Monday, October 26, 2026
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Anti-Defection Law: कोई इस्तीफा देता है और मंत्री बन जाता है, यह राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा है; TVK में शामिल होने वाले 6 AIADMK विधायकों का केस जानें

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मामले की पृष्ठभूमि: क्या था पूरा घटनाक्रम?

  1. व्हिप का उल्लंघन और इस्तीफा:मई 2026 में AIADMK व्हिप का उल्लंघन करने के बादPerundurai, Madurantakam, Dharapuram, Ambasamudram, Viralimalai और Karur विधानसभा क्षेत्रों से AIADMK के टिकट पर जीते 6 विधायकों (एस. जयकुमार, मरगथम कुमारवेल, पी. सत्यभामा, इसाक्की सुबया, सी. विजयभास्कर और एम. आर. विजयभास्कर) ने मई और जून 2026 के दौरान अपनी सीटों से इस्तीफा दे दिया।
  2. TVK में शामिल होना और उपचुनाव:इस्तीफा स्वीकार होने के बाद सभी छह पूर्व विधायक मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली तमिलगा वेट्री कड़गम (TVK) में शामिल हो गए। 6 अक्टूबर को हुए उपचुनाव में मरगथम कुमारवेल और पी. सत्यभामा TVK के उम्मीदवार के तौर पर दोबारा विधायक चुने गए।
  3. मद्रास हाईकोर्ट का रुख (24 सितंबर व 13 अक्टूबर):मद्रास हाईकोर्ट ने PIL को खारिज करते हुए माना था कि इस्तीफा स्वीकार करना और रिक्तियों की घोषणा करना संवैधानिक रूप से वैध है। हाईकोर्ट ने विधानसभा अध्यक्ष जे.सी.डी. प्रभाकर के फैसले को बरकरार रखा था, लेकिन AIADMK व्हिप कृष्णमूर्ति की अयोग्यता याचिका पर अध्यक्ष को 2 महीने के भीतर फैसला करने का निर्देश दिया था। इसके खिलाफ याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।

सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के मुख्य निष्कर्ष व कानूनी तर्क

1. “इस्तीफा और अयोग्यता दो अलग-अलग संवैधानिक प्रक्रियाएं हैं”:

अदालत ने माना कि यदि किसी विधायक के खिलाफ 10वीं अनुसूची (दल-बदल कानून) के तहत अयोग्यता की याचिका लंबित भी हो, तो भी विधानसभा अध्यक्ष (Speaker) के पास उसका इस्तीफा स्वीकार करने का संवैधानिक अधिकार बना रहता है: “अयोग्यता याचिका का लंबित होना संवैधानिक रूप से अध्यक्ष को इस्तीफे स्वीकार करने से नहीं रोकता, क्योंकि इस्तीफा और अयोग्यता दो अलग-अलग संवैधानिक प्रक्रियाएं हैं।”

2. उपचुनाव के खर्च की भरपाई की मांग खारिज:

  • अदालत ने उस मांग को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि इस्तीफा देकर उपचुनाव कराने वाले विधायकों से चुनाव का खर्चा वसूला जाए। कोर्ट ने माना कि न्यायिक आदेश के माध्यम से संविधान और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम में अतिरिक्त वैधानिक शर्तें (Extra-statutory conditions) नहीं जोड़ी जा सकतीं।

3. अयोग्यता याचिका पर 2 महीने में फैसले का निर्देश:

  • भले ही इस्तीफे स्वीकार कर लिए गए हों, लेकिन इससे अयोग्यता याचिकाएं निष्प्रभावी (Infructuous) नहीं होतीं।
  • मद्रास हाईकोर्ट द्वारा जारी अनुच्छेद 226 के तहत उस निर्देश को सही ठहराया गया, जिसमें तमिलनाडु विधानसभा अध्यक्ष को 2 महीने के भीतर AIADMK व्हिप द्वारा दायर अयोग्यता याचिकाओं पर अंतिम निर्णय लेने का आदेश दिया गया था।

नई दिल्ली: भारत का संविधान के अनुच्छेद 190(3)(b) (विधानसभा सदस्य द्वारा त्यागपत्र देने का संवैधानिक अधिकार एवं अध्यक्ष की संतुष्टि), 10वीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून / Anti-Defection Law), जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (RPA, 1951), तथा इस्तीफे के बाद उपचुनाव लड़ने पर ‘चुनावी व्यय प्रतिभूति’ (Election Expenditure Security) जमा कराने व पांच वर्ष के अयोग्यता प्रतिबंध की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) पर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण विधिक निर्णय सुनाते हुए याचिका खारिज कर दी है।

मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन-न्यायाधीशों की विशेष पीठ ने अधिवक्ता के. सुथन द्वारा मद्रास उच्च न्यायालय के 24 सितंबर 2026 के आदेश के खिलाफ दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर विचार करने से स्पष्ट इनकार कर दिया।

शीर्ष अदालत ने संसदीय और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की प्रकृति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि राजनीतिक जीवन में त्यागपत्र देना, किसी अन्य दल में शामिल होना या मंत्री पद ग्रहण करना लोकतांत्रिक राजनीतिक प्रक्रिया का स्वाभाविक हिस्सा है। अदालतें जनहित याचिकाओं के माध्यम से विधायिका द्वारा बनाए गए कानूनों से परे जाकर विधायकों के इस्तीफे के संवैधानिक अधिकार पर अतिरिक्त वित्तीय या दंडात्मक शर्तें नहीं थोप सकतीं।

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां

1. ‘इस्तीफा और मंत्री बनना राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा’

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिकाकर्ता के तर्कों को खारिज करते हुए मौखिक रूप से स्पष्ट किया: “कोई इस्तीफा देता है और मंत्री बन जाता है, यह सब राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा (Part of Political Process) है। अदालतें निर्वाचित प्रतिनिधियों के इस्तीफे देने के संवैधानिक अधिकार को न्यायिक आदेशों के माध्यम से नियंत्रित या बाधित नहीं कर सकतीं।”

2. ‘चुनावी खर्च जमा करने और 5 साल के प्रतिबंध की मांग असंवैधानिक’:

  • याचिकाकर्ता ने निर्वाचन आयोग को यह निर्देश देने की मांग की थी कि वह एक ‘इलेक्शन एक्सपेंडिचर सिक्योरिटी’ तंत्र बनाए, जिसके तहत स्वेच्छा से इस्तीफा देकर दोबारा उपचुनाव लड़ने वाले पूर्व विधायक से उपचुनाव में खर्च होने वाला पूरा सार्वजनिक धन पहले जमा कराया जाए।
  • मद्रास उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय दोनों ने माना कि संविधान के अनुच्छेद 190(3)(b) के तहत इस्तीफा देना सदस्य का संवैधानिक अधिकार है।
  • जब तक संसद जनप्रतिनिधित्व कानून में संशोधन करके ऐसी कोई शर्त नहीं जोड़ती, तब तक न्यायपालिका किसी विधायक पर ऐसा कोई वित्तीय बोझ या 5 साल का अयोग्यता प्रतिबंध नहीं लगा सकती।

मद्रास उच्च न्यायालय के निष्कर्ष (अध्यक्ष का प्राधिकार और 10वीं अनुसूची)

इस मामले से जुड़ी विधिक पृष्ठभूमि में मद्रास उच्च न्यायालय ने 13 अक्टूबर 2026 को दिए गए अपने विस्तृत निर्णय में तमिलनाडु विधानसभा अध्यक्ष द्वारा त्यागपत्र स्वीकार किए जाने की वैधता को बरकरार रखा था:

  1. इस्तीफा और अयोग्यता स्वतंत्र संवैधानिक प्रक्रियाएं: अदालत ने माना कि 10वीं अनुसूची के तहत अयोग्यता याचिका लंबित रहने से स्पीकर को अनुच्छेद 190(3)(b) के तहत स्वैच्छिक त्यागपत्र स्वीकार करने से कानूनी रूप से नहीं रोका जा सकता।
  2. स्पीकर की संतुष्टि का दायरा: अध्यक्ष को केवल यह देखना होता है कि इस्तीफा वास्तविक (Genuine) और स्वैच्छिक (Voluntary) है या नहीं। उन्हें इसके पीछे के राजनीतिक इरादों या अंतर्निहित मंशा की विस्तृत जांच (Roving Inquiry) करने की आवश्यकता नहीं है।
  3. अयोग्यता याचिका का निष्प्रभावी न होना: इस्तीफा स्वीकार कर लिए जाने से लंबित अयोग्यता याचिका स्वतः निरर्थक (Infructuous) नहीं हो जाती। यदि कोई सदस्य दल-बदल का दोषी था, तो उस पर विधिक परिणाम तय करने हेतु अध्यक्ष को याचिका पर अंतिम निर्णय देना ही होगा।
  4. अनुच्छेद 226 के तहत समयबद्ध निर्देश: उच्च न्यायालय ने विधानसभा अध्यक्ष को निर्देश दिया था कि वह अन्नाद्रमुक (AIADMK) के सचेतक (Whip) द्वारा दायर अयोग्यता याचिकाओं पर दो महीने की समय-सीमा के भीतर अंतिम निर्णय लें।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2026)

चरण / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
मूल दलऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (AIADMK)।
नया दलतमिलगा वेत्री कझगम (TVK) — मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के नेतृत्व वाला सत्तारूढ़ दल।
संबंधित 6 विधायक1. एस. जयकुमार (पेरुंदुरई)
2. मरगथम कुमारवेल (मदुरंतकम)
3. पी. सत्यभामा (धारापुरम)
4. एसाक्की सुबैया (अंबासमुद्रम)
5. सी. विजयभास्कर (विरालीमलई)
6. एम.आर. विजयभास्कर (करूर)
इस्तीफों का घटनाक्रमअप्रैल 2026 में AIADMK टिकट पर चुने जाने के बाद, 13 मई को व्हिप का उल्लंघन हुआ। 25 मई से 29 जून 2026 के बीच इन सभी 6 विधायकों ने विधानसभा से स्वेच्छा से इस्तीफा दे दिया और टीवीके (TVK) में शामिल हो गए।
उपचुनाव परिणाम (06.10.2026)6 अक्टूबर 2026 को हुए उपचुनावों में मरगथम कुमारवेल और सत्यभामा ने TVK उम्मीदवार के रूप में अपनी-अपनी सीटों (मदुरंतकम और धारापुरम) से पुनः विजय प्राप्त की।
दाखिल जनहित याचिका (PIL)अधिवक्ता के. सुथन ने मांग की थी कि जनता के पैसे की बर्बादी रोकने हेतु इन विधायकों से उपचुनाव का पूरा खर्च वसूला जाए और उन्हें 5 साल तक चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित किया जाए।
न्यायालयों का अंतिम निर्णयमद्रास उच्च न्यायालय ने 24 सितंबर को याचिका खारिज की थी; 26 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने भी याचिका पूरी तरह खारिज कर दी।

विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘दल-बदल विरोधी कानून बनाम इस्तीफे की स्वतंत्रता’

  • श्रीमंत बालासाहेब पाटिल बनाम कर्नाटक विधानसभा अध्यक्ष [(2020) 2 SCC 1]:
    • सर्वोच्च न्यायालय की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने कर्नाटक के 17 विधायकों के मामले में स्पष्ट व्यवस्था दी थी कि विधानसभा अध्यक्ष को किसी सदस्य का त्यागपत्र स्वीकार करने से रोकने का कोई संवैधानिक आधार नहीं है, भले ही अयोग्यता याचिका लंबित हो।
    • हालांकि, उसी निर्णय में यह भी स्पष्ट किया गया था कि त्यागपत्र स्वीकार कर लेने मात्र से 10वीं अनुसूची के तहत अयोग्यता की कार्यवाही समाप्त नहीं होती। यदि विधायक ने अयोग्यता का आचरण किया था, तो स्पीकर उसे अयोग्य ठहराने के लिए स्वतंत्र हैं।
  • संविधान की 10वीं अनुसूची और उपचुनाव लड़ने की पात्रता:
    • 91वें संविधान संशोधन (2003) के अनुसार, यदि किसी सदस्य को 10वीं अनुसूची के तहत अयोग्य घोषित किया जाता है, तो वह सदन के उस कार्यकाल की समाप्ति तक या जब तक वह दोबारा निर्वाचित नहीं हो जाता, तब तक मंत्री पद धारण नहीं कर सकता।
    • किंतु यदि सदस्य ने अयोग्यता से पूर्व स्वेच्छा से इस्तीफा दे दिया है और जनता ने उसे उपचुनाव में दोबारा चुन लिया है, तो कानूनन उस पर कोई प्रतिबंध नहीं रहता। अदालतें न्यायिक आदेश के माध्यम से संविधान में नए अयोग्यता आधार नहीं जोड़ सकतीं।

विधिक विवरण

  • न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय (दीवानी अपीलीय क्षेत्राधिकार)
  • केस संदर्भ: अधिवक्ता के. सुथन बनाम मुख्य निर्वाचन अधिकारी, तमिलनाडु व अन्य [विशेष अनुमति याचिका (सिविल)]
  • पीठ: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना
  • आदेश की तिथि: 26 अक्टूबर 2026
  • चुनौती के अधीन निर्णय: मद्रास उच्च न्यायालय (प्रथम पीठ) का निर्णय दिनांक 24 सितंबर 2026 (PIL खारिज)

प्रासंगिक कानून एवं संवैधानिक प्रावधान:

  • भारत का संविधान — अनुच्छेद 190(3)(b) (सदन की सदस्यता से त्यागपत्र एवं अध्यक्ष का प्राधिकार)
  • भारत का संविधान — 10वीं अनुसूची (दल-बदल के आधार पर अयोग्यता)
  • जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (RPA) — धारा 8 से 11 (संसद व विधानसभाओं के लिए अयोग्यता के वैधानिक आधार)
  • भारत का संविधान — अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार) एवं अनुच्छेद 136 (सुप्रीम कोर्ट का विशेष अनुमति क्षेत्राधिकार)
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • विधायकों के इस्तीफे और न्यायिक हस्तक्षेप का विधिक मानक: ‘विधायिका के किसी सदस्य द्वारा त्यागपत्र देना संवैधानिक योजना का अभिन्न अंग है; जब तक संसद कानून बनाकर ऐसा कोई प्रतिबंध न लगाए, अदालतें न्यायिक आदेश द्वारा इस्तीफे के अधिकार पर ‘चुनावी खर्च जमा करने’ या ‘5 वर्ष के चुनाव प्रतिबंध’ जैसी गैर-सांविधिक शर्तें नहीं थोप सकतीं; किसी नेता का इस्तीफा देकर अन्य दल में जाना या मंत्री बनना राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा है।’
  • अंतिम परिणाम: विशेष अनुमति याचिका (SLP) पूर्णतः खारिज; मद्रास उच्च न्यायालय का आदेश बहाल; तमिलनाडु विधानसभा अध्यक्ष को पूर्व निर्देशानुसार AIADMK सचेतक की अयोग्यता याचिकाओं पर निर्धारित 2 माह की अवधि में गुण-दोष के आधार पर निर्णय लेने का वैधानिक दायित्व बना रहेगा।

Anti-Defection Law:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतभारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठमुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना
याचिकाकर्ताअधिवक्ता के. सुथन (मद्रास हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील)
प्रतिवादी/संबद्ध दलAIADMK के 6 पूर्व विधायक एवं सत्तारूढ़ TVK (तमिलगा वेट्री कड़गम)
विधायकों के नामएस. जयकुमार, मरगथम कुमारवेल, पी. सत्यभामा, इसाक्की सुबया, सी. विजयभास्कर, और एम. आर. विजयभास्कर
मुख्य मांग1. चुनाव खर्च सुरक्षा (Election Expenditure Security): स्वेच्छा से इस्तीफा देकर दोबारा उपचुनाव लड़ने वाले विधायकों से उपचुनाव का पूरा खर्च वसूलना।
2. 5 साल का अयोग्यता प्रतिबंध।
अदालत का फैसलायाचिका खारिज; इस्तीफा देना संविधान के तहत एक अधिकार है, जिस पर न्यायिक आदेश से अतिरिक्त शर्तें नहीं थोपी जा सकतीं।
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