FOLLOW US FOR MORE LEGAL UPDATES ON WhatsApp
नई दिल्ली: दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 439 (जमानत की शर्तें व शिथिलीकरण), भारत का संविधान के अनुच्छेद 21 (निष्पक्ष एवं समयबद्ध विचारण का अधिकार / Right to Fair and Speedy Trial), तथा गवाहों के निर्बाध परीक्षण व निष्पक्ष अभियोजन के सिद्धांतों पर सुप्रीम कोर्ट ने लखीमपुर खीरी 2021 तिकुनिया हिंसा मामले में ट्रायल की प्रगति की समीक्षा करते हुए एक महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश पारित किया है।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन-न्यायाधीशों की विशेष पीठ ने मामले के मुख्य आरोपी आशीष मिश्रा उर्फ मोनू को अपने परिवार और निकट संबंधियों के साथ दीवाली का पर्व मनाने के लिए सीमित अवधि हेतु गृह क्षेत्र जाने की अनुमति प्रदान की है।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह राहत 24 मार्च 2025 के आदेश के पैरा 9 में निर्धारित पूर्ववर्ती कठोर शर्तों के पूर्ण अनुपालन के अधीन रहेगी। इसके साथ ही, शीर्ष अदालत ने अभियोजन पक्ष को स्पष्ट निर्देश दिया कि विचारण को पूरा करने में न तो ऐसी जल्दबाजी होनी चाहिए कि आवश्यक गवाह व साक्ष्य छूट जाएं, और न ही अनावश्यक विलंब होना चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां
1. ‘निष्पक्ष प्रक्रिया और समयबद्धता के बीच संतुलन बनाए अभियोजन’
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने विचारण की गति पर टिप्पणी करते हुए अभियोजन के दायित्व को रेखांकित किया: *”आपका कर्तव्य यह सुनिश्चित करना है कि आपके गवाह अदालत में उपस्थित हों। मुकदमे का समयबद्ध तरीके से निपटारा होना चाहिए। *हम ऐसी जल्दबाजी (Tearing Hurry) बिल्कुल नहीं चाहते कि गवाहों की गवाही, जिरह (Cross-examination) या महत्वपूर्ण साक्ष्य छूट जाएं। इसके साथ ही, हम मुकदमे में अत्यधिक लंबा विलंब (Prolonged Delay) भी नहीं चाहते। अभियोजन पक्ष को इन दोनों के बीच संतुलन बनाकर चलना होगा।”
2. ट्रायल की वर्तमान स्थिति: 90 गवाह परीक्षित, 41 शेष
- सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश राज्य की ओर से उपस्थित अतिरिक्त अधिवक्ता ने पीठ को अवगत कराया कि सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्देशों के अनुपालन में एक वरिष्ठ एवं अनुभवी विशेष लोक अभियोजक (Special Public Prosecutor – SPP) को विचारण के संचालन हेतु नियुक्त कर दिया गया है।
- राज्य ने स्थिति रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए बताया कि कुल 131 अभियोजन गवाहों में से 90 गवाहों का परीक्षण पूरा हो चुका है, तथा अब केवल 41 गवाहों की गवाही शेष है।
- पीड़ितों की ओर से उपस्थित अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने अभियोजन पक्ष में किए गए इन सुधारात्मक कदमों और नए विशेष लोक अभियोजक की नियुक्ति पर अपनी संतुष्टि व्यक्त की।
3. दीवाली हेतु सशर्त आवागमन की अनुमति:
- आरोपी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने दलील दी कि पिछले वर्ष भी न्यायालय द्वारा त्योहार पर समान राहत दी गई थी, अतः समानता (Parity) के आधार पर एक सप्ताह की छूट दी जाए।
- उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पूर्व ट्रायल जज का स्थानांतरण रूटीन प्रशासनिक प्रक्रिया थी, न कि दंडात्मक, और सतर्कता रिपोर्ट हाईकोर्ट की प्रशासनिक समिति के समक्ष विचाराधीन है।
- पीठ ने याचिका स्वीकार करते हुए आदेश दिया:“याचिकाकर्ता को अपने परिवार के सदस्यों और करीबी रिश्तेदारों के साथ आगामी दीवाली का त्योहार मनाने हेतु अपने गृह जनपद जाने की अनुमति दी जाती है। यह अनुमति 24 मार्च 2025 के हमारे आदेश के पैराग्राफ 9 में अधिरोपित सभी शर्तों के अधीन होगी।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2021–2026)
| चरण / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के तर्क |
| मूल अपराध (3 अक्टूबर 2021) | उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के तिकुनिया में कृषि कानून विरोधी प्रदर्शन के दौरान किसानों पर वाहन चढ़ाने की घटना, जिसमें चार किसान, एक पत्रकार और तीन अन्य व्यक्तियों सहित 8 लोगों की जान गई थी। |
| अभियुक्त की स्थिति | मुख्य अभियुक्त आशीष मिश्रा उर्फ मोनू (पूर्व केंद्रीय गृह राज्य मंत्री का पुत्र); हत्या (302), आपराधिक षड्यंत्र (120B) आदि गंभीर धाराओं में विचारण का सामना कर रहे हैं। न्यायालय में वे निर्दोषता की उपधारणा (Presumption of Innocence) के अधीन हैं। |
| जमानत की शर्तें | जनवरी 2023 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा अंतरिम जमानत देते समय क्षेत्र में प्रवेश और गवाहों को प्रभावित करने पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए थे। बाद में 24 मार्च 2025 के आदेश के तहत शर्तों को संहिताबद्ध किया गया था। |
| ट्रायल की गति और प्रशासनिक बदलाव | पीड़ितों द्वारा पूर्व में गवाहों को ड्रॉप किए जाने और पीठासीन अधिकारी के आचरण पर आपत्ति जताए जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट को उपचारात्मक कदम उठाने के निर्देश दिए थे, जिसके तहत नए जिला जज और विशेष लोक अभियोजक की नियुक्ति हुई। |
| सुप्रीम कोर्ट का वर्तमान आदेश | दीवाली के उपलक्ष्य में सीमित अवधि के लिए गृह जनपद जाने की अनुमति बहाल; शेष 41 गवाहों के निष्पक्ष परीक्षण का निर्देश। |
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘त्वरित विचारण बनाम निष्पक्ष प्रक्रिया’
- ‘जस्टिस हरीड इज जस्टिस बरीड’ (हड़बड़ी न्याय को समाप्त करती है):
- सर्वोच्च न्यायालय ने कई ऐतिहासिक निर्णयों में यह दोहराया है कि त्वरित विचारण (Speedy Trial) का अर्थ यह कदापि नहीं है कि निचली अदालतें केवल फाइलों का निपटारा करने के उद्देश्य से गवाहों को छोड़ दें या बचाव पक्ष व अभियोजन को जिरह (Cross-examination) का पर्याप्त अवसर न दें।
- लखीमपुर खीरी जैसे संवेदनशील मुकदमे में, जहाँ चश्मदीद गवाहों की गवाही अत्यंत निर्णायक है, मुख्य न्यायाधीश की यह टिप्पणी प्रक्रियात्मक शुचिता (Procedural Fairness) को सर्वोच्च प्राथमिकता देती है।
- जमानत शर्तों का न्यायिक संतुलन:
- लंबे समय तक चलने वाले मुकदमों में आरोपी की स्वतंत्रता पर लगे प्रतिबंधों को मानवीय आधारों (जैसे प्रमुख पारिवारिक त्योहारों) पर संतुलित करना न्यायिक विवेक का हिस्सा है, बशर्ते कि गवाहों को डराने या साक्ष्यों से छेड़छाड़ की कोई गुंजाइश न रहे।
- 24 मार्च 2025 के आदेश के पैरा 9 की शर्तों को बरकरार रखकर शीर्ष अदालत ने सुरक्षा मानकों से कोई समझौता नहीं किया है।
विधिक विवरण एवं उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता
- न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय (आपराधिक अपीलीय क्षेत्राधिकार)
- केस संदर्भ: आशीष मिश्रा उर्फ मोनू बनाम उत्तर प्रदेश राज्य [SLP (Crl) No. 7857/2022]
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना
- आदेश की तिथि: 26 अक्टूबर 2026
- संबद्ध मूल घटना: 3 अक्टूबर 2021, तिकुनिया, लखीमपुर खीरी (उत्तर प्रदेश)
विधिक प्रतिनिधित्व:
- आरोपी (आशीष मिश्रा) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे (Senior Advocate Siddharth Dave)
- पीड़ितों/शिकायतकर्ताओं की ओर से: अधिवक्ता प्रशांत भूषण (Advocate Prashant Bhushan)
- उत्तर प्रदेश राज्य की ओर से: अधिवक्ता रुचिरा गोयल (Advocate Ruchira Goel)
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) — धारा 302 (हत्या), धारा 120B (आपराधिक षड्यंत्र), धारा 147/148 (दंगा) एवं धारा 307 (हत्या का प्रयास)
- दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) — धारा 439 (जमानत की शर्तें) एवं धारा 311 (गवाहों को बुलाने व परीक्षण की शक्ति)
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 21 (प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता तथा निष्पक्ष विचारण का अधिकार)
- गवाह संरक्षण योजना, 2018 (Witness Protection Scheme)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- विचारण की गति और निष्पक्षता का संतुलन: ‘आपराधिक मुकदमे में समयबद्धता और प्रक्रियात्मक निष्पक्षता एक-दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक हैं; न तो गवाहों को छोड़ देने वाली जल्दबाजी स्वीकार्य है और न ही अत्यधिक विलंब; त्योहारों पर दी जाने वाली सशर्त मानवीय राहत मुकदमे के नियमित संचालन को बाधित नहीं करनी चाहिए।’
- वर्तमान स्थिति: आरोपी को 24 मार्च 2025 के पैरा 9 की शर्तों के अधीन दीवाली मनाने हेतु गृह जनपद जाने की अनुमति दी गई है; विशेष लोक अभियोजक के नेतृत्व में शेष 41 गवाहों के परीक्षण के साथ विचारण जारी रहेगा।
Lakhimpur Kheri: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना |
| मामला/साइटेशन | आशीष मिश्रा उर्फ मोनू बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (Ashish Mishra Alias Monu v. State of UP) |
| मुख्य आरोपी | आशीष मिश्रा उर्फ मोनू (पूर्व केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा टेनी के पुत्र) |
| मूल घटना | 3 अक्टूबर 2021 को लखीमपुर खीरी में एसयूवी (SUV) से प्रदर्शनकारी किसानों को कुचलने की घटना (4 किसानों और 1 पत्रकार सहित 8 की मौत)। |
| अदालत का फैसला | सशर्त राहत; मार्च 2025 के जमानत आदेश की शर्तों के तहत दिवाली मनाने लखनऊ जाने की छूट। |
| ट्रायल की स्थिति | 131 में से 90 अभियोजन गवाहों (Prosecution Witnesses) के बयान दर्ज हो चुके हैं; 41 गवाह शेष हैं। |

