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मामले की पृष्ठभूमि: क्या था पूरा घटनाक्रम?
- विवाह और संदिग्ध मौत:नोएडा की रहने वाली त्विषा शर्मा ने डेटिंग ऐप के जरिए पहचान के बाद भोपाल के वकील समर्थ सिंह से शादी की थी। शादी के महज 5 महीने बाद, 12 मई को वह भोपाल स्थित अपने ससुराल में फंदे से लटकी मिलीं। मृतका के परिवार ने ससुराल वालों पर दहेज उत्पीड़न और घरेलू हिंसा के आरोप लगाए, जिसके बाद कटारा हिल्स पुलिस स्टेशन (बिलासपुर/भोपाल) में मामला दर्ज किया गया।
- CBI जांच और गिरफ्तारी:शुरुआत में सत्र अदालत से गिरिबाला सिंह को अग्रिम जमानत मिली थी, जिसे राज्य सरकार और पीड़िता के परिवार की याचिका पर हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया था। इसके साथ ही हाईकोर्ट के निर्देश पर AIIMS दिल्ली के डॉक्टरों की टीम द्वारा दूसरा पोस्टमार्टम कराया गया। बाद में मामले की जांच सीबीआई (CBI) को सौंपी गई, जिसने गिरिबाला सिंह और उनके बेटे समर्थ सिंह को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया।
- सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप:पीड़िता के पिता द्वारा मुकदमे को दिल्ली स्थानांतरित (Transfer) करने की मांग को लेकर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य ट्रायल की कार्यवाहियों पर रोक लगा दी है, लेकिन हाईकोर्ट को दो सप्ताह के भीतर आरोपियों की जमानत याचिकाओं पर निर्णय लेने का निर्देश दिया है।
हाईकोर्ट में बचाव पक्ष के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी तर्क
1. “नाराजगी जाहिर करने का मतलब आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं”:
वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया कि यदि किसी मां या सास की सहमति के बिना उसकी बहू गर्भपात कराती है, तो क्रोधित होना और बात बंद कर देना एक स्वाभाविक इंसानी व्यवहार है: “दोनों सास और पति बच्चा चाहते थे। यदि सास ने गुस्से में आकर उसे ‘हत्यारा’ कह दिया, तो क्या इसका मतलब यह है कि वह चाहती थी कि बहू आत्महत्या कर ले? यह सब आवेश में कहा गया था, जिसके लिए गिरिबाला सिंह ने बाद में माफी भी मांग ली थी।”
2. बातचीत और व्हाट्सएप चैट का हवाला:
- बचाव पक्ष ने कोर्ट को बताया कि चैट से स्पष्ट होता है कि यदि मृतका किसी तनाव में थी, तो वह अपने पति समर्थ सिंह के व्यवहार के कारण थी। इससे गिरिबाला सिंह पूरी तरह से दोषमुक्त साबित होती हैं।
- यह भी तर्क दिया गया कि मृतका पर कोई बंदिश या अवैध निरोध (Confinement) नहीं था; वह दिल्ली में रहने की योजना बना रही थी और वहां नौकरी के लिए आवेदन भी कर चुकी थी।
जबलपुर: भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 108 (आत्महत्या के लिए उकसाना / पूर्ववर्ती IPC धारा 306), धारा 85 (पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता / पूर्ववर्ती IPC धारा 498A), दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961, तथा आत्महत्या के लिए उकसाने में मानसिक स्थिति (Mens Rea) और प्रत्यक्ष संलिप्तता (Instigation) के विधिक मानकों पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में एक अत्यंत संवेदनशील मामले में नियमित जमानत याचिका पर अंतिम बहस पूरी हुई है।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अजय कुमार निरंकारी (Justice Ajay Kumar Nirankari) की एकल पीठ के समक्ष पूर्व जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग की अध्यक्ष एवं सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी गिरिबाला सिंह की नियमित जमानत याचिका पर उनके वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलीलें पूरी कीं।
वरिष्ठ अधिवक्ता ने तर्क दिया कि अपनी बहू ट्विशा शर्मा द्वारा परिवार की असहमति के बावजूद गर्भपात (Abortion) कराने पर गुस्से में उसे “हत्यारा” (Murderer) कह देना एक मानवीय व तात्कालिक आक्रोश (Heat of the moment) था, जिसके लिए बाद में माफी भी मांग ली गई थी। इसे कानूनन न तो क्रूरता माना जा सकता है और न ही आत्महत्या का दुष्प्रेरण (Abetment to Suicide)।
उच्च न्यायालय में बचाव पक्ष (गिरिबाला सिंह) द्वारा रखी गई प्रमुख विधिक दलीलें
1. ‘हत्यारा कहने का अर्थ यह नहीं कि वह आत्महत्या कर ले’
गिरिबाला सिंह की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने व्हाट्सएप चैट और कॉल रिकॉर्ड्स का हवाला देते हुए अदालत के समक्ष दलील दी: “सास बहुत आहत थीं क्योंकि बहू ने उनकी बात नहीं सुनी और गर्भपात का कदम उठा लिया। ऐसी स्थिति में कौन सी सास खुश होगी? स्वाभाविक प्रतिक्रिया गुस्से की ही होगी। उन्होंने बात न करके अपनी नाराजगी जाहिर की—यह किसी भी सामान्य इंसान की स्वाभाविक प्रतिक्रिया है। पति और सास दोनों बच्चा चाहते थे; ऐसे में अगर उन्होंने उसे ‘मर्डरर’ कह भी दिया, तो क्या इसका यह मतलब निकाल लिया जाएगा कि वे चाहते थे कि वह आत्महत्या कर ले? यह सब तात्कालिक आवेश (Heat of the moment) में कहा गया था, जिसके लिए गिरिबाला सिंह ने बाद में माफी भी मांग ली थी।”
2. ‘यदि गर्भपात के लिए दबाव डालते तब क्रूरता बनती’:
- वरिष्ठ वकील ने रेखांकित किया कि यदि सास और पति ने ट्विशा पर बच्चे को गिराने के लिए दबाव डाला होता, तब जाकर क्रूरता का अपराध बनता।
- यहाँ स्थिति उलट थी—ससुराल पक्ष संतान चाहता था, जबकि बहू ने उनकी सहमति के बिना गर्भपात कराया। इस पर परिवार के भीतर हुई तनातनी को वैवाहिक क्रूरता या धारा 108 BNS के तहत ‘उकसाने’ का संज्ञेय अपराध नहीं ठहराया जा सकता।
3. पति के आचरण और सास की भूमिका का कानूनी अलगाव:
- बचाव पक्ष ने चैट रिकॉर्ड्स का विश्लेषण करते हुए कहा कि यदि मृतका के मन में कोई अवसाद या क्षोभ था, तो वह उसके पति समर्थ सिंह के व्यक्तिगत आचरण और उनके वैवाहिक विवादों से संबंधित हो सकता है।
- वरिष्ठ अधिवक्ता ने तर्क दिया कि उपलब्ध साक्ष्य गिरिबाला सिंह को पूरी तरह दोषमुक्त करते हैं और एक ही तराजू में पूरी ससुराल को नहीं तौला जा सकता।
4. स्वतंत्रता और 7 वर्ष से कम कारावास का सिद्धांत:
- अदालत को बताया गया कि मृतका किसी अवैध परिरोध (Confinement) में नहीं थी; वह दिल्ली में नौकरी की तलाश कर रही थी और वहां जाने के लिए स्वतंत्र थी।
- इसके अतिरिक्त, यह तर्क भी प्रस्तुत किया गया कि धारा 85 और धारा 108 BNS के तहत जिन अपराधों में आरोप पत्र दाखिल किया गया है, उनमें सामान्यतः अधिकतम सजा 7 वर्ष या 10 वर्ष तक की है, और जांच पूरी होकर चार्जशीट दाखिल होने के बाद आरोपी को अनिश्चितकाल तक जेल में नहीं रखा जाना चाहिए।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (मई 2024–2026)
| चरण / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
| मृतका | ट्विशा शर्मा — मूल निवासी नोएडा (उत्तर प्रदेश); शादी के मात्र 5 महीने बाद 12 मई 2024 को भोपाल के कटारा हिल्स स्थित वैवाहिक घर में संदिग्ध परिस्थितियों में मृत पाई गईं। |
| आरोपीगण | 1. समर्थ सिंह (पति – भोपाल स्थित अधिवक्ता)। 2. गिरिबाला सिंह (सास – मध्य प्रदेश में जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग की पूर्व अध्यक्ष एवं पूर्व न्यायिक अधिकारी)। |
| मायके पक्ष के आरोप | ट्विशा के परिजनों ने आरोप लगाया कि शादी के तुरंत बाद से ही भारी दहेज की मांग, लगातार घरेलू हिंसा और प्रताड़ना दी जा रही थी, जिसके चलते कटारा हिल्स थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई गई। |
| प्रक्रियात्मक इतिहास | सत्र न्यायालय ने पूर्व में गिरिबाला सिंह को अग्रिम जमानत दी थी, जिसे मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया था। इसके बाद हाईकोर्ट के निर्देश पर एम्स दिल्ली के डॉक्टरों की टीम से दूसरा पोस्टमॉर्टम कराया गया। |
| सीबीआई जांच व न्यायिक हिरासत | मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई। सीबीआई ने 2 जून 2024 को कस्टडी रिमांड खत्म होने पर दोनों आरोपियों को जेल भेजा, जहाँ वे न्यायिक हिरासत में हैं। |
| सुप्रीम कोर्ट का निर्देश | मृतका के पिता द्वारा मुकदमे को दिल्ली स्थानांतरित करने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य ट्रायल पर रोक लगाते हुए हाईकोर्ट को निर्देश दिया था कि वह दो सप्ताह के भीतर नियमित जमानत याचिकाओं पर फैसला करे। |
विधिक एवं आपराधिक न्यायशास्त्र: ‘आत्महत्या का दुष्प्रेरण’ (धारा 108 BNS / 306 IPC)
- सुप्रीम कोर्ट की स्थापित नजीरें — रमेश कुमार बनाम छत्तीसगढ़ राज्य [(2001) 9 SCC 618] एवं एम. मोहन बनाम तमिलनाडु राज्य [(2011) 3 SCC 626]:
- सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार स्पष्ट किया है कि आत्महत्या के लिए उकसाने (Instigation) का अपराध सिद्ध करने के लिए आरोपी का प्रत्यक्ष कृत्य (Positive Act) और स्पष्ट आपराधिक आशय (Mens Rea) होना अनिवार्य है।
- केवल गुस्से में कहे गए कठोर शब्द, ताने या सामान्य पारिवारिक विवाद आत्महत्या के दुष्प्रेरण की श्रेणी में नहीं आते, जब तक कि यह साबित न हो कि उन शब्दों का उद्देश्य पीड़ित को मौत की ओर धकेलना ही था।
- गर्भपात और घरेलू असहमति का विधिक पहलू:
- यद्यपि गर्भ का समापन महिला का प्रजनन अधिकार है, किंतु पारिवारिक स्तर पर इस पर उपजे असंतोष को भारतीय न्याय संहिता के तहत ‘क्रूरता’ या ‘आत्महत्या के लिए विवश करने’ का सीधा आधार मानना एक जटिल विधिक प्रश्न है, जिस पर हाईकोर्ट का आगामी निर्णय महत्वपूर्ण मिसाल बनेगा।
विधिक विवरण
- न्यायालय: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (जबलपुर पीठ)
- केस संदर्भ: गिरिबाला सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य व अन्य [नियमित जमानत याचिका]
- पीठ: न्यायमूर्ति अजय कुमार निरंकारी (एकल पीठ)
- तारीख: अक्टूबर 2026 (बहस संपन्न, आदेश सुरक्षित/प्रतीक्षारत)
- जांच एजेंसी: केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI)
प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS):
- धारा 85 — पति या उसके नातेदारों द्वारा महिला के प्रति क्रूरता (पूर्ववर्ती IPC धारा 498A)
- धारा 108 — आत्महत्या का दुष्प्रेरण (पूर्ववर्ती IPC धारा 306)
- दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 — धारा 3 एवं 4
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) — धारा 480/483 (नियमित जमानत के प्रावधान)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- घरेलू कलह और आत्महत्या दुष्प्रेरण का विधिक मानक: ‘क्रूरता या सामान्य पारिवारिक विवादों के दौरान तात्कालिक आवेश में प्रयुक्त कठोर शब्द स्वतः आत्महत्या के लिए उकसाने का आधार नहीं बन सकते; धारा 108 BNS के लिए प्रत्यक्ष उकसावा और मानसिक इरादा साबित होना अनिवार्य है; आरोप पत्र दाखिल होने के बाद न्यायिक हिरासत का जारी रहना मामले के विशिष्ट तथ्यों और भूमिका के पृथक्करण पर निर्भर करता है।’
Twisha Sharma: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (Madhya Pradesh High Court) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति अजय कुमार निरंकारी (Justice Ajay Kumar Nirankari) |
| याचिकाकर्ता (आरोपी) | गिरिबाला सिंह (पूर्व अध्यक्ष, जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग, म.प्र.) |
| मृतका | त्विषा शर्मा (नोएडा निवासी; भोपाल के वकील समर्थ सिंह से शादी के 5 महीने बाद 12 मई को फांसी से मौत) |
| मुख्य विवाद | गर्भपात को लेकर व्हाट्सएप चैट में ‘हत्यारा’ (Murderer) कहने और दहेज उत्पीड़न/क्रूरता के आरोपों के तहत BNS की धारा 85 और 108 के तहत मुकदमा। |
| अदालत में पक्ष | बचाव पक्ष ने तर्क पूरे किए; सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में मुख्य ट्रायल पर रोक लगाते हुए हाईकोर्ट को 2 सप्ताह के भीतर जमानत याचिका पर फैसला करने का निर्देश दिया है। |

