FOLLOW US FOR MORE LEGAL UPDATES ON WhatsApp
अदालत की मुख्य टिप्पणियां: “दोपहर 1 बजे अर्जी दाखिल कर शाम 4 बजे आदेश की उम्मीद अनुचित”
- सरकारी वकील को सत्यापन का अवसर अनिवार्य:अदालत में एक जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान आरोपी के वकील ने दावा किया कि शिकायतकर्ता पक्ष के साथ समझौता (Settlement) हो गया है और इसके आधार पर तुरंत जमानत दी जाए। इस पर जज ने कहा कि वे राज्य सरकार के वकील को पुलिस से निर्देश और सत्यापन प्राप्त करने का समय दिए बिना किसी भी समझौते या हलफनामे को आँख मूँद कर स्वीकार नहीं करेंगे।
- त्वरित राहत के दबाव पर सवाल:न्यायमूर्ति एडप्पागथ ने वकीलों के इस रवैये पर सवाल उठाया कि वे केवल कुछ घंटे पहले याचिका दायर कर तुरंत राहत की उम्मीद करते हैं। उन्होंने कहा:“आप दोपहर 1 बजे याचिका दाखिल करते हैं और उम्मीद करते हैं कि शाम 4 बजे तक जमानत का आदेश मिल जाए? प्रॉसीक्यूटर को निर्देशों के सत्यापन का समय मिलना ही चाहिए। जब तक प्रॉसीक्यूटर को निर्देश नहीं मिल जाते, मैं ऐसे किसी समझौते को स्वीकार नहीं करूंगा।”
- दिन-रात काम करने वाले जजों की निराशा:शाम 4:00 बजे अदालत का समय समाप्त होने पर जज साहब ने उठते हुए बेहद निराशा व्यक्त करते हुए कहा कि जज दिन-रात काम कर रहे हैं, लेकिन वकील केवल अपने एक मामले को लेकर चिंतित रहते हैं और इस तरह की गलत कार्यप्रणाली से बार-फ्रेंडली जजों को नुकसान पहुंचाते हैं।
कोच्चि: दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 439 / भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 483 (जमानत देने के क्षेत्राधिकार की प्रक्रिया), आपराधिक मुकदमों में पक्षों के बीच कथित समझौते (Compromise / Settlement between parties) के आधार पर जमानत याचिकाओं का त्वरित निस्तारण, शपथ पत्र अधिनियम व कोर्ट नियमों के तहत हलफनामों की सत्यता (Sanctity of Affidavits in Judicial Proceedings), अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के तहत वकीलों के पेशेवर आचरण के मानक (Professional Ethics of Advocates), तथा लोक अभियोजक को निर्देश प्राप्त करने का उचित अवसर (Right of Public Prosecutor to obtain instructions) दिए जाने के प्रक्रियात्मक सिद्धांतों पर केरल हाईकोर्ट ने अत्यंत तल्ख और आत्ममंथनकारी मौखिक टिप्पणियां की हैं।
केरल हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति कौसर एडाप्पागथ (Justice Kauser Edappagath) की एकल पीठ ने शुक्रवार की दोपहर जमानत मामलों की सुनवाई के अंतिम सत्र में वकीलों द्वारा बिना सत्यापन के फर्जी हलफनामे दाखिल करने और सरकारी वकील को निर्देश लेने का समय दिए बिना तत्काल जमानत पाने की हड़बड़ी पर गहरा रोष और निराशा व्यक्त की।
पीठ ने खुली अदालत में यह चौंकाने वाला खुलासा किया कि हाल के दिनों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहाँ वकीलों ने समझौते के फर्जी हलफनामे पेश किए और बाद में जब लोक अभियोजक ने पुलिस से पड़ताल करवाई, तो वे दस्तावेज पूरी तरह जाली निकले। न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि जब तक सरकारी वकील पुलिस से वास्तविक निर्देश प्राप्त नहीं कर लेते, तब तक अदालत केवल वकीलों के मौखिक दावों या हलफनामों पर अंधा विश्वास (Blind Faith) करके कोई जमानत या राहत आदेश पारित नहीं करेगी। शाम 4:00 बजे जब अदालत की अंतिम घंटी बजी, तो जज ने उठते हुए अत्यंत व्यथित स्वर में कहा—“हम दिन-रात काम कर रहे हैं, पर आप लोग केवल अपने एक केस की चिंता करते हैं; आप लोग एक बार-अनुकूल जज (Bar-friendly judge) का भरोसा तोड़ देंगे।”
उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘इतने सारे मामलों में हलफनामे फर्जी निकले; अभियोजन के सत्यापन के बिना समझौता स्वीकार नहीं’
दिन भर जमानत मामलों की लंबी सूची निपटाने के बाद, जब एक मामले में आरोपी के वकील ने यह तर्क देते हुए तत्काल जमानत मांगी कि शिकायतकर्ता पक्ष के साथ राजीनामा/समझौता (Settlement) हो गया है और हलफनामा पेश कर दिया गया है, तो न्यायमूर्ति कौसर एडाप्पागथ ने तत्काल आदेश पारित करने से मना करते हुए कहा: “अदालतों में ऐसे अनगिनत मामले सामने आए हैं जहाँ समझौते के हलफनामे (Affidavits) दाखिल कर दिए जाते हैं, और बाद में जब सरकारी अभियोजक से निर्देश प्राप्त करने को कहा जाता है, तो पता चलता है कि वे हलफनामे पूरी तरह फर्जी (Fake) थे। जरा सरकारी वकील से पूछिए! जब तक सरकारी अभियोजक पुलिस और शिकायतकर्ता से सीधे निर्देश प्राप्त नहीं कर लेते, तब तक मैं किसी भी समझौते को स्वीकार नहीं करूंगा। ऐसा बिल्कुल नहीं होने वाला है।”
2. ‘दोपहर 1 बजे अर्जी और शाम 4 बजे जमानत आदेश की उम्मीद?’:
- न्यायाधीश ने वकीलों द्वारा बिना किसी अग्रिम नोटिस या तैयारी के तुरंत आदेश लेने की प्रवृत्ति पर कड़ा प्रहार किया:“वकील किस मुगालते में काम कर रहे हैं कि अदालत सरकारी अभियोजक को निर्देश प्राप्त करने का मौका दिए बिना, मात्र कुछ घंटे पहले दाखिल याचिका पर जमानत या अन्य कोई राहत दे देगी?आप दोपहर 1:00 बजे याचिका दाखिल करते हैं और उम्मीद करते हैं कि शाम 4:00 बजे तक जमानत का आदेश मिल जाए? सरकारी पक्ष को पुलिस थाने से निर्देश लेने का समय मिलना ही चाहिए।”
3. ‘आप लोग बार-अनुकूल जज को बिगाड़ देंगे/खराब कर देंगे’ (Bar-friendly Judge):
- शाम 4:00 बजे जब कोर्ट की कार्यवाही समाप्त होने का सायरन बजा, तो न्यायमूर्ति एडाप्पागथ ने अपनी पीठ से उठते हुए बेहद भारी मन से कहा:“हम सभी दिन-रात काम कर रहे हैं, लेकिन फिर भी आप (वकील) केवल अपने एक व्यक्तिगत केस की चिंता में डूबे हैं।आप जैसे लोग एक बार-अनुकूल जज (Bar-friendly judge) का भरोसा पूरी तरह तोड़ देंगे (You people will spoil a bar-friendly judge)।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक संदर्भ
| संदर्भ / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं अदालती रुख |
| न्यायालय | केरल उच्च न्यायालय, कोच्चि (एकल पीठ – आपराधिक क्षेत्राधिकार) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति कौसर एडाप्पागथ (Justice Kauser Edappagath) |
| कार्यवाही की प्रकृति | नियमित जमानत याचिकाओं (Regular Bail Applications) की दैनिक सुनवाई। |
| विवाद का तात्कालिक कारण | अभियुक्त के वकील द्वारा दोपहर 1:00 बजे अंतिम समय में जमानत याचिका दायर करना और शिकायतकर्ता के साथ कथित सुलह/समझौते का हलफनामा पेश कर शाम 4:00 बजे तक तत्काल जमानत आदेश जारी करने का भारी दबाव बनाना। |
| न्यायालय की चिंता का मूल कारण | आपराधिक मामलों में शिकायतकर्ता के फर्जी हस्ताक्षर करवाकर जाली नोटरीकृत हलफनामे पेश करने का बढ़ता चलन, जिसका पर्दाफाश केवल तभी होता है जब स्थानीय पुलिस थाने का बीट अधिकारी पीड़ित के घर जाकर भौतिक रूप से सत्यापन करता है। |
| प्रक्रियात्मक अनिवार्यता | लोक अभियोजक (Public Prosecutor) को पुलिस केस डायरी मंगाने और शिकायतकर्ता से हलफनामे की प्रामाणिकता की पुष्टि हेतु न्यूनतम 24 से 48 घंटे का समय दिया जाना वैधानिक आवश्यकता है। |
| न्यायालय का अंतिम निर्देश | बिना अभियोजन के औपचारिक निर्देश और भौतिक सत्यापन के किसी भी कथित समझौते या जमानत अर्जी पर आदेश पारित करने से स्पष्ट इनकार। |
विधिक एवं प्रक्रियात्मक विश्लेषण: ‘आपराधिक न्याय में शपथ पत्रों की शुचिता और प्राकृतिक न्याय’
- आपराधिक मामलों में ‘समझौता हलफनामे’ की प्रामाणिकता की विधिक जांच:
- भारतीय आपराधिक न्यायप्रणाली में विशेष रूप से गंभीर या गैर-शमनीय अपराधों में, अक्सर देखा जाता है कि अभियुक्त पक्ष जेल से छूटने के लिए पीड़ित पर दबाव बनाकर या बिना उसकी जानकारी के किसी तीसरे व्यक्ति को खड़ा करके फर्जी शपथ पत्र नोटरी करवाकर उच्च न्यायालय में जमा कर देता है।
- यदि न्यायालय सरकारी वकील को पुलिस के माध्यम से इसकी पुष्टि का अवसर दिए बिना जमानत मंजूर कर लेता है, तो वास्तविक पीड़ित की जान-माल को गंभीर खतरा उत्पन्न हो जाता है और न्याय प्रशासन की शुचिता कलंकित होती है।
- लोक अभियोजक का विधिक अधिकार (Right to Instructions):
- CrPC की धारा 439 के परंतुक (Proviso) और स्थापित न्यायिक नज़ीरों के अनुसार, गंभीर संज्ञेय अपराधों में लोक अभियोजक को सुनवाई का अवसर देना और मामले के तथ्यों की जानकारी जुटाने का समय देना एक वैधानिक अधिदेश है।
- “दोपहर 1 बजे याचिका दायर कर 4 बजे आदेश मांगना” अभियोजन को निष्पक्ष पैरवी के अधिकार से वंचित करने जैसा है। अदालत का यह कड़ा रुख दर्शाता है कि प्रशासनिक कार्यकुशलता और गति के नाम पर कानूनी प्रक्रियाओं और सुरक्षात्मक जांचों की बलि नहीं दी जा सकती।
- अधिवक्ताओं का कर्तव्य और ‘बार-बेंच सौहार्द’:
- न्यायमूर्ति कौसर एडाप्पागथ की यह टिप्पणी कि “वकील बार-हितैषी जजों का भरोसा तोड़ देंगे”, न्यायपालिका और बार के बीच के नाजुक विश्वास को उजागर करती है।
- कई न्यायाधीश मुकदमों के त्वरित निपटारे और वकीलों की सुविधा के लिए उदार रवैया अपनाते हैं। किंतु जब वकील इस सद्भावना का दुरुपयोग जाली हलफनामे पेश करने या जजों पर अनुचित दबाव बनाने के लिए करते हैं, तो अदालतों को अत्यंत कठोर, औपचारिक और अनुशासनात्मक रुख अपनाने के लिए विवश होना पड़ता है।
विधिक विवरण एवं संदर्भ
- न्यायालय: केरल उच्च न्यायालय, कोच्चि
- पीठासीन न्यायाधीश: न्यायमूर्ति कौसर एडाप्पागथ (एकल पीठ)
- तारीख: 30 अक्टूबर 2026 (शुक्रवार)
- विषय: जमानत याचिकाओं में फर्जी हलफनामे और अभियोजन को समय दिए बिना त्वरित राहत मांगने की प्रवृत्ति।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) — धारा 439 (जमानत के संबंध में उच्च न्यायालय की विशेष शक्तियां—लोक अभियोजक को नोटिस की अनिवार्यता) / BNSS 2023 की धारा 483
- भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) — धारा 193 (न्यायिक कार्यवाही में झूठे साक्ष्य गढ़ना), धारा 209 (न्यायालय में बेईमानी से कपटपूर्ण दावा करना) एवं धारा 465, 471 (जाली दस्तावेज का उपयोग)
- न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971) — अदालत में झूठे हलफनामे पेश कर न्याय प्रशासन को गुमराह करना
- बार काउंसिल ऑफ इंडिया नियम (भाग VI – अध्याय II) — अदालत के प्रति अधिवक्ता के पेशेवर कर्तव्य और सत्यनिष्ठा
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- आपराधिक मामलों में समझौते के हलफनामों और जमानत के निस्तारण का विधिक मानक: ‘अदालतें जमानत याचिकाओं में पक्षों के बीच सुलह या समझौते के मौखिक दावों और पेश किए गए हलफनामों को आंख मूंदकर स्वीकार नहीं कर सकतीं; फर्जी दस्तावेजों के बढ़ते मामलों को देखते हुए लोक अभियोजक को संबंधित जांच अधिकारी के माध्यम से हलफनामे की प्रामाणिकता और पीड़ित की स्वतंत्र सहमति का भौतिक सत्यापन करने का पर्याप्त समय दिया जाना अनिवार्य है; दोपहर में याचिका दाखिल कर शाम तक राहत की मांग करना प्रक्रियात्मक प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन है और यह बार-बेंच के विश्वास को गहरा आघात पहुंचाता है।’
- वर्तमान स्थिति व विधिक प्रभाव: केरल उच्च न्यायालय के इस कड़े रुख के बाद राज्य के आपराधिक वकीलों के लिए यह अनिवार्य संदेश गया है कि किसी भी जमानत या शमन याचिका में पेश किए गए हलफनामों की पुलिस द्वारा औपचारिक पुष्टि होने तक कोई त्वरित आदेश जारी नहीं किया जाएगा, जिससे आपराधिक मामलों में फर्जी हलफनामों के अवैध चलन पर प्रभावी अंकुश लगेगा।
Fake Affidavit:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | केरल उच्च न्यायालय (Kerala High Court), कोच्चि |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति कौसर एडप्पागथ (Justice Kauser Edappagath) |
| विषय/मुद्दा | आपराधिक याचिकाओं/जमानत मामलों में फर्जी समझौते के हलफनामे (Fake Settlement Affidavits) पेश करने पर कोर्ट की चिंता |
| मूल विवाद | अभियुक्त के वकील द्वारा दोपहर 1 बजे याचिका दायर कर शिकायतकर्ता के साथ समझौते के आधार पर शाम 4 बजे तक तुरंत जमानत आदेश पारित करने का दबाव बनाना। |
| अदालत का रुख | सत्यापन के बिना राहत नहीं: प्रॉसीक्यूटर द्वारा पुलिस से सत्यापन (Instructions) कराए बिना केवल हलफनामे के आधार पर कोई जमानत या राहत नहीं दी जाएगी। |

