Tuesday, October 27, 2026
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Women Lawyer: सभी राज्यों, UTs व उच्च न्यायालयों के जिला व तालुका अदालत…लेडीज बार रूम व प्रसाधन सुविधा दें ; बजट की कमी कोई बहाना नहीं

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मामले की पृष्ठभूमि और अदालती समीक्षा

  1. महिला वकीलों की याचिका:विभिन्न महिला अधिवक्ताओं द्वारा दायर याचिका में देश भर की जिला और अधीनस्थ अदालतों (Taluka Courts) में महिला अधिवक्ताओं के लिए अलग बार रूम, शौचालय और प्राथमिक सुविधाओं के पूरी तरह गायब होने का मुद्दा उठाया गया था।
  2. जमीनी हकीकत पर गंभीर चिंता:सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता जयना कोठारी (Senior Advocate Jayna Kothari) ने दाखिल हलफनामों का विश्लेषण पेश करते हुए बताया कि पंजाब के 67 कोर्ट परिसरों में से केवल 9 में महिलाओं के लिए शौचालय हैं, जबकि हरियाणा ने अब तक कोई निरीक्षण ही नहीं किया है।
  3. हलफनामों बनाम धरातल की जांच:वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. मोनिका गुसैन (Dr. Monika Gusain) ने जब गुजरात हाईकोर्ट के हलफनामे को सबसे बेहतर बताया, तो CJI सूर्या कांत ने केवल कागजी हलफनामों पर जाने के बजाय वालंटियर्स भेजकर जमीनी सच्चाई का वीडियो बनाकर कोर्ट में पेश करने का सुझाव दिया।

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य निष्कर्ष और कड़ा रुख

1. “शौचालय तक पहुंच बुनियादी मानवाधिकार है”:

अदालत ने स्पष्ट शब्दों में दोहराया कि जब महिला वकील अपना आधा दिन अदालत परिसरों में बिताती हैं, तो उनके सम्मान, गोपनीयता, सुरक्षा और पेशेवर कामकाज के लिए बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना अनिवार्य है: “यदि महिला वकीलों के लिए अलग बार रूम नहीं हैं, तो यह बहुत ही दयनीय स्थिति है। हम इसकी सख्त निंदा करते हैं। यह सभी उच्च न्यायालयों और राज्य सरकारों का कर्तव्य है कि जहां भी महिला सदस्य और युवा लड़कियां वकालत कर रही हैं, वहां सभी सुविधाओं के साथ एक विशेष महिला बार रूम प्रदान किया जाए। यह एक आदेश (Mandate) है और हम इससे कोई विचलन नहीं चाहते।”

2. महान्यायावादी (AG) को केंद्रीय भूमिका:

  • पीठ ने अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी को एक केंद्रीय नोडल प्राधिकरण के रूप में कार्य करने का निर्देश दिया। सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के महाधिवक्ता (Advocate Generals) और स्थायी वकील अपनी रिपोर्ट और फंड आवंटन का ब्योरा AG के समक्ष रखेंगे, जिसे संकलित करके AG अदालत के समक्ष पेश करेंगे।

नई दिल्ली: भारत का संविधान के अनुच्छेद 21 (प्राण, दैहिक स्वतंत्रता एवं गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार / Right to Life and Dignity), अनुच्छेद 14 व 15(3) (लैंगिक समानता एवं महिलाओं हेतु विशेष सुरक्षात्मक उपाय), जिला न्यायपालिका के बुनियादी अदालती ढांचे (Court Infrastructure), तथा न्यायपालिका में युवा और महिला अधिवक्ताओं के कार्यस्थल पर गरिमा और सुरक्षा के सांविधिक व संवैधानिक दायित्वों पर सुप्रीम कोर्टने एक ऐतिहासिक और सुधारात्मक आदेश पारित किया है।

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन-न्यायाधीशों की विशेष पीठ ने देश भर की अदालतों में महिला अधिवक्ताओं हेतु बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी को उजागर करने वाली रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए सभी राज्य सरकारों, केंद्र शासित प्रदेशों और उच्च न्यायालयों को कड़ा कानूनी अधिदेश जारी किया है।

शीर्ष अदालत ने दो-टूक कहा कि चाहे जिला या तालुका अदालतों में महिला सदस्यों की संख्या कितनी भी हो, उनके अनुपात के अनुसार एक अलग और विशेष महिला बार रूम (Separate and Exclusive Women’s Bar Room) तथा स्वच्छ शौचालय उपलब्ध कराना राज्यों और उच्च न्यायालयों का सांविधिक दायित्व है। अदालत ने स्पष्ट किया कि राजस्व घाटा या बजट की कमी बुनियादी सुविधाएं न देने का कोई विधिक बहाना नहीं हो सकती। मामले को अंतिम और व्यापक दिशा-निर्देश जारी करने हेतु 2 दिसंबर 2026 के लिए सूचीबद्ध किया गया है।

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां

1. ‘बुनियादी ढांचा अनुच्छेद 21 के तहत मानवीय गरिमा से सीधे जुड़ा है’

पीठ ने अपने आदेश में पूर्व टिप्पणियों की पुष्टि करते हुए रेखांकित किया:

  • अदालती परिसरों के भीतर महिला वकीलों के लिए बुनियादी सुविधाओं (शौचालय, पेयजल और बैठने के सुरक्षित स्थान) की उपलब्धता का सीधा संबंध भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीवन और गरिमा के मौलिक अधिकार से है।
  • जब महिला अधिवक्ताओं को अपने पेशेवर दायित्वों के निर्वहन हेतु दिन का बड़ा हिस्सा अदालतों में बिताना पड़ता है, तो उनकी निजता (Privacy), आराम, सुरक्षा और पेशेवर स्वतंत्रता के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचा अत्यधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।
  • अदालत ने दोहराया: “शौचालय तक पहुंच एक बुनियादी मानवाधिकार है और किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश का वित्तीय घाटा (Revenue-deficit) इसे उपलब्ध कराने में विफलता का बहाना नहीं बन सकता।”

2. ‘यदि लेडीज बार रूम नहीं हैं, तो यह अत्यंत दयनीय स्थिति है’

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने राज्य सरकारों और उच्च न्यायालयों के उदासीन रवैये पर तीव्र असंतोष व्यक्त करते हुए कहा: “यदि अदालतों में महिला बार रूम नहीं हैं, तो यह अत्यंत दयनीय स्थिति (Very Pitiable Condition) है। हम इसकी कड़े शब्दों में निंदा करते हैं। सभी उच्च न्यायालयों और राज्य सरकारों का यह सांविधिक कर्तव्य है कि जहाँ भी महिला सदस्य और युवा युवतियां वकालत कर रही हैं, वहाँ सभी सुविधाओं से युक्त एक विशिष्ट महिला बार रूम अनिवार्य रूप से प्रदान किया जाए। यह एक बाध्यकारी आदेश (Mandate) है। हम इससे पीछे नहीं हटना चाहते। इसका अनुपालन करना ही होगा—चाहे इसके लिए अतिरिक्त धन की आवश्यकता हो या अतिरिक्त भूमि की। जो भी आवश्यक हो, वह किया जाना चाहिए। इस आदेश को भली-भांति समझ लिया जाना चाहिए; अब हम केवल इसके निष्पादन (Execution) के चरण में हैं।”

3. भारत के अटॉर्नी जनरल केंद्रीय नोडल प्राधिकारी नियुक्त:

  • देश भर की अदालतों में बुनियादी सुविधाओं के एकसमान मानक सुनिश्चित करने के लिए न्यायालय ने भारत के अटॉर्नी जनरल (AG) आर. वेंकटरमणी को केंद्रीय नोडल प्राधिकारी बनाया है।
  • सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के महाधिवक्ता (Advocate Generals) और स्थायी वकील अपनी प्रगति रिपोर्ट सीधे एजी कार्यालय को सौंपेंगे, जिसके बाद एजी एक संकलित रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रखेंगे।
  • मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अदालत चाहती है कि अटॉर्नी जनरल पहले स्वयं राज्यों द्वारा आवंटित बजट और बुनियादी सुविधाओं की जमीनी हकीकत से संतुष्ट हों।

4. उच्च न्यायालयों की बिल्डिंग-कम-इन्फ्रास्ट्रक्चर कमेटियों को सर्वोच्च प्राथमिकता देने का निर्देश:

  • शीर्ष अदालत ने सभी उच्च न्यायालयों की भवन एवं अवसंरचना समितियों (Building-cum-Infrastructure Committees) को निर्देश दिया कि वे इस मुद्दे को सर्वोच्च प्राथमिकता के आधार पर लें और जिला व तालुका स्तर तक बुनियादी सुविधाओं का सृजन सुनिश्चित करें।

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अदालती सुनवाई में सामने आए चौंकाने वाले जमीनी आंकड़े

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ताओं द्वारा प्रस्तुत संकलनों ने देश भर की निचली अदालतों में बुनियादी ढांचे की गंभीर स्थिति को उजागर किया:

पक्षकार / अधिवक्ताप्रस्तुत तथ्य एवं अदालत की विधिक प्रतिक्रिया
वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. मोनिका गुसाईं• 69 प्रतिवादियों में से अब तक केवल 21 ने ही स्थिति रिपोर्ट दाखिल की है।
• गुजरात हाईकोर्ट का हलफनामा अब तक सबसे बेहतर प्रतीत होता है क्योंकि उसमें शौचालयों और बार रूम दोनों का ब्योरा दिया गया है।
• उन्होंने सवाल उठाया कि नए व पुराने कोर्ट भवनों में बार रूम कब तक जोड़े जाएंगे?
CJI सूर्यकांत की टिप्पणीCJI ने केवल कागजी हलफनामों पर भरोसा करने के बजाय डॉ. गुसाईं को सुझाव दिया कि वे गुजरात की जिला अदालतों की वास्तविक स्थिति जांचने के लिए स्वयंसेवकों को भेजें और अदालत के सामने वीडियो साक्ष्य प्रस्तुत करें।
वरिष्ठ अधिवक्ता जयना कोठारी• दाखिल 16-17 हलफनामों के विश्लेषण से पता चलता है कि कई राज्यों ने स्वीकार किया है कि उनके जिला न्यायालयों में महिला वकीलों के लिए शौचालय ही नहीं हैं।
• पंजाब: कुल 67 अदालती परिसरों में से केवल 9 कोर्ट परिसरों में महिलाओं हेतु शौचालय हैं।
• हरियाणा: शीर्ष अदालत के स्पष्ट आदेश के बावजूद अब तक बुनियादी सुविधाओं का कोई भौतिक निरीक्षण तक नहीं कराया गया।
अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणीअदालत को अवगत कराया कि उन्होंने सभी राज्यों के महाधिवक्ताओं के साथ एक बैठक कर ली है और इस माह के अंत तक शेष मुद्दों पर विस्तृत विचार-विमर्श हेतु दूसरी उच्चस्तरीय बैठक बुलाई जा रही है।

विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: कार्यस्थल पर गरिमा और ‘जेंडर-इन्क्लूसिव’ न्यायपालिका

  • कार्यस्थल पर लैंगिक समानता (Gender Equality at the Workplace):
    • आज देश के विधि विश्वविद्यालयों और अदालतों में महिला वकीलों और प्रथम-पीढ़ी की युवा महिला अधिवक्ताओं की संख्या तेजी से बढ़ रही है।
    • जिला और तालुका स्तर की अदालतों में बुनियादी प्रसाधनों का न होना महिलाओं के लिए एक अदृश्य बाधा (Invisible Barrier) बनता है, जो उन्हें लंबे समय तक अदालतों में प्रैक्टिस करने से हतोत्साहित करता है। सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्देश पेशे में व्यवस्थागत लैंगिक भेदभाव को समाप्त करने की दिशा में आवश्यक हस्तक्षेप है।
  • बजट की कमी की दलील अस्वीकार्य:
    • सर्वोच्च न्यायालय ने ऑल इंडिया जजेस एसोसिएशन के मामलों में पहले ही स्थापित किया है कि न्याय प्रशासन राज्य का संप्रभु कार्य (Sovereign Function) है।
    • न्यायपालिका के बुनियादी ढांचे के निर्माण में वित्तीय तंगी या ‘फंड्स की कमी’ का बहाना बनाकर कार्यपालिका अपने संवैधानिक उत्तरदायित्व से पल्ला नहीं झाड़ सकती।

विधिक विवरण एवं उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता

  • न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय (संवैधानिक एवं जनहित रिट क्षेत्राधिकार)
  • पीठ: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना
  • आदेश की तिथि: 26 अक्टूबर 2026
  • आगामी निर्णायक सुनवाई: 2 दिसंबर 2026 (समग्र दिशा-निर्देश जारी किए जाएंगे)

विधिक प्रतिनिधित्व:

  • भारत के अटॉर्नी जनरल: आर. वेंकटरमणी (Attorney General R. Venkataramani)
  • याचिकाकर्ताओं की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. मोनिका गुसाईं एवं वरिष्ठ अधिवक्ता जयना कोठारी
  • प्रासंगिक कानून एवं संवैधानिक प्रावधान:
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 21 (जीवन और मानवीय गरिमा का अधिकार), अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15(3) (महिलाओं के लिए विशेष उपबंध), एवं अनुच्छेद 32
    • अधिवक्ता अधिनियम, 1961 — वकीलों के पेशेवर अधिकार एवं बार कल्याण
    • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
      • अदालती बुनियादी ढांचे और मानवाधिकार का विधिक मानक: ‘शौचालय और कार्यस्थल पर सुरक्षित व पृथक विश्राम स्थल की उपलब्धता कोई विलासिता नहीं बल्कि अनुच्छेद 21 के तहत अनिवार्य मानवाधिकार है; राज्य सरकारों और उच्च न्यायालयों को जिला व तालुका स्तर तक महिला वकीलों के लिए विशेष बार रूम और शौचालय उपलब्ध कराने हेतु बिना किसी वित्तीय बहाने के तत्काल फंड्स आवंटित करने होंगे।’
  • वर्तमान स्थिति: अटॉर्नी जनरल को सभी राज्यों से डेटा संकलित कर रिपोर्ट पेश करने का निर्देश; राज्यों के महाधिवक्ताओं को सहयोग का आदेश; सुप्रीम कोर्ट 2 दिसंबर 2026 को पूरे देश के लिए अनिवार्य और व्यापक दिशा-निर्देश पारित करेगा।

Women Lawyer: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतभारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठमुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना
याचिकाकर्तादेश भर की अदालतों में बुनियादी सुविधाओं की मांग करने वाली महिला अधिवक्ता
केंद्रीय नोडल प्राधिकरणभारत के महान्यायावादी (Attorney General) आर. वेंकटरमणी (R Venkataramani)
मुख्य आदेश1. अनिवार्य प्रावधान: जिला और तालुका अदालतों में महिला वकीलों की संख्या चाहे जितनी हो, उनके लिए अलग बार रूम और शौचालय अनिवार्य हैं।
2. फंड आवंटन: राज्य सरकारों को तुरंत आवश्यक धनराशि आवंटित करने का आदेश।
3. फंड की कमी का बहाना नहीं: राजस्व घाटे (Revenue Deficit) का बहाना बनाकर बुनियादी मानवाधिकारों से इंकार नहीं किया जा सकता।
अगली सुनवाई2 दिसंबर 2026 (जहां व्यापक दिशानिर्देश जारी किए जाने की संभावना है)।
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