत ने डीजी (जेल) द्वारा रिपोर्ट आगे न भेजने के लिए दिए गए “रूटीन और औपचारिक स्पष्टीकरण” तथा प्रमुख सचिव (गृह) के उदासीन रवैये को भी प्रशासनिक तंत्र की विफलता माना।

3. हाईकोर्ट के आदेश में गंभीर विधिक त्रुटि:

  • सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के उस आदेश को आड़े हाथों लिया जिसने दिसंबर 2024 में इस जघन्य कस्टोडियल डेथ को केवल अधिकारियों की “लापरवाही” (Negligence) मानकर ₹1 लाख का मामूली मुआवजा दिया था।
  • पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय ने न केवल एक मामूली और अपर्याप्त मुआवजा (Meagre Compensation) दिया, बल्कि जिम्मेदार अधिकारियों और पुलिसकर्मियों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने की मुख्य प्रार्थना को भी पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया।

4. सीबीआई जांच, आपराधिक केस और ₹25 लाख का अंतरिम मुआवजा:

  • निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पूरे मामले की जांच छत्तीसगढ़ पुलिस से छीनकर केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंप दी और दोषी अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज करने का निर्देश दिया।
  • 13 अक्टूबर 2026 की सुनवाई में शीर्ष अदालत ने सीबीआई को अपनी जांच रिपोर्ट पूरी करने के लिए 3 महीने का अतिरिक्त समय दिया और मामले को आगे की सुनवाई हेतु 2 फरवरी 2027 के लिए सूचीबद्ध किया।
  • पीड़िता लेहरा बाई को भरण-पोषण और गरिमापूर्ण जीवन के लिए राज्य सरकार को ₹25 लाख का अंतरिम मुआवजा अदा करने का कड़ा आदेश दिया गया।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2024–2026)

चरण / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के तर्क
पीड़ित (मृतक)श्रवण सूर्यवंशी तामरे (34 वर्ष) — मोहरा गांव, बिलासपुर (छत्तीसगढ़); परिवार के पालन-पोषण के लिए राजमिस्त्री और छोटी दुकान संचालक।
याचिकाकर्तालेहरा बाई (35 वर्ष) — मृतक की अनपढ़ पत्नी, जो दो नाबालिग बेटियों (संध्या, 13 वर्ष और साक्षी, 11 वर्ष) की मां हैं और ₹300 प्रतिदिन की मजदूरी करती हैं।
गिरफ्तारी की पृष्ठभूमि (18.01.2024)सिपत थाना पुलिस ने ₹1,200 मूल्य की 6 लीटर अवैध महुआ शराब रखने के आरोप में छत्तीसगढ़ आबकारी अधिनियम, 1915 की धारा 34(2) के तहत गिरफ्तार किया।
हिरासत में यातना और मौतपरिजनों को मिलने नहीं दिया गया। 21 जनवरी की रात गुपचुप तरीके से CIMS अस्पताल बिलासपुर लाया गया। 22 जनवरी की सुबह 6 बजे मृत घोषित किया गया।
पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के चौंकाने वाले तथ्यप्रारंभिक मेडिकल रिपोर्ट में कोई चोट न होने का दावा किया गया था, किंतु पोस्टमॉर्टम में सामने आया:
1. भारी व कुंद वस्तु (Blunt Object) के वार से सिर में अंदरूनी चोट और कार्डियो रेस्पिरेटरी अरेस्ट।
2. सिर के पिछले हिस्से (Occipital Scalp) पर फटा हुआ गहरा घाव जिससे लगातार रक्त बह रहा था (बिना टांके के)।
3. शरीर पर कई जगह खरोंचें व नील के निशान, सूजन और जननांग (लिंग) से रक्तस्राव।
प्रशासनिक लीपापोती22 जुलाई 2024 को न्यायिक जांच अधिकारी ने सिर की चोट से मौत की पुष्टि की, किंतु डीजीपी और गृह विभाग ने रिपोर्ट न मिलने का बहाना बनाकर महीनों तक कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं की और न ही संबंधित पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई की।
सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुखडीजीपी के बहानों को आपराधिक लीपापोती माना; सीबीआई को जांच सौंपी; ₹25 लाख अंतरिम मुआवजा देने और दोषियों पर केस दर्ज करने का आदेश दिया।

विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘कस्टोडियल टॉर्चर’ और अनुच्छेद 21 का उल्लंघन

  • डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य [(1997) 1 SCC 416]:
    • सर्वोच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी थी कि पुलिस हिरासत में प्रताड़ना विधि के शासन (Rule of Law) के मुंह पर तमाचा है। किसी नागरिक को थाने में बंद करने का अर्थ यह नहीं है कि वह अपने जीवन और मानवीय गरिमा के मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 21) से वंचित हो जाता है।
    • सिपत थाने के पुलिसकर्मियों द्वारा सीसीटीवी फुटेज न देना और परिजनों को सूचना न देना डी.के. बसु के दिशा-निर्देशों का खुला उल्लंघन था।
  • धारा 176(1A) CrPC / धारा 196(2) BNSS का अधिदेश:
    • संसद ने कानून में विशेष संशोधन करके यह अनिवार्य बनाया था कि हिरासत में मौत के प्रत्येक मामले में कार्यपालक मजिस्ट्रेट नहीं, बल्कि न्यायिक मजिस्ट्रेट जांच करेगा।
    • जब न्यायिक मजिस्ट्रेट ने जुलाई 2024 में ही सिर की घातक चोट से मौत की पुष्टि कर दी थी, तो पुलिस महानिदेशक (DGP) और गृह सचिव द्वारा उस रिपोर्ट पर आंखें मूंद लेना और FIR दर्ज न करना सीधे तौर पर सांविधिक प्रक्रिया को विफल करने का आपराधिक कृत्य था।
  • नीलाबती बेहरा बनाम उड़ीसा राज्य [(1993) 2 SCC 746]:
    • सुप्रीम कोर्ट ने सुस्थापित किया था कि हिरासत में मौत के मामलों में संप्रभु उन्मुक्ति (Sovereign Immunity) का सिद्धांत लागू नहीं होता। राज्य अपने अधिकारियों के गैर-कानूनी कृत्यों के लिए प्रतिनिधिक रूप से उत्तरदायी (Viceriously Liable) है और पीड़ित परिवार को सार्वजनिक कानून (Public Law Remedy) के तहत भारी मुआवजा पाने का पूर्ण हक है।

पारिवारिक विवाद एवं सामाजिक संदर्भ: अनपढ़ मां की अनथक लड़ाई

  • कठिन सामाजिक पृष्ठभूमि: लेहरा बाई और श्रवण तामरे ने परिवार की मर्जी के खिलाफ विवाह किया था। लेहरा पहले से विवाहित थीं और तामरे से उम्र में बड़ी थीं, जिसके कारण ससुराल पक्ष उनसे नाराज रहता था।
  • मुआवजे पर ससुराल का दावा: तामरे के पिता अमृतलाल (जो एक सरकारी स्कूल शिक्षक हैं) ने भी मुआवजे में हिस्सेदारी की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पारिवारिक विवाद की सुनवाई को अंतिम राहत तय होने तक के लिए टाल दिया है।
  • अधिवक्ता की निःशुल्क विधिक सेवा: समाचार पत्र में खबर पढ़ने के बाद अधिवक्ता राजीव कुमार दुबे ने लेहरा बाई से संपर्क किया और उनका केस बिना कोई फीस लिए बिलासपुर से लेकर देश की सर्वोच्च अदालत तक पूरी निष्ठा से लड़ा।
  • संघर्ष का उद्देश्य: दिन में ₹300 की दिहाड़ी मजदूरी करने वाली लेहरा बाई ने कहा कि उनका एकमात्र सपना अपनी दो बेटियों (संध्या और साक्षी) को पढ़ाकर बड़ा अफसर (डॉक्टर या कलेक्टर) बनाना है, जो उनके पति का सपना था, और दोषियों को कानून के तहत सख्त सजा दिलाना है।

विधिक विवरण एवं उपस्थित अधिवक्ता

  • न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय (संवैधानिक एवं अपीलीय क्षेत्राधिकार)
  • केस संदर्भ: लेहरा बाई बनाम छत्तीसगढ़ राज्य एवं अन्य [विशेष अनुमति याचिका (आपराधिक)]
  • पीठ: न्यायमूर्ति विक्रम नाथ एवं न्यायमूर्ति संदीप मेहता
  • आदेश की मुख्य तिथियां: अगस्त 2026 (मुआवजा व सीबीआई जांच आदेश) एवं 13 अक्टूबर 2026 (सीबीआई को समय-विस्तार)
  • अगली सुनवाई की तिथि: 2 फरवरी 2027
  • अंतरिम मौद्रिक अनुतोष: ₹25,00,000 (पच्चीस लाख रुपये) — छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा देय

विधिक प्रतिनिधित्व:

  • याचिकाकर्ता (लेहरा बाई) की ओर से: अधिवक्ता राजीव कुमार दुबे (Advocate Rajeev Kumar Dubey)
  • प्रतिवादी (छत्तीसगढ़ राज्य) की ओर से: राज्य के वरिष्ठ स्थायी अधिवक्ता
  • जांच एजेंसी: केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI)
  • प्रासंगिक कानून एवं सांविधिक प्रावधान:
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 21 (प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता) एवं अनुच्छेद 32/136 (संवैधानिक उपचार)
    • दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) — धारा 176(1A) (हिरासत में मौत की न्यायिक जांच) एवं धारा 154 (संज्ञेय अपराध में अनिवार्य प्राथमिकी)
    • भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) — धारा 302 (हत्या), धारा 330/331 (स्वीकृति कराने हेतु यातना), एवं धारा 120B/201 (साक्ष्य मिटाना)
    • छत्तीसगढ़ आबकारी अधिनियम, 1915 — धारा 34(2)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • हिरासत में प्रताड़ना और संस्थागत जवाबदेही का विधिक मानक: ‘पुलिस हिरासत में किसी भी नागरिक की अस्वाभाविक मौत जीवन के मौलिक अधिकार का सबसे घोर उल्लंघन है; न्यायिक जांच रिपोर्ट में प्रताड़ना के साक्ष्य सामने आने के बाद शीर्ष पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा रिपोर्ट न मिलने का बहाना बनाकर FIR दर्ज न करना अदालत की आंखों में धूल झोंकने का अक्षम्य अपराध है; ऐसी स्थिति में अदालतें राज्य पर भारी अंतरिम मुआवजा अधिरोपित करेंगी और स्वतंत्र जांच एजेंसी (CBI) से आपराधिक विचारण सुनिश्चित कराएंगी।’
  • वर्तमान स्थिति: राज्य सरकार को ₹25 लाख का अंतरिम भुगतान करने का निर्देश प्रभावी; सीबीआई को जांच पूरी करने के लिए 3 महीने का अतिरिक्त समय दिया गया है; सुप्रीम कोर्ट में मामले की अगली सुनवाई 2 फरवरी 2027 को नियत है।

Custodial Death:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतभारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठन्यायमूर्ति विक्रम नाथ (Justice Vikram Nath) एवं न्यायमूर्ति संदीप मेहता (Justice Sandeep Mehta)
मृतक एवं याचिकाकर्तामृतक: श्रवण सूर्यवंशी ताम्रकार (उम्र 34 वर्ष) | याचिकाकर्ता: पत्नी लेहरा बाई (उम्र 35 वर्ष)
मूल मामला18 जनवरी 2024 को सीपत पुलिस (बिलासपुर) द्वारा 6 लीटर महुआ शराब (कीमत ₹1200) रखने के आरोप में गिरफ्तारी; 22 जनवरी को अस्पताल में मौत।
पोस्टमार्टम निष्कर्षसिर पर गंभीर चोट (Head Injury), कई स्थानों पर खरोंच/चोट के निशान, अंडकोष/पेनिस से रक्तस्राव।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश1. मुआवजा: पीड़ित पत्नी को ₹25 लाख का अंतरिम मुआवजा।
2. जांच: सीबीआई (CBI) जांच के आदेश (3 महीने का अतिरिक्त समय, अगली सुनवाई 2 फरवरी 2027)।
3. एफआईआर: दोषी अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने का निर्देश।
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