FOLLOW US FOR MORE LEGAL UPDATES ON WhatsApp
मामले की पृष्ठभूमि: क्या था पूरा विवाद?
- फेसबुक पोस्ट और FIR (अप्रैल 2025):13 अप्रैल 2025 को रूपनारायण एक्का ने सोशल मीडिया पर ऐतिहासिक कर प्रथा (‘ब्रेस्ट टैक्स’) के संबंध में एक पोस्ट साझा की। इसके बाद ब्राह्मण समाज के अध्यक्ष दीपक मिश्रा की शिकायत पर पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 299 और 353(2) के तहत मामला दर्ज किया।
- छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का रुख:छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 15 दिसंबर 2025 को एक्का की पहली अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी। इसके बाद दायर दूसरी याचिका को भी 3 जुलाई को यह कहते हुए खारिज कर दिया गया कि परिस्थितियों में कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं आया है और याचिकाकर्ता पर इसी तरह के अन्य मामले भी लंबित हैं। इसके खिलाफ एक्का ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
- सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम सुरक्षा:सितंबर 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर नोटिस जारी करते हुए राज्य पुलिस को निर्देश दिया था कि जांच में सहयोग करने की शर्त पर याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई भी कठोर/दंडात्मक कार्रवाई न की जाए।
सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई और मुख्य तर्क
1. “इतिहास पर दृष्टिकोण व्यक्त करना अपराध नहीं”:
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण (Prashant Bhushan) ने तर्क दिया कि यह एक साधारण पोस्ट थी और इसमें कोई अपराध नहीं बनता: “यह एक फेसबुक पोस्ट है जिसमें केवल यह कहा गया है कि हिंदुओं को सिखाएं कि महिलाओं द्वारा अपने वक्ष को ढकने पर लगने वाला कर औरंगजेब ने नहीं बल्कि किसी ब्राह्मण ने लगाया था। यह इतिहास के बारे में मेरा एक दृष्टिकोण है। गलत हो सकता है, लेकिन यह मेरा विचार है। यह कोई अपराध नहीं है।”
2. पीठ का रुख और समय की बर्बादी पर टिप्पणी:
- प्रशांत भूषण द्वारा मामले को पूरी तरह से “तुच्छ/बेतुका” बताए जाने पर न्यायामूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने टिप्पणी की:“इसीलिए हमने इस (अग्रिम जमानत) याचिका पर विचार किया है… इसका मतलब है कि लोगों के पास बर्बाद करने के लिए बहुत समय है।”
3. राज्य सरकार का पक्ष:
- राज्य सरकार के वकील ने तर्क दिया कि नोटिस जारी होने के बावजूद एक्का पुलिस स्टेशन में उपस्थित नहीं हुए। इस पर पीठ ने कहा कि पुलिस उन्हें समन जारी करे और वे जांच में शामिल होंगे।
नई दिल्ली: भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 299 (धार्मिक भावनाओं को आहत करने के इरादे से किया गया दुर्भावनापूर्ण कृत्य / पूर्ववर्ती IPC धारा 295A) एवं धारा 353(2) (विभिन्न समुदायों के बीच घृणा या शत्रुता को बढ़ावा देने वाली झूठी सूचना या अफवाहें फैलाना / पूर्ववर्ती IPC धारा 505(2)), भारत का संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) (वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता), ऐतिहासिक व्याख्याओं को अपराध की श्रेणी में रखने की विधिक सीमाएं, सोशल मीडिया पोस्टों पर यांत्रिक एफआईआर (Mechanical FIRs) दर्ज करने की पुलिसिया प्रवृत्ति, तथा धारा 482 BNSS / धारा 438 CrPC के तहत अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) के विधिक सिद्धांतों पर सुप्रीम कोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण टिप्पणी की है।
सर्वोच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना (Justice BV Nagarathna) और न्यायमूर्ति आर. महादेवन (Justice R Mahadevan) की खंडपीठ ने छत्तीसगढ़ के सामाजिक कार्यकर्ता रूपनारायण एक्का द्वारा छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती देने वाली विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुनवाई करते हुए यह मौखिक टिप्पणी की, जिसने उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी।
पीठ ने ऐतिहासिक संदर्भ (‘स्तन कर’ या ब्रेस्ट टैक्स) से जुड़ी एक फेसबुक पोस्ट को लेकर धार्मिक भावनाएं भड़काने की एफआईआर दर्ज करने पर राज्य पुलिस की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाया। न्यायमूर्ति आर. महादेवन ने दो-टूक कहा कि पुलिस को ऐसे तुच्छ मामलों के बजाय बड़े और गंभीर अपराधों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। शीर्ष अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 4 दिसंबर 2026 तक स्थगित करते हुए आरोपी को किसी भी दंडात्मक कार्रवाई से प्राप्त अंतरिम संरक्षण (Interim Protection from Coercive Steps) को अगली तारीख तक बढ़ा दिया है।
सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां
1. ‘इसमें एफआईआर करने जैसा क्या है? बड़े मामलों पर ध्यान केंद्रित करें’
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति आर. महादेवन ने पुलिस द्वारा सोशल मीडिया टिप्पणियों पर बिना सोचे-समझे आपराधिक मुकदमे दर्ज करने के रवैये पर टिप्पणी करते हुए कहा: “इसमें ऐसी कौन सी बात है जिसके लिए एफआईआर दर्ज की जाए? पुलिस को बड़े और गंभीर मामलों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, इस तरह के मामलों पर नहीं।”
2. ‘इतिहास का एक दृष्टिकोण होना कोई संज्ञेय अपराध नहीं’:
- याचिकाकर्ता रूपनारायण एक्का की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दलील दी कि संबंधित फेसबुक पोस्ट किसी भी तरह से संज्ञेय अपराध का गठन नहीं करती:“यह एक सामान्य फेसबुक पोस्ट है जिसमें केवल यह कहा गया था कि—’जाओ हिंदुओं को सिखाओ कि महिलाओं के स्तन ढकने पर कर औरंगजेब ने नहीं, बल्कि किसी ब्राह्मण ने लगाया था।’ बस इतनी सी बात है। यह कोई अपराध नहीं है। यह इतिहास का एक दृष्टिकोण (View of History) है; यह दृष्टिकोण गलत हो सकता है, लेकिन यह उनका अपना विचार है। यह पूरा केस पूरी तरह तुच्छ और निराधार है।”
- इस पर न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने कहा:“इसीलिए हमने इस याचिका पर विचार किया है (अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार करते हुए नोटिस जारी किया)।”
- हालांकि, सोशल मीडिया पर समय नष्ट करने की प्रवृत्ति पर न्यायमूर्ति नागरत्ना ने यह भी चुटकी ली: “इसका मतलब है कि लोगों के पास बर्बाद करने के लिए बहुत समय है।”
3. जांच में सहयोग और नोटिस जारी करने का निर्देश:
- छत्तीसगढ़ राज्य के वकील ने पीठ को बताया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा 9 सितंबर 2026 को नोटिस जारी किए जाने के बाद से आरोपी पुलिस स्टेशन में पेश नहीं हुआ है।
- इस पर खंडपीठ ने कहा:“आप उसे औपचारिक समन जारी कीजिए, वह पेश होगा।”
- राज्य के वकील ने अदालत को आश्वस्त किया कि सीआरपीसी/बीएनएसएस के प्रावधानों के तहत आज ही उपस्थिति का नोटिस जारी किया जा रहा है।
- प्रशांत भूषण द्वारा राज्य द्वारा अग्रिम जमानत याचिका पर औपचारिक जवाब दाखिल न करने पर सवाल उठाए जाने के बाद अदालत ने राज्य के अनुरोध पर मामले को 4 दिसंबर 2026 तक के लिए टाल दिया और गिरफ्तारी से मिली अंतरिम सुरक्षा को बरकरार रखा।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2025–2026)
| चरण / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के तर्क |
| याचिकाकर्ता | रूपनारायण एक्का — सामाजिक कार्यकर्ता (जशपुर, छत्तीसगढ़)। |
| शिकायतकर्ता | दीपक मिश्रा — अध्यक्ष, ब्राह्मण समाज (जशपुर)। |
| संबद्ध पुलिस स्टेशन | कुनकुरी पुलिस स्टेशन, जिला जशपुर (छत्तीसगढ़)। |
| दर्ज अपराध एवं धाराएं | भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 299 (धार्मिक भावनाओं को आहत करना) एवं धारा 353(2) (विभिन्न वर्गों में द्वेष/घृणा फैलाना)। |
| आरोपों का सार | अभियोजन के अनुसार, एक्का ने 13 अप्रैल 2025 को सोशल मीडिया (फेसबुक) पर कथित तौर पर हिंदू महिलाओं और ऐतिहासिक व्यवस्थाओं के संबंध में आपत्तिजनक सामग्री पोस्ट की थी, जिससे सामाजिक सौहार्द बिगड़ने का आरोप लगाया गया। |
| छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का रुख | हाईकोर्ट ने 15 दिसंबर 2025 को पहली अग्रिम जमानत याचिका खारिज की। इसके बाद 3 जुलाई 2026 को दूसरी अग्रिम जमानत याचिका भी यह कहते हुए खारिज कर दी कि परिस्थितियों में कोई तात्विक बदलाव नहीं आया है और याचिकाकर्ता के खिलाफ पूर्व में भी ऐसे मामले दर्ज रहे हैं। |
| सुप्रीम कोर्ट का वर्तमान आदेश | दंडात्मक कार्रवाई पर रोक का अंतरिम आदेश 4 दिसंबर 2026 तक विस्तारित; पुलिस को विधिवत नोटिस देकर जांच में शामिल करने का निर्देश। |
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम हेट स्पीच
- धारा 299 BNS (पूर्ववर्ती धारा 295A IPC) के अनिवार्य तत्व:
- सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने रामजी लाल मोदी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य [AIR 1957 SC 620] और महेन्द्र सिंह धोनी बनाम युधिष्ठिर साहू [(2017) 7 SCC 760] में स्पष्ट किया है कि किसी धर्म या जाति के प्रति कही गई प्रत्येक अप्रिय बात धारा 295A (अब धारा 299 BNS) के तहत दंडनीय नहीं होती।
- यह धारा केवल उन मामलों को दंडित करती है जहां किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को भड़काने का ‘विशिष्ट और दुर्भावनापूर्ण इरादा’ (Deliberate and Malicious Intention) स्पष्ट रूप से विद्यमान हो।
- ऐतिहासिक त्रावणकोर के ‘मुलाक्करम’ (स्तन कर / Breast Tax) जैसी ऐतिहासिक सामाजिक कुरीतियों या ऐतिहासिक संदर्भों पर की गई आलोचनात्मक टिप्पणी—चाहे वह ऐतिहासिक रूप से कितनी भी विवादास्पद क्यों न हो—स्वतः दुर्भावनापूर्ण घृणा की श्रेणी में नहीं आती।
- सोशल मीडिया पर पुलिसिया यांत्रिकता पर अंकुश:
- हाल ही में कर्नाटक उच्च न्यायालय द्वारा जारी 6-सूत्रीय दिशा-निर्देशों और सर्वोच्च न्यायालय के सुस्थापित सिद्धांतों के तहत अदालतों ने बार-बार यह रेखांकित किया है कि सोशल मीडिया की हर राजनीतिक या ऐतिहासिक बहस पर थानों में एफआईआर दर्ज कर नागरिकों की स्वतंत्रता छीनना संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) और 21 पर कुठाराघात है।
- जस्टिस महादेवन की यह टिप्पणी कि “पुलिस बड़े अपराधों पर ध्यान दे”, इसी न्यायिक चिंता को प्रतिबिंबित करती है।
विधिक विवरण एवं उपस्थित अधिवक्ता
- न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय (आपराधिक अपीलीय क्षेत्राधिकार)
- केस संदर्भ: रूपनारायण एक्का बनाम छत्तीसगढ़ राज्य [विशेष अनुमति याचिका (आपराधिक)]
- पीठ: न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना एवं न्यायमूर्ति आर. महादेवन
- आदेश की तिथि: 26 अक्टूबर 2026
- आगामी सुनवाई की तिथि: 4 दिसंबर 2026
- संबद्ध निचली अदालत का आदेश: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय (बिलासपुर) का आदेश दिनांक 3 जुलाई 2026 (अग्रिम जमानत खारिज)
विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (रूपनारायण एक्का) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण (Senior Advocate Prashant Bhushan)
- प्रतिवादी (छत्तीसगढ़ राज्य) की ओर से: राज्य के स्थायी पैनल अधिवक्ता
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS):
- धारा 299 — धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के विमर्शित और विद्वेषपूर्ण आशय से किए गए कार्य (पूर्ववर्ती IPC 295A)
- धारा 353(2) — विभिन्न वर्गों के बीच घृणा, शत्रुता या वैमनस्य पैदा करने वाले झूठे बयान या अफवाहें (पूर्ववर्ती IPC 505(2))
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) — धारा 35 (गिरफ्तारी हेतु नोटिस / पूर्ववर्ती CrPC 41A) एवं धारा 482 (अग्रिम जमानत / पूर्ववर्ती CrPC 438)
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 19(1)(a) (वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) एवं अनुच्छेद 21 (प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता)
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS):
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- सोशल मीडिया टिप्पणियों और धार्मिक भावना अपराधों का विधिक मानक: ‘इतिहास या सामाजिक प्रथाओं पर अपनी व्यक्तिगत राय रखना, भले ही वह विवादित या गलत हो, स्वतः BNS की धारा 299 व 353(2) के तहत संज्ञेय अपराध नहीं बनता; जब तक कि प्रत्यक्ष आपराधिक विद्वेष साबित न हो, पुलिस को सोशल मीडिया पोस्टों पर यांत्रिक एफआईआर दर्ज करने से बचना चाहिए और वास्तविक गंभीर अपराधों की जांच पर संसाधन लगाने चाहिए।’
- वर्तमान स्थिति: सर्वोच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता रूपनारायण एक्का की अंतरिम अग्रिम सुरक्षा को 4 दिसंबर 2026 तक विस्तारित कर दिया है; राज्य पुलिस को जांच में शामिल करने हेतु धारा 35 BNSS का औपचारिक नोटिस जारी करने का निर्देश दिया गया है।
Hate Speech:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना एवं न्यायमूर्ति आर. महादेवन् |
| मामला/साइटेशन | रूपनारायण एक्का बनाम छत्तीसगढ़ राज्य (Rupnarayan Ekka vs State of Chhattisgarh) |
| याचिकाकर्ता | रूपनारायण एक्का (सामाजिक कार्यकर्ता; अधिवक्ता प्रशांत भूषण द्वारा प्रतिनिधित्व) |
| मूल घटना | 13 अप्रैल 2025 को फेसबुक पर इतिहास और ‘ब्रेस्ट टैक्स’ को लेकर टिप्पणी; जिसके बाद जशपुर (छत्तीसगढ़) के कुनकुरी थाने में FIR दर्ज की गई। |
| लागू कानूनी धाराएं | BNS की धारा 299 (धार्मिक भावनाओं को आहत करना) एवं धारा 353(2) (समुदायों के बीच नफरत फैलाने वाली अफवाहें) |
| अदालत का फैसला | अंतरिम राहत बढ़ाई; याचिकाकर्ता के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई पर रोक का आदेश 4 दिसंबर 2026 तक बढ़ाया गया। |

