Saturday, October 31, 2026
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Blanket Ban: न्यायिक निष्कर्ष की आलोचना और जज पर व्यक्तिगत हमला करने में स्पष्ट कानूनी अंतर है; जजों को धमकाने वाले विरोध प्रदर्शनों को अनुमति न दी जाए

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मामले की पृष्ठभूमि: धर्मांतरण/आरक्षण फैसले के बाद जजों पर व्यक्तिगत हमले

  1. 25 जून का विवादित फैसला:मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ (न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति पी.बी. बालाजी) ने तमिलनाडु सरकार के उस आदेश को रद्द कर दिया था, जिसमें पिछड़ा वर्ग (BC), अति पिछड़ा वर्ग (MBC) और अनुसूचित जाति (SC) के व्यक्तियों को इस्लाम धर्म अपनाने के बाद ‘पिछड़ा वर्ग मुस्लिम’ (BCM) के रूप में वर्गीकृत करने की अनुमति दी गई थी। इस फैसले को बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा।
  2. विरोध प्रदर्शन और व्यक्तिगत हमले:फैसले के बाद तमिलनाडु तौहीद जमात (TNTJ) और तमिलनाडु मुस्लिम मुन्नेत्र कझगम (TMMK) जैसे संगठनों ने राज्य भर में विरोध प्रदर्शन आयोजित किए। याचिकाकर्ता का आरोप था कि ये प्रदर्शन केवल फैसले की आलोचना तक सीमित नहीं रहे, बल्कि इनमें पीठ के एक सदस्य के खिलाफ अभद्र भाषा, जातिगत टिप्पणियां और व्यक्तिगत पोस्टर अभियान चलाकर न्यायपालिका की साख गिराने की कोशिश की गई।
  3. राज्य सरकार और पुलिस की कार्रवाई:राज्य सरकार ने कोर्ट को बताया कि पुलिस ने अनधिकृत रैलियों को रोका है। मदुरै में 29 जून और 3 जुलाई को पुलिस की मनाही के बावजूद इकट्ठा भीड़ पर दो एफआईआर (FIR) दर्ज की जा चुकी हैं।

हाईकोर्ट के मुख्य विधिक निष्कर्ष और कड़े निर्देश

1. “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता व्यक्तिगत विषवमन की छूट नहीं देती”:

हाईकोर्ट ने माना कि संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को अदालती फैसलों से असहमति जताने का अधिकार देता है, लेकिन किसी जज को गाली देना, जातिगत टिप्पणियां करना या सुनियोजित तरीके से धमकाना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संरक्षण के दायरे में नहीं आता।

2. राज्य पुलिस साइबर विंग को निर्देश:

कोर्ट ने तमिलनाडु पुलिस की साइबर क्राइम डिवीजन को निर्देश दिया है कि वह सभी डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और सोशल मीडिया पर लगातार निगरानी रखे। यदि कोई भी कंटेंट जजों के खिलाफ आपराधिक धमकी (Criminal Intimidation) के दायरे में आता है, तो बिना देरी किए कानून के तहत प्राथमिकी दर्ज कर दंडात्मक कार्रवाई की जाए।

3. पूर्ण प्रतिबंध (Blanket Ban) से इंकार:

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के उस सुझाव को खारिज कर दिया जिसमें न्यायिक फैसलों के खिलाफ सभी तरह के सार्वजनिक प्रदर्शनों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग की गई थी। पीठ ने कहा कि ऐसा पूर्ण बैन लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति के अधिकारों का हनन करेगा। इसलिए जिला प्रशासन और पुलिस हर आवेदन का मूल्यांकन केस-टू-केस के आधार पर करे।

चेन्नई: भारत का संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) (वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) सहपठित अनुच्छेद 19(2) (अदालत की अवमानना, मानहानि और लोक व्यवस्था के आधार पर उचित प्रतिबंध), अनुच्छेद 19(1)(b) (बिना हथियारों के शांतिपूर्ण सम्मेलन का अधिकार), न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971), तथा भारतीय न्याय संहिता, 2023 / भारतीय दंड संहिता के तहत आपराधिक धमकी (Criminal Intimidation) के विधिक सिद्धांतों पर मद्रास हाईकोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं नज़ीरी फैसला सुनाया है।

मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी (Chief Justice Sushrut Arvind Dharmadhikari) और न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन (Justice G Arul Murugan) की प्रथम खंडपीठ ने आर. कार्तिकेयन द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) का निस्तारण करते हुए तमिलनाडु पुलिस को स्पष्ट और बाध्यकारी निर्देश जारी किए हैं कि सिटिंग जजों (वर्तमान न्यायाधीशों) को व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाने, बदनाम करने या डराने-धमकाने के उद्देश्य से आयोजित होने वाले किसी भी सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन, मार्च या सभा को अनुमति न दी जाए।

पीठ ने यह भी आदेश दिया कि यदि किसी पूर्व-अनुमति प्राप्त शांतिपूर्ण सभा या धरने के दौरान अचानक किसी जज पर व्यक्तिगत, जातिगत या अपमानजनक हमला शुरू हो जाता है, तो मौके पर तैनात पुलिस अधिकारी उस कार्यक्रम को तुरंत समाप्त (End the event immediately) करवाएं और दोषियों के विरुद्ध कानून सम्मत कड़ी आपराधिक कार्रवाई शुरू करें।

उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां

1. ‘कानूनी निष्कर्ष की आलोचना और जज पर व्यक्तिगत हमले के बीच स्पष्ट विधिक रेखा’:

मुख्य न्यायाधीश सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन की खंडपीठ ने न्यायिक निर्णयों की वैध आलोचना और जजों पर दुर्भावनापूर्ण हमलों के मध्य संवैधानिक अंतर स्पष्ट करते हुए दर्ज किया: “नागरिकों को किसी निर्णय से असहमति व्यक्त करने का निर्विवाद अधिकार है। किंतु किसी कानूनी निष्कर्ष की आलोचना करने और उस निर्णय को लिखने वाले व्यक्तिगत न्यायाधीश पर हमला करने के बीच एक स्पष्ट कानूनी रेखा (Clear legal line) मौजूद है। किसी भी वर्तमान न्यायाधीश को व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाने, बदनाम करने या डराने-धमकाने के उद्देश्य से किसी भी सार्वजनिक सभा या मार्च की अनुमति नहीं दी जाएगी। यदि किसी पूर्व-अनुमति प्राप्त सभा का स्वरूप किसी न्यायाधीश पर व्यक्तिगत हमले में तब्दील हो जाता है, तो संबंधित पुलिस अधिकारी उस आयोजन को तत्काल समाप्त करेंगे और उचित कानूनी कार्रवाई करेंगे।”

2. ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता व्यक्तिगत दुर्भावना का ढोंग रचने की अनुमति नहीं देती’:

  • अदालत ने रेखांकित किया कि न्यायाधीशों के विरुद्ध समन्वित अभियान चलाना, गाली-गलौज करना, अपमानजनक भाषा का प्रयोग करना या जाति-आधारित टिप्पणियां करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संवैधानिक संरक्षण के अंतर्गत नहीं आता:“कानून प्रवर्तन एजेंसियों को सभी जिलों में त्वरित और एक समान रूप से कार्य करना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि व्यक्तिगत दुर्भावना और कटुता (Personal Vitriol) को वैध सार्वजनिक विरोध का रूप धारण करने की अनुमति न मिले।”

3. डिजिटल स्पेस और सोशल मीडिया की सक्रिय निगरानी (Cyber Crime Division):

  • अदालत ने केवल भौतिक प्रदर्शनों तक सीमित न रहकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर जजों को दी जा रही धमकियों का कड़ा संज्ञान लिया:“राज्य पुलिस के साइबर क्राइम डिवीजन को डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर सक्रिय निगरानी (Active Surveillance) बनाए रखने का निर्देश दिया जाता है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि ऑनलाइन सामग्री वर्तमान न्यायाधीशों के विरुद्ध आपराधिक धमकी (Criminal Intimidation) में परिवर्तित न हो, और किसी भी उल्लंघन के खिलाफ कानून के अनुसार त्वरित कार्रवाई की जाए।”

4. पूर्ण प्रतिबंध से इनकार: लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति का सम्मान:

  • हालांकि, खंडपीठ ने याचिकाकर्ता के उस अत्यधिक व्यापक सुझाव को अस्वीकार कर दिया जिसमें अदालती फैसलों के खिलाफ सभी प्रकार की सार्वजनिक चर्चाओं या शांतिपूर्ण सभाओं पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग की गई थी:“अदालती फैसलों से संबंधित सभी सार्वजनिक चर्चाओं या शांतिपूर्ण सभाओं पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगाने वाला एक कंबल आदेश (Blanket Order) बहुत अधिक आगे चला जाएगा। यह वैध लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति (Legitimate Democratic Expression) का अतिक्रमण करेगा।”
  • अदालत ने निर्देश दिया कि पुलिस और जिला प्रशासन ऐसे विरोध प्रदर्शनों के आवेदनों पर मामला-दर-मामला आधार (Case-by-case basis) पर विचार करेंगे।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (जून–अक्टूबर 2026)

चरण / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
मूल न्यायिक निर्णय25 जून 2026 — मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै न्यायपीठ (न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन एवं न्यायमूर्ति पी.बी. बालाजी) ने तमिलनाडु सरकार के उस शासनादेश (GO) को रद्द कर दिया था, जिसके तहत पिछड़ा वर्ग (BC), अत्यंत पिछड़ा वर्ग (MBC), विमुक्त समुदाय (DNC) और अनुसूचित जाति (SC) के व्यक्तियों को इस्लाम अपनाने के बाद ‘पिछड़ा वर्ग मुस्लिम’ (BC Muslim) के रूप में आरक्षण का लाभ दिया जाता था। इस आदेश को बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने भी पूरी तरह बरकरार रखा था।
विरोध प्रदर्शनों का स्वरूपनिर्णय आने के बाद कुछ संगठनों (जिनमें तमिलनाडु तौहीद जमात – TNTJ और तमिलनाडु मुस्लिम मुनेत्र कझगम – TMMK शामिल हैं) ने राज्य भर में विरोध प्रदर्शन आयोजित किए।
जनहित याचिका के मुख्य आरोपयाचिकाकर्ता आर. कार्तिकेयन ने आरोप लगाया कि ये विरोध प्रदर्शन वैध कानूनी आलोचना की सीमा लांघकर पीठ के एक सदस्य (सिटिंग जज) को व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाने, उनके विरुद्ध अपमानजनक भाषा का प्रयोग करने, जातिगत टिप्पणियां करने और न्यायपालिका में जनता का विश्वास डिगाने के संगठित अभियान में बदल गए हैं।
राज्य सरकार व पुलिस का पक्षराज्य लोक अभियोजक ने सूचित किया कि मदुरै में 29 जून को TNTJ के प्रदर्शन की अनुमति खारिज की गई थी; फिर भी भीड़ जुटने पर पुलिस ने FIR दर्ज की। इसी प्रकार 3 जुलाई की घटना के बाद TMMK के सदस्यों के खिलाफ दूसरी FIR दर्ज की गई थी।
हाईकोर्ट का अंतिम निर्देश1. सिटिंग जजों को निशाना बनाने वाले प्रदर्शनों को अनुमति देने पर पूर्ण रोक।
2. बीच सभा में हमला होने पर कार्यक्रम तत्काल समाप्त कराया जाए।
3. राज्य का साइबर सेल सोशल मीडिया पर निगरानी रखे और त्वरित कार्रवाई करे।
4. दर्ज दोनों प्राथमिकियों की निष्पक्ष, गहन और समयबद्ध जांच पूरी की जाए।

विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘अनुच्छेद 19(1)(a) बनाम न्यायपालिका की संस्थागत स्वतंत्रता’

  • न्यायपालिका की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत हमलों से सुरक्षा:
    • भारत के संवैधानिक ढांचे में न्यायाधीश जनता या भीड़ के दबाव के बिना निष्पक्ष रूप से संविधान की व्याख्या करने के लिए बाध्य हैं। यदि किसी फैसले से असंतुष्ट वर्ग को संबंधित जज के घर के बाहर प्रदर्शन करने, उनकी जाति पर आपत्तिजनक टिप्पणियां करने या उन्हें धमकाने की अनुमति दी जाएगी, तो न्यायिक स्वतंत्रता का बुनियादी ढांचा (Basic Structure) ही ध्वस्त हो जाएगा।
    • सर्वोच्च न्यायालय ने सी. रविचंद्रन अय्यर बनाम जस्टिस ए.एम. भट्टाचार्जी [(1995) 5 SCC 457] में यह सुस्थापित किया है कि न्यायपालिका की गरिमा की रक्षा केवल जजों के व्यक्तिगत विशेषाधिकार के लिए नहीं, बल्कि नागरिकों के कानून के शासन में विश्वास को बनाए रखने के लिए अनिवार्य है।
  • संविधान का अनुच्छेद 19(2) और ‘लोक व्यवस्था’ (Public Order):
    • बोलने की स्वतंत्रता कभी भी ‘न्यायालय की अवमानना’ (Contempt of Court) या ‘अपराध के लिए उकसाने’ (Incitement to an offence) की ढाल नहीं बन सकती।
    • मद्रास हाईकोर्ट ने यह अत्यंत संतुलित व्यवस्था दी है कि सरकार नीतियों या अदालती निर्णयों पर शांतिपूर्ण असहमति और परिचर्चा पर रोक नहीं लगा सकती (ब्लैंकेट बैन से इनकार), किंतु जहां भी विरोध का उद्देश्य किसी जज का चरित्र-हनन करना हो, वहां प्रशासनिक अधिकारियों को बिना किसी संकोच के धारा 144 अथवा पुलिस शक्तियों का प्रयोग करना चाहिए।

विधिक विवरण एवं उपस्थित अधिवक्ता

  • न्यायालय: मद्रास उच्च न्यायालय (मूल जनहित रिट क्षेत्राधिकार)
  • केस संदर्भ: आर. कार्तिकेयन बनाम भारत संघ व अन्य [W.P. No. … / 2026]
  • पीठ: मुख्य न्यायाधीश सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी एवं न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन (प्रथम खंडपीठ)
  • निर्णय की तिथि: 30 अक्टूबर 2026 (शुक्रवार)
  • कार्यवाही का परिणाम: जनहित याचिका का विस्तृत और बाध्यकारी दिशा-निर्देशों के साथ निस्तारण (Closed with directions)।

विधिक प्रतिनिधित्व:

  • याचिकाकर्ता (आर. कार्तिकेयन) की ओर से: अधिवक्ता राजेंद्रन राघवन (Advocate Rajendran Raghavan)।
  • तमिलनाडु पुलिस महानिदेशक (DGP) की ओर से: राज्य लोक अभियोजक जॉन सत्यन (State Public Prosecutor John Sathyan), जिन्हें सरकारी अधिवक्ता एन. पलानीवेल ने सहयोग दिया।
  • तमिलनाडु राज्य सरकार की ओर से: सरकारी अधिवक्ता एस. गणेश बाबू (Government Advocate S Ganesh Babu)।
  • भारत संघ (केंद्र सरकार) की ओर से: अधिवक्ता जी. बाबू (Advocate G Babu)।
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 19(1)(a) (वाक् स्वतंत्रता), अनुच्छेद 19(2) (उचित प्रतिबंध—अदालत की अवमानना व मानहानि), अनुच्छेद 19(1)(b) (सभा की स्वतंत्रता) एवं अनुच्छेद 226
    • न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971) — धारा 2(c) (आपराधिक अवमानना—न्याय प्रशासन में बाधा व न्यायिक प्राधिकार को कलंकित करना)
    • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 / CrPC — सार्वजनिक सभाओं के नियमन व शांति व्यवस्था बनाए रखने संबंधी पुलिस शक्तियां
    • भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) — आपराधिक धमकी, मानहानि एवं गैर-कानूनी जमावड़ा संबंधी धाराएं
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • न्यायिक निर्णयों की आलोचना और जजों की सुरक्षा का विधिक मानक: ‘किसी नागरिक को अदालत के कानूनी निष्कर्ष से असहमति जताने और उसकी विधि सम्मत आलोचना करने का पूर्ण अधिकार है; किंतु किसी निर्णय के आधार पर संबंधित न्यायाधीश को व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाना, उनकी जाति या निष्ठा पर दुर्भावनापूर्ण आक्षेप लगाना या उन्हें डराने-धमकाने के लिए रैलियां निकालना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में नहीं आता; पुलिस प्रशासन को ऐसे प्रदर्शनों की अनुमति तुरंत अस्वीकार करनी चाहिए और डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर साइबर सेल के जरिए सक्रिय निगरानी रखकर आपराधिक धमकी देने वालों के विरुद्ध त्वरित कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए।’
  • वर्तमान स्थिति व अनुपालन निर्देश: मद्रास उच्च न्यायालय के इस निर्णय के बाद तमिलनाडु के सभी जिलाधिकारियों एवं पुलिस अधीक्षकों को जजों के विरुद्ध किसी भी प्रदर्शन की अनुमति न देने और पहले से दर्ज दो प्राथमिकियों की जांच निष्पक्ष व त्वरित गति से पूरी करने का औपचारिक निर्देश लागू हो गया है; साथ ही, राज्य पुलिस का साइबर क्राइम डिवीजन सोशल मीडिया पर न्यायिक अधिकारियों को निशाना बनाने वाले हैंडल्स पर सीधे कानूनी कार्रवाई करेगा।

Blanket Ban:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतमद्रास उच्च न्यायालय (Madras High Court), चेन्नई
पीठमुख्य न्यायाधीश सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी एवं न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन
मामला/साइटेशनकार्तिकयन बनाम भारत संघ व अन्य (Karthikeyan Vs Union of India)
याचिकाकर्ताआर. कार्तिकयन (सामाजिक कार्यकर्ता/श्रद्धालु) | प्रतिनिधित्व: अधिवक्ता राजेंद्रन राघवन
प्रतिवादी पक्षतमिलनाडु सरकार और डीजीपी | प्रतिनिधित्व: राज्य लोक अभियोजक जॉन सत्यन व अन्य
मूल विवादमदुरै पीठ के धर्म परिवर्तन/आरक्षण फैसले के बाद मुस्लिम संगठनों (TNTJ, TMMK) द्वारा जज के खिलाफ व्यक्तिगत व जातिगत रैलियां और पोस्टर अभियान।
अदालत का फैसला1. व्यक्तिगत विरोध पर रोक: जजों को निशाना बनाने वाले प्रदर्शनों की अनुमति खारिज होगी; जारी प्रदर्शन में ऐसा होने पर तुरंत रोक लगेगी।
2. साइबर सेल निगरानी: जजों को धमकाने वाले ऑनलाइन कंटेंट पर साइबर क्राइम विंग तुरंत एफआईआर दर्ज करे।
3. निष्पक्ष आलोचना की अनुमति: शांत एवं वैध लोकतांत्रिक चर्चाओं/विरोध पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने से इंकार।
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